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बाऊ जी की गंजी

शंकर प्रलामी की दो कविताएं

बाऊ जी की गंजी

लंबी होती परछाईं की जद में आई अलगनी पर
सूखते कपड़ों को धूप की तरफ सरकाने पहुंचा
देखा-मेरी गंजी नहीं है
पत्नी को आवाज दी
लौटकर आरामकुर्सी में धंस गया फि र से

बाऊ जी को आराम मिलता है इस पर
जब वो यहां नहीं होते तो मैं भी…

परछाई अब अलगनी से उतरकर मुझ तक आ गई है
परछाई के दूसरे सिरे पर
एक गंजी चमगादड़ की नाईं लटकी है
मेरी..अरे नहीं, बाऊ जी की गंजी
दोनों कांख और आगे-पीछे के गायब ऊपरी हिस्सों के बावजूद
मैली-चीकट वह गंजी आखिरी रेशे तक
चीथड़ों में शामिल नहीं की जा सकती

देखता रहा हूं छुटपन से
अपनी चादर में पांव सिकोड़े रहने की सजगता में
रतजगा करते बाऊ जी के पास
सरकारी यूनिफार्म के अलावा
एक पैंट, एक कमीज ही हुआ करती थी जो
यदा-कदा घुलती थी पर इकलौती गंजी तो..
एक साथ दो गंजियों की फिजूलखर्ची
बाऊ जी सोच भी नहीं सकते थे
मां जब-‘चिथड़े उड़ गए हैं.. बास आती है..छि :..
लोग क्या कहते होंगे’ जैसे अस्त्र फेंकती
तो बाऊ जी कहते-‘अंदर की चीज है, घर के या कमीज के
क्या फर्क पड़ता है.. फ टी है कि मैली’
और अस्त्र नाकाम

सेवानिवृत्ति के बाद
बाऊ जी हमारे साथ रहते हैं
नौकरी में हूं/बाऊ जी का ख्याल रखता हूं
बाऊ जी की अब दो गंजियां हैं
साफ-सुथरी-साबुत
मैं खुश हूं.. मां ज्यादा खुश है

कूकर की सीटी-सी सनसनाती
पत्नी कमरे में प्रवेश करती है-अब बोलिए!
अलगनी से गायब अपनी गंजी के बाबत पूछना चाहता हूं
तभी
पत्नी के एक हाथ में लैंप का कलिखाया सीसा
और दूसरे में सफाईरत् मेरी गंजी दिख जाती है

अब पूछना क्या था
मेरे चेहरे पर उग आए गुस्से से बेखबर मुस्कुराती
कमरे से वह निकल जाती है
-चिथड़े उड़ गए हैं.. बास आती है..छि: लोग क्या कहते होंगे’
-मैंने साफ -साफ सुना, पर
पत्नी तो कब की जा चुकी थी
और मां बाऊ जी के साथ छठ के बाद से गांव में है, फि र..?
लौटता हूं मैं परछाईं के उसी सिरे पर

चमगादड़-सी उलटी लटकी रहने वाली
चित्तियोंवाली मैली-चीकट-फ टी-चिटी वह गंजी
मेरे सामने सीधी खड़ी है
देखते-देखते बाऊ जी में तब्दील हो गई है
बाऊ जी मुस्कुरा रहे हैं
मैं उनकी उपस्थिति में कभी आरामकुर्सी पर नहीं बैठा
उठना चाहता हूं.. उठ नहीं पाता
बाऊ जी बैठे रहने को कहते हैं
बैठ जाता हूं
मैं साफ -साफ देख रहा हूं :
बाऊ जी को हौले-हौले दूर जाते हुए….


हासिल

हिरण्यधनु के धनुर्धर
प्रांतरप्रहरी एकलव्य!
तुम्हारे तूणीर का एक-एक वाण
जानता था आखेट का स्वाद
तो भी…तो भी उस दिनवन

स्वानों ने भौंक-भौंककर पूरे वन में कोहराम मचा दिया
मानो, तुम्हारी साधना भंग करने की ठान रखी हो !!
तुमने अपने उद्वेग बांधकर
लक्ष्य साधकर
शतप्राय वाणों से उन संदुष्ट श्वानों का मुंह भर दिया
और!! अपनी साधना में लीन हो गए थे
ऐसा करते भी तुमने
किसी वाण को रक्तपात की किंचित्नमात्र अनुमति नहीं दी

धनुपुत्र! अद्भुत!! अद्भुत!!!
धनुकौशल का चमत्कार था…या
एक आरण्यक का अनुवंशी संस्कार
एक माहिर का फ न था या मार्यादा का प्रण

सच बतलाना भीलकुंवर,
सचमुच यह हुनर तुमने अपने मानसगुरु द्रोण से ही सीखा था?
तो
कैसे कर सका वो
अपूर्व-अलौकिक एक हासिल का वध
और
कैसे संभाल सका वो
अपने संकीर्ण कर-द्रोण में इतना कुछभरोसे
का लहुआया मांसपिंड
आस्था का रक्त-समंदर
और..और
उभरती एक सभ्यता का विध्वंस-बोध!

(फारवर्ड प्रेस, बहुजन साहित्य वार्षिक, मई, 2014 अंक में प्रकाशित )


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लेखक के बारे में

शंकर प्रलामी

शंकर प्रलामी की 'मुझे कुलहीन ही रहने दो' कविता संग्रह प्रकाशित है।

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