h n

अगले तीन वर्षों में कोरेगांव की घटना रामजन्मभूमि मामले पर चढ़ बैठेगी!

दलितों के शौर्य का प्रतीक भीमा-कोरेगांव द्विजों के सांस्कृतिक आंदोलन के समानांतर सांस्कृतिक आंदोलन का प्रतीक बनता जा रहा है। आरएसएस इस खतरे को समझता है। लेकिन अब जिस तरह के हालात बनते जा रहे हैं, वह संकेत दे रहे हैं कि अगले तीन वर्षों में यह रामजन्मभूमि पर चढ़ बैठेगा। प्रेमकुमार मणि का आकलन :

अयोध्या में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद प्रकरण एक लम्बे समय से विवाद का विषय रहा है। पिछली सदी के आखिरी दो दशकों की राजनीति तो इसी के इर्द-गिर्द नाचती रही। मैं नहीं समझता कि इसके विस्तार में जाने की कोई ज़रूरत है। लेकिन इस आलेख के लिए संक्षेप में चर्चा आवश्यक जान पड़ती है। अयोध्या का रामजन्मभूमि प्रकरण हिन्दुओं तक सीमित था। इसके नेता और कर्ता-धर्ता सब द्विज हिन्दू थे; ज्यादातर अयोध्या के अखाड़ों से जुड़े लोग। हिन्दुओं में दो तरह के राम हैं। एक सगुन राम हैं ; दूसरे निर्गुण राम। सगुन राम अयोध्या के राजा दशरथ और कौशल्या के पुत्र थे। उनकी एक जीवन गाथा है, जिसे लेकर अनेक लोक कथाएं हैं। इन कथाओं को लेकर भारतीय साहित्य में जाने कितनी काव्य-कथाएं रची गईं …

पूरा आर्टिकल यहां पढें अगले तीन वर्षों में कोरेगांव की घटना रामजन्मभूमि मामले पर चढ़ बैठेगी!

 

लेखक के बारे में

प्रेमकुमार मणि

प्रेमकुमार मणि हिंदी के प्रतिनिधि लेखक, चिंतक व सामाजिक न्याय के पक्षधर राजनीतिकर्मी हैं

संबंधित आलेख

यूजीसी रेगुलेशन : इन कारणों से जरूरी है दलित-बहुजनों की यह लड़ाई
विश्वविद्यालयों में बहुजन छात्रों के ख़िलाफ़ गहरे और व्यवस्थित भेदभाव का एक प्रमुख कारण यह है कि प्रशासन अक्सर उच्च जाति की लॉबी से...
यूजीसी रेगुलेशन : बिहार के चप्पे-चप्पे में दलित-बहुजनों का हल्ला बोल
सिवान जिले के प्रिंस पासवान कहते हैं कि मुट्ठी भर लोगों के विरोध से एक बड़ी आबादी को भेदभाव से सुरक्षा प्रदान करने वाले...
यूजीसी रेगुलेशन : सच्चाई से मुंह मोड़ रहे हैं इसके विरोधी
ऊंची जाति के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव की इक्का-दुक्का घटनाएं हो सकती हैं, मगर एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों को संरचनात्मक बहिष्करण का सामना...
इलाहाबाद विश्वविद्यालय को हुआ क्या है?
कल 3 फरवरी, 2026 को जो घटना हुई उसने विश्वविद्यालय में व्याप्त जातिवाद को स्पष्ट तौर पर उजागर कर दिया। दिशा छात्र संगठन के...
महाराष्ट्र नगरपालिका चुनाव परिणाम : विपक्ष के लिए फिर एक बार गंभीर सबक
ओबीसी समाज एकसमान नहीं है। वह अनेक जातियों का समूह है। इसलिए पूरे ओबीसी समाज का एक नेता बनना संभव नहीं। भाजपा-संघ ने पहले...