एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप; एक मील-पत्थर

इससे सामग्री के लिए स्पेस कम हुआ होगा, लेकिन इसने भाषायी-मनोविज्ञान में एक स्वस्थ भूमिका भी निभाई। एक और इसने अंग्रेजी को जमीन से जोड़े रखा, दूसरी और हिन्दी को उसके स्थानिक और सामंती संस्कारों से दूर रखने में मदद की

फारवर्ड प्रेस’ से मेरा परिचय आशीष अलेक्सजेंडर ने करवाया था, जो इसके शुरुआती दौर में इसके संपादक थे और अनुवाद का कामकाज देखते थे। उसी समय भी मालूम चला था कि पुराने जानकार प्रमोद रंजन भी वहां हैं, सलाहकार संपादक बने हैं। पत्रिका के सरोकारों से मेरी सहानुभूति और संलग्नता थी। पत्रिका का अंग्रेजी और हिंदी में एक-साथ छपना बड़ा खास लगा था। बाद में पत्रिका नियमित रूप से मेरे पास पहुंचने लगी। इससे पहले, इस रूप में बहुजन-दलित विमर्श पर कोई पत्रिका हिंदी में नहीं थी, हालांकि वर्चस्वशाली मुख्यधारा मीडिया के समय में उसकी जरूरत बहुत अधिक थी। दलित मुद्दों के लिए प्रचलित मीडिया में उपेक्षा बड़ी साफ  थी। इस बीच में, एक या दूसरे प्रकार से, पत्रकारिता या इलेक्ट्रोनिक मीडिया में दलित या बहुजन पृष्ठभूमि के पत्रकारों की कमी बहस का मुद्दा बनने लगी थी और दलित पक्ष की वकालत करने वाले वैकल्पिक पत्रकारिता-मंच की मांग उठने लगी थी। ‘फारवर्ड प्रेस’ दलित-बहुजन पत्रकारिता की खोज में एक ऐतिहासिक महत्व की प्रविष्टि और मील का पत्थर बन गई। अब तक की क्षेत्रीय और नौसिखिया किस्म की, लघु-पत्रिका मार्का दलित-बहुजन पत्रकारिता को एक फ़स्र्ट-रेट पेशेवराना स्तर चाहिए था। फारवर्ड प्रेस ने यह कार्य किया। यह महत्व-आकांक्षा और आत्मविश्वास उसके नाम में ही स्पष्ट था। बैकवर्ड और दलित समुदायों के पक्ष की पत्रिका; नाम ‘फारवर्ड प्रेस’।

56498‘फारवर्ड प्रेस’ बहुजन की पत्रिका थी, केवल दलित की नहीं। यह सही है कि इन सालों में बहुजन कि जगह दलित संज्ञा ही अधिक प्रयोग होती नजर आती रही है। एफपी ने एक तरह से थोड़ा अलग रुख रखा। यह अलग रुख ही उसकी खासियत और पहचान थी। जो बात राजनीति में इतनी नजर नहीं आती-दलित, ओबीसी, स्त्री-विमर्श और आदिवासी विमर्श की एकता; उसको उन्होने ‘फारवर्ड प्रेस’ में करने की कोशिश की। एक बौद्धिक तीखेपन के साथ। हालांकि इस कोशिश के जो व्यावहारिक अंतर-विरोध हैं; वे यहां चर्चा में ज्यादा नहीं रहे। तथापि, सामाजिक पक्ष से न सही, बहुजन और दलित के राजनीतिक अंतर-विरोधों पर यहां बात होती रही है। तो भी, ऐसा करते हुए भी, कुल मिलकर उसका रवैया बहुजन-दलित के प्रति समान्य जातिगत पक्षधरता और लगाव का ही रहा। बहुजन और दलित पक्ष की बहुजन-व्याख्या ही उसका उद्देश्य रही है। इसके लिए एफ पी ने दलित-बहुजन लेखकों, खासकर पत्रकारीय लेखन करने वालों का न केवल एक नया समुदाय बनाया बल्कि उन्हें प्रशिक्षित करने की कोशिश भी की। इसी प्रकार दूसरे सहयोगियों को भी। मसलन, एफ पी लाल रत्नाकर जैसा चित्रकार सामने लेकर आई, जिसने बहुजन-दलित वैचारिकी और कल्पनाओं को एक शक्ल दी। एफ पी में उनका योगदान अतुलनीय है। वे एफ पी की उपलब्धियों में से एक हैं

इसमें शक नहीं की ‘फारवर्ड प्रेस’ ने फूले और आंबेडकर की सोच को आगे बढ़ाया। जाति के नजरिए से बहस हुई। अब यह देखना होगा कि बहुत से लोगों कि जाति उजागर करके एफ पी ने कितना तोड़ा; कितना बनाया। एफ पी के पन्नों पर ही, देश के कई मशहूर गायकों और फिल्म-कलाकारों की दलित पृष्ठभूमि को बताया गया था। शायद ऐसा पहली बार हुआ किसी पत्रिका में; जिसमें टुनटुन, शैलेंद्र, सोनू निगम और सुखविंदर सिंह जैसे लोगों के नाम थे। यह एक अच्छी रिसर्च थी। पता चलता है कि केवल कठोर श्रम में ही नहीं, ललित कलाओं में, खासकर पापुलर और लोक-कलाओं में बहुजन-दलित का योगदान जबर्दस्त है। इसी के साथ एफ पी ने असुर और देव के पौराणिक इतिहास को नए सिरे से लिखने की कोशिश की और कई बहसों को जन्म दिया। दलित इतिहास और अस्मिता से जुड़ी बहुत सी जानकरियां पहली बार यहां से ही मिली। जो अब तक अकथित था, अज्ञात था, यहां प्रकट हुआ। और यह सब  लेखको-पत्रकारों कि नई बिरदारी के साथ जिसके अधिकतर सदस्य युवा थे।

एफ पी समसामयिक विषयों और सैद्धांतिकी का सुंदर मिश्रण रहा है। वह भी एक आम पाठक को समझ में आने वाली खांटी पत्रकारीय भाषा में; लेखों कि उबाऊ लंबाई से बचते हुए। दलित-बहुजन उद्यमियों के लिए जारी कालम एक अन्य खास उपक्रम था। समय की मांग होने के साथ, एफ पी एक सफ ल प्रयोगधर्मी प्रयास भी रहा। जैसे पत्रिका का द्विभाषी (हिंदी-अंग्रेजी) होना। इससे सामग्री के लिए स्पेस कम हुआ होगा, लेकिन इसने भाषायी-मनोविज्ञान में एक स्वस्थ भूमिका भी निभाई। एक और इसने अंग्रेजी को जमीन से जोड़े रखा, दूसरी और हिंदी को उसके स्थानिक और सामंती संस्कारों से दूर रखने में मदद की। जैसा कि प्रमोद रंजन बताते हैं कि एफ पी के मालिक व मुख्य संपादक बरसों तक केनेडा में सक्रिय रह कर भारत आए थे। उनके वैश्विक अनुभव का लाभ एफ पी को मिला। पत्रिका की प्रॉडक्शन वेल्यू ऊंचे दर्जे की रही है और सामग्री की गुणवत्ता से समझौता नहीं हुआ है। इसे लगातार बनाए रखना बहुत मुश्किल हो सकता है, खासकर बहुजन-दलित समाजशास्त्र में। एफ पी ने इसे संभव कर दिखाया। पर इसके लिए कितना खून जला होगा इसे तो इसके मालिक या सलाहकार संपादक ही जानते हैं। हमने तो इसका सिर्फ  आनंद ही उठाया है। अंतत: एफपी की मुख्य पहचान हिन्दी रूप में ही बनी। यह दिलचस्प है; इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि पत्रिका दिल्ली में स्थित रही।

कुछ कमियाँ भी खलती रहीं। बहुजन-समाज से बाहर के, सहानुभूति रखने वाले वर्गों के साथ, बहुजन-विमर्श रिश्ता कैसा हो, उसे शायद एफपी ज्यादा एड्रेस नहीं कर सकी। यहीं बात मार्क्सवाद के बारे में कही जा सकती है। आदिवासी समाजों या उपेक्षित डिनोटीफ़ाईड श्रेणियों के बारे में भी ज्यादा विश्लेषण यहाँ नहीं दिया जा सका। इसके अलावा पत्रिका के विमर्श मुख्यत: उत्तर भारत तक ही सीमित रहे। उसमें भी पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, जम्मू-काश्मीर और राजस्थान जैसे हिस्से थोड़ा छूटते रहे। संभव है हमारे पास इन दायरों से निकले लेखकों-टिप्पणीकारों की कमी है।

फॉरवर्ड प्रेस का जन्म अपने समय के दबाव से हुआ था। उसका बंद होना (या ठहरना) भी क्या समय का ज़ोर है? एक बात तो तय है कि उसे वेब रूप में लाकर उसके प्रिंट रूप के पुराने अवतार के लौटने की संभवाना को जीवित रखा गया है। यूं भी, बदलते दौर में वेब-मंच की भूमिका बढ़ती जाती है और वह भी अपने किस्म के धमाके करने में सक्षम है। एक पक्ष में इसे दलित-बहुजन पत्रकारिता का अगला चरण भी कहा जा सकता है। हो सकता है यह दलित चेतना के लिए अग्रगामी साबित हो। बहरहाल, फिलहाल अभी तो यही कहा जा सकता है कि बहुजन-दलित की स्टडी करने वाला एफ पी का प्रिंट संस्करण अब खुद एक स्टडी-सामग्री है। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में उसके उदय और योगदान को योग्य कमेंटेटर और शोधार्थी अवश्य चिह्नित करेंगे।

(फॉरवर्ड प्रेस के अंतिम प्रिंट संस्करण, जून, 2016 में प्रकाशित)

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