पैसे दो, प्रतियां जलाओ!

मेरी नजऱ पत्रिका के एक लेख ‘राम गए कृष्ण आए’ पर अटक गई थी। कुछ अजीब का आकर्षण लगा। मैंने अपने कंपार्टमेंट से बाहर निकल कर टॉयलेट के आगे की रौशनी में उस आर्टिकल को पढ़ा

सही तारीख तो याद नहीं लेकिन मुझे यह अच्छी तरह से याद है कि उस दिन मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 11 या 15 पर पटना के लिए राजधानी एक्सप्रेस का इंतज़ार कर रहा था। ट्रेन 45 मिनट बाद प्लेस होने वाली थी। मैं समय काटने के लिए एक बुकस्टाल पर किताबें पलट रहा था। तभी मेरा मोबाइल बजा। पत्नी ज्योति का फोन था कि इस महीने की ‘मनोरमा’, ‘सरिता’, ‘गृहशोभा’, ‘वनिता’ और भी जो नई मैगज़ीन मिले, ले लेना। मैं ‘इंडिया टुडे’ और ‘आउटलुक ट्रैवलर’ पढऩे का शौकीन था। मैंने हम दोनों के लिए पत्रिकाएं खरीदी। दुकानदार ने छुट्टे पैसे नहीं हैं का बहाना कर एक नई मैगज़ीन भी पकड़ा दी। कुछ अजीब सा नाम लगा ‘फारवर्ड प्रेस।’

ट्रेन में डिनर के समय तक मैंने प्राय: सभी पत्रिकाएं पलट लीं। अंत में, मैं ‘फॉरवर्ड प्रेस’ को पलट रहा था कि बगल से आवाज आई, ‘भाईसाहब, अब लाइट बंद कर दो।’ लेकिन मेरी नजऱ पत्रिका के एक लेख ‘राम गए कृष्ण आए’ पर अटक गई थी। कुछ अजीब का आकर्षण लगा। मैंने अपने कंपार्टमेंट से बाहर निकल कर टॉयलेट के आगे की रौशनी में उस आर्टिकल को पढ़ा। यह प्रमोद रंजन का आर्टिकल था, जिसने मुझे प्रभावित किया। उसी मैगज़ीन में संवाददाता चाहिए का विज्ञापन भी था। मैंने सोचा कि इसमें अप्लाई करना चाहिए क्योंकि हम लोगों (मैं खुद और मेरी फैमिली) ने कर्मकांड काफी पहले छोड़ दिया था। अवैज्ञानिक और विचित्र पारंपरिक ब्राह्मणवादी व्यवस्था की खिलाफत मेरे खून में है। मुझे लगा की यह पत्रिका अन्य पत्रिकाओं से अलग है। सारे के सारे आर्टिकल शोध किए हुए लगे, जो सीधे-सीधे दिमाग के अंदर जा रहे थे।

download (4)सुबह पटना स्टेशन पर मेरी नींद खुली, लेकिन पत्रिका गायब थी। कंपार्टमेंट में छानबीन के बाद पता चला की बगल वाले पैसेंजर मैगज़ीन को लेकर रास्ते में ही उतर चुके हैं। बाद में मैंने इस अंक की कुछ प्रतियां सप्रयास प्राप्त कीं तथा अपना बायोडेटा दिए गए पते पर मेल किया। कुछ दिनों बाद प्रमोद जी का ईमेल और फिर फोन आया। कुछ फॉर्मल बातचीत हुई। मैं संवाददाता चुन लिया गया।

इस पत्रिका ने ‘बहुजन परंपराओं का पुनर्जागरण’ किया। बहुजनों के जाति नायक सीरीज अद्भुत है। मेरे आसपास कोसी क्षेत्र में प्राय: सभी बहुजन जातियों के अपने-अपने नायक हैं, जिनकी कहानियों का प्रकाशित होना आवश्यक है।

फॉरवर्ड प्रेस के सभी लेख शोधपरक होते है, भाषा तीखी होने के कारण सीधे-सीधे दिमाग पर चोट करती है। संवाददाता बनने के कुछ समय बाद दुगार्पूजा के समय मेरे साथ एक विचित्र घटना घटी। सूचना व जनसंपर्क विभाग के स्थानीय दफ्तर से फोन करके मुझे बुलाया गया। डीपीआरओ ने कहा की कुछ लोग मेरे एवं फॉरवर्ड प्रेस के खिलाफ  शिकायत करने आए थे कि यह पत्रिका सामाजिक विद्वेष बढ़ा रही है। इस पत्रिका का विरोध किया जाएगा। हालाँकि कोई लिखित शिकायत नहीं थी, लेकिन उन्होंने ने कहा कि सचेत रहिएगा। दूसरे दिन सुबह-सुबह मेरे पापा (डा. एम.एन. मल्लिक) के क्लीनिक में कुछ लोग ब्राह्मण टोला से आए शिकायतों का पिटारा लेकर। सभी लोग मेरे परिचित थे। एक तो मेरे गुरूजी थे, जिन्होंने हाल में बैंक से रिटायर होने के बाद सुपौल कोर्ट में वकालत शुरू की थी। एक मेरे स्कूल के सीनियर थे, जो दिल्ली में इनकम टैक्स के असिस्टेंट कमिश्नर थे। गुस्से में उन्होंने कहा – ”तुमको और कोई मैगज़ीन नहीं मिली जो इससे जुड़ गए? अब महिषासुर की पूजा करोगे क्या? ब्राह्मणों को गाली देने का ठेका ले लिए हो क्या? हम लोग कल प्रशासन से शिकायत किए हैं। संपादक और प्रिंटिंग प्रेस पर भी कोर्ट केस करेंगें। और हां, विजयदशमी के दिन तुम्हारे पत्रिका को जलाएंगें।’’ सारे के सारे लोग उग्र थे। मैंने धैर्यपूर्वक उन लोगों को सुना। मैंने जवाब दिया – ‘आप लोगों को जो भी कानूनी कार्रवाई करनी हो आप लोग करें। फॉरवर्ड प्रेस का अंक जो आपके हाथ में है, उसमें सब अता-पता है। हां, अगर मैगज़ीन जलाना है तो अभी मेरे पास चार प्रतियां हैं, इनका पेमेंट कीजिए और ले जाइए। और प्रतियां चाहिए तो कूरियर से आने में 4-5 दिनों का समय लगेगा। लेकिन पेमेंट एडवांस में करना होगा। और हाँ, जब पत्रिका जलाइएगा तो खबर कीजिएगा। अगले अंक में डिटेल छाप देंगें।’ मैंने पूरी घटना की सूचना प्रमोद रंजन और बिहार के ब्यूरो प्रमुख बीरेंद्रजी को दी। अंततोगत्वा, हुआ कुछ नहीं, लेकिन वह आक्रोश देखने लायक था।

(फॉरवर्ड प्रेस के अंतिम प्रिंट संस्करण, जून, 2016 में प्रकाशित)

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