‘दलित ही नहीं, ओबीसी रंगमंच भी संभव’

दलित हों या ओबीसी दोनों की हालत कम-अधिक एक जैसी ही है। दोनों वर्ण, जाति के आधार पर श्रेष्ठ जातियों द्वारा अपमानित होते रहे हैं। अगर नाटक में ओबीसी संभाग बनता है तो उसका उद्देश्य भी वर्ण-जाति विहीन समाज का निर्माण हो

 नवउदारवाद के दौर में रंगमंच और द्विज सत्ता का ताना-बाना

 

साहित्य के क्षेत्र में दलित साहित्य अब एक मुकाम बना चुका है। क्या रंगमंच के क्षेत्र में भी दलित रंगमंच की संभावना है? क्या जिस प्रकार ओबीसी साहित्य की सुगबुगाहट हुई है, वैसी कोई सुगबुगाहट रंगमंच के क्षेत्र में भी परिलक्षित होता है? वरिष्ठ नाटककार राजेश कुमार यह मानते हैं कि रंगमंच में अभी भी 95 फीसदी सवर्ण हैं। लिहाजा नाटकों के विषय में बहुजन विमर्श की बहुत अधिक कल्पना करना बेमानी है। लेकिन इस स्थिति में अहम बदलाव भी हुए हैं। दलित रंगमंच अंकुरने लगा है। साथ ही ओबीसी रंगमंच के लिए भी संभावनायें बनती हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है कि रंगमंच में यह संभावना अधिक से अधिक मजबूत हो ताकि फुले, आंबेडकर के सपनों के समाज के निर्माण में रंगमंच अपनी भूमिका का निर्वहन कर सके। इन विषयों और मुद्दों को लेकर रंगकर्मी व सामाजिक कार्यकर्ता राजेश चंद्र ने वरिष्ठ नाटककार राजेश कुमार से बातचीत की।

नाटककार राजेश कुमार

 

नाटक बहुत दिनों तक अभिजात्य स्वीकार्यता से बाहर रहे, लेकिन इसके संस्थानीकरण के साथ इस पर अभिजात्यों और उच्च वर्ण के लोग काबिज होते गए, इसे ऐतिहासिकता में कैसे देखते हैं?

नाटक की उत्पत्ति संबंधी जितनी भी कथाएं हैं, सबों को हिन्दू अवधारणाओं के ही आधार पर ही गढ़ा गया है। नजरिया भी धार्मिक है। जैसे हिन्दू धर्म की समस्त ग्रंथों की रचना किसी न किसी देवता गण से जोड़ देते है, वैसे ही नाटक के सबसे प्राचीन ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र ‘ को भी ब्रह्मा से सम्बद्ध कर दिया गया है। भले इसकी रचना भरतमुनि या इस विधा से जुड़े लोगों के लंबे समय के शोध, सैद्धान्तिक-व्यवहारिक के आधार पर व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से किया गया हो पर जनमानस में मान्यता प्रदान करने के लिए धार्मिकता का आवरण चढ़ाकर इसका श्रेय ब्रह्मा को दे दिया गया ताकि इसकी अवधारण पर कोई प्रश्नचिन्ह न लगा सके। कोई शंका न कर सके। इसकी पुष्टि कथा के उस प्रसंग से स्पष्ट हो जाती है जब आत्रेय मुनि ने भरतमुनि से नाट्यवेद की रचना के सम्बन्ध में जिज्ञाषा प्रकट की तब भरतमुनि ने बताया कि त्रेता युग में जब प्रजाजन काम, क्रोध ,ईर्ष्या के वशीभूत होने लगे तो महेंद्र आदि देवताओं ने ब्रह्मा से निवेदन किया कि हमें मनोरंजन को कोई साधन दीजिये, जो देखने तथा सुनने योग्य हो। ये भी कहा कि आपने जिन चतुर्वेदों की रचना की हैं, वे शूद्रों के लिए निषेधात्मक और उनकी समझ के बाहर के हैं। इसलिए आग्रह है कि आप सभी वर्णो के लिए उपयोगी, एक पंचम वेद की और रचना कीजिये। फिर ब्रह्मा ने ‘ऋग्वेद’ से पाठ्य, ‘सामवेद’ से गीत, ‘ यजुर्वेद’ से अभिनय और ‘अथर्वेद’ से रसों को लेकर ‘नाट्यवेद’ की रचना की। सृष्टि के बाद जब इस प्रयोग को करने की जिम्मेदारी इंद्र को दी गयी तो उन्होंने मना कर दिया कि देवताओं में इस प्रयोग को करने की सामर्थ्य नहीं हैं। फिर ब्रह्मा ने इस नाट्य प्रयोग के लिए कर्त्ता रूप में भरतमुनि को चुना। ध्वज महोत्सव पर भरतमुनि के पुत्रों व शिष्यों द्वारा नाटक ‘ देवासुर संग्राम ‘ मंचित किया गया जिसे देखकर सभी देवता और ब्रह्मा प्रसन्न हुए। लेकिन दर्शकों में उपस्थित दैत्य और दानव नाटक में अपनी पराजय को देखकर विक्षुब्ध हो उठे, दैत्यों के नेता विरूपाक्ष ने मंच पर आकर प्रतिरोध किया, अभिनेताओं की वाणी, चेष्टाओं तथा स्मृति को भी रुद्ध कर दिया । इससे नाराज होकर इंद्र मंच पर जाकर स्वयं प्रतिरोध कर रहे दैत्यों और दानवों को जर्जरित किया, सबों के सम्मुख उनका वध किया। उसके बाद ब्रह्मा  के आदेश पर विश्वकर्मा ने एक बड़ा ही भव्य वास्तुकलात्मक रंगमंच का निर्माण किया। रंगमंच का यह पहला विभाजन था । दैत्य या दानव जो यहाँ के मूलनिवासी थे, जिनकी संस्कृति देवताओं से अलग थी, जंगलों में जो रहते थे, उन्हें रंगमंच की इस धारा से अलग कर दिया गया। और बाकी जो वर्णाश्रम व्यवस्था में सबसे निम्न वर्ग में आते थे, रंगमंच के इस नए प्रारूप में उनके लिए कोई उचित स्थान नहीं था। प्रेक्षागृह में वर्णश्रेष्ठता के अनुसार बैठने की जगह तय होती थी। लाजमी है कि सबसे पीछे जगह की जगह शूद्र के लिए निर्धारित होती थी। सबसे अग्रिम पंक्ति में ब्राह्मण, फिर क्षत्रिय, उसके बाद वैश्य का स्थान होता था। विचारणीय है कि जिस पंचम वेद की रचना शूद्र के लिए की गयी थी, अशिक्षित समाज के लिए रचा गया था, सबसे पहले उसे ही हटा दिया गया। शूद्रों को पीछे ठेल दिया गया। रंगमंच पर अभिजात्य व उच्च वर्ग का कब्ज़ा हो गया। काबिज करने वाले वर्ग ने रंगमंच पर हर तरह से नियंत्रण रखना चाहा। वे रंगकर्मियों की अभिव्यक्ति के पक्ष में कतई नहीं थे। इसलिए जब एक प्रस्तुति में भरतमुनि के शिष्यों ने ब्राह्मणों की करतूतों पर व्यंग्य किया तो ब्राह्मणों ने गुस्से में आकर शाप दिया कि आज से तुम हमेशा वेदों के निंदक ‘शूद्र’ कहलाओगे , तुम्हारी आनेवाली पीढ़ियां भी ‘शूद्र’ कहलायेगी। और उसके बाद जैसा मिथ है, भरतमुनि को स्वर्ग से बाहर कर दिया गया । बाहर क्या किया होगा, भय के कारण भरतमुनि को अपने पुत्रों, शिष्यों के साथ वहां से भागना पड़ा होगा। पृथ्वी पर आने पर उनके सम्मुख दो ही विकल्प होंगें। या तो राजदरबार की तरफ प्रस्थान किया जाये या आवाम की तरफ। मुझे लगता है कि यहाँ फिर से एक बार रंगमंच विभाजित हुआ होगा। एक वर्ग अभिजात्य, उच्च वर्ण से जुड़ा तो दूसरा वर्ग श्रम, निम्न वर्ण से।

नाटक स्त्रियों और दलितों , दोनों के लिए कठिन डगर ही सिद्ध हुए।

ब्रह्मा ने जब पंचम वेद की रचना की तो भरतमुनि के सम्मुख स्त्री पात्र के लिए महिला रंगकर्मी का संकट खड़ा हुआ था। इस संकट को दूर करने के लिए तत्काल ब्रह्मा ने कुछ अप्सराओं का सृजन किया। लेकिन पृथ्वी पर जब रंगमंच अभिजात्य, कुलीन वर्ग-वर्ण में आया तो स्त्री भूमिका के लिए कोई सवर्ण महिला आगे नहीं आयी। प्रारम्भ में पुरुष ही स्त्री भूमिकाओं को अभिनीत करते थे। बाद में देवदासी प्रथा का चलन बढ़ा तो मंदिरों में सेवा करने के बहाने रखी जाने वाली निम्न जाति की महिलाओं से स्त्री भूमिकाओं को कराने का प्रचलन बढ़ा। लेकिन मनु जैसे आर्यपुत्रों ने भरतमुनि की तमाम संभावनाओं पर पानी फेरते हुए रंगमंच के क्षेत्र में भी शूद्रों को समाज में बराबरी के अधिकार से पुनः वंचित करा दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि सवर्णो को रंगमंच के अभिनेताओं का भोजन स्वीकार नहीं करना चाहिए। विष्णु के विधिशास्त्र’ विष्णु स्मृति ‘ में अभिनेताओं की उत्पत्ति को शूद्रों और वैश्य कन्याओं से जोड़ा गया। इसी तरह मनुस्मृति में मनु ने नटों और मल्लों के पेशे को सबसे नीच माना और ब्राह्मणों को अभिनेता बनने से वर्जित किया। इसी तर्ज पर ‘ महाभाष्य ‘ में स्त्री पात्रों की भूमिका निभानेवाले अभिनेताओं की पत्नियों को गिरी नैतिकता वाला माना गया और ब्राह्मणों को उनसे दूर रहने की सलाह दी गयी। नाटक करने वालों की स्त्रियां एक प्राचीन संस्कृत श्लोक के अनुसार पराये पुरुषों के साथ इस प्रकार लगी हुई थी, जिस प्रकार वर्णों के साथ मात्राएँ। उपनिषद कल में भी नाटकों में स्त्रियों की भूमिका वार्जित मानी गयी थी और उनकी भूमिका के लिए बालकों को रखने की परंपरा थी, जिन्हें ‘ भ्रूणकुश ‘ कहा जाता था। ऐसे नाटक करने वाले कोहलीय संप्रदाय के लोग होते थे और अपने को भरतमुनि का वंशधर कहा करते थे। कौटिल्य ने भी अपनी पुस्तक ‘ अर्थशास्त्र ‘ में नट-नटियों की आचारहीनता की ओर संकेत किया है और नागरपालिकों तथा पंचायतों पर जोर डाला है कि वे नटों-बाजीगरों, मदारियों और तमाशा करनेवालों को नगर के समीप न फटकने दें। इनके लिए नगर के बाहर ही बस्ती बनायीं जाये। अर्थशास्त्र में ही नाट्यशालाओं का विरोध करते हुए यह भी लिखा गया है कि ये गांव में नहीं बनायीं जानी चाहिए क्योंकि इससे ग्रामीणों के काम में बाधा पहुँचती हैं। इससे यह पता चलता है कि तत्कालीन समाज में अभिनेता नीची निगाह से देखे जाते थे और लोग दलित जाति की स्त्रियों को उनके शारीरिक सौन्दर्य का आनद लेने में ज्यादा दिलचस्पी रखते थे, उनकी कला या सम्मान में नहीं। यहीं नहीं , नाटक में अभिनय करते समय भी ब्राह्मण , शूद्र तथा नारी पात्रों में समानता नहीं बरती जाती थी। ब्राह्मण पात्र यदि अभिनय करते थे, तो संवाद के लिए संस्कृत का प्रयोग करते थे, जब कि शूद्रों और स्त्रियों के लिए संस्कृत वर्जित था। उनके संवाद प्राकृत में होते थे। यानी हर स्तर पर ब्राह्मण श्रेष्ठ थे और शूद्रों को उनकी बराबरी करने का अधिकार नहीं था।

आप दलित थिएटर को कैसे देखते हैं, हिंदी में इसकी क्या परम्परा  है?

साहित्य में दलित अवधारणा कोई नई बात नहीं है। कई वर्षों से हिंदी साहित्य में दलित कहानी, कविता व आत्मकथा लिखी जा रही है, और लगातार चर्चा में भी है। तुलसी राम की  ‘मुर्दिह्या ‘, ‘ मणिकर्णिका ‘, ओमप्रकाश बाल्मीकि का ‘जूठन ‘मलखान सिंह का कविता संग्रह ‘सुनो ब्राह्मण ‘ में जिस तरह का साहित्य रचा गया है, दलित चेतना की जो धारा इन साहित्यों में है, वो दलित समाज द्वारा उतना ही ग्राह्य है जितना अन्य लोगों द्वारा। लेकिन दलित थिएटर का परिदृश्य इससे इतर है। जब भी इसकी चर्चा सोशल मीडिया पर होती है, हर तरफ से इस पर हमले होने शुरू हो जाते है। कोई कहता है कि रंगमंच में दलित रंगमंच की क्या आवश्यकता है।बल्कि अधिकतर का मत होता है कि रंगमंच का इस तरह से विभाजन उचित नहीं। इससे रंगमंच में जाति बढ़ेगी। कुछ तो ये भी कहते हैं कि भले साहित्य में दलित अवधारणा है, नाटक में इसकी जरूरत नहीं । इससे नाटक का भला नहीं होनेवाला, उल्टे नुकसान की सम्भावना अधिक है। मेरा मानना है कि जो साहित्य और नाटक को अलग-अलग मान रहे हैं, वो भ्रम में है। नाटक एक ऐसा साहित्य है जिसमें समस्त कलाओं का समावेश हैं जो पढ़ा भी जा सकता है लिखा भी।

बीते 27 मार्च 2018 को दिल्ली के शुभमंच थियेटर में राजेश कुमार द्वारा लिखित नाटक ‘गाय’ के मंचन का दृश्य

और हिंदी में दलित नाटक की परंपरा भले 20-25 वर्षों की हो, पर दूसरी भाषों में विशेषकर मराठी में काफी वर्षों से है। पिछली सदी के पांचवें दशक के अंत आते-आते मराठी रंगमंच में दलित रंगमंच की पहचान बन गयी थी। रंगकर्म में एक आंदोलन के रूप में खड़ा हो गया था। इसके प्रेरणास्रोत आंबेडकर थे। आम्बेडकर ने महाड़ आंदोलन से जो दलितों के अंदर राजनितिक चेतना जगायी थी, सांस्कृतिक आंदोलन के लिए वही आधार बना। सन 1936 और 1956 में आंबेडकर की नाट्य प्रस्तुति में जो उपस्तिथि थी और वहां जो भाषण दिया, दलित रंगमंच को वैचारिक रूप से पुख्ता किया।उन नाटकों में केवल दलितों पर ढाये जा रहे जातीय जुल्म का मात्र चित्रण नहीं था, चेतना का भी भाव था जो ब्राह्मणवाद द्वारा स्थापित अवधारणों का तर्कसम्मत खंडन करता था। एक बात और , भले दलित रंगमंच के आंदोलन को आंबेडकर ने तीव्रता प्रदान की, पर उनके पूर्व जिन लोगों ने एक लंबे समय से लड़ाई लड़ी थी, उनका दृष्टिकोण भी साथ -साथ था। आंबेडकर के पहले बुद्ध, कबीर, रैदास और फुले ने समाज में व्याप्त जात-पात, छुआ-छूत, अस्पृश्यता , असमानता के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, जो सांस्कृतिक आंदोलन छेड़ा था, दलित रंगमंच की पृष्ठ्भूमि में है। फुले की नाट्य रचना ‘ त्रिरत्न ‘ स्पस्ट रूप से हिन्दू धर्म के अंदर जो असमानता है, रेखांकित करती है। इसके अलावा ‘गुलामगिरी ‘ और ‘सत संस्कार’ किताब जो संवाद शैली में फुले ने लिखी थी, हिन्दू धर्म के अंतर्द्वंदों को सामने लाता है। निर्मम होकर सवाल-जवाब के रूप में वर्णव्यवस्था पर चोट की है। नाट्य आलोचकों ने अभी भी सही ढंग से फुले की इन कृतियों का मूल्यांकन नहीं किया है। जब भी उस दौर के नाटकों की बात होती है तो पारसी थिएटर से शुरू होकर भारतेंदु, जयशंकर प्रसाद तक जाती जरूर है, पर फुले को हमेशा नजरअंदाज कर दिया जाता है। हीरा डोम की कविता काफी दिनों तक साहित्य के नेपथ्य में पड़ा रहा। अछूतानंद ‘ हरिहर ‘ ने सन 1916 से 1926 तक दलित रंगकर्मियों को संगठित कर गांव-गाँव जाकर नॉटंकी शैली में नाटक किये, उस पर आज तक किसी आलोचक की नजर क्यों नहीं गयी? आधे दर्जन से अधिक उन्होंने जो नाटक लिखे, उस पर रंग जगत खामोश क्यों हैं? दलित रंगमंच के प्रति मुख्यधारा के लोगों का प्राम्भ से ही उपेक्षा का बर्ताव रहा है। दलित रंगमंच दरअसल प्रतिरोध का रंगमंच रहा है। इसकी एक लंबी परंपरा रही है। इसकी परंपरा सत्ता से जुड़े रंगमंच से नहीं है। संस्कृत नाटक हो या कोई शास्त्रीय नाटक जिसका पोषण मंदिर, दरबार से होता आ रहा हो, वहां दलित रंगमंच की धारा देखने को नहीं मिलेगी। वहां का रंगमंच यथास्थिति को बरकरार रखने वाला होगा। वह कदापि ब्राह्मणवाद का विरोध नहीं करेगा। उनका रंगमंच वर्णव्यस्था का पर्दाफाश नहीं करेगा। हरगिज वर्ण, जाति के आधार पर समाज में व्याप्त भेदभाव का खंडन नहीं करेगा। हाँ, लोक रंगमंच में विरोध का भाव सहज रूप में देखने को मिल जायेगा।

दलित रंगमंच को भले मुख्यधारा के लोग मान्यता देने में हिचक रहे हों, तरह – तरह के आरोप लगा रहे हों लेकिन साहित्य की तरह आज नहीं तो कल इस धारा के अस्तित्व को स्वीकारना ही होगा। आंबेडकर को लेना आज हर राजनितिक धारा की विवशता हो गयी है। पहले मुख्यधारा के रंगमंच में दलित सवाल कम होते थे, अगर किसी ने कृपा भी कर दी तो, हमेशा दलितों के प्रति दया, सहानुभूति वाला भाव रखा जाता था। वर्णव्यवस्था को हटाने के अपेक्षा वर्ण समन्वय पर जोर दिया जाता था। जाति भी रहे, वर्ण भी रहे और हृदय परिवर्तन के द्वारा विरोध का भाव दूर हो जाये, इस बात पर ज्यादा जोर रहता था। वर्णविहीन, जातिविहीन समाज की परिकल्पना करना, या ऐसा समाज बनाना उनका उद्देश्य रहता भी नहीं था।

आज दलित रंगमंच ने एक सफर तय कर लिया है। एक अवधारणा विकसित कर लिया है। भले रंगमंच के मठाधीशों को यह न पचे। उन्हें यह रंगमंच अगढ़, कला विहीन, असाहित्यिक , भाषणबाजी लगे लेकिन दलित रंगमंच अपना नया सौन्दर्यशास्त्र गढ़ रहा है। रंगमंच का अपना व्याकरण बना रहा है। कभी इन्हीं मठाधीशों ने जनपक्षीय नुक्कड़ नाटक पर इसी तरह के आरोप जड़ कर ख़ारिज करने की पुरजोर कोशिश की थी। लेकिन जिस रंगमंच का सम्बन्ध जनता से होता है, जन-जन से जिसका जुड़ाव होता है, उसे फतवे जारी कर के ख़त्म नहीं किया जा सकता।

आजकल साहित्य में ओबीसी साहित्य की बात हो रही है, क्या नाटकों का कोई ओबीसी संभाग या वर्गीकरण हो सकता है, इसकी कोई जरूरत?

साहित्य में इस तरह की बात सुनने को मिल रही हैं, पर रंगकर्म में इसकी कोई सुगबुगाहट नहीं है। अभी तो दलित रंगमंच ही इनके लिए नया शब्द है। नगरीय, महानगरीय रंगमंच में जहाँ 95 प्रतिशत उच्च वर्णीय रंगकर्मी हैं, सहज ये दलित रंगमंच स्वीकार्य भी नहीं होगा। दलित हो या ओबीसी दोनों की हालत कम-अधिक एक जैसी ही है। दोनों वर्ण, जाति के आधार पर श्रेष्ठ जातियों द्वारा अपमानित होते रहे हैं। अगर नाटक में ओबीसी संभाग बनता है तो उसका भी उद्देश्य वही होना चाहिए। ऐसे समाज का निर्माण, जहाँ कोई वर्ण, जाति न हो। न जाति के आधार पर किसी तरह का शोषण। दलित या ओबीसी संभाग का कदापि यह मतलब नहीं होना चाहिए की इस तरह के रंगमंच में किसी जाति का महिमामंडन हो। आजकल दलित राजनीति के नाम पर कई लोग ऐसे मिल जायेंगे जो अलग -अलग जातियों की दूकान खोल कर बैठ गए हैं। किसी खास जाति को संगठित कर के संसदीय राजनीति में मोलभाव करते हैं। ओबीसी वर्ग इससे अछूता नहीं है। साहित्य या रंगमंच में भी इस तरह के खतरे की सम्भावना है। जाति को मजबूत बनाना दलित या ओबीसी वर्गीकृत रंगमंच का उद्देश्य नहीं हो सकता है, बल्कि इसे मिटाना मकसद होगा। ओबीसी वर्ग को भ्रम हो सकता है कि दलितों की तुलना में उनका समाज में ऊँचा स्थान है,  उनके साथ उस तरह अस्पृश्य भाव नहीं है। ये उनकी खुशफहमी है। वर्णव्यवस्था में उच्च वर्णीय लोगों की नज़र में ओबीसी भी शूद्र ही समझे जाते हैं। इनके साथ भी अस्पृश्य जैसा ही बर्ताव करते हैं। अगर ओबीसी संभाग के अंतर्गत ऐसे सवाल उठते हैं तो इसकी जरूरत से इंकार किया जा सकता है। बात कहीं से आए, लाने की जरूरत है।जहाँ से भी विरोध उठे, स्वागत करनी चाहिए। परस्पर कोई अंतर्विरोध होगा तो संघर्ष के दौरान खुद ब खुद दूर हो जायेगा।

नाट्य संस्थानों की राजनीति में जाति की क्या भूमिका देखते हैं?

देश में जितने भी केंद्र या प्रादेशिक स्तर पर नाट्य अकादमी हैं या नाट्य प्रशिक्षण संस्थान, सब मूल रूप से सत्ता से ही जुड़े होते हैं। उनकी सांस्कृतिक नीति उन्हीं के हित में होती है। और उनकी सांस्कृतिक नीति का ये हाल है कि साम्प्रदायिकता पर तो बोलने में इन्हें कोई परेशानी नहीं होती, वर्णवादी व्यवस्था पर कुछ भी टिप्पणी करने से संकोच करते हैं। आये दिन अकादमियों में बड़े-बड़े महोत्सव आयोजित होते रहते हैं, लोक संस्कृति – लोक रंगमंच के संवर्धन हेतु कार्यक्रम होते हैं लेकिन इनका विश्लेषण करने पर पाते हैं कि इनका उद्देश्य लोगों में वैज्ञानिक चेतना जगाना नहीं है बल्कि यथास्थिति को बनाये रखना है। इनके एजेंडे में दलित समस्या को लाना नहीं होता है। अगर कभी इस विषय पर कोई नाटक कर भी दिया हो तो इस समस्या पर इनका जोर दया, सहानुभूति प्रगट करना ही होता है। जिस तरह देश भर में दलितों के अंदर राजनीतिक -सांस्कृतिक चेतना का विकास हुआ है, इसको अपने नाटकों में परिलक्षित करने से बचते हैं। ऐसा भूलवश नहीं, राजनीति के तहत है। इन संस्थानों में इस तरह का माहौल है कि राजनीतिक व्यक्ति अगर चला जाय और अपने विचारधारा पर अडिग न रहे तो धीरे -धीरे कब उसे राजनीतिक बना दिया जायेगा, उसे पता नहीं चलेगा। इन संस्थानों में राजनीतिक कब्ज़ा उच्च वर्णीय लोगों का है, इसलिए कोई अगर हाशिये के लोगों को केंद्र में लाना भी चाहे तो उसे प्रोत्साहन नहीं मिलनेवाला, हर कदम पर हताशा ही हाथ आएगी। ऐसे लोगों का प्रयास रहता है कि रंगमंच में विचारशून्यता की स्थिति उत्पन्न कर दी जाय। और आज मुख्यधारा के रंगमंच का यही हाल हैं। शायद यही इनकी राजनीति हो ताकि जाति , वर्ण के विरुद्ध कोई सवाल उठा न सके। कोई आवाज उठे तो दबा दिया जाय।

हिंदी क्षेत्र में राजनीतिक नाटकों की समृद्ध परंपरा है, लेकिन क्या उसका ह्रास हो रहा है?

राजनीतिक नाटक की परंपरा हमारे देश में आजादी के पहले से रही है। फुले और आंबेडकर की विचारधारा से प्रभावित होकर जिन लोगों ने दलित रंगमंच की अवधारणा को विकसित किया, वो केवल सामाजिक  सांस्कृतिक आंदोलन तक सीमित नहीं था । उसके पीछे एक राजनीतिक चिंतन भी था। आंबेडकर की दूरगामी सोच थी कि ऐसी राजनीतिक व्यवस्था लायी जाय, जहाँ जाति के आधार पर शोषण न हो। इसी तरह इप्टा का भी मानना था कि मजदूरों- किसानों के अंदर चेतना का वो स्वर भर दिया जाये जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंके। इप्टा का सांस्कृतिक आंदोलन जिस गति से आजादी के पहले चला, आजादी के बाद पार्टी में सांस्कृतिक दल का पार्टी और सत्ता से कैसा सम्बन्ध हो, ये स्पस्ट न होने तथा अंतर्विरोधों के कारण,रंगमंच की धारा कमजोर हुई। नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौर में एक नए तरह का राजनीतिक नाटक का उदय हुआ जो प्रेक्षागृह की दीवारों से निकल कर नुक्कड़ों, सड़कों, चौराहों पर उतरा। नुक्कड़ नाटक के रूप में जाना गया जो जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा एक राजनीतिक नाट्य रूप था। आपातकाल में नुक्कड़ नाटक की एक ऐतिहासिक भूमिका रही है। लेकिन बाद के दिनों में सत्ता द्वारा इस नाट्य विधा को इतना बरगला दिया गया कि जो इसकी वास्तविक पहचान थी, वो ख़त्म हो गयी। सत्ता ने अपने विरोधी नाट्य रूप को इस तरह विकृत कर दिया की आज नुक्कड़ नाटक सरकार का सबसे बड़ा भोंपू बन गया है। नुक्कड़ नाटक के नुकीले नख-दन्त तोड़कर राजनीतिविहीन कर दिया है। रही सही कसर, सोवियत यूनियन के टूटने और लिब्रलाइजेशन से हो गया। प्रतिपक्ष की राजनीतिक दलों के हताशा में जाते ही राजनीतिक नाट्यदलों में भी भटकाव आने लगा। विचार के कमजोर होते ही वे राजनीतिक होने लगे। उनपर विचारशून्यता हावी होने लगा। परिणाम ये हुआ कि, कई जनपक्षीय नाट्यदल आज सत्ता के गलियारे में ग्रांट, सरकारी अनुदान के लिए टहलते हुए दिखते हैं। उनका एक पैर कहने को प्रगतिशील जमीन पर रहता है तो दूसरा पैर किसी एनजीओ या सत्ता की तरफ जाने को तैयार रहता है।

लेकिन इतनी भी निराशाजनक स्थिति नहीं है। संख्या में भले कम हो, पर कुछ लोग नई अवधारणा के साथ देश के कोने -कोने में काम कर रहे हैं। उनका नाटक जितना सामाजिक है, उतना ही राजनीतिक भी। उनके साथ अगर मार्क्स हैं तो आंबेडकर भी है। और भगत सिंह भी। और उन्हें इस बात का भरोसा है कि शायद यहीं से कोई रास्ता निकलेगा।


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