डरो कि डरना जरूरी है

वर्चस्ववादी ब्राह्मणवादी ताकतों के विरोध ने हमेशा बहुजन आन्दोलन को एक नयी उर्जा दी है

हज़ार साल पुराना है उनका गुस्सा
हज़ार साल पुरानी है उनकी नफऱत
मैं तो सिर्फ
उनके बिखरे हुए शब्दों को
लय और तुक के साथ लौटा रहा हूँ
मगर तुम्हें डर है कि
आग भड़का रहा हूँ…

1975 के आसपास लिखी गई गोरख पाण्डेय की यह कविता, जितनी तब प्रासंगिक थी, शायद उससे ज्यादा आज के बहुजन आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक है। पांच हज़ार वर्षों से चली आ रही ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने दलित-पिछड़े समाज को केवल नफऱत, ज़लालत, शोषण-उत्पीडऩ, धोखा-फरेब और वंचना दी है। सन 1950 में देश के गणतंत्र बनने और डॉ. अम्बेडकर द्वारा निर्मित संविधान के लागू होने के बाद पहली बार यहाँ के दलित-आदिवासी और ओबीसी समाज को पढऩे-लिखने और सामाजिक-आर्थिक रूप से स्वतंत्र जीवन जीने का अवसर प्राप्त हुआ। हज़ारों साल से इन वंचित समूहों की आवाज़ को जबरन दबाकर रखा गया था। लेकिन संवैधानिक अधिकार मिलने के बाद इन तबकों ने जब अपने दर्द की मार्मिक कहानियों को अभिव्यक्त करना शुरू किया तो वर्चस्वशाली वर्ग द्वारा उसे ‘आग’ भड़काना करार दिया जाने लगा। वास्तव में, उत्पीडि़त समुदाय की दास्तान में महज रूदन, शिकायत या आक्रोश ही नहीं है बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनैतिक बदलाव की छटपटाहट भी मौज़ूद है।

ऐसा नहीं है कि अन्याय और वर्चस्व के खिलाफ पहली बार यह आवाज़ उठ रही है। ढाई हज़ार साल पहले, तथागत गौतम बुद्ध ने शोषणकारी वैदिक व्यवस्था के खिलाफ आमूलचूल परिवर्तन का बिगुल फूँका था। उस वक्त भी ब्राह्मणवादियों द्वारा विरोध की जबरदस्त आंधी चलाई गई थी। आगे चलकर यह परंपरा कबीर-रैदास, स्वामी अछूतानंद, नारायण गुरु, जोतिबा-सावित्रीबाई फूले, रामास्वामी पेरियार आदि के रूप में अपना फौलादी स्वर बुलंद करती रही। मुखालफ़त तब भी जारी रही थी। आदिवासी समुदाय में सिद्धो-कान्हो, तिलका मांझी, बिरसा मुंडा, टंट्या भील, गोविन्द गुरु, रानी दुर्गावती, शंकर शाह-रघुनाथ शाह और रानी गिडालू जैसे शूरवीरों ने दमनकारी तंत्र के खिलाफ लड़ाई लड़ी और शहीद हुए। आधुनिक भारत में डा. आम्बेडकर को हर स्तर पर लडऩा-जूझना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने प्रतिरोध की आवाज़ को कभी मद्धिम नहीं होने दिया।

इसकी ऐतिहासिक व्याख्या की जाए तो यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि प्रतिरोध की निर्भीक अभिव्यक्ति बहुजन समाज की परम्परा रही है। यही कारण है कि आम्बेडकरवाद की वैचारिक प्रेरणा से शुरू हुआ दलित साहित्य आज मराठी, हिन्दी, गुजराती, पंजाबी, कन्नड़, मलयालम, तमिल, तेलगू समेत लगभग सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य को समृद्ध कर रहा है।

लेकिन अपने आरंभिक काल में हर भाषा के दलित साहित्य को द्विज साहित्य का भारी विरोध और उपेक्षा झेलनी पड़ी, इसमें सर्वाधिक आश्चर्यजनक बात तो यह रही कि सवर्ण वामपंथी लेखकों ने भी हर जगह दलित साहित्य का खूब विरोध किया, लेकिन परिवर्तनकामी चेतना से संपृक्त दलित साहित्य और उसके आन्दोलन को जातिवादी बाधाएं नहीं रोक सकीं और आज यह कारवां पूरी ताकत के साथ आगे ही बढ़ता जा रहा है।

संवैधानिक प्रावधानों की बदौलत एस.सी.-एस.टी. और ओबीसी वर्ग में आई सामाजिक-राजनैतिक चेतना ने बहुजन प्रतिरोध के स्वर को मज़बूत आधार प्रदान किया है। अपने वैचारिक महापुरुषों से प्रेरणा लेकर इन समूहों ने अब अपनी संस्कृति, साहित्य और इतिहास की नए सिरे से व्याख्या और उनकी नवनिर्मिति करनी शुरू कर दी है। ऐसा लग रहा है जैसे बहुजन समाज पिछले पांच हज़ार साल का हिसाब मांग रहा है। इस देश के इतिहास, साहित्य, संस्कृति और सामाजिक संरचना में खुद के वजूद को न पाकर अब यह तबका एक नई समतामूलक समाज-व्यवस्था रच रहा है. ज़ाहिर है, इससे यहाँ के ब्राह्मणवादी सवर्ण समाज को अपने वर्चस्व के ख़त्म होने का खतरा नजऱ आने लगा है. उसे ‘गड़े मुर्दे’ उखड़ जाने का भय सताने लगा है। इसलिए हिंदुत्ववादी शक्तियों ने इस चेतनाकामी विचारधारा को कुचलने, अन्धविश्वास व कर्मकांड के बहाने धार्मिक-सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाने और बहुजन प्रतिरोध को नष्ट करने की अपनी कारगुजारियां भी तेज़ कर दी हैं। उनका डर अब बढऩे लगा है। हताशा में वे बेचैन होने लगे हैं और दमन के नए-नए कायराना तरीकों को आजमाने में जुट गए हैं। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि वर्चस्ववादियों का यह डर और विरोध ही बहुजन आन्दोलन को बल प्रदान करेगा, जिस तरह कि बुद्ध, कबीर, बिरसा एवं बाबासाहेब को ऊर्जा और ताक़त मिली थी। वस्तुत: बहुजन आन्दोलन के लिए चुनौतियां बढ़ेंगी तो लड़ाई के तरीकों, तैयारियों और वैचारिक मज़बूती की धार भी तेज़ होगी और तभी आम्बेडकरवाद का सपना सच होगा।

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी, 2015 अंक में प्रकाशित)


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