हे ईश्वर कहां पर रहते हो तुम?

पॉल माल्तो की कविता

धरती को देखने पर धरती (जमीन) सूखी दिखती है
आसमान को देखने पर आसमान ऊंचाई पर दिखता है
तकलीफ से ही दिन गुजरता है।
हे ईश्वर कहां पर रहते हो तुम?
हमारा दिल (मन) तुम्हें खोजता है

पहाड़ पर रहने वाले लोग पहाडिय़ा मानते हैं
बीमारी से मरते जा रहे हैं जो
हमलोगों को देखने वाला कोई नहीं है
हम पर हंसने वाले लोग ज्यादा हैं
तकलीफ से ही दिन गुजरता है
हे ईश्वर कहां पर रहते हो तुम?
हमारा दिल (मन) तुम्हें खोजता है

पहले सूखाड़-अकाल के दिनों में
भूखमरी से मर गए बहुत से लोग
भूखमरी में ताड़ और ओल खाकर जीवित रहे
तकलीफ से ही दिन गुजरता है

हे ईश्वर कहां पर रहते हो तुम?
हमारा दिल (मन) तुम्हें खोजता है

(फारवर्ड प्रेस, बहुजन साहित्य वार्षिक, मई, 2014 अंक में प्रकाशित )


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