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महिषासुर का अपमान उलटा पड़ा : सड़क पर उतरे आदिवासी

रैली में हिंदुत्ववादियों द्वारा ‘महिषासुर के औलादों को जूते मारो सालों को’ कहना मंहगा पड़ा। कारण कि बस्तर के इलाके में स्थाई निवासियों के घर-घर में के नाम से महिषासुर (स्थानीय नाम भैंसासुर) की पूजा की जाती है। स्थानीय लोगों ने इस नारे को अपने ऊपर सांस्कृतिक हमला माना, और वे हिंदुत्ववादियों के सांस्कृतिक एकरूपीकरण के खिलाफ खड़े हुए

unnamed (7)मुक्तिबोध के पैतृक जिले राजनंदगाँव के एक कसबे में पिछले अप्रैल के अंतिम दिन सैकड़ों आदिवासी और स्थानीय बहुजन सड़क पर उतरे। आदिवासी वर्चस्वशाली ब्राह्मणवादियों को न सिर्फ आगाह करने के उद्देश्य से सड़क पर उतरे बल्कि वे सरकार को भी सन्देश देना चाह रहे थे कि उनकी संस्कृति और उनके अधिकार से खिलवाड़ ठीक नहीं। इसके पहले 12 मार्च को मानपुर में एक समूह ने रैली निकाली थी, जिसमें बहुजन जनता की सांस्कृतिक भावनाओं के खिलाफ नारे लगाये गये थे :

‘महिषासुर (भैंसासुर) के औलादों को जूता मारो सालों को’

‘रामायण-गीता को नहीं मानने वालों को, जूता मारो सालों को’

‘अबूझमाड़ियों होश में आओ’

‘राक्षस के औलादों को, जूता मारो सालों को’

स्थानीय लोगों का दावा है कि नारे लगाने वालों में छत्तीसगढ़ के भाजपाई मुख्यमंत्री रमणसिंह के बेटे और भाजपा सांसद अभिषेक सिंह के समर्थक भी थे। अभिषेक राजनंदगाँव से ही भाजपा की सीट पर चुने गये हैं। इस रैली की पृष्ठभूमि में था दो साल पुराना एक फेसबुक स्टेटस, जिसमें देवी दुर्गा को लेकर ‘तथाकथित अपमानजनक’ बातें की गई थी। इस स्टेटस को हिन्दूवादियों के एक समूह ने इस साल के फरवरी-मार्च में यह कहते हुए व्हाट्सग्रूप में वायरल कर दिया था कि इसे लिखने वाले पत्रकार विवेक कुमार को गिरफ्तार किया जाये।

दुर्गा का तथाकथित अपमान दो साल बाद हुआ

2014 के अक्टूबर में जब फॉरवर्ड प्रेस पर पुलिसिया कार्रवाई हुई थी, तब विवेक कुमार ने अपनी फेसबुक वाल पर दुर्गा के मिथकीय स्वरुप और उसकी कथाओं पर टिप्पणी की थी। तब इस टिप्पणी का वैसा संज्ञान नहीं लिया गया था, जैसा इस साल 2016 की फरवरी में लिया गया। दरअसल 7 से 9 फरवरी तक स्थानीय लोगों ने भूमकाल दिवस का आयोजन किया था, जिसमें ‘भूमकाल शांति सेना’ की अगुआई में बड़ी संख्या में आदिवासियों ने भाग लिया था। यह आयोजन बस्तर के आदिवासी शहीद वीर गुंडा धूर की याद में किया जाता है, जिन्होंने अंग्रेजों से लड़ने के लिए 1910 में भूमकाल सेना का गठन किया था। इस आयोजन में विवेक कुमार की भी सक्रिय भूमिका थी, जो पिछले 10 सालों से मानपुर और प्रदेश में सामाजिक रूप से सक्रिय हैं। सीए की पढाई कर चुके सीमेंट के व्यापारी विवेक कुमार ‘दक्षिण कौशल’ नामक अखबार भी प्रकाशित करते हैं और आदिवासियों के साथ तथा दलित-बहुजन आंदोलन से भी जुड़े हैं। पिता राम सुशील सिंह कांशीराम जी के साथ बसपा में सक्रिय रहे हैं। कुर्मी जाति से आने वाला उनका परिवार मध्यप्रदेश से राजनंदगाँव आ बसा था। ‘दक्षिण कौशल’ नामक पत्रिका दलित-बहुजन और आदिवासी मुद्दों को खासकर प्रकाशित करती है।

विवेक कुमार बताते हैं कि ‘भूमकाल दिवस पर आदिवासी मुद्दों को लेकर सभा हुई और आदिवासी सहित दलित-बहुजन संस्कृति पर चर्चा हुई। हम बिरसा-आंबेडकरवादियों के खिलाफ तब से ही हिन्दूवादियों के भीतर आक्रोश था। इसके अलावा हमलोग भाजपा की राजनीति की स्थानीय और प्रदेश स्तर पर खिलाफत भी करते हैं, जिसके कारण लोगो मौके की तलाश में थे।’ शायद यही कारण रहा हो कि विवेक कुमार के दो साल पुराने फेसबुक पोस्ट को व्हाट्स अप पर जीवित कर एआईआर की योजना बनाई गई हो। सक्रिय लोगों की कोशिशों के बाद भी जब पुलिस ने एफआईआर लिखने से मना कर दिया तो 12 मार्च को हिंदुत्ववादियों ने रैली निकाली और भाजपा के बड़े नेताओं का दवाब लाकर एफआईआर दर्ज करवाई। इसके बाद 28 मार्च को विवेक कुमार की गिरफ्तारी हो गई और 4 जून तक जमानत मिलने के बाद वे जेल से रिहा हुए।

उल्टा पड़ा दाँव क्योंकि घर-घर में पूजे जाते हैं महिषासुर

unnamed (8)12 मार्च की रैली में हिंदुत्ववादियों द्वारा ‘महिषासुर के औलादों को जूते मारो सालों को’ कहना मंहगा पड़ा। कारण कि बस्तर के इलाके में स्थाई निवासियों के घर-घर में के नाम से महिषासुर (स्थानीय नाम भैंसासुर) की पूजा की जाती है। स्थानीय लोगों ने इस नारे को अपने ऊपर सांस्कृतिक हमला माना, और वे हिंदुत्ववादियों के सांस्कृतिक एकरूपीकरण के खिलाफ खड़े हुए, 30 अप्रैल को मोर्चा निकला और 12 मार्च हुई रैली में नारा लगाने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाया। हालांकि पुलिस ने कथित ऊपरी दवाब के कारण किसी आरोपी को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया है। विवेक कुमार कहते हैं, ‘हिंदुत्ववादी सबको राम और दुर्गाभक्त बना देना चाहते हैं, उन्हें किसी की संस्कृति की कोई परवाह नहीं। उन्हें यह भी बर्दाश्त नहीं है कि बस्तर के स्थानीय निवासी दुर्गापूजा या दशहरा नहीं मनाते- यहाँ रावण का दहन नहीं होता है।’

नक्सली बताओ या अन्य मामले में फंसाओ

विवेक कुमार बताते हैं कि ‘फरवरी में भूमकाल दिवस के आयोजकों में से कुछ लोगों को पुलिस ने नक्सली बताकर गिरफ्तार कर लिया और जिन्हें वह नक्सली नहीं बता सकी, जैसे मुझे, तो इस तरह एक मुकदमा बना कर दो महीने से ज्यादा दिनों के लिए जेल में डाल दिया। यही हाल पुलिस पिछले 30 अप्रैल के मोर्चे के आयोजकों के साथ कर रही है।’ यह सच भी है, क्योंकि पिछले दिनों जगदलपुर में भूमकाल शांति सेना का गठन हुआ तो पुलिस का मीडिया में बयान आया कि ‘कहीं न कहीं इस शांति सेना का उपयोग नक्सलवादी संगठन कर सकते हैं।’ ये घटनाएं बताती हैं कि शासन और वर्चस्वशाली ताकतों, हिन्दूवादियों के खिलाफ जब आदिवासी अपने संस्कृति के दावे के साथ खड़े होते हैं तो नक्सली कहकर या भावना भड़काने की धाराओं में गिरफ्तार कर लिया जाता है।

जेल में भी हमले हिंदुत्ववादी हमले

विवेक कहते हैं कि ‘दमन के इनके तरीके बड़े संगठित हैं। जेल में भी मुझे हिन्दुत्ववादी ताकतों के हमले झलने पड़े। वे मुझे महिषासुर की औलाद या राक्षस कहते थे। हालांकि जल्द ही मूलनिवासी लोगों से मुझे समर्थन मिल गया, दोनो पक्षों में टकराव की स्थिति बन गई, इसलिए वहाँ वे मुझे शारीरिक रूप से क्षति नहीं पहुंचा सके। हिंदुत्ववादियों को इस बार कड़ी चुनौती मिलती दिख रही है। 30 अप्रैल को निकाले गये मोर्चे को आयोजक संगठन ‘राष्ट्रीय आदिवासी संघर्ष मोर्चा’ और ‘मूलनिवासी अधिकार गण (एम्बस)’ ने मानपुर से राष्ट्रव्यापी आन्दोलन की शुरुआत बताया।

( महिषासुर आंदोलन से संबंधित विस्‍तृत जानकारी के लिए पढ़ें ‘फॉरवर्ड प्रेस बुक्स’ की किताब ‘महिषासुर: एक जननायक’।  अमेजन से घर बैठे मंगवाएं : http://www.amazon.in/dp/819325841X )

लेखक के बारे में

संजीव चन्दन

संजीव चंदन (25 नवंबर 1977) : प्रकाशन संस्था व समाजकर्मी समूह ‘द मार्जनालाइज्ड’ के प्रमुख संजीव चंदन चर्चित पत्रिका ‘स्त्रीकाल’(अनियतकालीन व वेबपोर्टल) के संपादक भी हैं। श्री चंदन अपने स्त्रीवादी-आंबेडकरवादी लेखन के लिए जाने जाते हैं। स्त्री मुद्दों पर उनके द्वारा संपादित पुस्तक ‘चौखट पर स्त्री (2014) प्रकाशित है तथा उनका कहानी संग्रह ‘546वीं सीट की स्त्री’ प्रकाश्य है। संपर्क : themarginalised@gmail.com

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