यह तुम्हारा समय है मेरा नहीं : राजेंद्र यादव

देश-विदेश के साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों में भागीदारी और ‘हंस’ के संपादन के साथ-साथ स्त्री व दलित विमर्श में सार्थक हस्तक्षेप के कारण राजेंद्र यादव लगातार चर्चा में बने रहे

हिंदी में ‘नई कहानी’ आंदोलन के प्रवर्तकों में से एक, कहानीकार-उपन्यासकार और साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ के संपादक राजेंद्र यादव का निधन साहित्य जगत से एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर का चले जाना है। देश-विदेश के साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों में भागीदारी और ‘हंस’ के संपादन के साथ-साथ स्त्री व दलित विमर्श में सार्थक हस्तक्षेप के कारण राजेंद्र यादव लगातार चर्चा में बने रहे। साहित्यकारों की नई पीढी के साथ उनका जुड़ाव एक दोस्त के रूप में था और वे जब तक जीवित रहे तब तक युवा लेखकों की यही आकांक्षा रही कि उन्हें राजेंद्र यादव से बतरस का मौका मिले।

राजेंद्र यादव

इसी इच्छा से दिल्ली आने के बाद सबसे पहले मैं यदि किन्हीं से मिला तो वे राजेंद्र यादव थे। जब तक मैं दिल्ली में रहा उनसे बराबर मिलता रहा। राजधानी में रहकर पत्रकारिता में एमए करने और कुछ समय तक दैनिक लोकमत समाचार में काम करने के बाद मैंने वर्ष 2013 में फॉरवर्ड प्रेस’ ज्वाइन की। उसके बाद कई बार यादव जी से मुलाकातें हुईं लेकिन वे औपचारिक ही रहीं। हालांकि इन मुलाकातों में उनके सहज स्वभाव के कारण मैं उनसे बहुत खुल गया था और उनसे लडऩे-भिडऩे का माद्दा भी मुझमें आ गया था।

अप्रैल, 2013 में फॉरवर्ड प्रेस की ‘बहुजन साहित्य वार्षिकी’ प्रकाशित होने के बाद मेरे मन में अनेक सवाल उमड़े और पता नहीं क्यों ऐसा लगा कि इनके उत्तर सिर्फ राजेंद्र यादव ही दे सकते हैं। मुख्य सवाल ‘ओबीसी साहित्य’ की उस अवधारणा को लेकर था, जिसे ‘फॉरवर्ड प्रेस, प्रस्तुत कर रहा था। इस संबंध में यादव जी का इंटरव्यू (फॉरवर्ड प्रेस के अगस्त और सितंबर, 2011 अंक में प्रकाशित) मुख्य संपादक आयवन कोस्का और तत्कालीन संपादक (हिंदी) प्रमोद रंजन ले चुके थे। साक्षात्कार में यादव जी ने जो बातें कहीं थीं, वे मुझे संतुष्ट नहीं कर पा रही थीं।

बहरहाल, ओबीसी साहित्य पर चर्चा करने की और अनेक जिज्ञासाएं मन में लिए मैं उनसे मिलने दरियागंज स्थित ‘हंस’ कार्यालय पहुंच गया। औपचारिक दुआ-सलाम के बाद उनसे बातचीत शुरू हुई –

सर, ओबीसी साहित्य को आप कैसे देखते हैं?

हमारे हिसाब से ओबीसी साहित्य की कोई अवधारणा अभी तक सामने नहीं आई है।

लेकिन दलित साहित्य को जब आप मान्यता देते हैं तो ओबीसी साहित्य को क्यों नकार रहे हैं?

दलित साहित्य के पीछे उन समुदायों की सामाजिक, राजनीतिक पीड़ा का यथार्थ है।

हिंदी में दलित साहित्य की धारा को लेकर ‘हंस’ को आपने समकालीन परिदृश्य में साहित्यिक वाद-विवाद का एक सक्रिय मंच बना दिया। लेकिन आप ओबीसी के हक को नकार रहे हैं?

यह कहते हुए मुझे कोई संकोच या किसी तरह की हिचक नहीं है कि पिछले ढाई दशक में हिंदी पट्टी में रहने वाले लोगों की महत्वपूर्ण कहानियां ‘हंस’ में ही छपीं। अगर झूठी शालीनता न बरतूं तो कह सकता हूं कि हिंदी में अस्सी प्रतिशत श्रेष्ठ कहानियां ‘हंस’ में ही प्रकाशित हुई हैं और अगर तुम इसे समकालीन परिदृश्य में साहित्यिक वाद-विवाद का सक्रिय मंच मानते हो तो तुहारी मर्जी। अगर तुम चाहते हो कि ओबीसी को लेकर भी ऐसा परिदृश्य पैदा हो तो सबसे पहले ओबीसी की अवधारणा क्या है, यह तो स्पष्ट करो।

मंडल कमीशन ने पिछड़े समुदायों के लोगों को सामूहिक रूप से ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ का नाम दिया। इन पिछड़े समुदायों के लोग अपनी पीड़ा
को उजागर करना चाहते हैं। आप विरोध कर रहे हैं?

देखो, पहली बात मैं कोई विरोध नहीं कर रहा हूं। भाई, मैं तो यह कह रहा हूं कि ओबीसी अपने विचार को समग्रता से पहले सामने तो लाएं, अपने चिंतकों को सामने तो लाएं। वहां जब चिंतक ही नहीं हैं तो चिंतन कौन करेगा।

आप भी तो ओबीसी समाज से हैं। फिर आपने इसके लिए काम क्यों नहीं किया?

‘देखो, मैं फिर तुमसे कह रहा हूं कि मेरे समय में ओबीसी साहित्य जैसा कुछ नहीं था, तो मैं उस पर कार्य कैसे करता

लेकिन आप ओबीसी हैं तो अपने को ओबीसी लेखक कहलवाना क्यों नहीं चाहते?

मैं अपने आप को ओबीसी के दायरे में समेटकर नहीं देखता।

आप दलित चिंतकों के बारे में बात तो करते हैं लेकिन आपको ओबीसी में कोई चिंतक ही दिखाई नहीं देता?

देखो, दलितों के पास आम्बेडकर, अछूतानंद, फुले हैं। ओबीसी में कौन है?

लेकिन फुले तो ओबीसी वर्ग में आते है?

फुले के समय में ओबीसी नहीं था।

लेकिन वर्तमान में ओबीसी वर्ग है और उसमें आप भी हैं?

अब मेरा समय नहीं है, यह समय तुम जैसे लोगों का है। तुम जो काम करोगे वह तुम्हें आगे ले जाएगा।

लेकिन आप हमारे जैसे लोगों को आधार ही मुहैय्या नहीं करा रहे हैं?

मेरे समय में साहित्य में ओबीसी वर्ग का विमर्श नहीं था। अब तुम्हारे समय में है, तुम इस पर काम करो।

तो आप हमें सहयोग करेंगे?

‘हां, अगर तुम ईमानदारीपूर्वक तार्किक रूप से काम करोगे, अपने विचारकों को आगे लाओगे, तब जहां भी तुम्हें मेरी जरूरत हो बताना, मैं तुम्हारी मदद करूंगा।

लेकिन आप अभी ही मदद नहीं कर रहे है?

देखो, बात समझने की कोशिश करो। हमारे समय में साहित्य का इस तरह का बंटवारा नहीं हुआ था। हम लोग मुख्यधारा के साहित्य के अंदर ही अपनी अस्मिता के लिए लड़ रहे थे। लेकिन अब तुम लोग कर रहे हो तो तुम इस पर लिखो। मैं तुम्हारे साथ हूं। मैं नए विचारों को सामने लाना चाहता हूं। मेरे लिए यह नई चीज है, अगर ऐसा तुम कर पाओ तो आगे देखेंगे। तुम्हें जो भी सहयोग चाहिए, हम करेंगे।

और इस तरह उन्होंने हौसला अफजाई करते हुए बातचीत समाप्त करने का इशाारा किया।’

9 अक्टूबर, 2013 को मन व्यथित और शोकाकुल हो गया जब सुबह-सुबह कटिहार से नवनीत यादव ने फोन कर राजेंद्र यादव के इंतकाल की सूचना दी। मेरे लिए, ‘सारा आकाश’ एकबारगी खाली हो गया था।

(फारवर्ड प्रेस, बहुजन साहित्य वार्षिक, मई, 2014 अंक में प्रकाशित )


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