बाबा साहेब डा. आंबेडकर का सृजनात्मक साहित्य

लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधरत राज बहादुर डा. आंबेडकर के सृजनात्मक लेखन और उनकी पत्रकारिता का परिचय दे रहे हैं

यह सर्वविदित है कि बाबा साहेब डा. आंबेडकर ने साहित्य की विधा विशेष (यथा-काव्य, कहानी, नाटक आदि) में कोई रचना नहीं की, लेकिन उनकी कलम से उच्च कोटि के विपुल साहित्य का सृजन हुआ है। उनका साहित्य मूलतः अंग्रेजी भाषा में गहन अध्ययन एवं चिंतन के बाद सृजित हुआ है। बाबा साहेब का साहित्य जितना उनके समय में प्रासंगिक था, कहीं उससे अधिक वर्तमान में प्रासंगिक है। आज बाबा साहेब का साहित्य एवं चिंतन भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में शोध का विषय बना हुआ है। उनके बारे में नित नयी जानकारियाँ प्राप्त हो रही हैं। हम उनके जीवन से तो बखूबी परिचित हो गये हैं, लेकिन अभी उनके साहित्य एवं चिंतन से कम परिचित हो पाये हैं। इस लेख में बाबा साहेब के साहित्य के बारे में संक्षिप्त  जानकारी देने का प्रयास किया गया है।

बाबा साहेब डा. आंबेडकर द्वारा रचित ग्रंथ कुछ तो उनके जीवनकाल में ही प्रकाशित हो गये तथा कुछ उनके परिनिर्वाण के बाद प्रकाशित हो पाये, जिनका तिथिवार विवरण निम्नवत् हैं-

(1)     कास्ट्स इन इण्डिया (1917)

(2)    स्माल होलिंग्स इन इंडिया एण्ड देयर रेमिडीज (1918)

(3)    दी प्राब्लम आफ दि रूपी (1923)

(4)    दी इवोल्यूशन आफ दि प्रोविन्शियन फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया (1924)

(5)    एनाहिलेशन ऑफ़ कास्ट (1936)

(6)    मिस्टर गांधी एण्ड दी एमेन्सीपेशन ऑफ़ दी अनटेचेविल्स (1945)

(7)    रानाडे, गांधी एण्ड जिन्ना (1943)

(8)    थाट्स आन पाकिस्तान (1945)

(9)    ह्वाट कांग्रेस एण्ड गांधी हैव डन टू दी अनटचेविल्स (1945)

(10)    महाराष्ट्र एज ए लिंग्विस्टिक स्टेट (1945)

(11)    हू वेयर दी शूद्राज (1946)

(12)    स्टेट्स एण्ड माइनोरीटीज (1947)

(13)    हिस्ट्री आफ इण्डियन करेंसी एण्ड बैंकिंग (1947)

(14)    दी अनटचेबिल्स (1948)

(15)    थाट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट (1955)

(16)    बुद्ध एण्ड कार्लमार्क्स (1946)

(17)    कम्यूनल डेडलाक एण्ड वे टू साल्व इट (1945)

(18)    बुद्ध एण्ड दी फ्यूचर ऑफ़ हिज रिलिजन (1950)

(19)    फ्यूचर आफ पार्लियामेन्ट्री डेमोक्रेसी (1951)

(20)   लिंग्विस्टिक स्टेट्स नीड्स फार चेक्स एण्ड बैलेन्सेज (1953)

(21)    बुद्धिज्म एण्ड कम्यूनिज्म (1956)

(22)   दि बुद्ध एण्ड हिज धम्म (1957)

(23)   हिन्दू वुमन: राइजिंग एंड फाल।

डा. आंबेडकर द्वारा उपरिलिखित ग्रंथों की विषय सामग्री बहुत व्यापक है। उनकी विश्लेषण पद्धति बहुत ही सूक्ष्म एवं सटीक है। उनके कुछ प्रमुख ग्रंथों के बारे में संक्षेप में जानकारी दी जा रही है।

(1) कास्ट्स इन इंडिया – यह डा. आंबेडकर द्वारा लिखित एक लेख था, जो मई 1926 में कोलम्बिया यूनिवर्सिटी अमेरिका में पढ़ा गया था। यह बाद में 1917 में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। इसके अन्तर्गत भारत में जातियों की उत्पत्ति, गठन एवं विकास पर प्रकाश डाला गया है। उनकी दृष्टि में, जाति एक ऐसा परिबद्ध वर्ग है, जो अपने तक सीमित रहता है। उनके अनुसार जाति समस्या के चार पक्ष हैं-

(क)    हिन्दू जनंसख्या में विविध तत्वों के सम्मिश्रण के बावजूद इसमें दृढ़ सांस्कृतिक एकता है

(ख)    जातियां इस विराट सांस्कृतिक इकाई का अंग है

(ग)    शुरू में केवल एक ही जाति थी।

(घ)    देखा देखी या बहिष्कार से विभिन्न जातियां बन गयी।[1]

(2) स्माल होल्डिंग्स इन इण्डिया एण्ड देयर रेमेडीज – यह पुस्तक 1918 में प्रकाशित हुई। यह छोटी और बिखरी हुई जोतने योग्य भूमि के विस्तार एवं उसके चकबन्दी से संबंधित है। डा. आंबेडकर के अनुसार जब तक छोटी एवं बिखरी हुई जोतने योग्य भूमि का विस्तार एवं चकबन्दी नहीं होगी तब तक भारत के कृषि सुधार में प्रगति नहीं होगी।

(3) दी प्राब्लम ऑफ़  द रूपी – यह डा. आंबेडकर का वह शोध प्रबन्ध है, जिसे उन्होंने अक्टूबर, 1922 में यूनिवसिर्टी ऑफ लंदन में डाक्टर आफ सांइस (डी.एस.सी.) की उपाधि के लिए प्रस्तुत किया था। यही थीसिस दिसम्बर, 1923 में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में डा. आंबेडकर ने स्पष्ट रूप से विश्लेषित किया कि मुद्रा समस्या के अन्तिम निर्णय में, किस प्रकार ब्रिटिश शासकों ने भारतीय रूप की कीमत को पाउण्ड के साथ जोड़कर अपने अधिकतम लाभ का मार्ग चुना। इनकी इस हेरा फेरी ने ही सभी भारतीय लोगों को गंभीर आर्थिक कठिनाईयों में ढकेल दिया, क्योंकि भारतीय धन का ब्रिटीश खजाने की ओर निरन्तर बहाव हो गया। कई ढंगों से यहां का धन ब्रिटिश सरकार तथा जनता के लाभ में जाने लगा।

(4)  दी इवोल्यूशन आफ दी प्रोविन्शियन फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया – यह पुस्तक डा. आंबेडकर का वह शोध प्रबन्ध है, जिसे उन्होंने 1916 में कोलम्बिया यूनिवसिर्टी में पीएचडी डिग्री के लिए प्रस्तुत किया था। इसका प्रकाशन 1924 ई0 में हुआ। यह पुस्तक महाराजा बड़ौदा नरेश श्रीमंत सयाजी राव गायकवाड को समर्पित की गयी है। उल्लेखनीय है कि महाराजा ने ही उन्हें अमेरिका में शिक्षा ग्रहण करने हेतु भेजा था। यह पुस्तक फाइनेंस से संबंधित है, जिसमें ब्रिटीश नौकरशाही का बुरी तरह से भण्डाफोड़ किया गया है।

(5) एनाहिलेशन ऑफ कास्ट – डा. आंबेडकर द्वारा लिखित यह बहुचर्चित पुस्तक है, इसका प्रकाशन 1936 में हुआ। जात-पांत तोड़क मण्डल द्वारा आयोजित उसके वार्षिक अधिवेशन में लाहौर में मार्च 1936 में डा. आंबेडकर को अध्यक्षीय भाषण देने के लिये आमंत्रित किया गया था, लेकिन मण्डल के सदस्यों ने जब कार्यक्रम से पूर्व डा. आंबेडकर के इस भाषण को देखा तो उन्हें यह आपत्तिजनक लगा। मण्डल के सदस्यों ने इस भाषण में परिवर्तन के लिए डा. आंबेडकर से अनुरोध किया, लेकिन डा. साहेब भाषण में कोई भी परिवर्तन करने से स्पष्ट मना कर दिया। अन्ततोगत्वा मण्डल के इस वार्षिक अधिवेशन के कार्यक्रम को रद्द कर दिया। डा. आंबेडकर ने इसी भाषण को ज्यों का त्यों 1936 में ‘एनाहिलेशन ऑफ कास्ट’ के नाम से पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवा दिया ताकि अधिक से अधिक लोग इसके बारे में जान सकें। यह पुस्तक छोटी सी है, लेकिन बहुत ही गंभीर है। इस पुस्तक में डा. आंबेडकर ने जाति व्यवस्था के आधार पर उसके उन्मूलन के संबंध में गंभीर चर्चा की है। जाति व्यवस्था के उन्मूलन के संबंध में उन्होंने लिखा है कि ‘‘यदि आप जाति प्रथा में दरार डालना चाहते हैं तो इसके लिए आपको हर हालत में वेदों और शास्त्रों में डाइनामाइट लगाना होगा, क्योंकि वेद और शास्त्र किसी भी तर्क से अलग हटाते हैं और वेद तथा शास्त्र किसी भी नैतिकता से वंचित करते हैं। आपको ‘श्रुति’ और ‘स्मृति’ के धर्म को नष्ट करना ही चाहिए। इसके अलावा और कोई चारा नहीं है।’’[2]

(6) रानाडे, गांधी एण्ड जिन्ना – जनवरी 1943 में डा. आंबेडकर ने पूना में एम. जी. रानाडे के जन्म समारोह के उपलक्ष्य में एक व्याख्यान दिया, जो आगे चलकर रानाडे, गांधी एवं जिन्ना के रूप में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में रानाडे, गांधी और जिन्ना के व्यक्तित्व का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है तथा बताया गया है कि नायक पूजा (हीरो वर्शिप) अच्छी बात नहीं है, क्योंकि अन्ततोगत्वा वह समाज तथा देश के हितों के लिए हानिकारक होती है।

(7) थाट्स ऑन पाकिस्तान – डा. आंबेडकर की यह बहुचर्चित पुस्तक 1945 में प्रकाशित हुई। यह वह समय था जब भारत के विभाजन को लेकर पूरे देश में हलचल मची हुयी थी। इस पुस्तक ने इस समस्या का उचित समाधान प्रस्तुत करने की दिशा में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इस पुस्तक के संबंध में डा. आंबेडकर लिखते हैं कि ‘‘पुस्तक के नाम से ऐसा लगता है जैसे पाकिस्तान के बारे में एक सामान्य सा खाका खींचा गया है, जबकि इसमें उसके अलावा और भी बहुत कुछ है। यह भारतीय इतिहास और भारतीय राजनीति के साम्प्रदायिक पहलुओं की एक विश्लेषणात्मक प्रस्तुति है। इसका मकसद पाकिस्तान के क.ख.ग. पर प्रकाश डालना भी है। इस पुस्तक में भारतीय इतिहास और भारतीय राजनीति की एक झांकी कहा जा सकता है।’’[3]

(8) ह्वाट कांग्रेस एण्ड गांधी हैव डन टू दी अनटचेबिल्स – यह पुस्तक भी 1945 में ही प्रकाशित हुई। इसमें कांग्रेस और गांधी द्वारा अछूतों के लिए किये गये कार्यों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है तथा सही कार्य न करने के लिए उनकी अच्छे से खबर ली गयी है। इस पुस्तक में यह बताया गया है कि कांग्रेस पार्टी ने अछूतोद्धार की समस्या को अपने राजनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति का साधन मात्र बनाया है। कांग्रेस ने अपने अछूतोद्धार कार्यक्रम का जितना प्रचार किया, वास्तव में उतना काम नहीं किया। इसीलिए इस पुस्तक में दलित वर्गों से गांधी एवं गांधीवाद से सावधान रहने के लिए निवेदन किया गया है। डा. आंबेडकर के अनुसार यदि दुनिया में कोई ऐसा वाद हैए जिससे लोगों को शान्त करने के लिए कार्य धर्म को अफीम के रूप में प्रयोग किया है, उन्हें गलत धारणाओं तथा वायदों में फंसाया है, वह गांधीवाद है। गांधीवाद अछूतों के साथ छल कपट है।

(9) हू वेयर दी शूद्राज – यह ग्रन्थ 1946 में प्रकाशित हुआ। यह एक खोजपरक पुस्तक हएै जिसमें शूद्रों की उत्पत्ति के इतिहास का विश्लेषण किया गया है। इसमें बताया गया है कि ‘शूद्र’ शब्द की उत्पत्ति मात्र शाब्दिक नहीं है। उसका ऐतिहासिक सम्बन्ध है। आज जिन्हें शूद्र कहा जाता है वे सूर्यवंशी आर्य क्षत्रिय लोग थे।

(10) स्टेट्स एण्ड माइनोरीटीज – यह पुस्तक मार्च 1947 में प्रकाशित हुई। अपनी इस पुस्तक में डा. आंबेडकर ने समाज की समाजवादी रूपरेखा प्रस्तुत करने का प्रयास किया है साथ ही उन्होंने यह भी आग्रह किया है कि राज्य समाजवाद को संविधान की धाराओं द्वारा स्थापित किया जाय ताकि विधायिका तथा कार्यपालिका के सामान्य कार्य, उन्हें परिवर्तित न कर सके। राज्य समाजवाद का व्यावहारिक रूप संसदीय जनतंत्र द्वारा लाया जाना चाहिए, क्योंकि संसदीय जनतंत्र समाज के लिए सरकार की न्यायोचित व्यवस्था है।

(11) दी अनटचेबिल्स – यह ग्रन्थ अक्टूबर 1948 में प्रकाशित हुआ। इसमें छुआछूत के उत्पत्ति के सिद्धान्तों के बारे में विस्तार से बताया गया है। डा. आंबेडकर ने इस पुस्तक में प्रमाणों के साथ यह सिद्ध किया है कि ‘‘अस्पृश्य पहले पराजित लोग थे और बौद्ध धर्म तथा गोमांस खाना न छोड़ने से उन्हें अस्पृश्य माना गया। उनके मतानुसार अस्पृश्यता का उद्गम ईस्वी सन् 400 के दरमियान हुआ होगा। उन्होंने  यह साबित किया कि बौद्ध धर्म और ब्राह्मण धर्म में श्रेष्ठता के लिए जो संघर्ष हुआ उससे अस्पृश्यता पैदा हुई।[4]

(12) थाट्स ऑफ लिंग्विस्टिक स्टेट – डा. आंबेडकर का यह महत्वपूर्ण ग्रंथ 1955 में प्रकाशित हुआ। इसमें उन्होंने राज्यों के भाषाई गठन का चित्रण किया है तथा एक राज्य एक भाषा के सार्वभौमिक सिद्धान्त को स्वीकार किया है। हिन्दी भाषा को सम्पूर्ण राष्ट्र की राजकीय भाषा बनाये जाने पर बल दिया है। उनके अनुसार एक भाषा राष्ट्र को संगठित रख सकती है और सम्पूर्ण राष्ट्र में शान्ति तथा विचार संचार को आसान बना सकती है।

(13) द बुद्ध एण्ड हिज धम्म – वैसे तो डा. आंबेडकर द्वारा लिखित सभी पुस्तकें अपना विशिष्ट महत्व रखती हैंए लेकिन उनमें से भी सबसे महत्वपूर्ण स्थान ‘द बुद्धा एण्ड हिज धम्म’ का है। यह पुस्तक बाबा साहेब डा. आंबेडकर  के निर्वाणोपरान्त सन् 1957 में प्रकाशित हो पायी। अगर इस ग्रंथ को बौद्ध धर्म का धर्मशास्त्र कहा जाय तो अतिश्योक्ति न होगी। यह एक विशाल ग्रंथ है, जिसमें बौद्ध धर्म की विशद् विवेचना की गयी है इस ग्रंथ की भाषा ओजस्वी एवं सारगर्भित है। आंबेडकर साहित्य के विद्वान डा. डी0आर0 जाटव के अनुसार ‘‘ यह ग्रंथ कई मौलिक प्रश्नों को प्रस्तुत करता है जिसका डा. आंबेडकर  ने बड़ी बुद्धिमत्ता के साथ उत्तर दिया है। सर्वप्रथम, उन्होंने हीनयान तथा महायान में विभाजित बौद्धधर्म को कोई महत्व नहीं दिया। बौद्ध धर्म, भगवान बुद्ध का धर्म एक ही है। दार्शनिक व्याख्याएँ भिन्न हो सकती हैं। धर्म के रूप में बौद्ध धर्म एक ही है। दो बौद्ध धर्म होना संभव नहीं है।

इन पुस्तकों के अतिरिक्त डा. आंबेडकर के कई ऐसे स्वतंत्र लेख जो अंग्रेजी तथा मराठी भाषाओं में लिखे गये हैं, जो भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं जिनका सामाजिक तथा साहित्यिक दृष्टिकोण से विशेष महत्व हैए जैसे लेबर एण्ड पार्लियामेन्ट्री डेमोक्रेसी, नीड फाॅर चेक्स एण्ड वैलेन्सेज, माई पर्सनल फिलाॅसफी, बुद्धिज्म एण्ड कम्यूनिज्म आदि।

महाराष्ट्र सरकार के शिक्षा विभाग ने बाबा साहेब डा. आंबेडकर के साहित्य के महत्व एवं मांग को देखते हुए उनके सम्पूर्ण साहित्य को कई खण्डों में प्रकाशित करने की महत्वपूर्ण योजना बनायी है। इसके अन्तर्गत अभी तक ‘डा. बाबा साहेब अम्बेडकर: राइटिंग्स एण्ड स्पीचेज’ नाम से 22 खण्ड प्रकाशित किये जा चुके हैं। अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित ये वाल्यूम बहुत महत्व के हैं सबसे अच्छी बात ये है कि इनका मूल्य बहुत कम रखा गया है। इस वृहत योजना के पहले खण्ड का प्रकाशन बाबा साहेब अम्बेडकर के जन्म दिन 14 अप्रैल, 1979 को हुआ।

महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रकाशित ‘डा. बाबा साहेब आंबेडकर: राइटिंग्स एण्ड स्पीचेज’ के अंग्रेजी खण्डों के महत्व एवं लोकप्रियता को देखते हुए भारत सरकार के ‘सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय’ के डा. आंबेडकरप्रतिष्ठान ने इस खण्डों के हिन्दी अनुवाद प्रकाशित करने की योजना बनायी है ताकि हिन्दी जनता तक भी बाबासाहेब का साहित्य पहुंच सके। इस योजना के अन्तर्गत अभी तक बाबा साहेब डा. आंबेडकर  संपूर्ण वाङ्मय नाम से 21 खण्ड हिन्दी भाषा में प्रकाशित किये जा चुके हैं। इन हिन्दी खण्डों के लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अभी तक इनके कई संस्करण प्रकाशित किये जा चुके हैं। दिनोंदिन इसकी मांग बढ़ती जा रही है। यह कहा जा सकता है कि हिन्दी क्षेत्र में इस संपूर्ण वाङ्मय ने डा. आंबेडकर के विचारों का प्रचार एवं प्रसार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

आंबेडकर द्वारा सम्पादित पत्र एवं पत्रिकाएँ

बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर ने दलित समाज में जागृति लाने के लिए कई पत्र एवं पत्रिकाओं का प्रकाशन एवं सम्पादन किया। इन पत्र-पत्रिकाओं ने उनके दलित आंदोलन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अगर देखा जाय तो डा. आंबेडकर ही दलित पत्रकारिता के आधार स्तम्भ हैं। वे दलित पत्रिकारिता के प्रथम संपादक, संस्थापक एवं प्रकाशक हैं उनके द्वारा संपादित पत्र आज की पत्रकारिता के लिए एक मानदण्ड हैं। डा. आंबेडकर  द्वारा निकाले गये पत्र-पत्रिकाओं की संक्षेप में जानकारी निम्नवत है-

(1) मूक नायक – इस मराठी पाक्षिक पत्र का प्रकाशन 31 जनवरी, 1920 को हुआ। इसके संपादक पाण्डुराम नन्दराम भटकर थे जो कि महार जाति से संबंध रखते थे। आंबेडकर इस पत्र के अधिकृत संपादक नहीं थे, लेकिन वे ही इस पत्र की जान थे। एक प्रकार से यह पत्र उन्हीं की आवाज का दूसरा लिखित रूप था। ‘मूक नायक’ सभी प्रकार से मूक-दलितों की ही आवाज थीए जिसमें उनकी पीड़ाएं बोलती थीं इस पत्र ने दलितों में एक नयी चेतना का संचार किया गया तथा उन्हें अपने अधिकारों के लिए आंदोलित होने को उकसाया। यह पत्र आर्थिक अभावों के चलते बहुत दिन तक तो नहीं चल सका लेकिन एक चेतना की लहर दौड़ाने के अपने उद्देश्य में कामयाब रहा।

(2) बहिष्कृत भारत – अल्प समय में ही ‘मूक-नायक’ के बन्द हो जाने के बाद डा. आंबेडकर  ने 3 अप्रैल 1927 को अपना दूसरा मराठी पाक्षिक ‘बहिष्कृत भारत’ निकाला। यह पत्र बाम्बे से प्रकाशित होता था। इसका संपादन डा. आंबेडकर खुद करते थे। इसके माध्यम से वे अस्पृश्य समाज की समस्याओं और शिकायतों को सामने लाने का कार्य करते थे तथा साथ ही साथ अपने आलोचकों को जवाब भी देने का कार्य करते थे। इस पत्र के एक सम्पादकीय में उन्होंने लिखा कि यदि तिलक अछूतों के बीच पैदा होते तो यह नारा नहीं लगाते कि ‘‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’’ बल्कि वह यह कहते कि ‘‘छुआछूत का उन्मूलन मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है।’’ इस पत्र ने भी दलित जागृति का महत्वपूर्ण कार्य किया।

 

(3) समता –इस पत्र का प्रकाशन 29 जून, 1928 को आरम्भ हुआ। यह पत्र डा. आंबेडकर द्वारा समाज सुधार हेतु स्थापित संस्था ‘समता संघ’ का मुख पत्र था। इसके संपादक के तौर पर डा. आंबेडकर ने देवराव विष्णु नाइक की नियुक्ति की थी।

(4) जनता – ‘समता’ पत्र बन्द होने के बाद डा. आंबेडकर ने इसका पुनप्र्रकाशन ‘जनता’ के नाम से किया। इसका प्रवेशांक 24 नवम्बर, 1930 को आया। यह फरवरी 1956 तक कुल 26 साल तक चलता रहा। इस पत्र के माध्यम से डा. आंबेडकर ने दलित समस्याओं को उठाने का बखूबी कार्य किया।

(5) प्रबुद्ध भारत – 14 अक्टूबर, 1956 को बाबा साहेब डा. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। इसी के साथ ही ‘जनता’ पत्र का नाम बदलकर उन्होंने ‘प्रबुद्ध भारत’ कर दिया। इस पत्र के मुखशीर्ष पर ‘अखिल भारतीय दलित फेडरेशन का मुखपत्र’ छपता था।

डा. अम्बेडकर के सभी पत्र मराठी भाषा में ही प्रकाशित हुए क्योंकि मराठी ही उस समय आम जनता की भाषा थी। चूकि बाबा साहेब का कार्य क्षेत्र महाराष्ट्र था और मराठी वहां की जन भाषा है। जैसा कि विदित है कि बाबा साहेब अंग्रेजी भाषा के भी प्रकाण्ड विद्वान थे, लेकिन उन्होंने अपने पत्र मराठी भाषा में इसलिए प्रकाशित किये कि उस समय महाराष्ट्र की दलित जनता ज्यादे पढ़ी लिखी नहीं थी, वह केवल मराठी ही समझ पाती थी। जबकि उसी समय महात्मा गांधी अपने आप को दलितों का हित चिन्तक दिखाने के लिए अपना एक पत्र ‘हरिजन’ अंग्रेजी भाषा में निकाल रहे थे जबकि उस समय दलित जनता आमतौर पर अंग्रेजी जानती ही नहीं थी। यह दलितों के साथ सरासर धोखेबाजी थी।

संदर्भ –

[1] बाबा साहेब डा. आंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय, खण्ड-1, पृ0 35

[2] वही, पृ0 99

[3] बाबा साहेब डा. आंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय, खण्ड-15, पृ0 10

[4] डा. बाबा साहेब आंबेडकर – जीवन चरित, धनंजय कीर, हिन्दी अनुवाद- गजानन सुर्वे, पृ0 387


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