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महिषासुर के वंशज आहत, करेंगे मुकदमा

देवी दुर्गा के कथित अपमान को लेकर सीपीआई नेता मनीष कुंजाम के खिलाफ हुए एफआईआर का दाँव उलटा पड़ सकता है मनुवादियों को। संजीव चंदन की रिपोर्ट

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मनीष कुंजाम

छत्तीसगढ़ की हालिया घटनाओं से ऐसा लगता है कि राज्य के आदिवासी समुदाय ने आरएसएस प्रायोजित वर्चस्वशाली संस्कृति के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया है। ताजा घटनाक्रम में सुकमा जिले में आदिवासी समुदाय पूर्व विधायक सीपीआई नेता मनीष कुंजाम के खिलाफ मुकदमे से आंदोलित है। मनीष कुंजाम के खिलाफ 17 सितंबर को देवीदुर्गा के खिलाफ विवादित पोस्ट प्रसारित करने के मामले में ‘धर्म सेना’ के नेता सुशील मौर्य ने एफआईआर दर्ज करवायी। इसके बाद कुंजाम की गिरफ्तारी की मांग के साथ 19 सितंबर को हिंदुत्ववादियों के द्वारा सुकमा जिला बंद किया गया।

मैं आदिवासी और असुर का वंशज : कुंजाम

मुक़दमे से बेफिक्र कुंजाम ने कहा कि वे आदिवासी हैं और असुरों के वंशज हैं। उन्होंने कहा, ‘मैं मूल निवासी होने के नाते बूढ़ा देव का आराधक हूँ।’ उन्होंने आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (एआईएसएफ़) की एक सभा को सुकमा में संबोधित करते हुए कहा कि ‘पौराणिक कथाओं व धार्मिक ग्रंथों में असुरों को ब्राह्मणों द्वारा गलत तरीके से दर्शाया गया है- लंबे बाल और नाखून वाले असुरों को दिखाकर आदिवासियों को नीचा दिखाने की कोशिश की गई है। इससे हमारी भी भावनायें आहत होती हैं।’

व्हाट्सअप पोस्ट पर कुंजाम की दृढ़ता

कुंजाम ने कहा कि “ ‘दुर्गा’ को तथाकथित तौर पर अपमानित करने वाला और सोशल साइट्स पर वायरल हुआ पोस्ट यद्यपि मेरे द्वारा नहीं लिखा गया था, लेकिन मैं उस पोस्ट में लिखी गई कुछ बातों को सच मानता हूँ। वेश्या के घर की मिट्टी लाकर दुर्गा की प्रतिमा बनाई जाती है। महिषासुर आदिवासी और दलितों के राजा थे, मैं भी आदिवासी हूँ और उनके वंश का हूँ।’ कुंजाम आगे कहते हैं कि ‘जब हिन्दू देवी देवताओं के खिलाफ टिप्पणी करने पर आरएसएस और मनुवादियों को तकलीफ हो रही है तो हमें भी धार्मिक ग्रंथों में असुरों के गलत चित्रण पर दुःख होता है, महिषासुर की तरह बस्तर में कई आदिवासी देवता हैं, मैं उनकी आराधना करता हूँ।’

मुकदमों और गिरफ्तारियों का सिलसिला : आदिवासियों का प्रत्युत्तर

img-20160920-wa0086इसके पहले भी ‘देवी दुर्गा’ का तथाकथित अपमान के आरोप में फरवरी 2016 में राजनंदगाँव के एक कसबे मानपुर के निवासी सामाजिक कार्यकर्ता  विवेक कुमार के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था और उनकी गिरफ्तारी हुई थी। इस माह की शुरुआत में भी रायपुर सामाजिक न्याय मंच के सक्रिय कार्यकर्ता भारत कुर्रे की भी गिरफ्तारी दुर्गा के अपमान के आरोप में हुई।

लेकिन मुकदमों का सिलसिला एकतरफा भी नहीं है। विवेक कुमार की गिरफ्तारी के लिए मानपुर बंद के दौरान हुए प्रदर्शन में मनुवादियों द्वारा आदिवासियों और महिषासुर को गालियाँ देना मंहगा पड़ा था। आदिवासी संगठनों ने उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया, जिसके अभियुक्तों की अग्रिम जमानत याचिका हाईकोर्ट से खारिज हो चुकी है, और वे फरार हैं। हालांकि आदिवासी नेताओं का आरोप है कि राज्य की भाजपा सरकार के तथाकथित दवाब में पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया है। उक्त प्रदर्शन में नारे लगाये गये थे, ‘महिषासुर के औलादों को, जूते मारो सालों को’। (सम्बंधित रिपोर्ट फॉरवर्ड प्रेस में पढ़ें: महिषासुर का अपमान उलटा पडा: सड़क पर उतरे आदिवासी)

सुकमा में भी मुक़दमे की तैयारी

सुकमा के आदिवासी नेताओं ने फॉरवर्ड प्रेस से बताया कि वे भी आदिवासी संस्कृति के खिलाफ ब्राह्मणवादियों के हमले के खिलाफ मुकदमा दर्ज करायेंगे। उन्होंने बताया कि कुंजाम की गिरफ्तारी की मांग के लिए हुए प्रदर्शनों में महिषासुर और आदिवासियों को गाली दी गई है, जो कि अनुसूचित जाति-जनजाति क़ानून के तहत आने वाला इरादतन अपराध है। आदिवासी नेता ‘रामा सोडी’ ने बतलाया कि अलग –अलग जगहों पर आदिवासियों ने बैठक ली है और आगे की कार्रवाई के लिए एकजूट हो रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासियों के बीच महिषासुर : एक जननायक  किताब के अंश पढ़े जा रहे हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=tV4jlFLrya8

 

सांस्कृतिक संघर्ष और संस्कृति की दावेदारी

इस प्रकरण पर गांधीवादी मानवाधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने कहा कि जब एक संस्कृति के बरक्स दूसरी संस्कृति के लोग अपनी बात कह रहे हैं, तो हिन्दुत्ववादियों की बौखलाहट सामने आ रही है। महिषासुर और दुर्गा के प्रसंग में आदिवासी अपनी बात कहकर आरएसएस के मनुवादी एजेंडे के खिलाफ अपना मत दे रहे हैं। वहीं मनीष कुंजाम ने कहा कि बस्तर के आदिवासियों के संघर्ष से ध्यान भटकाने के लिए आरएसएस के तत्व सक्रिय हैं, गौरतलब है कि कुंजाम ने छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ सघन अभियान चला रखा है।

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लेखक के बारे में

संजीव चन्दन

संजीव चंदन (25 नवंबर 1977) : प्रकाशन संस्था व समाजकर्मी समूह ‘द मार्जनालाइज्ड’ के प्रमुख संजीव चंदन चर्चित पत्रिका ‘स्त्रीकाल’(अनियतकालीन व वेबपोर्टल) के संपादक भी हैं। श्री चंदन अपने स्त्रीवादी-आंबेडकरवादी लेखन के लिए जाने जाते हैं। स्त्री मुद्दों पर उनके द्वारा संपादित पुस्तक ‘चौखट पर स्त्री (2014) प्रकाशित है तथा उनका कहानी संग्रह ‘546वीं सीट की स्त्री’ प्रकाश्य है। संपर्क : themarginalised@gmail.com

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