जब जी उठा पिछड़ा वर्ग संघ का इतिहास

18 मार्च 1948 को भारत सरकार के कानून मंत्री से मिल कर पिछड़े वर्ग के उत्थान हेतु चंदापुरी ने संविधान में धारा 340 के समावेश करने की मांग की थी। अगर संविधान में धारा 340 का प्रावधान नहीं रहता तो मंडल कमीशन की अनुशंसा कोर्ट में अवैध घोषित हो जाती। अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग संघ के राष्ट्रीय अधिवेशन के मौके पर जारी की गई पत्रिका ‘पिछड़ा वर्ग संदेश’ ऐसे कई ऐतिहासिक अन्यायों का खुलासा करती है

IMG_20160827_143721_HDRआमतौर पर जातीय संगठनों का मंच राजनीतिक पार्टियां अगवा कर लेती है, मगर यहां ऐसा नहीं था। आजादी के साल ही बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के कहने पर त्यागमूर्ति रामलखन चंदापुरी ने जिस अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग संघ की स्थापना की थी, वह मंच स्थापना काल से लेकर अभी तक राजनीतिक पार्टियों के द्वारा इस्तेमाल होने से परहेज करते आ रही है। 27 अगस्त 2016 को भी दिल्ली के कंस्टीट्यूशनल क्लब में अखिल भारतीय पिछडा वर्ग संघ ने जो मंच तैयार किया था, उसके राजनीतिक मायने जरूर थे, मगर मंच किसी राजनीतिक पार्टी की मोहताज नहीं। यह मंच भारत की बहुलतावादी-बहुसंस्कृतिवादी रवायत की कोलाज रच रही थी। मंच पर दांए से थे हिन्दू महासभा के आर. एल. खन्ना, बौद्ध भंते ज्ञानकीर्ति, दिल्ली जामा मस्जिद यूनाइटेड फोरम के अध्यक्ष सैयद याहया बुखारी, बीच में थे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन, उनके बगल में जमात-उल-उलेमा हिन्द के अध्यक्ष मौलाना आबिद कासिम और साथ में पिछड़ा वर्ग संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. एम. ए. खान और राष्ट्रीय अध्यक्ष इंद्र कुमार सिंह चंदापुरी। ये सभी इकठ्ठा हुए थे रामलखन चंदापुरी और बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर द्वारा शुरु की गयी पत्रिका ‘पिछड़ा वर्ग संदेश’ के चंदापुरी पर केंद्रित विशेष अंक के विमोचन के लिए। बांए पोडियम से महाराष्ट्र से आई पिछड़ा वर्ग संघ की अध्यक्ष सुनीता पाटिल जब यह बोल रही थीं कि मुसलमान, ओबीसी, एससी,एसटी ही भारत के मूल निवासी हैं, हम ही भारत के हुक्मरान हैं, तो लग रहा था कि दलित-बहुजनों और मुसलमानों का गठजोड़ अब बन कर रहेगा। यह गठजोड़ सारी सीमा को लांघ कर मुठ्ठी भर सवर्णवादी-हिन्दूवादी राजसत्ता की सदियों से आ रही इजारेदारी को अपदस्थ कर बहुलतावादी बहुजनों की वाजिब सत्ता कायम करके रहेगी। यह अकारण नहीं था कि सुनीता पाटिल भले बैकड्रॉप से दलित-बहुजन और मुसलमानों के गठजोड़ की अपील कर रही थी, मगर सामने हॉल में जो भीड़ थी उसमें भी इस गठजोड़ की प्रतीक उभर कर सामने आ रही थी। हॉल खचाखच अल्पसंख्यक महिलाओं, दलित महिलाओं और पिछड़े वर्ग के लोगों से भरा था।

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के.जी. बालकृष्णन

हालांकि सुनीता पाटिल जिस गठजोड़ को बनाने की अपील कर रहीं थी, वह काफी पहले से बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम भी कहते आ रहे हैं। जाने माने राजनीतिशास्त्री रजनी कोठारी ने भी इसकी वकालत की थी कि-‘अगर पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक और आदिवासी मिल जाएं तो एक जोरदार बहुमत बनेगा’। यह बहुमत कमोबेश मंडल आंदोलन के समय हुए लोकसभा चुनाव में बना भी था। वीपी सिंह के समय जो लोकसभा का गठन हुआ था उसमें ब्राह्मण हमेशा से खासे कम थे, पिछड़ी जातियां ज्यादा थीं। मगर अफसोस मंडल की राजनीति का उफान दक्षिणपंथी राजनीति के उस उफान में डूब गया, जिस पर आरएसएस हावी थी। और यह महज संयोग नहीं है कि एक बार देश में फिर से हिन्दूत्ववादी शक्तियां हावी हो रही हैं। हिन्दुत्ववादी शक्तियां ही लगातार राजसत्ता की इजारेदारी का भोग करते आ रही हैं। अगर इनको अपदस्थ नहीं किया गया तो दलित, पिछड़े, मुसलमान और ईसाई समुदाय हाशिए की ओर ढकेले जाते रहेंगे। हिन्दुत्ववादी शक्तियों को अपदस्थ करने के लिए एक बार फिर से दलितों, पिछड़ों, मुसलमानों और आदिवासियों को राजनीतिक गठजोड़ बनाना होगा। झारखंड से आए पिछड़ा वर्ग संघ के प्रांतीय अध्यक्ष रामदेव विश्वबंधु भी मंच से यही अपील कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण कोई जाति या वर्ग नहीं है, बल्कि एक प्रभुवादी विचारधारा है। और यह विचारधारा कभी नहीं चाहेगी कि पिछड़ों का राजनीतिक और आर्थिक अभ्युदय हो। उन्होंने पिछड़ों के आर्थिक रुप से मजबूत होने की जरूरत पर प्रकाश डाला।

जमात-उल-उलेमा हिन्द के अध्यक्ष मौलाना आबिद कासिम ने सत्ता के चरित्र पर कोफ्त जाहिर करते हुए कहा कि “आजादी की लड़ाई में क्या मुसलमानों ने कुर्बानी नहीं दी थी, जो हमें लगातार गुनाहगार साबित किया जा रहा है। इतिहास गवाह है कि हजारों की संख्या में उलेमाओं ने आजादी के लिए कुर्बानी दी थी। महात्मा गांधी को आजादी की लड़ाई के लिए पूरे देश में भ्रमण करने के लिए मदरसों से चंदे इकठ्ठे करके दिए गए थे ताकि गांधीजी अंग्रेजों के दमन के खिलाफ देश भर में जनचेतना का अभियान चला सके। और आज विडंबना है कि उन्हीं मदरसों को बदनाम किया जा रहा है।”

पिछड़ा वर्ग संघ और रामलखन चंदापुरी

IMG_20160827_135954_HDRअखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग संघ का इतिहास ऐतिहासिक अन्याय का इतिहास है। 10 सितंबर 1947 को संघ की स्थापना हुई थी। पहले यह बिहार प्रांतीय पिछड़ी जाति संघ के नाम से जाना जाता था। बिहार के रामलखन चंदापुरी, जिन्होंने जीवन भर पिछड़ों के आरक्षण के लिए लड़ाई लड़ी, उनके साथ काफी विश्वासघात हुआ। उन्होंने ही बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की सहमति से पिछड़ा वर्ग संघ की स्थापना की। छह नवंबर 1951 को रामलखन चंदापुरी के आग्रह पर बाबा साहेब आंबेडकर पटना आए थे। आंबेडकर की सभा पर पटना में तत्कालीन कांग्रेसी सरकार की ओर से हमला कराया गया था। त्यागमूर्ति चंदापुरी बाबा साहेब को बचाने के लिए आगे आ गए। जिस मंडल कमीशन के कारण आरक्षण का प्रावधान आया, उसके पीछे भी चंदापुरी का अहम योगदान है। 18 मार्च 1948 को भारत सरकार के कानून मंत्री से मिल कर पिछड़े वर्ग के उत्थान हेतु चंदापुरी ने संविधान में धारा 340 के समावेश करने की मांग की थी। अगर संविधान में धारा 340 का प्रावधान नहीं रहता तो मंडल कमीशन की अनुशंसा कोर्ट में अवैध घोषित हो जाती। अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग संघ के राष्ट्रीय अधिवेशन के मौके पर जारी की गई पत्रिका ‘पिछड़ा वर्ग संदेश’ ऐसे कई ऐतिहासिक अन्यायों का खुलासा करती है।

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