आदिवासी साहित्य की पहचान

हाल के वर्षों में लिखित साहित्य के रूप में आदिवासी साहित्य और विमर्श ने महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराई है। आदिवासी साहित्यकारों में आदिवासी और गैर-आदिवासी दोनों शामिल हैं। आदिवासी भाषा, साहित्य और संस्कृति की प्राचीनता, विविधता, व्यापकता, प्रकृति के साथ उसके सघन जुड़ाव और जीवन्तता से परिचित करा रहे हैं जनार्दन गोंड :

नाकुन पिसिहाट का गोंडी में अर्थ होता है मुझे बचाओ, जो एक चित्कार और खुद के वजूद के लिए किया गया आह्वान है। गोंड़ी का संपूर्ण वैभव प्रकृति का सानिध्य पाकर अर्थवान होता, जिसे एक उदाहरण से देख सकते हैं-

बस्सो उंग्गुर ता तादो थामन थूनी,

बस्सो उंग्गुर ता तादो हरीलो बद्दूर।

बिंदरा उंग्गुर ता तादो थामन थूनी,

बापी टे नरकी तादो हरीलो बद्दूर ।

बापी टे नरकी तादो थामन थूनी,

बापी टे नरकी तादो हरीलो बद्दूर।

यह गीत और लंबा है जिसका सारांश इस प्रकार है– हे मेरे दादा (आजा) कौन से जंगल से आपने मंडल के लिए थूनियां, बल्ललियां, और हरे-हरे बांस लाए। शायद कजरी वन से थूनियां और बल्लियां लाएं होंगे और बिंदरा वन से हरे-हरे बांस लाए होंगे।

यह गीत गोंड समुदाय में विवाह की तैयारी के समय गाया जाता है, जब मंडाधारी गाड़ने की तैयारी हो रही होती है। इस गीत में वन और उन के उत्पादों पर आधारित जीवन का वर्णन है। आदिवासी जीवन के सभी कार्यक्रम सामुदायिक तरीके से संपन्न होते हैं। मंडाधारी लाने और गाड़ने का उपक्रम भी सामूहिक होता है। प्रस्तुत व्यवस्था का वर्णन करते हुए गोंडी भाषा और संस्कृति के अध्येता टेकसिंह तेकाम कहते हैं,“बड़े सबेर छ:-सात पुरुष तीन–चार बैल गाड़ियां लेकर मंडाधारी लाने के लिए जंगल चले जाते हैं। ये लोग मंडप बनाने के लिए ताजी-ताजी सालाई, मवई और साज की लकड़ियां,हरे-हरे बांस, जामुन की हर-हरी टहनियां लाते हैं। इस सारी संपदा को बैलगाड़ी पर लादकर दस बजे तक घर, चले आते हैं।”

गीत-संगीत में झूमता आदिवासी समाज

जैसा कि ऊपर तेकामजी ने कहा है कि इसमें साज के तीन मलंग,खाम की लकड़ी, सत्ताइस बांसें एवं जामुन की टहनियां होती हैं। सम्मिलित रूप से इन्ही वन के उत्पादों को मंडाधारी कहा जाता है। अभिजन समाज में गोंड समुदाय की यह सांस्कृतिक उपलब्धियां मंडवा के रूप में देखी जाती है।

अपनी पहचान और प्राकृतिक वैभव को बचाने के लिए जान की कुर्बानी करने तक से पीछे न हटने वाले आदिवासी समुदाय का साहित्य अभी तक न सही रूप से न सामने आ पाया है ना ही पूर्णरूप से परिभाषित हो सका है। किसी भी साहित्य के लिए उसे अभिव्यक्त करने वाली भाषा और समाज का होना जरूरी है। आदिवासियत के संदर्भ में देखा जाए तो यहां तीनों कारकों (समाज या समुदाय, भाषा या बोली और साहित्य) के होने के बाद भी उनके साहित्य को पहचान नहीं मिल पाई है। यह ठीक उसी तरह है जिस तरह इस देश में आदिवासी आबादी होने और संविधान में अनुसूचित जनजाति के रूप में दर्ज होने के बाद भी सन् 1994 के जेनेवा सम्मेलन में भाग लेने वाले भारतीय प्रतिनिधि ने संयुक्त राष्ट्र संघ को बताया कि हमारे यहां ‘संयुक्त राष्ट्र द्वारा परिभाषित आदिवासी लोग (अर्थात् अनुसूचित जनजातियां) हैं, ही नहीं।’ बल्कि इसके विपरीत संयुक्त राष्ट्र संघ को बताया गया कि ‘भारत के सभी लोग भारत के आदिवासी हैं और भारत की जन जातियां किसी प्रकार  की सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक पक्षपात की शिकार नहीं हो रही हैं’। गौरतलब है कि इस सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र संघ ने आदिवासियों को भरोसा दिलाते हुए कहा, हम आपके साथ हैं, जबकि भारत  द्वारा सीधे–सीधे पल्ला झाड़ लिया गया।

देखा जाए तो आम पठन-पाठन की रवायत से आदिवासी साहित्य अलग-थलग किया जाता रहा। कुछ एक विश्वविद्यालयों में दिखाने के लिए जनजाति अध्ययन केंद्र जरूर खोले गए, परंतु प्रेरणा और प्रोत्साहन के अभाव में वे भी अकादमिक दावपेंच और जोर  आजमाइश के नमूने भर रह गए हैं। कई विश्वविद्यालयों के साहित्य विभागों द्वारा आदिवासी साहित्य को पाठ्यक्रम और शोध का हिस्सा बनाए जाने के बाद भी तस्वीर बहुत साफ नहीं हो पाई है। यह तस्वीर उस वक्त है,जब सरकारी तौर पर बोडो और संथाली को राजभाषा का दर्जा मिल चुका है। गांव-खेड़ों से लेकर शहर तक में आवासीय आदिवासी विद्यालयों की योजना किसी न किसी रूप में सांस ले रही है, बावजूद इसके कुछ नहीं बदला है – न भूखमरी, न शोषण, न विस्थापन, न सामूहिक नरसंहार।

सन 2005 से अब तक लगभग 9 साहित्य अकादमी पुरस्कार बोडो भाषा में लिखित साहित्य को प्राप्त हो चुके हैं। थोड़ा उदार होकर देखा जाए तो आदिवासी साहित्य का स्वरूप भारतीय होने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय भी है, जैसे बोडो को ही लिया जाए। यह तिब्बती-बर्मी भाषा है जो  भारत, उत्तरपूर्व, नेपाल और  बांग्लादेश में रहने वाले बोड़ो लोगों द्वारा बोली जाती है। यह भाषा असम की आधिकारिक भाषाओं में से एक है। ऐसी ही भाषाएं सही अर्थों में साझी संस्कृति का वाहक बन पाती हैं।

बोडो और भाषाई अंतरराष्ट्रीयता की चर्चा हो ही रही है तो पूर्वोत्तर की बोली राभा पर भी संक्षिप्त चर्चा कर लेना अनुचित नहीं होगा। पूर्वोत्तर में बोडो के बाद राभा भी एक प्रमुख जनजाति है, जिनके पूर्वज म्यामार से पूर्वोत्तर में आकर बसे। ये लोग प्रमुख रूप से मेघालय के खासी और जैयंतियां की पहाड़ियों में निवास करते हैं। इनका पुरखा साहित्य बहुत संपन्न है, जिसमें म्यामार और भारत की तमाम साझी कथाएं अंतर्निहित हैं। इनका उल्लेख प्रथम अथवा द्वितीय शताब्दी के ग्रीक नाविक की पुस्तक पेरिपस ऑफ दी इराथ्रेन सी में भी मिलता है। राभा की विरासत काफी समृद्ध है। खासतौर इसका सौंदर्य अनूठा है कितु लिपि, व्याकरण और शब्दकोश के अभाव में यह भाषा का दर्जा हासिल नहीं कर पाई। राभा बोली का व्यवहार करने वाला आदिवासी समुदाय देवनागरी लिपि के सहारे  हिंदी में अथवा रोमन लिपि के सहारे अंग्रेजी में लेखन कर रहा है ।

ईसाई मिशनरियों के माध्यम से संथाली भाषा को विशेष प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। मिशनिरियों ने संथाली में ओल्ड टेस्टामेंट और न्यू टेस्टामेंट का अनुवाद छपवाया, इससे संथाली प्रचार – प्रसार में वृद्धि हुई। देखते–देखते ही संथाली अंग्रेजों के अध्ययन की प्रमुख भाषा बन गई। ‘ए इंट्रोडंक्शन टू दी संथाल लंग्वेज’ (जे. फिलिप्स), ‘ए वैकबुलरी आफ द संथाल लेंग्वेज’ (ई. एल. फासले) और ‘ए संथाली लैंग्वेज डिक्शनरी’ (ऐ. कैंपबेल) ने संथाली भाषा का आधार मजबूत किया, जिसमें आगे चलकर कई सारे आदिवासी लेखकों द्वारा लेखन किया गया, किया जा रहा है। मूलभूत कार्य हो जाने के बाद संथाली साहित्य का मार्ग प्रशस्त हुआ। राजभाषा के रूप में स्वीकृत होने पर सन् 2005 में भाबना  (कविता संग्रह) के लिए जदुमणि बेसरा को संथाली का पहला साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ।

संथाली के साथ-साथ मुंडारी भी झारखंड की प्रमुख भाषा है। हालांकि इसे राजभाषा का दर्जा हासिल नहीं हो पाया है। कुछ लोगों को भाषा के रूप में इसकी स्वीकृति पर आपत्ति हो सकती है, क्योंकि  मानक भाषा की कुछ शर्तें पूरी नही हो पातीं। किसी ने सच ही कहा है कि भाखा वही जो भाखै। भले ही मुंडारी को भाषा का दर्जा नहीं मिला है,फिर भी इसमें प्रचूर साहित्य रचा जा रहा है। चूंकि लिखने वाले आदिवासी ही हैं। इसलिए मुंडारी साहित्य पूरी तरह आदिवासी साहित्य है।

आजादी के पहले मेनास राम ओड़ेया की रचना ‘मतु रअ: कहनि’ (मतु की कहानी) में पांच खंडों में मुंडाओं की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सरंक्षित किया गया। आजादी के बाद रामदयाल मुंडा के साथ दुलायचंद्र मुंडा, मनमसीह मुंडू, सिलास हेम्ब्रम और मंगल सिंह मुंडा इत्यादि लेखकों की एक पीढ़ी तैयार हुई ।

प्रस्तुत पीठिका के साथ यह भी देखना जरूरी हो जाता है कि आदिवासी साहित्य किसे कहा जाए साथ ही यह शेष साहित्य से कैसे अलग है?

भारत में लगभग 427 (कहीं-कहीं 461 दिया हुआ है–आजादी के इतने साल गुजर जाने के बाद भी आदिवासी समुदाय और भाषा विभाजन के सही आंकडे अनुपलब्ध) आदिवासी समुदाय पाए जाते हैं, जो रहन–सहन, भाषा –बोली और साहित्य के लिहाज से एक दूसरे से बहुत भिन्न हैं। आदिवासी रहन–सहन और उनके अधिकार को संविधान द्वारा पूर्ण संरक्षण प्राप्त है,जहां इनके लिए अनुसूचित जनजाति शब्द का  इस्तेमाल हुआ है। अनुच्छेद 366 (25) में अनुसूचित जनजातियों को “ऐसी जनजातियां या जनजातीय समुदाय या इनमें सम्मिलित जनजाति समुदाय के भाग या समूहों को संविधान के प्रयोजनों हेतु अनुच्छेद 342 के अधीन अनुसूचित जनजातियां माना गया है”, पारिभाषित किया गया है। इस अनुच्छेद में अनुसूचित जनजातियों को सुनिश्चित करने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं एवं उनके भौगोलिक विविधता के विषय में बताया गया है।

नृजातीय विभिन्नता, अब तक की साहित्यिक उपलब्धियों और संविधान में वर्णित प्रवृत्तियों के आधार पर ही आदिवासी साहित्य को आधार प्राप्त होता है। इन्हीं मापदंडो पर इस साहित्य को परखा जा सकता है। संविधान की इस आकांक्षा को पूरा करने के लिए सन् 1960 में चंदा समिति का गठन किया गया। समिति ने आदिवासियों की पहचान के लिए पांच मानक निर्धारित किया है – भौगोलिक एकाकीपन,विशिष्ट संस्कृति,पिछड़ापन,संकुचित स्वभाव,आदिम जाति के लक्षण

चंदा समिति आदिवासी समुदाय को एक स्थैतिक समूह के रूप में देखती है जो काफी हद सही भी है किंतु सवाल तो यह है कि जिस आदिवासी समुदाय का संपर्क मुख्यधारा से होता जा रहा है, जो शहरों में रहकर रोजी-रोटी कमाते, गुजारा कर रहे हैं, जिनकी एक–दो पीढ़ियां अपने मूल स्रोत से दूर जा चुकी हैं, जो कस्बों-शहरो में हैं, साथ ही जिनका संपर्क दूसरी सांस्कृतियों से हो रहा है, उन्हें आदिवासी माना जाएगा अथवा नहीं। इनके बारे में समिति की क्या राय है। आज नहीं तो कल आदिवासी साहित्य और समाज को इस प्रश्न से टकराना ही होगा।

आदिवासी साहित्य को सरलता से समझने के लिए कुछ उपविभाजन करने होंगे –

(क) नृजातीय एवं भाषाई विभिन्नता और व्यापकता

आदिवासी साहित्य की सही पहचान पुरखा साहित्य के रूप में की जाती है, जो भाषाई रूप से अखिल भारतीय है,क्योंकि इसमें कई भाषा या बोली का साहित्य समाहित है। अर्थात आदिवासी साहित्य बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक है।

भारत की 461 जनजातियां भारत के सात क्षेत्रों में विभाजित हैं :

  1. उत्तरी क्षेत्र:  जम्मू–कश्मीर, उत्तरांचल और हिमाचल प्रदेश

प्रमुख जनजातियां–लेपचा, भूटिया, थारू, बुक्सा, जौनसारी, खांपटी और कनोटा । माना जाता है के उपरोक्त जनजातियां नृजातीय आधार पर मंगोलायड हैं। इनका आरेचर (ऑरल लिटरेचर) चीनी – तिब्बती भाषा के अंतर्गत चिह्नित किया जाता है।

  1. पूर्वोत्तर क्षेत्र: लेपचा (सिक्किम, दार्जिलिंग), भारी, मिसमी, डफला (अरूणाचल प्रदेश), हमर (असम, मणिपुर),वुकी(मणिपुर, त्रिपुरा),लुसाई(मिजोरम)और मोनपास, शेरदुक पेस (अरूणाचल प्रदेश)। ये जनजातियां भी मंगोलायडों में गिनी जाती हैं। भाषाई आधार पर ये उपरोक्त भाषाएं या बोलियां चीनी – तिब्बती भाषा परिवार में आती हैं।
  2. पूर्वी क्षेत्र – जुआंग, खोड़, भूमिज, खड़िया (उड़िसा), मुंडा, उरांव संथाल और हो (झारखंड, पश्चिम बंगाल)

प्रजाति आधार पर ये जनजातियां प्रोटो आस्ट्रेलायड से संबधित हैं और भाषाई रूप से आस्ट्रो – एशियाटिक भाषा परिवार से ताल्लुक रखती हैं।

  1. मध्य क्षेत्र – गोंड, बैगा, मारिया और अबूझ मारिया (छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलांगाना, कर्नाटक और महाराष्ट्र) ।  प्रोटो – आस्ट्रेलायड नृजाति से संबधित, ये समुदाय प्रमुख रूप से द्रविड़ भाषा परिवार से वास्ता रखने वाली मानी जाती हैं।
  2. पश्चिम भारत – भील – महादेव, काली, बाली और डबला (गुजरात) तथा गरासिया, डामोर, सहरिया और कोरकू आदि (गुजरात, राजस्थान, पश्चिम मध्य प्रदेश)। इन आदिवासी समुदायों का भाषाई संबध भारोपीय आर्य परिवार से है।
  3. दक्षिण भारत – कोटा, बागदा, टोडा, करूंबा, कादर, चेंचु पूलियान, नायक और चेट्टी (करली)। द्रविड़ (कहीं – कहीं नीग्रो से संबधित कहा गया है)  नस्ल की ये आदिवासी समुदाय द्रविड़ भाषा परिवार से जुड़े हुए हैं।
  4. द्विपी क्षेत्र – जाखा, आंगे, सेंटलिस और सेंपियन (अंडमान-निकोबार) प्रजातिगत आधार पर नीग्रो। ये आदिवासी प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर हैं।

(ख) भौगोलिक विभिन्नता (संस्कृति और परंपराबोध में अंतर)

संस्कृतियां और परंपराएं परिस्थितिजन्य हुआ करती हैं। भारत के भौगोलिक वैभव ने तमाम प्रकार की संस्कृतियों को जन्म दिया है। गोंडवाना (मध्य भारत में गोंड जनजातियों के इलाके), भीलांचल और उत्तर – पूर्व के राज्यों की भौगोलिक परिस्थितियां इतनी अलग हैं कि खानपान से लेकर रहन-सहन सब में बड़ा अंतर देखने को मिलता है, जो उनके आरेचर (ऑरल + लिटरेचर) में परिलक्षित होता है। ये प्रवृत्तियां गोंडवाना और गोंडी साहित्य में अभिव्यक्त हुई हैं। अनुकूल परिस्थितियों के कारण ही गोंडवाना दर्शन और साम्राज्य संभव हो सका और गोंडी भाषा और साहित्य पनपने का आधार प्राप्त हुआ। आदिवासी साहित्य के प्रमाणों के लिए इतिहास, खास तौर पर वैकल्पिक इतिहास की ओर जाना होगा, ताकि साहित्यिक परंपराओं के उत्स तक पहुंचा जा सके।  

गोंडवाना का विस्तार और इतिहास पर हीरालाल शुक्ल का मानना है, “विंध्याचल और सतपुड़ा (देवास, होशंगाबाद, बैतुल, मंडला, छिंदवाड़ा तथा बालाघाट) के गोंड, गोंडी की उत्तरी शाखा का व्यवहार करते हैं, जिन्हें भाषाविद् पारसी गोंडी तथा राज गोंडी के नाम से संबोधित करते हैं। हिवाले तथा ऐल्विन का यह विचार है कि इनका मूल निवास गोदावरी तट रहा होगा तथा बारहवीं शताब्दी में इन्होंने बस्तर होते हुए मध्यभारत पर आक्रमण किया होगा।” आगे वे लिखते हैं “ वे वहां कैसे रहते थे, इसके विषय बारे में हमें कोई निश्चित जानकारी चौदहवीं शताब्दी तक नहीं मिलती।” (आदिवासी भाषा विज्ञान, हीरालाल शुक्ल)

शुक्लजी की ही तरह बहुत से लेखक हैं, जिन्हें गोदावरी के आसपास गोंडों की प्राचीनता नहीं दिखाई पड़ती, जिससे गोंड इतिहास के साथ–साथ साहित्य अध्ययन के भी सूत्र पकड़ में नहीं आ पाते। इससे आर्यों की प्राचीनता को गोदावरी तट पर दिखाने में सुविधा होती है, परंतु आदिवासी साहित्यकार और सांस्कृतिक इतिहास के लेखकों ने इस दिशा में प्रचुर और प्रामाणिक कार्य किया है, जिससे शुक्लजी द्वारा दिखाया गया फांक भर जाता है। जरूरत सिर्फ ऐसे साहित्य और इतिहास तक पहुंचने की रह जाती है।

गोंडी इतिहास, संस्कृति और साहित्य के अध्येता आचार्य मोतीरावण कंगाली का कहना है, “भूगर्भ शास्त्रियो के मतानुसार तथा प्राचीन इतिहासकारों एवं पुरात्ववादों की दृष्टि से नरमादा घाटी की प्राचीन सभ्यता आज से लगभग दस हजार वर्ष पुरानी प्रतीत होती है। अनेक पुरावशेषविदों के मत में नरमादा घाटी की प्राचीन सभ्यता ही संसार की समस्त सभ्यताओं की जननी है और वह प्राचीन सभ्यता गोंडवाना की सभ्यता या संस्कृति है।” (गोंडवाना का सांस्कृतिक इतिहास, आचार्य मोतीराम कंगाली, पृष्ठ, 2)

आधुनिक नर्मदा को ही आचार्य कंगाली नरमादा कहते हैं। गोंडवाना की प्राचीनता एवं तथ्य के प्रमाण में कंगालीजी लक्ष्मीप्रसाद मिश्र के हवाले से कहते हैं, ‘नरमादा घाटी की गोंडवाना सभ्यता के गंडजीवों ने ही अपना बेल विस्तार करके आगे चलकर सिंधु घाटी एवं मोहनजोदड़ो की सभ्यता का निर्माण किया था। ये लोग द्रविड़ कहलाते थे।द्रविड़ भाषा तथा मेसोपोटामिया और काकेशस की भाषा में बहुत कुछ साम्य है। नरमादा घाटी की गोंडवाना सभ्यता की गोंडी भाषा भी द्रविण मूल की भाषा है। भारत में द्रविण मूल की गोंडी भाषा बोलने वाले की सभ्यता ई.स. के 4000 पूर्व उन्नति के शिखर पर अधिष्ठित थी। उनकी लिपि एक प्रकार की चित्रलिपि थी, जो सिंधुघाटी एवं मेसोपोटामिया में प्रचलित थी। गोंडवाना की यह सांस्कृतिक धरोहर आर्यों के आगमन से पतन के कगार पर पहुंची।’( बुंदेलखंड का इतिहास, लक्ष्मीप्रसाद मिश्र पृ. 3)

आदिवासी संस्कृति के अध्येताओं ने आर्यों के आगमन के तिलिस्म का भी पैमाइश किया है, परंतु विषयांतर से बचने के कारण विस्तार में नहीं जा रहा हूं।

आदिवासी साहित्य खासकर गोंडवाना की प्राचीनता के विषय थोड़ा और जान लेना गलत नहीं होगा । आचार्य कंगाली कहते हैं “श्रृग्वेद (1 –126 –8) के गंडमंदाना में गण्डधरों के जो दस गण्डराज्य थे उन्हें गण्डधारी या गंधारी कहा गया है। अथर्वेद में गण्डमंदाना के गण्डधरों की गणना अनार्य पिचास जातियों में की गई है और उनके देश को गण्डक या गौड़ देश कहा गया। यूनानी भूगोलवेत्ताओं ने गण्डक देश गोंडो चातिस यानि गोंडों का देश कहा है।” (गोंडवाना का सांस्कृतिक इतिहास, आचार्य मोतीराम कंगाली, पृष्ठ, 16)

इतनी सारी ऐतिहासिक एकता के बावजूद गोंडी भाषा और साहित्य में पर्याप्त अंतर देखने को मिलता है, जिसका संकेत प्राचीन भारतीय साहित्य जैसे कि मार्कंडेय पुराण से प्राप्त होता है। मार्कंडेय में पिशाची भाषा का भौगोलिक विस्तार संपूर्ण गण्डमंदाना में बताया गया है, जिसमें ग्यारह भेदों का उल्लेख है –  

कांची देशीय पांडेयच पांचाल गोंडं मागधम।

ब्रांउचडं दक्षिणात्यच शौरसेनच कैकयम ।।

शाबरं द्रविणं चैव एकादश पिशाचजा: ।।।

अर्थात पैशाचीम में कांची, पांडेय, पांचाली, गोंडी, मागधी, ब्राउंचड, दक्षिणी सौरसेनी, कैकय, शाबरी और द्रविड़ जैसी ग्यारह बोलियां अभिहित हैं। ये सारी बोलियां प्राचीन गण्डमादाना की ही थीं। प्राचीन भाषाविदों ने गण्डमंदाना के गण्डजीवों को पिशाच कहा है और उनकी बोली को पैशाचिक कहा है।’ (प्राकृत भाषाओं का व्याकरण, डॉ. रिचर्ड पिशल, पृ. 54)

जैसे-जैसे भाषा विकास करते हुए व्यापक विस्तार करती है वैसे–वैसे क्षेत्र विशेष के कारण उसमें स्थानीयता आती जाती है, जिसका प्रभाव क्षेत्र विशेष के साहित्य में भी दिखाई पड़ता है। ध्यान देने की बात है जब आदिवासी साहित्य के अवधारणा की बात होगी तो उसके जड़ की तलाश करना ही होगा। परंपराएं एकांगी नहीं हुआ करतीं। उनके स्रोत तक पहुंचने का मार्ग आसान नहीं हुआ करता। आदिवासी साहित्य के तमाम सूत्र पालि, प्राकृत और संस्कृत साहित्य के साथ आदिवासी भाषाओं से होते हुए लोक बोलियों तक में समाए हुए हैं। उन्हें ढूढ़ने के लिए गहन और प्रतिबद्ध अध्यवसाय, संग्रह, विश्लेषण और संश्लेषण की जरूरत होगी।

अकादमिक क्षेत्र में यह मानकर चला जाता है कि संस्कृत साहित्य से आदिवासी साहित्य का कोई रिश्ता नहीं है, जो एक भ्रामक अवधारणा है। बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर शुद्रों के अध्ययन के सिलसिले में वैदिक साहित्य और पुराणों से बहुत कुछ प्राप्त करते हैं। जातिगत शोषण और शुद्रों के इतिहास के अध्ययन में ये ग्रंथ बहुत उपयोगी सिद्ध हुए। इससे सवर्णवाद की मानसिक संरचना के मूलभूत दस्तावेजों की पहचान हो पाई। जो कार्य बाबा साहेब ने दलित चिंतन के दिशा में किया, वही कार्य आदिवासी चिंतकों को करना होगा। हमारे शोषण, पराजय और पलायन का एक पक्ष निश्चित रूप से प्राचीन संस्कृत साहित्य से ज्ञात होगा। छल-प्रपंच करने वाली सत्ताएं भी छल–प्रपंच के पर्याप्त संकेत छोड़ती जाती हैं। अपने ऐतिहासिक धरोहर तक पहुंचने के लिए उन सत्ताओं के साहित्य से अपने साहित्य को जाना जा सकता है। उदाहरण के रूप में सन 800 ईं से 920 ई के दौरान काव्य रचने वाले कवियों की मीमांसा करने वाले कवि राजशेखर ने काव्य पाठ और काव्य के महत्व को बताते हुए जिस तरह से विभिन्न देशों के कवियों के काव्य चिंतन की विवेचना किए हैं, वह बड़े काम की और आदिवासी साहित्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे कहते हैं कि गोंड़ देश की कविता सभी प्रकार से मध्यम कोटि की है। इस विवेचना से स्पष्ट होता है कि आठवीं शताब्दी में गौंड़ देश यानि गोंडवाना था। राजशेखर ने स्पष्ट संकेत किया है कि उस काल में संस्कृत, प्राकृत और गोंड़ी में कविता पाठ होता था।

भौगोलिक विभन्नता के संदर्भ जिस तरह गोंडी और गोंडवाना पर संक्षिप्त चर्चा की गई वह शेष आदिवासी समुदाय पर भी लागू होता है। झारखंड के आदिवासियों का अध्ययन करते हुए डॉ. रामदयाल मुंडा ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है।

(ग) आदिवासियत की अवधारणा – अखिल भारतीय आदिवासी साहित्य की संकल्पना  आदिवासियत के बिना असंभव है। आदिवासियत अर्थात आदिवासी दर्शन समस्त भारतीय साहित्य को जोड़ने का काम करता है। भिन्न –भिन्न समुदायों, बोलियों–भाषाओं और भौगोलिक जटिलताओं को समान आधार पर लाने का काम आदिवासी दर्शन करता है। इसी के माध्यम से आदिवासी साहित्य के एकरूप तत्व की पहचान की जाती है। आदिवासी साहित्य के वर्तमान मानचित्र का अवलोकन करने पर आदिवासियत की अवधारणा के तीन प्रस्थान बिंदु दिखाई पड़ते हैं :

  1. आदिवासी विषय और गैर-आदिवासी लेखक :  गैर-आदिवासियो की बड़ी संख्या आदिवासी समाज के लिए लिख रही है। कई सामाजिक कार्यकर्ता और आदिवासी समाज के हित में सोचने वाले आदिवासी समाज के संघर्ष को साहित्य की सभी विधाओं (कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, आत्मकथा और शोध–आलेख) में अभिव्यक्त कर रहे हैं। इस श्रेणी में भारतीय और विदेशी दोनों शामिल हैं। विदेशियों में वैरीयर ऐल्विन सबसे पहले जहन में आते हैं। इनके अलावा आदिवासी भाषा पर ग्रियर्सन और पिशेल द्वारा महत्वपूर्ण कार्य किया गया है। यहां तक कि आइने अकबरी और जहांगीरनामा के अलावा गैर –आदिवासी भारतीय लेखकों में रमणिका गुप्ता, महाश्वेता देवी, संजीव, राकेश कुमार सिंह, महुआ माजी, हीरालाल शुक्ल, रूपचंद्र वर्मा, वीर भारत तलवार, रणेंद्र और डॉ सुरेश मिश्र शामिल किए जाते हैं। इन लेखकों ने आदिवासी दर्शन को आधार बना कर ही लेखन किया है फिर भी भाषा और संस्कृति की दूरी खटकने लगती है। हालांकि अभिव्यक्ति का सौंदर्य निखरा हुआ है। इनको गैर–आदिवासी माना जाता हैं फिर भी इससे आदिवासी साहित्य को मजबूती प्राप्त हुई। आदिवासी साहित्य के इतिहास की प्रस्तावना लिखते समय इन लेखकों को छोड़ा नहीं जा सकता ।

2. आदिवासी विषय और आदिवासी लेखक : जैसे ही आदिवासी समाज को अक्षर का ज्ञान हुआ, वह अपनी अनुभूति को शब्दबद्ध करने लगा। इस कतार में शामिल लेखक जन्मना आदिवासी हैं। उनकी अनुभूति उपार्जित नहीं है। उनका लेखन उनकी भाषा, संस्कृति और परिवेश से व्युत्न्न लेखन है। यह अलग तरह का लेखन है, जिसमें संप्रदाय, धर्म और राजनीतिक दावपेंच की जगह मनुष्यता, समुदायिक जीवनबोध और सरलता होती है। प्रकृति अपने पूर्ण वैभव के साथ उपस्थित रहती है। आदिवासी साहित्य प्रकृति साहित्य के रूप में सामने आता है। भारत क्या, विश्व आदिवासी साहित्य में प्रकृति एक अटल के आस्था के रूप में दिखाई पड़ती है। इसीलिए आदिवासी साहित्य में प्रकृति का अनुराग है तो उससे बिछड़ने का शोकगीत भी व्याप्त है। प्रकृति के लूट से उपजा आक्रोश कहीं समुदायिक आंदोलन तो कहीं मत्यु के समूहगान के रूप में निसरित होती है। इस अवधारणा के अंतर्गत आने वाले प्रमुख आदिवासी साहित्यकारों में संत सेवालाल (बंजारा समाज के प्रसिद्ध संत कवि) , जयपाल सिंह मुंड़ा, एलिस एक्का, मोतीराम कंगाली, राम दयाल मुंडा, टेक सिंह तेकाम और रोज केरकेट्टा जैसे साहित्यकार शामिल हैं। यह भी सत्य है कि इस समय आदिवासी समुदाय के लेखकों की नई पीढ़ी प्रचुर और सार्थक लेखन कर रही है।

भाषा और बोली अभिव्यक्ति के माध्यम हैं। किसी भी समाज की पहचान भाषा और बोली से भले किया जाता है  किंतु यह विशेषता बताने का बाहरी आधार है। आंतरिक आधार तो चिंतन या दर्शन को ही माना जाता है। समाज या समुदाय की वास्तविक पहचान उसके द्वारा आचरण में लाए जाने वाले जीवन – दर्शन से ही होता है। दर्शन ही भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। अर्थात पहले जीवन – दर्शन फिर भाषा या बोली ।

चूंकि आदिवासी साहित्य का सर्वाधिक हिस्सा आरेचर (युगांडा के आदिवासी लेखक पियो जिरमू द्वारा दी गई पदावली) होने के कारण आदिवासी जीवन–दर्शन को मूल अवधारणा न मानने से छूट जाता है। इसीलए भी आदिवासियत को आदिवासी लेखन का आधार बिंदु मानना अनिवार्य हो जाता है। प्रमुख चिंतक अनीता हेइस ( सिडनी ) ने सही कहा है,‘आदिवासियों के आदिवासियत को न तो आप वर्गीकृत कर सकते हैं न ही किसी मानक से नाप सकते हैं क्योंकि यह तो विरासत में मिला हुआ वह गुण है जिसे कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता और न ही इसे कोई खारिज कर सकता है। किसी व्यक्ति की आदिवासियत को आप इस बात से भी नही तय कर सकते हैं कि उसमें आदिवासी खून कितना है।’मुझे लगता है कि आदिवासी साहित्य को समझने के लिए आदिवासियत को समझना होगा। इसी से आदिवासी साहित्य और संस्कृति के तत्वों का सर्जन और विश्लेषण किया जा सकता है।

 


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