उच्च शिक्षा में ओबीसी-आदिवासी सीटों की लूट ​

कोलकाता के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान सेंटर फाॅर स्टडीज इन सोशल साइंसेज सरकार के निदेर्शों के बावजूद आरक्षण के नियमों का उल्लंघन कर रहा है। यह स्थिति तब है जबकि यह संस्थान सामाजिक अध्ययन के क्षेत्र में उत्कृष्ट माना जाता है और प्राख्यात इतिहासकार पार्थ चटर्जी जैसे शिक्षाविद् यहां मानद प्रोफेसर हैं

कहने की आवश्यकता नहीं है कि कोलकाता का सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज एक प्रतिष्ठित व सरकार द्वारा वित्त संपोषित संस्थान है। सामाजिक अध्ययन के मामले में पूरे देश में अपनी अलग पहचान रखने वाले इस संस्थान की वास्तविकता यह है कि सरकार द्वारा वित्त संपोषित होने के बावजूद यह संस्थान आरक्षण के संबंध में सरकार के निर्देशों का पालन नहीं करता है। सामाजिक न्याय यहां हाशिये पर है।

सीएसएसएससी में एक सेमिनार को संबोधित करतीं ताप्ती गुहा ठाकुरता। जुलाई तक ये संस्थान की निदेशक थीं

प्राप्त जानकारी के मुताबिक सीएसएसएससी ने हाल ही में आरक्षित श्रेणी के शिक्षकों की नियुक्ति शुरू की है। इसके तहत पिछले वर्ष पहली बार दो दलित अध्यापकों की नियुक्ति संस्थान में की गई थी। संस्थान ने इस संवाददाता को बताया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग जैसी उच्चत्तर संस्थाओं के निर्देशों का पालन करने के लिए आरक्षित श्रेणी के अधिक से अधिक शिक्षक नियुक्ति करने की प्रक्रिया शुरू की गई है।

संस्थान के सूत्र यह भी बताते हैं कि संस्थान में आरक्षण को दरकिनार करने की परंपरा बन चुकी है। आरक्षित पदों के बारे में कह दिया जाता है कि उपयुक्त अभ्यर्थियों के नहीं होने के कारण सीटें खाली रह गयीं और बाद में आरक्षित कोटे के पदों को सामान्य श्रेणी का पद घोषित कर दी जाती है। लेकिन इस मामले में यह स्पष्ट नहीं किया जाता कि ऐसा करने के लिए संबंधित प्राधिकारों से अनुमति ली गई थी या नहीं।

शैक्षिक वर्ष 2016-2017 में इस मामले से जुड़े छात्रों के एक समूह ने रिक्त पड़ें आरक्षित सींटों का मामला उठाया। उन्होंने संस्थान के निदेशक को एक पत्र लिखा, जिसमें कहा गया कि  संस्थान में दाखिले की कुल अधिकतम सीटों (कुल 20 सीटों) के आलोक में संस्थान ने जिन उम्मीदवारों की प्रवेश सूची जारी की उनमें से 14 सामान्य श्रेणी के  और  दो आरक्षित श्रेणी के थे। इस प्रकार जिन 16 उम्मीदवारों को इस संस्थान में प्रवेश के योग्य पाया गया, उनमें से केवल दो आरक्षित श्रेणी के रहे और उसमें भी केवल एक अनुसूचति जाति के थे।

पार्थ चटर्जी सीएसएसएससी के मानद प्रोफेसर हैं

ध्यातव्य है कि पश्चिम बंगाल के उच्च शिक्षा विभाग ने 3 जनवरी 2014 को एक अधिसूचना जारी की थी। इसके मुताबिक उसके नियम-4 के उप-नियम-1 के अनुसार किसी भी विशेष कोर्स में कुल उपलब्ध सीटों ( इस मामले में 20 ) में से 22 प्रतिशत अनुसूचित जातियों, 6 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों, 10 प्रतिशत ओबीसी-और 7 प्रतिशत ओबीसी-बी के लिए आरक्षित होंगी। इस प्रकार कुल सीटों का 45 प्रतिशत इन श्रेणियों के लिए आरक्षित होगा। यदि सीएसएसएससी प्रबंधन इस अधिसूचना को लागू करे तो कुल 20 सीटों में से 9 सीटें आरक्षित होंगी और 11 सीटें अनारक्षित होंगी। जबकि इन संदर्भ में यदि 2016-17 में प्रवेश के योग्य पाए जाने वाले छात्रों की सूची पर निगाह डालें, तो पाते हैं कि ओबीसी और अनुसूचित जनजाति श्रेणी के किसी भी छात्र को प्रवेश नहीं दिया गया और सामान्य श्रेणी की कुल 11 सीटों में 3 और अतिरिक्त सीटें जोड़ दी गईं। महत्वपूर्ण यह है कि पश्चिम बंगाल के उच्च शिक्षा विभाग की उपर वर्णित अधिनियम के नियम-8 के तहत आरक्षित सीट को अनाक्षित सीटघोषित करने का अधिकार संस्थान को है, लेकिन इसके साथ शर्त जुड़ी हैं। इसके लिए कुछ निश्चित औपचारिक प्रक्रियाओं का पालन करना जरूरी है। जैसे कि पश्चिम बंगाल के पिछड़े वर्गों के कल्याण विभाग के आरक्षण के संयुक्त आयुक्त से अनुमति लेना।

हम उम्मीद  करते हैं कि आरक्षित सीटों को सामान्य सीट घोषित करते समय इस प्रक्रिया का उचित तरीके से पालन किया गया होगा, और हम इस मामले में संस्थान से स्पष्टीकरण चाहते हैं। हम इस मामले में अपनी हैरानी भी दर्ज करना करना चाहते हैं कि आरक्षित श्रेणी के जो छात्र प्रवेश पाने की योग्य थे, उन्हें प्रवेश क्यों नहीं दिया गया। जबकि विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी के अनुसार इन मामलों में प्रबंधन का रूख आमतौर पर समझ में न आने वाला और इंकार करने वाला था।

इस संदर्भ में छात्रों के एक समूह द्वारा पिछले वर्ष लिखा गया एक पत्र इसी तरह की असंगति को शिक्षकों की नियुक्ति के मामले में उजागार करता है। यह पत्र संस्थान के वेबसाइट पर हाल में ही प्रकाशित विज्ञापन के संदर्भ में है, जिसके जरिए संस्थान में शिक्षकों के खाली पदों के लिए आवेदन आमत्रित की गयीं। वेबसाइट पर प्रकाशित प्रारंभिक विज्ञापन (जो अब वेबसाइट से हटा दी गयी हैं) में लगता है कि आरक्षण की नीतियों को लागू करने से संबंधित कोई अनुच्छेद नहीं था, जिसका इस तरह की नियुक्तियों में पालन किया जाना जाना चाहिए। उदाहरण के लिए अभी हाल में पीएचडी के जो आवेदन मांगे गए हैं उसमें यह चीज स्पष्ट तौर पर सामने आई है। हम लोगों को इस सूचना के लिए आपको इसलिए लिखना पड़ा, क्योंकि संस्थान में सुनिश्चित प्रश्नों के बारे में सूचनाएं देने के लिए अभी कोई कार्यालय या या इस काम के लिए नियुक्त कोई अधिकारी नहीं हैं। यहां तक कि यदि यह जानकारी सूचना अधिकार अधिनियम के तहत मांगी जाए, तो भी प्रबंधन द्वारा जानकारी नहीं दी जाती है

इसी संस्थान एक पूर्ववर्ती छात्र जीशान हुसैन बताते हैं कि इस संस्थान में सवर्ण शिक्षकों की भरमार है। गैर-सवर्ण छात्र छिपे और खुले तौर पर भी भेदभाव का सामना करते हैं। पूर्ववर्ती छात्र अपनी बात आगे बढ़ाते हुए बताते हैं कि  आमतौर पर गैर-सवर्ण छात्र (कक्षा में अपने परिणामों के मामले में) सवर्ण छात्रों की तुलना में निचले पायदान पर रहते हुए 25 प्रतिशत पाते हैं। गैर-सवर्ण छात्रों के लिए शिक्षकों से अनुमोदन पत्र प्राप्त करना बहुत कठिन होता है। उन्होंने कहा कि मैं ऐसे गैर-सवर्ण छात्र को जानता हूं, जो अपने गाइड से एक अनुमोदन पत्र नहीं प्राप्त कर पाया, जबकि उसी के बैच के अन्य 2 सवर्ण छात्रों को अनुमोदन पत्र मिल गया। गैर-सवर्ण छात्र को उनके गाइड ने उसे लंबे समय तक लटकाए रखा और आखिरकार अनुमोदन पत्र देने से इंकार कर दिया।

उल्लेखनीय है कि जब कुछ वर्ष पहले अंबेडकरवादी छात्रों के एक समूह द्वारा संस्थान के कैम्पस में एक बीफ फेस्टिवल (गौ-मांस भोजन उत्सव) आयोजित की गयी थी तब कई शिक्षकों के अलावा बहुत सारे लोग शामिल हुए। वहीं शिक्षकेत्तर कर्मचारी दूर रहे। हालांकि एक स्रोत के मुताबिक शिक्षकों के बीच से भी असहमति का स्वर उभरा था। उनका कहना था कि “बंगाल के दलित गौ-मांस नहीं खाते।” प्राप्त जानकारी के अनुसार बीफ फेस्टिवल का आयोजन करने वाले अंबेडकरवादी छात्रों के समूह ने ही शिक्षकों की नियुक्तियों और छात्रों के प्रवेश के मामले में आरक्षण का मुद्दा उठाया था।

हद तो तब हो गयी जब वर्ष 2015 में संस्थान के कुल सचिव ने संविदा के आधार पर नियुक्त एक दलित-मुस्लिम कर्मचारी को एक छोटी सी गलती के लिए कान पकड़कर उठक-बैठक करने को कहा। स्रोत बताते हैं कि प्रशासन इस मामले को रफा-दफा करना चाहता था। संयोग की बात यह है कि यह कर्मचारी बीफ फेस्टिबल में शामिल हुआ था। संस्थान पर लगे इन धब्बों को धोने के लिए बाद में जाति पर एक कार्यशाला आयोजित की गई। लेकिन तत्कालीन निदेशक ने कार्यशाला की रूपरेखा ही बदल दी। बाद में जुलाई की शुरूआत में ख्यातिलब्ध अकादमिशियन रोसिनका चौधरी ने संस्थान के निदेशक के रूप में कार्यभार संभाला।

संस्थान के एक पूर्ववर्ती छात्र कुनाल दुग्गल ने राउण्ड टेबल इंडिया द्वारा प्रकाशित अपने लेख में इस संस्थान में जातिगत भेदभाव के अपने अनुभवों के  बारे में लिखा है। वे लिखते हैं कि दो अध्यापकों ने उनकी जाति और संस्थान में उनके प्रवेश के बारे में अपमानजनक ढंग से पूछताछ की थी। इन सभी मामलों में संस्थान प्रबंधन की क्या राय रही, इस संदर्भ में प्रबंधन से उनकी मुलाकात नहीं हो सकी।


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