हम जरूर जिएंगे ही, पठार की तरह निडर
पठारी क्षेत्र में तुमने
हमें (असुरों को) जन्म दिया
पर जिंदा रहने के लिए रास्ता नहीं बतलाया
पठारी क्षेत्र में तुमने
हमें (असुरों को) मजदूर बनाया
पर स्कूल जाने के लिए पैसा नहीं दिया
हमें आगे बढऩे के लिए रास्ता नहीं बतलाया
अब तो हमारे पास भाषा नहीं है
अब तो हमारे पास संस्कृति नहीं है
हम तुम्हें कैसे पुकारें
हम तुम्हें किस विधि से याद करें
हे धरती के पुरखो, हे आसमान के पुरखो
ओ हमारे माता-पिता, ओ सभी असुर बूढ़े-बूढिय़ो
तुम्हारे भोजन की जिम्मेवारी जंगल की थी
तुम्हारी मजूरी खेत की जिम्मेवारी थी
यहां से वहां तक फैला पठार ही तुम्हारी पाठशाला थी
पहाड़-झरने तुम्हें रास्ता बताते थे
हे धरती के पुरखो, हे आसमान के पुरखो
ओ हमारे माता-पिता, ओ सभी असुर बूढ़े-बूढिय़ो
तुम सब नहीं जानते थे कचिया-ढिबा (रुपया-पैसा)
तुम सब नहीं जानते थे परजीविता
हम तुम्हें दोष नहीं देते
हम तुम्हें अपनी असहायता के लिए
कोर्ट-कचहरी नहीं करते
पर जब कंपनी धम-धम आती है
पर जब सरकार दम-दम बेदम करती है
हम किसको गोहराएं
हम किस छाती में आसरा ढूंढे
हे धरती के पुरखो, हे आसमान के पुरखो
ओ हमारे माता-पिता, ओ सभी असुर बूढ़े-बूढिय़ो
हम सीखेंगे तुम्हारी तरह बोलना
हम सीखेंगे तुम्हारी तरह नाचना
हम करेंगे शिकार तुम्हारी तरह
उन सभी जानवरों का
जो असुरों के घर खोद रहे हैं
जो हमारे झरनों को फुसला-बहला रहे हैं
जिन्हें धरती और इंसान खाने की लत है
हम जरूर जिएंगे तुम्हारी तरह ही
पठार की तरह निश्चिंत-निश्छल
तुम्हारे रचे इस असुर दिसुम में
पहाड़ रो रहा है
पहाड़ रो रहा है
नदी सिसक रही है
रो रहे हैं झारखंड के झरने
धरती पहाड़ सब रो रहे हैं
रो रहे हैं असुर सारे
झरने में पानी नहीं है
पहाड़ में फूल-फल नहीं है
नदी में बहने के लिए पानी नहीं है
बाघ, बंदर, भालू, सियार,
सांप, हाथी, खरगोश, चिडिय़ों
के लिए जगह नहीं है
पहाड़ का घर खत्म हो गया है
भाषा ही नहीं रहेगी तो
गीतों का मेला कहां लगेगा
हमने बनाया था लोहा
अब उसी लोहे से कंपनी वाले
धरती कोड़-कोड़ लहू बहा रहे हैं
उसी लोहे से मार रहे हैं
रो रहे हैं असुर सारे।
कितने दिन?
कितने दिन जमीन
बेचा हुआ रुपया-पैसा रहेगा?
कितने दिन पत्थर तोड़ोगे?
पत्थर-खेत क्यों तोड़ रहे हो?
तुम लोग पेट का
पोटा (अंतड़ी) को तोड़ रहे हो
और खत्म कर रहे हो खुद को
कितने दिनों तक
जमीन बेचा हुआ, रुपया पैसा रहेगा?
एक दिन ऐसा समय आएगा
बच्चे तुम्हारे खून से
ढिबरी जला-जला कर खोजेंगे
उस दिन तुम्हारी आंखों से गिरेगा पानी
सभी सूख गए झरनों का पानी
झर झर झार …
अभी तो सभी जमीन को बेच-बेचकर
फूलपैंट, जूते-चह्रश्वपल पहन रहे हैं
खूब दारू-शराब पी रहे हो
नाच-नाच के मोबाइल हो रहे हो
कल के समय में कुछ भी नहीं मिलेगा
कल के समय में कुछ भी नहीं बचेगा
रिरियाने के लिए भाषा भी नहीं बचेगी
किसके कंधों पर सर रखकर रोओगे
पहाड़ तो शहर में बिछी होगी अलकतरा के साथ
कुचल रही होंगी हर पल जिसे
अनगिनत नई-नई मॉडल की गाडिय़ां
(फारवर्ड प्रेस, बहुजन साहित्य वार्षिक, मई, 2014 अंक में प्रकाशित )
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