आदिवासी साहित्य बनाम मुख्यधारा का साहित्य    

आदिवासी ही आदिम कलाकार और साहित्यकार हैं। उनका अधिकांश साहित्य उनके सामूहिक जीवन की अभिव्यक्ति है, जिसके मूल में मनुष्य और प्रकृति के प्रति गहरा जुडाव है। इन आदिम कलाकारों और उनकी कृतियों को किस तरह किनारे लगाया गया और इसके पीछे क्या प्रयोजन था, इसका विश्लेषण कर रहे हैं  विकाश सिंह मौर्य :

आदिवासी साहित्य पर कुछ भी कहने से पहले बेहतर होगा कि आदिवासी और इससे स्वतः जुड़े हुए या किसी के द्वारा जोड़ दिए गए विश्लेषणों पर थोड़ा दृष्टिपात कर लिया जाए। आदिवासी साहित्य संभवतः दुनिया का सबसे प्राचीन और जीवन्तता से भरा हुआ साहित्य है। आदिवासियों की इतनी सशक्त अभिव्यक्ति पर किसी की नजर न जाना या फिर यूँ कहें कि स्वघोषित विद्वत मंडली द्वारा जान- बूझकर अनदेखा कर दिये जाने के पीछे के कारण क्या हो सकते हैं? अगर लेखन कला को साहित्य का सर्वाधिक प्रखर लक्षण माना जाता हो तो दुनिया की सर्वप्रथम प्राप्त लिपि ‘हड़प्पा-मोहनजोदड़ो’ की लिपि के लिखने वाले कौन लोग थे? या वे लोग कौन रहे होंगे? यहीं, इसी भूमि के आदिवासी न। जिस माप-नाप और जिस डिज़ाइन के गहने हमें हमारी इन प्राचीनतम संस्कृतियों की खुदाई में मिले हैं ठीक उसी माप-नाप और उसी डिज़ाइन के गहने उत्तर-पूर्व के आदिवासी आज भी पहनते हैं, क्या इस मामले पर किसी मानवशास्त्री या भाषा वैज्ञानिक का ध्यान अभी तक नहीं गया है?

आदिवासियों प्रकृति आधारित सामूहिक जीवन-संघर्ष

आदिवासी साहित्य को समझने के लिए भाषा के खेल को समझना बहुत आवश्यक है। न्गुगी थ्योंगो (1999) ने एक स्थान पर लिखा है कि, “भाषा केवल शब्दों का जाल नहीं है. इसके अन्दर कुछ ऐसी जादुई शक्ति है, जो शब्दों के शब्दकोशीय अर्थों से भिन्न है। भाषा की इस जादुई ताकत के प्रति हमारा मोह उस समय और मजबूत हो जाता था, जब हम पहेलियों, मुहावरों, शब्दों के उलटफेर तथा शब्दों के बेतुके किन्तु संगीतमय संयोजन से कोई खेल खेलते है”। इस तरीके के अनुभव हम में से कईयों के रहे होंगे। जिसने भाषा के संगीत की निस्सीमता और उसकी अनंत ऊंचाई की पवित्रता का अनुभव किया होगा। और उस अनुभव की यादें अभी भी उससे जुदा नहीं हुई होंगी। इस खास तरीके का अनुभव किसी भी आदिवासी भाषा-भाषी के जीवन में सहज ही मिल जायेंगे। जो विद्वान् आदिवासी भाषा और साहित्य को पिछड़ा हुआ या अस्तित्व से ही बाहर करने की मुहिम सी छेड़े हुए हैं, वो क्यों अपनी सौतेली भाषा को इतना समृद्ध, शान्त और ममतामयी मानेगें।

हमें आदिवासी साहित्य पर बात करते समय ‘आदिवासी जीवन-दर्शन, आदिवासी जीवन मूल्य, साहित्य, आदिवासी साहित्य, संस्कृति, आदिवासी संस्कृति और इनको देखे समझे जाने के तरीकों के ब्राम्हणीकृत पूंजीवादी पूर्वाग्रहों पर ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक होगा। इस दायरे में आने वाले कई अन्य प्रचलित मुहावरेबाजी का भी परीक्षण करते चलना पड़ेगा। क्योंकि प्रत्येक कदम पर, प्रत्येक क्षण जागरूक रहना ही मूल आदिवासी धर्म है जिसके सर्वाधिक प्रखर प्रवक्ता दुनिया भर में आश्चर्य, सम्मान और अजूबे के साथ देखे जाने वाले महाकारुणिक तथागत गौतम बुद्ध हैं। आदिवासी साहित्य को कमतर ठहराने के लिए कुछ  मुख्य मुहावरे इस तरह के गढ़े गए हैं। ‘आदिवासियों को मुख्य धारा में जोड़ने की सख्त आवश्यकता है।’ या ‘भारत बहुत सी संस्कृतियों का देश है।’ आदि ऐसे ही कई अन्य ‘ग्रैंड नरेटिव्स’ भी जो सरल, सहज और मानवीय सवालों से बचने के लिए भारत के पारंपरिक सत्ताधारी वर्ग द्वारा गढ़ दिये गए हैं। यहाँ पर मैं  इन जुमलों का परीक्षण करने का प्रयास कर रहा हूँ। प्रथम तो ये कि, कौन बतायेगा कि ये मुख्य धारा किस चिड़िया का नाम है? जिस ओर पूरे वंचित समाज को ले चलने की घोषणा और संकल्प  की नौटंकी चलती रहती है। क्या आज तक किसी ने भी इस मुख्य धारा जैसी बहुद्देशीय परियोजना को परिभाषित किया? नहीं किया  तो क्यों नहीं?

यहाँ एक सवाल साहित्य रचना करते समय रचनाकार द्वारा प्रयुक्त भाषा का भी है। किसी भी भाषा का चयन करने और उस भाषा का इस्तेमाल करने का निर्णय लेते समय महत्वपूर्ण बात यह है कि वह व्यक्ति अपने देश की जनता को अपनी प्राकृतिक और सामाजिक परिस्थितियों के सन्दर्भ में अथवा यूँ कहें कि समूचे विश्व के परिदृश्य में किस तरह से परिभाषित करता है?

अफ़्रीकी आदिवासियों के लिए स्वातंत्र्य संघर्ष करने वाले वहां के जमीनी स्तर के और बेहद जनप्रिय जननेता गिनी बिसाऊ के मुक्ति आन्दोलन के नेता अमिल्कर कबराल के कथनी और करनी पर ध्यान दें और उसकी साम्यता भारतीय उपमहाद्वीप में ढूढें तो काफी दिलचस्प ऐतिहासिक चीजें दिखाई देंगी। “साम्राज्यवादी प्रभुत्व जब गुलाम देश की जनता के ऐतिहासिक विकास को नकारता है तो वह बुनियादी तौर वह सांस्कृतिक उत्पीड़न का सहारा लेता है…….दरअसल संस्कृति में ही प्रतिरोध के बीज छिपे होते हैं जो आगे चलकर मुक्ति आन्दोलन के निर्माण और विकास में सहायक होते हैं.” अब भारत की ब्राम्हण-हिन्दू संस्कृति को आप कहाँ रखेंगे? जो आदिवासियों को अपने वोट की खातिर अपने बौद्धिक विमर्शकारों जी.एस. घुर्ये, एन. के. बोस और  एम. एन. श्रीनिवास जैसे मठाधीसों की सहायता से पिछड़े हिन्दू या संस्कृतिकरण की सरकारी परियोजना जैसे कुत्सित प्रोजेक्ट उन लोगों के लिए चलाते हैं, जो समुदाय या जो लोग कभी सनातनी-हिन्दू व्यवस्था का हिस्सा थे ही नहीं। इस मामले में ई.वी. रामासामी नायकर और बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा का दृष्टिकोण समझना बहुत आवश्यक है। डॉ. भीम राव आंबेडकर ने एक बार कहा था कि, “किसी कौम का इतिहास (साहित्य) ख़त्म कर दो और आराम से उस पर पीढ़ियों शासन करते रहो।” अब आप आदिवासियों के पूरे साहित्य को ख़त्म करने की परियोजना आर्य-ब्राहमणवादी हजारों वर्षों से चला रहे हैं। आदिवासी साहित्य और बौद्ध साहित्य के बीच नजदीकी रिश्ता है। उसे निम्नवत प्रकट कर सकते हैं :

  1. बुद्ध श्रमण परम्परा के लोग आदिवासी सक्रियता और प्रमाणिकता के उन्नायक थे।
  2. कुछ लोग बौद्ध घुमक्कड़ों और बौद्ध विद्वानों को ब्राम्हण सिद्ध करने पर लगे हुए हैं। यह बात अलग है कि ये कूपमंडूक उन्हें कभी पढ़ने की जहमत नहीं उठाते हैं। धम्मपद के ब्राम्हणवग्गो में तथागत बुद्ध ने ब्राम्हण की जो परिभाषा बतायी है, ये सारे बौद्ध विद्वान् इसी श्रेणी के ब्राम्हण हैं। न कि चार धामों के मठाधीसों, राष्ट्रीय? स्वयं सेवक संघ ब्रांड देशभक्त और हराम का खाने वालों की जमात के इन्सान। जिनकी काबिलियत मजलूमों को सताने और ‘हेजिमनी बाइ कंसेंट’ का बखूबी इस्तेमाल करते रहना है।
  3. असंग, वसुबन्धु, नागसेन, नरेंद्र यश, दिग्नाग, आचार्य नागार्जुन, धर्म कीर्ति, शान्ति देव, बोधि धर्मन और बाद में ग्यारहवीं शताब्दी में इसी आदिवासी बौद्ध घुम्मकड़ विद्वान् परम्परा के संत गोरखनाथ से होते हुए सरहपा और संत कबीर तक की परम्परा को आदिवासी परम्परा में ही रखा जाना चाहिये।
  4. इसी तरह विद्रोह की और जुल्म न सहने की आदिवासियों की परम्परा का विन्ध्य की श्रेणियों के आदिवासियों में पाया जाना और बौद्धों का परिपथ विन्ध्य का ही होना, क्या कोई साम्यता नहीं दिखाता है? निर्भय गुर्जर, सीताराम, हनुमान, रम्पा, गया बाबा, शिवकुमार पटेल उर्फ़ ददुआ और फूलन देवी सहित घनश्याम केवट के जनांदोलनों और उनकी व्यापक जनसहमति को इसी बौद्ध-आदिवासी परम्परा में देखा जाना चाहिये।

प्रतिबद्धता, समर्पण और प्रैक्टिस  पहली शर्त होनी आवश्यक है। भ्रमपूर्ण जानकारी एम. एन. श्रीनिवासी परम्परा के सूचना प्रदायक अपने कब्जे के प्रचार-प्रसार संस्थाओं के माध्यम से लाते रहते हैं। अकादमिक माफिया और  बौद्धिक आतंकवादियों ने आदिवासियों और कृषक कुल वंशजों का जो नुकसान किया है वह किसी अन्य ने नहीं किया है। ऐसे में इनके इरादों के प्रति संदेह और जागरूक होना बहुत जरुरी हो जाता है।

ऊल-गुलान दिवस के अवसर पर नृत्य करती आदिवसी महिलाएं

जाति के मुद्दे पर लेकर हरिराम मीना आदिवासियों के ‘जनजाति’ उच्चारण को लेकर आपत्ति जताते हैं कि “जिस समाज में जाति जैसी कोई संस्था अथवा अवधारणा ही नहीं पायी जाती है, उन्हें भी जनजाति कह दिये।” यह तो अच्छा मजाक हुआ और ये जाति छुपाने या स्पष्ट करने का खेल सबसे महत्वपूर्ण तब हो जाता है जब यह किसी भी प्रकार की सत्ता की प्राप्ति के लिए अथवा किसी भी प्रकार की सत्ता संरचना को बनाये रखने के लिये खेला जा रहा होता है। आदिवासी परम्परा के दैदीप्यमान संत कबीर ने ऐसे लोगों के लिये ही कहा था कि “मन न रंगाये रंगाये जोगी कपड़ा”।  यहाँ पर कपड़ा रंगाकर योगी बने हुए लोगों से जितना सावधान हम, हमारा समाज और हमारे कार्यकर्त्ता रहेंगे, उनकी दिमागी सेहत के लिए और उनकी प्रतिबद्धता के लक्ष्य के लिये उतना ही अच्छा होगा। बुद्ध के सम्पूर्ण जीवन में देवदत्त भी भिक्खु का चोला पहनकर ऐसी ही कुटिल और कुत्सित भूमिका निभाता रहा था। यह अलग बात है कि वह कभी सफल नहीं हो पाया।

यहाँ पर विषयांतर करते हुए पुनः आदिवासियों की प्राचीन ऐतिहासिक अविच्छिन्न परम्परा की तरफ जाना चाहेंगे। बौद्ध भिक्खुओं की विशाल फ़ौज और उनके सहज स्वीकार्य प्रकृति प्रेमी जीवन दर्शन के पीछे आदिवासियों के योगदान की चर्चा तो कर ही आये हैं। अब यहाँ पर चर्चा मौर्य साम्राज्य की। सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य की सेना में सबसे ज्यादा संख्या आदिवासी लड़ाकों की ही थी। उनके मंत्रिमंडल में भी इनकी अच्छी संख्या थी। इसका प्रमुख कारण सम्भवतः चन्द्रगुप्त का ‘मोरिय’ आदिवासी समुदाय का सदस्य होना था। ये मोरिय कृषि प्रधान शाक्यों की एक शाखा थे, जो किसी कारण वश अपने मूल पैत्रिक स्थान से विस्थापित हो आये थे  और यह स्थापित किया जा चुका है कि शाक्य आदिवासी थे। फिर भी ये अपना प्रमुख कार्य कृषि कार्य ही करते थे और राज्य की तरफ से किसानों के लिए विशेष सुविधायें और रियायतें दी थीं। अमर्त्य सेन ऐसे ही नहीं, अभी तक के भारत की  सबसे अधिक जी.डी.पी. (सकल घरेलू उत्पाद) सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के समय की बताते हैं।

आजीविका और अपने समस्त जीवन के संचालन के लिये आदिवासियों की निर्भरता प्रमुखतः जमीन, जल और जंगल थे, हैं और संभवतः रहेंगे भी।  बड़े-बड़े सम्राटों के अतिरिक्त सबसे अधिक बौद्ध अवशेषों का आदिवासी इलाकों में पाया जाना आखिर क्या सिद्ध करता है? बुद्ध ने वर्षावासों के अतिरिक्त अपना सबसे अधिक घुमक्कड़ी का समय आदिवासियों के बीच में ही गुजारा है। उनकी शिक्षाओं में भी आदिवासी जीवन-मूल्य स्पष्टता से दिख जाते हैं। मनसा-वाचा-कर्मणा एक रूप होकर जीना और किसी भी प्राणी को अकारण हानि न पहुँचाने का आजीवन प्रण करना। कुदरत के साथ व इंसानों के साथ संघर्ष की बजाय सहयोग करते हुए जीवनयापन करना आदिवासी समुदायों की सबसे बड़ी खूबसूरतियों में से एक है।

आज की कृषक जातियां और आदिवासी समुदाय ऐसा प्रतीत होता है कि इनका मूल उत्स कहीं एक जगह ही है। कारण साफ है कि दोनों ही कृषि पर निर्भर होते हैं। दोनों ही प्रकृति पर और जमीन पर प्रमुखतः निर्भर होते हैं। दोनों ही थोड़े मात्र से संतुष्ट हो जाते हैं। दोनों ही आमतौर पर दिमागी रूप से भोले और मासूम होते हैं। दोनों ही वर्तमान में जीना पसंद करते हैं और भविष्य के बारे में बहुत चिंतित प्रतीत नहीं होते हैं। अतः ऐसे बहुजन साहित्य के साथ ही आदिवासी साहित्य को देखा जाना सही दृष्टिकोण होगा।

आदिवासी संगीत की विविधता

आदिवासी  और कृषक कुल वंशजों (मराठा सेवा संघ द्वारा प्रयोग में लाया गया शब्द) का दर्द मुख्यतः एक ही है। यह ब्राम्हणीकृत नवसाम्राज्यवादी और विकृत आधुनिकताबोध से त्रस्त सरकारी लुटेरे वर्ग द्वारा इनकी आजीविका और सम्पूर्ण जीवन संगीत की स्वर लहरियों के केंद्र जमीन, जल और जंगल को अपना माल समझकर औने-पौने दाम में बेंचकर, इन आजन्म स्वतंत्रचेता इंसानों को पीढ़ी दर पीढ़ी गुलामी करने को बाध्य कर देना। जमीन को खोने का दर्द और जंगल को खोने की तकलीफ़ तो वही समझ सकता है न, जिसके पास जमीन रही हो और जंगल की मस्ती में, उसकी चुनौतियों और कुदरती रोमांच में ही करुणा, मैत्री, आनंद  के  साथ ही जीने की और सारे  दुःख, तकलीफ़, ख़ुशी आदि हँसते हुए झेलने की जन्मना आदत हो।

किसी भी साहित्य को देखने-समझने का तरीका यह हो सकता है कि हम सर्वप्रथम उसे लिखने वाले की प्राथमिकता का अंदाजा लगायें। उस लिखने वाले के मस्तिष्क के साथ तालमेल बैठाये बिना उसे सही तरीके से समझ पाना और उसके मंतव्यों, गंतव्यों का पूर्वानुमान लगा पाना बहुत मुश्किल होगा। आदिवासी इतिहास लेखन में जनकथाओं का अपना विशिष्ट महत्व है। ये जन कथायें कई बार अनछुए सत्यों की बंद दीवार को खोलने में बहुत सहायक होती हैं। साहित्य लेखन में इनका प्रयोग बहुतायत में  प्रयोग किया जाना बेहतर होगा। अभी अगस्त महीने में मैं अपने एक रिसर्च पेपर के सिलसिले में चित्रकूट और रीवा जनपदों में कोल आदिवासियों के बीच में था। यहाँ पर हिन्दुओं के सर्व-पूज्य राम के बारे में एक जबरदस्त जनकथा की जानकारी हुई। जो कुछ इस प्रकार से है। पहले तुलसी बाबा कृत राम चरित मानस का किस्सा फिर वह जनकथा। आप देखेंगे कि किस तरह से ये जनकथाएं अपने अपमे तार्किकता का समावेश किये हुए होती हैं।

चित्रकूट में एक प्रथा है कि प्रत्येक अमावस्या को चित्रकूट के ‘कामदगिरि’ पर्वत की परिक्रमा करने लाखों की संख्या में लोग आते हैं। तपती दोपहरी में तथा सर्दियों में कड़ाके की ठण्ड में भी  भी नंगे पांव लगभग पांच किलोमीटर की परिक्रमा, लेटी परिक्रमा इनकी अंधभक्ति के स्तर को और सतत पिछड़ेपन के कारण को बयान करते हैं। इसको लोग ‘बाबा कामतानाथ’ भी कहते हैं। चित्रकूट प्रशासन के हाथ-पाँव इनको कंट्रोल करने में फूल जाते हैं। खैर तुलसीकृत रामचरित मानस में इसके पीछे की कहानी यह बतायी गयी है कि बाबा कामतानाथ ने चित्रकूट में रहते समय राम, लक्ष्मण व सीता का बहुत ख्याल रखा था। तो राम ने कामतानाथ को पर्वत के रूप में अमर होने का वरदान दिया था। तुलसीदास ने अरण्य कांड में लिखा है कि “कामद भे गिरि रामप्रसादा ।”  सच्चाई यह है कि लोग परिक्रमा आज भी कामदगिरि की करते हैं। किसी राम की नहीं।

इस घटना से सम्बंधित जो जनश्रुति हमें जानने को मिली वह यूँ है। यह देखते हुए कि सत्ता किस प्रकार से ‘ग्रैंड नरेटिव्स’ व  विकृत इतिहास लेखन के द्वारा अपना हित साधती है। कामतानाथ कोलगढ़ी (आज के रीवा जनपद में सिरमौर पहाड़ी के पास में) के राजा थे। आदिवासी राजा होने के कारण आवश्यक रूप से वे वन तथा वन्य जीवों के संरक्षक थे। एक दिन कुछ बाहरी लोग आकर उनके राज्य क्षेत्र में निर्दोष जानवरों को मारने लगे (धर्मग्रंथों में ऐसे कुत्सित कृत्य को शिकार खेलना कहा गया है) राजा के सैनिकों ने उस उद्दंड शिकारी को गिरफ्तार कर लिया। इसका नाम राम था। उसके बिगडैल छोटे भाई लक्ष्मण ने जब यह बात सुनी तो वहीं पास में भ्रमण करती हुई एक आदिवासी लड़की शूपर्णखा के साथ बलात्कार कर दिया एवं उसके गुप्त अंगों में भारी चोट पहुंचाई। वह भी गिरफ्तार कर लिया गया। दोनों को लम्बी पूछताछ तथा पिटाई के बाद कारावास में बंद कर दिया गया। जब राम और लक्ष्मण के घर यह सूचना पहुंची तब ये लोग पहले तो भारी दल-बल के साथ आक्रमण करने के उद्देश्य से आये, किन्तु कामतानाथ की सैन्य शक्ति और किलों की व्यवस्था देखकर इनकी हिम्मत जवाब दे गयी। ऐसे में एक संधि करने का असफल प्रयास किया गया। जिसे ‘भरत मिलाप’ के नाम से जाना जाता है।

वैसे तो कामतानाथ की राजधानी कोलगढ़ी में थी। परन्तु उनकी अदालत अस्थाई रूप से महीने में एक बार अमावस्या को चित्रकूट में भी लगती थी। चूँकि यह मामला चित्रकूट के नजदीक का था, तो ऐसे में उनके घर वालों की मनुहार के बाद प्रत्येक अमावस्या को इस केस की सुनवाई खुली अदालत में होने लगी। जिसमे इन अभियुक्तों के घर-परिवार व आस-पड़ोस के लोग भी भारी संख्या में आते थे और आखिर में उन्हें चौदह साल की सजा सुनायी गयी। ऐसे में यह जनकथा हमें सच तक पहुँचने में ज्यादा मददगार साबित होगी। इसी तरीके से जनकथाएं भी हमें अदृश्य सच तक पहुँचने का मार्ग सुलभ करवा सकती हैं। जिनसे हो सकता है कि पूरी की पूरी स्थापित मान्यता ही पलट जाये।

आदिवासी समाज ने हमें आग की खोज करके दिया,  हमें पहिया बनाकर दिया,  हमें साथ में रहकर सबके साथ जीना सिखाया और जीवनोत्सव से भरपूर साहित्य  रचा। उसी आदिवासी साहित्य को तथाकथित मुख्यधारा के नाम पर हाशिए का साहित्य कह कर किनारे लगा दिया जाता है।


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