हिन्दी साहित्य में ओबीसी विमर्श

डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह की नई पुस्तक ओबीसी विमर्श को प्रतिष्ठापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने इस पुस्तक में ओबीसी साहित्य की अवधारणा के संदर्भ में अत्यंत गंभीर विवेचन- विश्लेषण प्रस्तुत किया है और ओबीसी साहित्य की परंपरा,मूल्यों, मान्याताओें, सिद्धांतों को तार्किक ढंग से रेखांकित किया है

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पुस्तक:  ओबीसी साहित्य विमर्श; लेखक: डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह; प्रकाशकः सम्यक प्रकाशन, 32/3, पश्चिमपुरी, नई दिल्ली – 110063; मूल्य: 100 रूपये; संपर्क : 9810249452, 9818390161

वर्तमान हिन्दी साहित्य में विमर्शों का दौर चल रहा है। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श आदिवासी विमर्श के बाद अब ओबीसी विमर्श प्रारंभ हुआ है। हिन्दी साहित्य में विमर्शों का उद्देश्य हाशिये पर रहे वर्ग को उचित स्थान दिलाना है। पूर्व में यह वर्ग हिन्दी साहित्य में काफी उपेक्षित रहा है। इनकी संवेदना एवं स्वानुभूति को साहित्य में पर्याप्त स्थान नहीं मिला।

हिन्दी साहित्य में दलित विमर्श एवं स्त्री विमर्श की शुरूआत करने एवं हाशिये पर रहे दलित – स्त्रियों को साहित्य के केन्द्र में लाने का श्रेय प्रख्यात साहित्यकार एवं ‘हंस’ पत्रिका के संपादक रहे राजेन्द्र यादव को है। उन्होंने विगत दो-ढाई दशकों में ‘हंस’ में चलाए जा रहे विमर्शों के माध्यम से दलितों एवं स्त्रियों को उनकी संपूर्ण गरिमा के साथ साहित्य में स्थापित करने का कार्य किया। उन्होंने कई उपेक्षित, पर प्रतिभासम्पन्न दलितों को प्रोत्साहित-प्रेरित कर लेखक बनाया। कई स्त्रियों को साहित्यकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने स्वयं पुरानी, दकियानुसी, पारंपरिक एवं जड़वादी मूल्यों, विचारधाराओं, चिंतन प्रणाली पर प्रश्न खडे़ किये, मिथकों – अंधविश्वासों पर कुठराघात किया और अपने सहयोगी –मित्रों को पुरातन व्यवस्थाओें-प्रणालियों की शल्य-क्रिया करने की पूरी छूट दी; उन्हें सहयोग प्रदान किया। यादव युग के ‘हंस’ की प्रतियों में ऐसे लेखक -साहित्यकारों की सैकड़ों रचनाएं देखी-पढ़ी जा सकती हैं, जिनमें पुरातन मूल्यों, विश्वासों , प्रणालियों, मानकों को प्रश्नविद्ध किया गया है।

राजेन्द्र यादव की तरह आलोचक एवं भाषाविद् डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने इधर हिन्दी साहित्य में एक नयें विमर्श को जन्म दिया हैं- ओबीसी विमर्श । दिल्ली से प्रकाशित द्विभाषी पत्रिका ‘फारवर्ड प्रेस’ में कई आलेख लिखकर उन्होंने इस नई अवधारणा को बल दिया है। ‘फारवर्ड प्रेस’ ने भी इस विमर्श को आगे बढाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। वर्श 2011, 2012, 2013 एवं 2014 में बहुजन साहित्य (दलित,ओबीसी, आदिवासी, एवं स्त्री ) वार्षिकी (विशेषांक) प्रकाशित कर  ‘फारवर्ड प्रेस’ ने नये विमर्श को स्थापित करने का पुरजोर प्रयास किया है।

हालांकि अभी भी ओबीसी विमर्श (ओबीसी साहित्य) को लेकर समकालीन लेखक-साहित्यकारों में मत-भिन्नता है। कुछ साहित्यकारों ने इस नये विचार का स्वागत किया है तो कइयों ने इसकी अवघारणा को खारिज किया है। राजेन्द्र यादव ने एक साक्षात्कार में ओबीसी विमर्श पर पूछे गए सवाल के जवाब में कहा था कि ‘ओबीसी साहित्य की कोई अवधारणा  अभी तक सामने नहीं आयी है। मेरे लिए यह नई चीज है। ओबीसी अपने विचार को समग्रता से पहले सामने लाये, अपने  चिंतकों को सामने लाये तो अपेक्षित सहयोग करूंगा।‘ शायद यहीं वजह है कि डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने ओबोसी साहित्य की अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए ‘ओबीसी  साहित्य विमर्श ’ नामक एक पुस्तक लिखी है जो, सम्यक प्रकाशन से हाल ही में प्रकाशित हुई है।

इस पुस्तक में डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने ओबीसी साहित्य की अवधारणा, ओबीसी साहित्य की विषय-वस्तु, ओबीसी साहित्य के सिद्धांत एवं सिद्धांतकार, ओबीसी आलोचनाः सिद्धांत और विनियोग, हिन्दी भाषा में ओबीसी विमर्श, ओबीसी साहित्य के आधुनिक विमर्शकार आदि शीर्षकों द्वारा ओबीसी साहित्य के व्यापक परिपे्रक्ष्य पर प्रकाश डाला है।

ओबीसी साहित्य के नामकरण के औचित्य पर विचार करते हुए उन्होंने लिखा है कि ‘‘ जब धर्म – संप्रदाय के नाम पर हिन्दी साहित्य में सिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य और जैन साहित्य की काव्यधारा की पहचान की जा सकती है एवं की गई है, तब ओबीसी साहित्य के रूप में एक मुकम्मल और सशक्त काव्यधारा की पहचान क्यों नहीं की जा सकती है? इतना ही नहीं, जब ईश्वर के नाम पर और उसके रूप के आधार पर हिन्दी साहित्य में राम काव्य, कृष्ण काव्य, सगुण काव्य, निर्गुण काव्य आदि जैसी साहित्यिक काव्यधाराओं का वर्गीकरण किया जा सकता है एवं किया गया है, तब ओबीसी साहित्य से परहेज क्यों? यदि ओबीसी को भारतीय समाज का एक वर्ग मान लिया जाए, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता है। कारण कि हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक दबंग वर्ग के नाम के आधार पर ‘सामंत युग’ की परिकल्पना है । यदि भारतीय समाज के एक दबंग वर्ग के नाम के आधार पर कोई साहित्यिक काल-खण्ड हो सकता है,तब उसी समाज के एक कमजोर एवं पिछड़ा वर्ग के नाम पर ओबीसी साहित्य की अवधारणा क्यों नहीं खड़ी की जा सकती है? वर्ग क्या, जाति के आधार पर भी हिन्दी साहित्य में ‘चारण काल’ जैसे नाम दर्ज किए गए हैं। आधुनिक काल में द्विवेदी युग (काव्य), शुक्ल युग (आलोचना) जैसे नामकरण भी जातिसूचक उपाधि के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। यदि दलित साहित्य हो सकता है, तो ओबीसी साहित्य क्यों नहीं ? आधी आबादी के नाम पर हिन्दी साहित्य में स्त्री विमर्श और महिला लेखन को रेखांकित किया गया है। भारतीय समाज में ओबीसी की आबादी आधी से भी ज्यादा है। फिर ओबीसी साहित्य क्यों कैसें नहीं?

ओबीसी संवैधानिक मान्यता प्राप्त एक सामाजिक समूह का सूचक शब्द है और यह समूह भारतीय समाज के प्रत्येक क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है। भारत में जाति – व्यवस्था बगैर किसी वैज्ञानिक आधार के पिछले पांच हजार सालों से न सिर्फ  जिंदा है, बल्कि अपने गैर-बराबरी के सिद्वांतों का बहुत ही प्रभावशाली असर अपने सामाजिक,आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षणिक व्यवस्था पर छोड़ा है। आजादी के बाद भी ओबीसी समूह का पिछडेपन कायम है। शायद इसीलिए वी.पी.सिंह  ने ‘मंडल विचार’ के लोकापर्ण के अवसर पर कहा है कि ‘मंडल केवल आरक्षण नहीं एक विचार है, एक मानवतावादी विचार है। उसी प्रकार आबीसी साहित्य भी एक विचार है, एक मानवतावादी विचार है।’’ (पृ0 21)

ओबीसी के विचारकों का उल्लेख करते हुए डा. राजेन्द्र प्रसाद सिहं ने ओबीसी साहित्य के प्रथम सिद्वांतकार कौत्स (7 वीं शती ईसा पूर्व) को माना है। उन्होंने लिखा है – ‘‘ कौत्स वेद-विरोधी थे। वे सिर्फ वेदों की मान्यता का ही विरोध नहीं करते थे, अपितु यह भी कहते थे कि वैदिक मंत्र अर्थहीन हैं। वे वेद को बकवास साबित करने के लिए अनेक युक्तियाँ दिया करते थे। यह दुर्भाग्य की बात है कि कौत्स का पूरा साहित्य आज उपलब्ध नहीं हैं बावजूद इसके उनका लिख हुआ जो भी साहित्य मिलता है, उससे पता चलता है कि कौत्स ओबीसी साहित्य के प्रथम मौलिक सिद्धांतकार थे। (पृ0 37)

1496658_240488226155672_1289237039_nडा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने ओबीसी के बाद के विचारक -चिंतकों में मक्खली गोशाल, अजित केशकंबली, बुद्ध, गोरखनाथ, कबीर, फुले, पेरियार, गांधी, आंबेडकर और लोहिया को सम्मिलित किया है। राम स्वरूप वर्मा, जगदेव प्रसाद और बी.पी. मंडल को भी ओबीसी का प्रमुख विचारक-सिद्धांतकार माना है।

ओबीसी आलोचना एवं आलोचना की अन्य पद्धतियों की चर्चा करते हुए उन्होंने पारंपरिक आलोचना पद्धति-प्रणालियों एवं स्थापनाओं केा सिरे से नकारते हुए ओबीसी साहित्य की मूल्यांकन में उन्हें अप्रासंगिक करार दिया है। इस सिद्धांत की प्राचीन शास्त्रीय समीक्षा पद्धति पर प्रश्न उठाते हुए उन्होंने लिखा है कि ,‘‘ ओबीसी साहित्य का मानदंड, उसका काव्यशास्त्र और उसका सौंदर्यबोध अलग है। इसलिए ओबीसी आलोचना हिन्दी की सभी आलोचनात्मक पद्धतियों से अलग है।’’ (पृ0 50) उन्होंने पाश्चात्य मनोविश्लेषणवादी आलोचना एवं मार्क्सवादी आलोचना को भी भारतीय संदर्भ में अप्रासंगिक करार दिया है। वे लिखते हैं, ‘‘मनोविश्लेषणवादी आलोचना भी हिन्दी में पाश्चात्य जगत के ढर्रे पर मनोविज्ञान तथा मनोविश्लेषनात्मक चितंन पद्धति के प्रभाव से आया है। इसलिए यह भी फ्रायड, एडलर, और युंग की मान्यताओं और सिद्धांत पर आधारित है। भारत में दमित वासनात्मक ग्रंथि अथवा शारीरिक हीनताजनित ग्रंथि से महत्वपूर्ण दमित जातीय दंश की  ग्रंथि है।  फ्रायड, एडलर और युंग के समाज में यह ग्रंथि मौजूद नहीं है, अतः भारतीय परिप्रेक्ष्य में पाश्चात्य ढर्रे पर स्थापित मनोविश्लेषणवादी आलोचना एक सीमा तक असफल है। कारण कि आलोचना की यह पद्धति भारत में चेतन-अवचेतन-अर्धचेतन मानस में किसी पिछडे़ या दलित लेखक के दमित जातीय दंश को विश्लेषित नहीं कर पाती है। भारत में मार्क्सवादी आलोचना एकदम बेईमानी है। कारण कि भारत में वर्ग नहीं बल्कि वर्ण और जाति है। यहाँ वर्ग–संघर्ष  से ज्यादा महत्वपूर्ण जाति-संघर्ष है। इसलिए जगदेव प्रसाद ने कहा है कि दस प्रतिशत शोषक बनाम नब्बे प्रतिशत शोषित की इज्जत और रोटी की लड़ाई भारत में समाजवाद या कम्युनिज्म की असली लड़ाई है। भारत जैसे द्विज शोषित देश में असली वर्ग-संघर्ष यही  है।’’ (पृ0 51)

डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने ओबीसी आलोचना को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि ‘‘ ओबीसी आलोचना नाना प्रकार की विशेषताओं का वह पुंज है, जो पारंपरिक आलोचना पद्धतियों से उसे अलग करता है। यह ब्राह्मणवादी संस्कृति पर आधारित नहीं है, बल्कि श्रम संस्कृति पर आधारित आलोचना की पद्धति है। इसके प्रेरणा-स्रोत अलग हैं। वेद, पुराण,  और रामायण इसके प्रिय ग्रंथ नहीं हैं। गोलवरकर और तिलक जैसे हिन्दू फासिस्ट विचारकों को यह आलोचना पद्धति खारिज करती है, इसका आलोचनात्मक मानदंड तुलसीदास नहीं बल्कि कबीर हैं। यह महात्मा बुद्ध, फुले, पेरियार जैसे समाज सुधारकों को अपना आदर्श मानती है। यह आलोचना पद्धति श्रम में सौन्दर्य खोजती  है। कारण कि ओबीसी की सभी जातियां श्रमशील हैं। खेती, पशुपालन, उद्योग-व्यापार, बुनाई अथवा कारीगरी के अन्य सभी कार्य ओबीसी के लोग किया करते हैं। इसीलिए मक्खली गोशाल और बुद्ध से लेकर फुले-गांधी और राममनोहर लोहिया तक ने श्रम की प्रतिष्ठा की है। मानववाद की पहचान करना ओबीसी आलोचना पद्धति की सबसे बड़ी खासियत है। ढोंग, पाखंड, पूजा-पाठ, जाति-व्यवस्था आदिको प्रोत्साहित करने वाले साहित्य को ओबीसी  आलोचना नकारती है और जाति के आघार पर हिन्दी में चलाए गए काव्यांदोलनों की बारीकी से जांच करती है।’’  (पृ0 52)

डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने ओबीसी साहित्य को दलित एवं सवर्ण साहित्य से अलग करते हुए लिखा है कि ‘‘ हिन्दी का दलित साहित्य अपना दरवाजा सिर्फ दलित-रचनाकारों के लिए खोल रखा है। उसमें ओबीसी रचनाकारों की गुंजाइश कम होती जा रही है। पहले ऐसा नहीं था। अर्जक संघ के नेतृत्व में दलित-पिछडे़ वर्ग के लोग एक साथ थे। दोनों वर्गो के चिंतक भी एक थे। पेरियार और फुले पिछड़े वर्ग से आते हैं। आंबेडकर दलित वर्ग से आते हैं, बावजूद इसके वे अपना गुरू फुले को मानते हैं। हिन्दी साहित्य के इतिहास में साहित्य की तथाकथित जो मुख्यधारा है, वह सवर्णों के लिए आरक्षित है। ऐसे में ओबीसी रचनाकार कहाँ जाएंगे? आज, जब अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग, अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग, सवर्ण आयोग जैसी संस्थाओं पर सरकारी मुहर लग चुकी है, तब सवर्ण साहित्य, ओबीसी साहित्य और दलित साहित्य पर भी साहित्यिक मुहर लगनी चाहिए।’’  (पृ0 22)

कुल मिलाकर डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह की यह पुस्तक ओबीसी विमर्श को प्रतिष्ठापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने इस पुस्तक में ओबीसी साहित्य की अवधारणा के संदर्भ में अत्यंत गंभीर विवेचन- विश्लेषण प्रस्तुत किया है और ओबीसी साहित्य की परंपरा,मूल्यों, मान्याताओें, सिद्धांतों को तार्किक ढंग से रेखांकित किया है। निश्चित रूप से इस पुस्तक से ओबीसी विमर्श को काफी बल मिलेगा।

 

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  1. रामकृष्ण यादव Reply

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