पेरियार : जिन्होंने आर्य श्रेष्ठता, ब्राह्मणवाद और वर्ण-जाति व्यवस्था को चुनौती दी

पेरियार इरोड वेंकट रामासामी एक ऐसे व्यक्तित्व रहे हैं, जिन्होंने आर्य श्रेष्ठता, ब्राह्मणवाद और वर्ण-जाति व्यवस्था के खिलाफ निर्णायक संघर्ष किया। तमिलनाडु में उन्होंने ब्राह्मणों के वर्चस्व को काफी हद तोड़ दिया। उत्तर भारत में आज भी द्विज वर्चस्व कायम है, इसे तोड़ने के लिए पेरियार के विचार अपनाना जरूरी है। बता रहे हैं, कमलेश वर्मा :

पेरियार इरोड वेंकट रामासामी का जन्म 17 सितम्बर, 1879 ईसवी को तमिलनाडु के इरोड कस्बे में हुआ था। 24 सितम्बर, 1973 ईसवी को उनकी मृत्यु वेल्लोर के सीएमसी अस्पताल में 94 वर्ष की उम्र में हुई थी। पेरियार के पिता वेंकट नाइकर एक व्यापारी थे। उनकी माँ का नाम चिन्ना थयम्म्ल था, जिन्हें लोग मुथम्म्ल भी कहते थे। पेरियार की शादी 19 वर्ष की उम्र में 13 साल की नगम्म्ल से हुई थी।

25 वर्ष की उम्र में पेरियार काशी (वाराणसी) आए थे। तमिलनाडु के एक द्रविड़ व्यापारी के द्वारा बनवाए धर्मशाला में उन्हें अपमानित करके निकाला गया, क्योंकि वहाँ भोजन की सुविधा केवल ब्राह्मणों के लिए उपलब्ध थी। भूख से परेशान पेरियार ने धर्मशाला के बाहर फेंके गए जूठे पत्तलों पर मौजूद भोजन से अपनी भूख मिटाई। जूठन के उस अंबार  पर कुत्ते भी अपनी भूख मिटा रहे थे। इस घटना ने पेरियार के मन में जातिवादी भेदभाव के प्रति स्थायी रूप से अस्वीकृति का भाव भर दिया। काशी के प्रति उनके मन में वितृष्णा का भाव भर गया क्योंकि उन्होंने इन भेदभावों की व्यापक स्वीकृति इस शहर में देखी थी। यहाँ आकर उन्होंने आर्य और द्रविड़ के भेद को भी महसूस किया। नस्ल के नाम पर द्रविड़ों के प्रति हेय दृष्टि को महसूस करने के कारण पेरियार के मन में जातिवादी श्रेष्ठता का दंभ रखनेवाले ब्राह्मणों के प्रति तीखी आलोचनात्मक दृष्टि का विकास हुआ। उन्होंने ठान लिया कि वे जातिवादी दंभ के खिलाफ निरंतर संघर्ष करते रहेंगे।

पेरियार इरोड वेंकट रामासामी (17 सितम्बर, 1879 -24 सितम्बर, 1973)

प्रसंगवश यह बताना जरूरी है कि पेरियार एक सफल उद्योगपति थे। सामाजिक कामों में लगे रहने के कारण वे बहुत लोकप्रिय थे। राजनीति में आने के बाद उनकी लोकप्रियता तो बढ़ी ही, वे अनेक संस्थाओं के अध्यक्ष या अन्य पदाधिकारी के रूप में समादृत हुए। इसलिए उनके द्वारा चलाए गए कार्यक्रमों को प्रायः व्यापक स्वीकृति प्राप्त हुई। इस आलेख का सन्दर्भ ‘जाति के प्रश्न’ से जुड़ा है, इसलिए पेरियार से जुड़ी केवल उन्हीं बातों की चर्चा यहाँ की जा रही है, जिनका सम्बन्ध जाति-संबंधी पेरियार के विचारों या कार्यक्रमों से है।

1922 में पेरियार तमिलनाडु काँग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बनाए गए थे। उन्होंने तिरुपपुर के प्रांतीय सम्मलेन में यह प्रस्ताव पारित करवाना चाहा कि द्रविड़ ‘अस्पृश्यों’ को सभी मंदिरों में प्रवेश दिया जाए। लेकिन यह प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया। विरोध करनेवालों में काँग्रेस के ब्राह्मण सदस्यों की प्रबलता ज्यादा थी। नाराज और दुखी होकर पेरियार ने यह घोषणा की कि वे ब्राह्मणवाद का पोषण करनेवाली दो पुस्तकों (‘मनुस्मृति’ और ‘रामायण’) का न केवल बहिष्कार करेंगे बल्कि इनका दहन भी करेंगे। इसी तरह जस्टिस पार्टी की सरकार ने मद्रास राज्य विधायी परिषद् में 1923 में एक अधिनियम पारित किया जिसके आधार पर ऐसे कानून बनाए जा सकते थे, जिनकी मदद से मंदिरों में ब्राह्मणों के द्वारा होनेवाले अत्याचारों को रोका जा सके। पेरियार ने काँग्रेस में होने के बावजूद जस्टिस पार्टी द्वारा प्रस्तुत इस अधिनियम का समर्थन किया। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि वे सामाजिक न्याय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को लेकर दृढ़ थे।

अपनी पत्नी मैनियामाई के साथ पेरियार

1924 में केरल के वायकॉम कस्बे में सामाजिक न्याय को लेकर कांग्रेस की तरफ से एक सत्याग्रह आन्दोलन चला, जिसका नेतृत्व पेरियार ने किया। यह आन्दोलन साल भर चला जिसमें पेरियार को दो बार जेल भेज दिया गया। एक बार तो वे छह महीने तक जेल में रहे। इस सत्याग्रह का परिणाम यह हुआ कि धार्मिक शहर वायकॉम के मन्दिरों के आसपास की गलियों में प्रत्येक जाति को जाने की अनुमति प्राप्त हो गयी। इसके पहले अस्पृश्य जातियों को इन गलियों में जाने से ब्राह्मण समुदाय ने रोक लगा रखी थी।

तिरुवनवेली के पास चेरनमाधवी में राष्ट्रीय प्रशिक्षण विद्यालय ‘गुरुकुलम’ था। यहाँ के छात्रावास में ब्राह्मण और द्रविड़ छात्रों के बीच भेदभाव किया जाता था। पेरियार ने इसका जबरदस्त विरोध किया और सुनवाई में लापरवाही होने पर उन्होंने तमिलनाडु कांग्रेस कमिटी के सचिव पद से इस्तीफ़ा दे दिया। वे लगातार कांग्रेस के विभिन्न पदों पर बने रहे और जातिवादी भेदभाव के खिलाफ संघर्ष करते रहे। इसके लिए उन्होंने अपने पद की शक्ति का भी उपयोग किया और राजनीतिक माहौल बनाने की निरंतर कोशिश की। वे कांग्रेस के सम्मेलनों में इस तरह के प्रस्ताव पारित करवाने की कोशिश लगातार करते रहे जिससे शिक्षा और नौकरी के क्षेत्र में द्रविड़ों को आरक्षण मिल सके। हालाँकि उनके प्रस्तावों को पारित होने से बार-बार रोका गया। वे अपने इस तरह के प्रस्तावों को तिरुवनवेली (1920), तंजावुर (1921), तीरुपुर (1922) और सलेम (1923) के सम्मेलनों में पारित नहीं करवा पाए। इन प्रकरणों से गुजरते हुए पेरियार इतने क्षुब्ध रहे कि उन्होंने सलेम की एक सभा में भाषण देते हुए ‘ब्राह्मनोक्रेसी’ जैसे नए शब्द का प्रयोग किया। वे ‘कुडी अरासू’ नामक अपनी तमिल साप्ताहिक पत्रिका को इसी उद्देश्य से प्रकाशित करते थे ताकि द्रविड़ समुदाय को जातिवादी और धार्मिक अत्याचारों से मुक्त कराया जा सके। ब्राह्मण और हिन्दू धर्म के द्रविड़-विरोधी दृष्टि के खिलाफ यह संघर्ष निरंतर चलता रहा। 1925 में कांचीपुरम के कांग्रेस सम्मलेन में उन्होंने गैर-ब्राह्मणों के सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के सन्दर्भ में प्रस्ताव रखा तो पहले की तरह ही यह प्रस्ताव ख़ारिज कर दिया गया। इस घटना से क्षुब्ध होकर उन्होंने कांग्रेस से अपना सम्बन्ध तोड़ लिया। अपने कटु अनुभवों के कारण वे क्रमशः ब्राह्मणवाद के विरोध के प्रति वैचारिक रूप से दृढ़ होते गए। इसके बाद द्रविड़ों के ‘आत्मसम्मान आन्दोलन’ की शुरुआत हुई। गैर-ब्राह्मण सम्मेलनों को आयोजित करते हुए वे लगातार प्रयास करते रहे कि ब्राह्मणों के द्वारा फैलाए गए षड्यंत्रों से द्रविड़-समाज को बचाया जाए और इनका प्रतिनिधित्व हर जगह बढाया जाए। बाद में वे तमिलनाडु तथा उसके बाहर भी ब्राह्मणों के सम्मेलनों में शामिल हुए और द्रविड़ों के ‘आत्मसम्मान आन्दोलन’ का प्रचार करते रहे। वर्णाश्रम के समर्थक गाँधीजी से 1927 में बंगलूरू में मिलकर पेरियार ने इस बात पर दृढ़ता दिखाई कि वर्णाश्रम को ख़त्म करके ही अस्पृश्यता का समाधान निकला जा सकता है। ‘आत्मसम्मान आन्दोलन’ को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने विवाह की ब्राह्मणवादी पद्धति को छोड़ने की अपील की और केवल माला पहनाकर शादी करने की सादी पद्धति की सिफारिश की। किसी भी प्रकार की पुरोहिती की अनुमति उन्होंने नहीं दी। यह पद्धति अंतरजातीय, अंतरधार्मिक और विधवा-विवाह को स्वीकृति देती थी।

वाइकम (केरल) में पेरियार की प्रतिमा (फोटो : एफपी ऑन द रोड)

पेरियार ने यह सब केवल कहा नहीं बल्कि करके दिखाया। उन्होंने सामूहिक विवाह के कार्यक्रम आयोजित किए। इस तरह में मामले में 1933 में 144 धारा के अंतर्गत उन्हें गिरफ्तार भी किया गया। उनके द्रविड़ आग्रह का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उन्होंने 1940 में अलग ‘द्रविड़नाडु’ की माँग की थी। इसी कड़ी में उन्होंने ‘जस्टिस पार्टी’ का नाम बदलकर ‘द्रविड़ कषगम’ रख दिया ताकि द्रविड़ मुद्दे को ठीक पहचान मिल सके। 1946 में पेरियार के द्वारा आयोजित ‘काली कमीज़ सम्मलेन’ का विरोध जिस तरह ब्राह्मणवादी ताकतों के द्वारा गुंडे भेजकर किया गया और आगे चलकर इसे प्रतिबंधित भी किया गया, उससे यह पता चलता है कि पेरियार के प्रयासों का प्रभाव विस्तार प्राप्त करने लगा था। पेरियार गाँधीजी की हत्या को ब्राह्मणवाद का ही अपराध मानते थे। उन्होंने बैठक करके इस घटना की निंदा की तथा भारत का नाम ‘गाँधीनाडु’ रखने का प्रस्ताव दिया।

पेरियार के तीन दशकों के संघर्ष का एक परिणाम यह निकला कि 1951 में संविधान में पहला संशोधन करते हुए अनुच्छेद 15 में उपखंड (4) जोड़ा गया। इसके अनुसार देश के अन्य पिछड़े वर्ग के लिए समान अधिकार और अवसर सुनिश्चित करने का प्रावधान किया गया। आगे चलकर काका कालेलकर या बी पी मंडल ने जो रिपोर्ट और सिफारिशें तैयार कीं, उन सब को आधार इसी संविधान संशोधन से प्राप्त हुआ। 1953 में मूर्ति पूजा का विरोध करते हुए पेरियार ने पिल्लैयर (विनायक) की मूर्तियों को सार्वजनिक स्थानों पर तोड़ा भी, ताकि यह बताया जा सके कि ब्राह्मणवादियों द्वारा फैलाई गई अवधारणाएँ गलत हैं कि मूर्तियों में शक्ति होती है। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने यह कोशिश की थी कि माता-पिता के पेशे को ही विद्यार्थियों को स्कूलों में सिखाया जाए। वे इसे शिक्षा सुधार का कार्यक्रम मानते थे। पेरियार ने इसे गैर-ब्राह्मण के विरूद्ध कार्यक्रम माना और इसका इतना कड़ा विरोध किया कि राजगोपालाचारी को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। इस तरह वे लगातार कोशिश कर रहे थे कि ब्राह्मणवादियों का जातिवादी वर्चस्व कमजोर हो और द्रविड़ समुदाय का प्रतिनिधित्व प्रत्येक क्षेत्र में बढ़े। 1954 में इरोड में उनके द्वारा आयोजित बौद्ध धर्म का सम्मलेन उनकी इन्हीं योजनाओं का हिस्सा था कि इसकी सहायता से ब्राह्मणवादियों के खिलाफ लड़ाई का एक और मोर्चा खोला जा सके। इसी वर्ष उनकी मुलाकात डॉ. बी. आर. आम्बेडकर से हुई। पेरियार का सुझाव था कि वे बड़ी संख्या में अपने अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म को अपनाएँ ताकि हिन्दूवाद पर गहरा प्रहार हो सके।

1955 में पेरियार ने ‘रामकथा’ के द्रविड़-विरोधी पक्ष को उद्घाटित किया तथा इस बात पर जोर दिया कि ‘वाल्मीकि रामायण’ वस्तुतः आर्य-श्रेष्ठता को स्थापित करने का एक साहित्यिक-सांस्कृतिक प्रयत्न है। यही वह दौर है जब उन्होंने ‘सच्ची रामायण’ की रचना तमिल भाषा में की जिसका अँग्रेजी अनुवाद 1959 में प्रकाशित हुआ – ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग’। 1968 में ‘सच्ची रामायण’ के नाम से यह पुस्तक प्रकाशित हुई। इस पुस्तक का लम्बे समय तक विरोध होता रहा और इसे सरकारी तौर पर प्रतिबंधित भी रखा गया। परन्तु इस पुस्तक ने पूरे भारत में उस चेतना को सहारा दिया जो ब्राह्मणवाद के खिलाफ थी। यह पुस्तक पेरियार की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही।

जातिवादी वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष करते हुए वे अदालत के खिलाफ भी खड़े हुए। 1955 में त्रिची के जिलाधाकिरी थे श्री आर. एस. मलयप्पन। वे दलितों के प्रति सहानुभूति रखते थे तथा स्वयं पिछड़ी जाति के थे। मद्रास न्यायालय के दो ब्राह्मण न्यायाधीशों ने अपने एक फैसले में श्री मलयप्पन की कड़ी निंदा की। पेरियार ने त्रिची के टाउनहॉल चौराहे पर हुई जनसभा में दोनों न्यायाधीशों की कड़ी आलोचना की और उनके जातिवादी चेहरे को उजागर किया। इस मामले में उन्हें मुक़दमे का भी सामना करना पड़ा और न्यायालय की अवमानना के आरोप में जब सुनवाई हुई तो पेरियार ने वहाँ भी वक्तव्य देकर ब्राह्मणों के नस्लवादी षड्यंत्रों का विरोध किया। समाज और राजनीति से लेकर न्यायालय तक पेरियार अपने विचारों के साथ सक्रिय रहे। तमिलनाडु के होटलों के बोर्ड पर ‘ब्राह्मण’ शब्द का प्रयोग बहुतायत से होता था। यह ब्राह्मण श्रेष्ठता का प्रतीक था। पेरियार ने 1958 में आन्दोलन चलाकर होटलों के बोर्ड से ‘ब्राह्मण’ शब्द को हटवाया। उनपर मुक़दमे हुए कि उन्होंने अपने अनुयायियों को ब्राह्मणों के खिलाफ भड़काया है और उन्हें इस मामले में दो माह की सज़ा हुई। 1960 में उन्होंने तमिलनाडु को छोड़कर भारत का नक्शा जलाया और सन्देश दिया कि केंद्र सरकार का शासन ब्राह्मणों का शासन है। पेरियार उन प्रतीकों और संकेतों के खिलाफ भी लड़ रहे थे जो ब्राह्मण-श्रेष्ठता का पोषण करते थे। 1968 में पेरियार की प्रेरणा से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री श्री सी. एन. अन्नादुरई ने सर्कुलर जारी किया कि सभी सरकारी कार्यालयों से देवी-देवताओं की तस्वीरें हटा ली जाएँ। भारत के धर्मनिरपेक्ष ढाँचे को बनाए रखने के लिए यह कदम जरूरी था। 1969 में पेरियार ने जातिगत भेदभाव को दूर करने के लिए एक और कदम उठाया। मंदिरों के गर्भगृह में अब तक केवल ब्राह्मण को प्रवेश का अधिकार था। उन्होंने कार्यक्रम बनाकर सभी जातियों के लिए इस प्रवेश को सुनिश्चित कराया तथा यह व्यवस्था भी दी कि पूजा-पाठ का काम संस्कृत के बजाए तमिल में होगा। पेरियार ने अपने प्रयासों से तमिलनाडु के सामाजिक-धार्मिक जीवन को गैर-ब्राह्मणों के अनुकूल बनाने में काफी सफलता पायी। पेरियार का ‘सच’ पर बहुत जोर रहा। वे तर्क और सच के हिमायती रहे। उन्होंने ‘रामायण’ भी ‘सच्ची’ लिखी। पहले की रामकथा के झूठ को उजागर करना उन्होंने जरूरी समझा ताकि आर्यों के नस्लवादी भेदभाव और ब्राह्मणों के जातिवादी षड्यंत्रों को समझा जा सके। अपने जीवन के अंतिम दिनों तक वे सक्रिय रहे। 91 साल की उम्र में उन्होंने 1970 में ‘उन्मई’(सच) नामक द्विमासिक तमिल पत्रिका की शुरुआत की। इसके शीर्षक में भी सच का आग्रह साफ़-साफ़ दिखाई पड़ता है। तर्कवादियों को जोड़ने के लिहाज से उन्होंने ‘रेशनलिस्ट फोरम’ नाम से एक अराजनीतिक मंच की स्थापना की। उन्होंने इसी क्रम में अंग्रेजी में मासिक पत्रिका ‘मॉडर्न रेशनलिस्ट’ की भी शुरुआत की। 8 और 9 दिसम्बर 1973 को पेरियार ने थिडल, वेपेरी और मद्रास में सामाजिक सम्मेलनों का आयोजन करवाया जिसमें भारी जमावड़ा हुआ। इन सम्मेलनों में पेरियार के शानदार भाषण हुए जिनमें अपील की गयी थी कि द्रविड़ों को हर तरह से आगे आना चाहिए और ब्राह्मण-वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष करना चाहिए। नस्ल और जाति के भेदभाव के खिलाफ पेरियार का संघर्ष जीवन भर चलता रहा। 19 दिसम्बर, 1973 को त्यागराय नगर में उनका अंतिम भाषण हुआ और इसके पाँच दिनों बाद 24 दिसम्बर, 1973 को 94 साल की उम्र में पेरियार ने अपने संघर्षशील जीवन को सदा के लिए विश्राम दे दिया।    

पेरियार और आंबेडकर। दोनों लोग 1954 में रंगून में मिले थे, विश्व बौद्ध कांफ़्रेंस में भाग लेने बर्मा की राजधानी पहुंचे थे

पेरियार के भाषणों और लेखों के हवाले से जाति-संबंधी उनके विचारों को जाना जा सकता है और उनकी समीक्षा भी की जा सकती है। व्यावहारिक भाषा और तर्कों के माध्यम से उन्होंने अपनी बातें कहीं। ब्राह्मणों के द्वारा की गयी हिन्दू धर्म की व्याख्या में अनेक अंतर्विरोध हैं, जिन पर विस्तार से डॉ आम्बेडकर ने ‘हिन्दू धर्म की पहेलियाँ’ पुस्तक में लिखा है। डॉ. आम्बेडकर की तरह का व्यवस्थित लेखन पेरियार ने नहीं किया था, मगर सोद्देश्यता से परिपूर्ण उनके लेखन में मार्गदर्शन की अद्भुत क्षमता थी। ‘विदुथलई’ के सम्पादकीय में 04 मार्च 1969 को वे लिखते हैं, “कुछ वक्त पहले वैष्णव और शैव पुजारी केरल के लोगों के तर्ज़ पर अपने बालों में चोटियाँ करते थे। अब यह भेद मिट गया है। आज ब्राह्मण सोचते हैं कि जो भी होता है, जो भी बदलता है उस सबके बीच उनकी सर्वोच्च जाति और सर्वोच्च दर्ज़ा कायम है। ऐसे में वे उच्च धर्म के नाम पर कुछ भी करने के लिए पूरी तरह तैयार नज़र आते हैं।”

पेरियार अपने तर्कों और जानकारियों से यह सिद्ध करते रहे कि हिन्दू धर्म से जुड़ी बातें मूलतः ब्राह्मण-वर्चस्व को कायम करती हैं। इसकी वैचारिक प्रक्रिया, मान्यता, कर्मकांड आदि में इस वर्चस्व को बनाए रखने के हिसाब से परिवर्तन आए हैं। इसलिए हिन्दू धर्म के परिवर्तनों को प्रगतिशीलता से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। हिन्दू मतों को आमने-सामने रखकर देखा जा सकता है कि इनमें परस्पर कितनी झूठी बातें हैं। बताया जाता रहा है कि वैदिक मंत्र पवित्र होते हैं। इन्हें सुनने का अधिकार सबको नहीं है। मगर यह बात सब जगह समान रूप से नहीं मानी जाती है। पेरियार इसी सम्पादकीय में लिखते हैं, “पंजाब में आर्यसमाजी वैदिक मन्त्रों का उच्चारण जोर-जोर से करेंगे ताकि कुत्ते, घोड़े, गधे आदि सब सुन सकें। तमिलनाडु में वे कहते हैं कि वैदिक ध्वनियाँ तो हमारे कानों में नहीं पड़नी चाहिए।”  इसी क्रम में वे आगे कहते हैं , “सन् 1930 में पाँचवीं जाति के लोग मन्दिर में नहीं घुस सकते थे। केरल में तो चौथे वर्ण के कुछ लोग भी मन्दिर के घुसने के पात्र नहीं थे। आज हर कोई मन्दिर में प्रवेश कर सकता है। ऐसा देखकर कोई देवता मन्दिर छोड़कर भाग नहीं गया है।” इन विसंगतियों का उपयोग ब्राह्मण-वर्चस्व को बनाए रखने के लिए किया जाता रहा है। जरूरत के अनुसार वे अपने को परम्परावादी या सुधारवादी के रूप में पेश करते रहे हैं।

8 जनवरी 1940 को बम्बई में आंबेडकर, पेरियार और जिन्ना

पेरियार के जाति-संबंधी विचारों का एक पक्ष यह भी है कि वे चाहते थे कि द्रविड़ों को हिन्दू न माना जाए। हिन्दू धर्म की मान्यताओं में आर्यों और ब्राह्मणों की प्रमुखता को देखते हुए उन्होंने ऐसा विचार बनाया था। 6 जनवरी 1945  को ‘कुडियारासू’ (रिपब्लिक) के सम्पादकीय में पेरियार ने लिखा, “हम लम्बे समय से कहते रहे हैं कि हिन्दू धर्म का अर्थ है आर्य धर्म और हिन्दू आर्य हैं। इसलिए हम यह कहते रहे हैं कि हम द्रविड़ों को खुद को हिन्दू नहीं कहना चाहिए न ही खुद को हिंदुत्व को मानने वाला कहना चाहिए। इसी के अनुरूप सन् 1940 में जस्टिस पार्टी के प्रांतीय सम्मलेन में मेरी अध्यक्षता में एक प्रस्ताव पारित हुआ। फैसला किया गया कि हम द्रविड़ खुद को हिन्दू नहीं कहेंगे और न ही यह कहेंगे कि हम हिन्दू धर्म से ताल्लुक रखते हैं।” आर्यों को विदेशी मानने वाले पेरियार ने अनेक जगहों पर लिखा और कहा है कि आर्य लोगों की व्यवस्था ही जाति-व्यवस्था के लिए जिम्मेदार रही है। आर्यों के ग्रंथों में उनके जीवन का एक ही लक्ष्य दिखाई पड़ता है कि वे आराम से रहें और एक बड़ा वर्ग उनकी सेवा करता रहे। शोषण का महिमामंडन इन पुस्तकों का मूल स्वर है। वे लिखते हैं, “चार वर्णों की स्थापना के लिए कौन जिम्मेदार है? हमारे समाज की एकता को नष्ट करनेवाली सैंकड़ों जातियाँ किसने बनाई हैं और देश की एकता को नष्ट किसने किया ? क्या यह काम आर्यों ने नहीं किया ? इन वर्णों और जातियों को बनाकर और एक जाति का दूसरी जाति से हर तरह का संपर्क रोककर, हर जाति के लिए काम और कर्तव्य निर्धारित करके क्या आम जनता के बीच की एकता को खंडित नहीं किया गया ? क्या यही वजह नहीं है कि हमारे लोग देश के बारे में चिंता नहीं करते और अन्य लोगों की भी उनको कोई परवाह नहीं रहती? हम शर्मिंदगी के शिकार हैं और आर्यों और विदेशियों के गुलाम बन गए हैं।” पेरियार इन दोनों गुलामियों से मुक्त होना चाहते थे। अगर आजादी की लड़ाई का अर्थ केवल अंग्रेजों से मुक्ति है तो यह अधूरी लड़ाई है। इसकी पूर्णता तब होगी जब द्रविड़ों को हिन्दुओं के नस्लवादी भेदभाव से मुक्ति मिले। ऐसी व्यवस्था बने कि द्रविड़ों का शोषण न हो सके, “हिन्दू परजीवी हैं। हम कड़ी मेहनत करते हैं, वे हमारे श्रम का रस चूस लेते हैं। अगर आज़ादी इस शोषण का अंत नहीं कर सकती तो ऐसी आज़ादी मिले या न मिले कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर आप इतिहास पर नज़र डालें, पुराणों को देखें, मनु शास्त्र को पढ़ें या आर्यों के किसी भी साहित्य पर गहराई से नज़र डालें तो आप पाएँगे कि आर्य हिन्दू बिना मेहनत किए परजीवियों की भाँति दूसरों की मेहनत पर जीवित रहते थे। वे आज भी ऐसा ही कर रहे हैं।”

पेरियार ने विभिन्न जातियों की उत्पत्ति से सम्बंधित कथाओं और विवरणों की चर्चा की है। इस क्रम में उन्होंने इस बात की तरफ ध्यान आकर्षित किया कि इन जातियों के जन्म की कथा अत्यंत अपमानजनक रूप में पेश की गयी है। निचली जातियों को अवैध सम्बन्धों से उत्पन्न बताया गया है। कोशिश की गयी है कि ब्राह्मणों के अलावा प्रत्येक जाति के बारे में अपमानजनक बातें फैलाई जाएँ। 1930 के अपने एक सम्पादकीय में उन्होंने लिखा, “इस प्रकार यह स्थापित किया गया था कि ब्राह्मणों के अलावा अन्य जातियाँ नीची हैं। वे ब्राह्मणों के स्पर्श के काबिल नहीं हैं, न ही ब्राह्मण उनके साथ भोजन करके उनको समान दर्ज़ा देगा। अन्य जातियाँ कई तरह के अधिकारों से वंचित थीं। वे केवल ब्राह्मणों की सेवा करने लायक थे। उनका जन्म अवैध सम्बन्धों, ऊँची-नीची जातियों के सम्बन्धों की परिणति था।” पेरियार चाहते थे कि अंग्रेजों के रहते हुए ही जाति-व्यवस्था के अंत का सटीक प्रयास किया जाए। उनका विश्वास था कि सत्ता के स्तर पर बड़े प्रयास के बगैर यह व्यवस्था समाप्त नहीं हो सकती। अंग्रेजों के जाने के बाद इस व्यवस्था के और भी सुदृढ़ होने की आशंका उनके मन में पहले से ही थी, “भारत में आज 1,000 में से 999 लोग जातिभेद खत्म करने के इच्छुक नहीं हैं। बल्कि वे ऊँची जाति में शामिल होना चाहते हैं ताकि वे अन्य निचली जातियों पर रसूख कायम कर सकें।”

पेरियार ने हिन्दू धर्म की बनावट को जाति-आधारित बताया है। उन्होंने विवरण-सहित बताया कि हिन्दू धर्म के संप्रदाय हों या ग्रन्थ, उन सबमें जाति की बुनियाद मौजूद है। 03 जनवरी 1931 को दिए गए अपने भाषण में उन्होंने कहा था, “हिन्दू धर्म में बात चाहे वैष्णव संप्रदाय की हो या शिव संप्रदाय की क्या आप बिना भेदभाव, ऊँची-नीची स्थापना वाले देवताओं या अवतारों वाली जातियाँ दिखा सकते हैं ? इसके अलावा ईश्वर की लीलाएँ, ईश्वर की राह दिखाने वाले महात्मा, ईश्वरीय गतिविधि दर्शाने वाले पुराण अथवा ऐतिहासिक घटनाएँ, सभी जातिवादी विचारों से भरे हुए हैं। 64 नयनार (शैव संत) 64 जातियों से ताल्लुक रखते थे। 12 आलवार (वैष्णव संत) 12 जातियों से थे। अगर आप मनु धर्म को हिन्दू धर्म का आधार मानते हैं तो आपको कई जातियों और उनके बीच भेदभाव के सन्दर्भ देखने को मिलेंगे। आप इसे चाहे जिस नज़र से देखिए, भले ही यह धर्म में आपकी ताज़ा आस्था हो या उसके आधार पर ईश्वर में या वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास में, आप कभी यह नहीं कहेंगे कि जातिगत भेद मौजूद नहीं है।” इस तरह पेरियार की दृढ़ मान्यता थी कि जातिगत भेदभाव का सैद्धांतिक आधार हिन्दू धर्म की स्थापनाओं में मौजूद है।

पेरियार के भाषणों और आलेखों से अनेक उद्धरण लिए जा सकते हैं जिनमें उन्होंने जाति-व्यवस्था पर विचार किया है। पेरियार का मुख्य जोर इस बात पर था कि धर्म का सहारा पाकर यह व्यवस्था ज्यादा क्रूर हो गयी है। उनके विचारों को क्रमबद्ध किया जाए तो कहा जा सकता है कि हिन्दू समाज की इस बुराई का आधार उन्होंने धर्म के भीतर तलाशा था। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि हिन्दू धर्म आर्य नस्ल की देन है और स्पष्ट है कि इसका द्रविड़ समाज से कोई अच्छा रिश्ता कभी न रहा है और न कभी हो सकता है। नस्ल की श्रेष्ठता की बुनियाद को छोड़कर ही आर्य और द्रविड़ समाज के बीच उचित सम्वाद हो सकता है। मगर, सांस्कृतिक दृष्टि से इतने काँटे और विष बोए जा चुके हैं कि इनका निदान आसान तो बिल्कुल नहीं है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने ‘रामकथा’ का जिक्र बार-बार किया। वे इस पुस्तक को आर्यों की नस्लवादी श्रेष्ठता का आग्रह रखनेवाली पुस्तक के रूप व्याख्यायित करते थे। उनका विचार था कि इस कथा में कोशिश की गयी है कि आर्यों को श्रेष्ठ बताया जाए और द्रविड़ों को निकृष्ट।

जाति-संबंधी पेरियार के विचारों में दूसरा पक्ष है ब्राह्मण-श्रेष्ठता का। धार्मिक मान्यताओं का पोषण करनेवाली पुस्तकें हों या सांस्कृतिक कथाओं को प्रस्तुत करनेवाली ‘रामायण’-जैसी पुस्तकें। इन सभी पुस्तकों में किसी न किसी रूप में ब्राह्मण की श्रेष्ठता को स्थापित किया गया है। ब्राह्मण को धरती का देवता बताया गया है और हर हालत में उसे ऊँचा बताया गया है। यहाँ तक कि गलत काम में लिप्त रहनेवाले ब्राह्मण को पूज्य भी बताया गया है। उसे हर स्थिति में दंड-विधान से ऊपर बताया गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि शेष जातियाँ स्वयं को जन्म से निम्न मानने की मानसिकता के बीच अपना जीवन व्यतीत करती रहें। यह ठीक है कि जाति के आधार पर होनेवाले व्यवहारों में समय के अनुसार कुछ परिवर्तन देखे गए हैं, मगर मूल बात जस की तस बनी रही है। विभिन्न जातियों की उत्पत्ति के बारे में जो कथाएँ रची गयी हैं उनमें अपमानजनक प्रसंग भरे पड़े हैं। शायद ही कोई जाति होगी जो अवैध सम्बन्ध से उत्पन्न न मानी गयी होगी। केवल ब्राह्मण जाति के बारे में इस तरह की कोई अपमानजनक कथा नहीं मिलती है। जाहिर है कि इस तरह की कथाएँ काल्पनिक हैं और इनका भी उद्देश्य यही है कि शेष जातियों की तुलना में ब्राह्मण को पवित्र, कुलीन और वैध बताया जा सके। पेरियार की दो टूक राय है कि गैर-ब्राह्मण जातियों को इन ग्रंथों पर विश्वास नहीं करना चाहिए और इनके भीतर मौजूद षड्यंत्रों को समझते हुए इनका पर्दाफाश करना चाहिए। स्वयं पेरियार यह काम अपने जीवन भर करते रहे। अपने इस काम को मजबूती प्रदान करने के लिए उन्होंने संगठन बनाए, पत्रिकाएँ निकालीं, भाषण दिए, सम्मलेन करवाए, सम्मेलनों में अनेक प्रस्ताव पारित करवाए, कांग्रेस के सम्मेलनों में अनेक बार टकराव मोल लिया। पेरियार के विचार केवल शब्दों तक सीमित नहीं थे। वे अपने विचारों को लेकर समाज में उतरते थे।

तमिलनाडु की राजनीति में गैर-ब्राह्मणों का महत्त्व आगे चलकर स्थायी रूप से स्थापित हुआ। आज़ादी के बाद दिल्ली की केन्द्रीय सत्ता को तमिलनाडु से भरपूर चुनौती मिली। दक्षिण भारत के चार राज्यों में जाति की भूमिका तमिलनाडु की राजनीति में सबसे ज्यादा रही। यह भूमिका महज वोट बैंक के रूप में जाति के दुरुपयोग तक नहीं थी, बल्कि सामाजिक न्याय को स्थापित करने की दृष्टि से थी। ‘जाति के प्रश्न’ को जातिवाद की दृष्टि से देखनेवाले इस पक्ष को खूब बदनाम करते हैं, मगर यह सवाल समाज की बनावट को समझने का एक पुख्ता आधार है। धीरे-धीरे दूसरी धाराओं के विचारक भी इस पक्ष को ज़रूरी मानने लगे हैं। इधर के वर्षों में वामपंथ ने भी भारत के सन्दर्भ में जाति को एक ज़रूरी आधार माना है। वहाँ यह बात समझ ली गयी है कि भारत में वर्ग के निर्माण में जाति की अहम भूमिका है। अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो जाति के सवाल का राजनीतिक रूप अत्यंत स्तरहीन होगा और इसका लाभ प्रतिगामी जातिवादी ताकतें उठाती रहेंगी। यह भी माना गया है कि जाति को समझे बगैर वर्ग का विश्लेषण अधूरा होगा। इसी वर्ष (2018) जेएनयू, नयी दिल्ली में वीरभारत तलवार ने चौथीराम यादव की पुस्तक ‘लोक और वेद : आमने-सामने’ के विमोचन कार्यक्रम के अध्यक्षीय वक्तव्य में खूब ज़ोर देकर कहा था कि भारतीय समाज को समझने के लिए जाति पर बात करनी ही होगी। 2016 के बाद वामपंथी पार्टियों ने आम्बेडकर और भगत सिंह को साथ रखकर अपनी बात कहने का जो नया रूप अपनाया है उसमें जाति की अनिवार्यता की स्वीकृति ही दिखाई पड़ती है। पेरियार उन चिंतकों और राजनीतिज्ञों में हैं जिन्होंने जाति की भूमिका की पहचान दूसरों की तुलना पहले कर ली थी। उन्होंने तमिलनाडु की भूमि को सामाजिक न्याय की भूमि बनाने में दूसरों की तुलना में अग्रणी भूमिका निभायी थी।

(कॉपी संपादन : सिद्धार्थ)


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