अयोध्या : दूर रहे दलित-बहुजन, उन्माद को मिली मात

बीते 25 नवंबर 2018 को तमाम प्रयासों के बावजूद विश्व हिंदू परिषद और शिवसेना अयोध्या में भीड़ नहीं जुटा सकी। जबकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा फैसला टाले जाने के बाद संघ और भाजपा के नेताओं द्वारा उन्माद बढ़ाने वाले बयान दिए गए। बता रहे हैं सुशील मानव :

कथित तौर पर मुख्यधारा की मीडिया की हफ्तों की रात-दिन की तमाम कोशिशें उत्तर प्रदेश के अयोध्या में उन्माद नहीं फैला सकीं। बहुसंख्यकवादी संपादकीय दलीलों, और सोशल मीडिया पर चले धुंआधार प्रचार के बावजूद बीते 25 नवंबर 2018 को हुई कथित धर्मसभा फुस्स हो गई। देश में जिस सांप्रदायिक बवंडर को उठाने के मकसद से वो धर्मसभा और धर्म संसद आयोजित की गई थी उसे इस देश की बहुसंख्यक आवाम ने एक तरह से खारिज कर दिया है। संघ के इस धर्म संसद को खारिज करके जनता ने स्पष्ट बता दिया है कि संसद, संविधान और सुप्रीम कोर्ट की जगह कोई धर्म-संसद नहीं ले सकती है।

एक समय में राम मंदिर आंदोलन ने ना सिर्फ संघ-भाजपा को देश-समाज में वैधता व स्वीकार्यता प्रदान की बल्कि का जरिया भी बनी लेकिन इसके साथ ही साथ राम मंदिर आंदोलन ने भारतीय समाज से संविधानवाद और समूहिक विवेक खत्म करके समाज को कट्टरपंथी और असहिष्णुता का अनुगामी बना दिया। आज भाजपा सरकार की विफलताओं को छुपाने और जनता का ध्यान भटकाकर चुनावी हित साधने के लिए सबरीमाला से लेकर अयोध्या-विवाद तक बहुसंख्यक मर्दों की भीड़ के बलबूते सरकार और आरएसएस व उसके अन्य सहयोगी संगठन सुप्रीम कोर्ट और संविधान की धज्जियां उड़ाने की कोशिश करते दिख रहे हैं।

अयोध्या में बहुजन रहे दूर। इनसेट में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे

जबसे सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर सुनवाई जनवरी तक टालने का फैसला सुनाया है, संघ और भाजपा की बेचैनी बढ़ गयी है। इसी महीने की शुरूआत में आरएसएस प्रवक्ता व राज्य सभा सांसद राकेश सिन्हा ने बयान दिया कि राम मंदिर पर वे संसद में निजी विधेयक लाएंगे। इससे पहले संघ सरगना मोहन भागवत ने कहा था कि मंदिर निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहण को लेकर सरकार को कानून बनाना चाहिए। अध्यादेश की बात कहकर संघ और उसके प्रवक्ता ने राम मंदिर के बहाने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सांप्रदायिकता पर देश की बहुसंख्यक आबादी की नब्ज़ टटोलने की कोशिश की। इस तरह से राम मंदिर मुद्दे की राजनीति में बैकडोर इंट्री करवाई गई और इसी को ध्यान में रखकर 25 नवंबर को अयोध्या में धर्म संसद बुलाई गई।

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सोशल मीडिया पर इसके लिए बाकायदा अभियान चलाकर ज्यादा से ज्यादा युवाओं से अयोध्या पहुँचने की अपील की गयी। संघ और उसकी सहयोगी संगठनों व शिवसेना द्वारा बुलाए गए इस धर्म-सभा व धर्म-संसद का आखिर उद्देश्य क्या था? इसे समझने के लिए भाजपा और संघ के नेताओं के कुछ बयानों को देखना होगा।

बलिया (उत्तर प्रदेश) से भाजपा के विधायक सुरेंद्र सिंह ने धमकी देते हुए कहा कि- “मंदिर निर्माण को लेकर अगर संविधान को हाथ में लेना पड़ेगा तो भी वो पीछे नहीं हटेंगे। हमने 1992 में भी संविधान को जब अपने हाथ में लिया और मस्जिद ढाह दी थी। और इस बार भी हमें ऐसा करने से गुरेज नहीं है।”

भीड़ जुटाने को शिवसेना द्वारा लगाया गया बैनर

कुछ ऐसा ही बयान शिवसेना नेता संजय राउत ने दिया। फिर विश्व हिंदू परिषद की साध्वी प्राची ने एक बयान में कहा कि- “सुप्रीम कोर्ट का फैसला चाहे जो भी हो, अयोध्या में तो राम मंदिर का ही निर्माण होगा।”

धर्मसभा के बहाने देश के संविधान, सुप्रीम कोर्ट और उसकी संस्थाओं को खुली चुनौती थी। निःसंदेह इस धर्मसभा का तात्कालिक लक्ष्य विधानसभा और लोकसभा चुनाव ही हैं। पर उसका एक दीर्घकालिक लक्ष्य राम मंदिर निर्माण और उस तरह के अन्य प्रतीकों के माध्यम से सांस्कृतिक हिंदू राष्ट्र की स्थापना ही है। संघ, विहिप और उसके सहयोगी संगठनों ने धर्म संसद के बहाने एक तरह से सुप्रीम कोर्ट और संविधान के खिलाफ़ शक्ति प्रदर्शन किया है। यह काफी कुछ पाकिस्तान के आसिया बीबी के मामले में आये पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ़ वहां के सांप्रदायिक दहशतगर्दों द्वारा किए गए शक्ति प्रदर्शन जैसा ही था।

भीड़ जुटाने को शिवसेना द्वारा लगाया गया बैनर

अयोध्या के अलावा देश में 500 अन्य जगहों पर भी धर्मसभाएं करने की कोशिश की गई थी। साथ ही ‘चलो अयोध्या’ और ‘चलो अयोध्या संकल्प बाइक रैली’ जैसी कार्यक्रम भीड़ जुटाने के मकसद से चलाए गए थे।

बता दें कि अयोध्या विवाद की एक याचिका पर नवंबर में सुनवाई की पक्षकारों की दलील पर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कहा था कि हमारी अपनी प्राथमिकताएं हैं। और यह उचित पीठ तय करेगी की सुनवाई कब हो। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के फैंसले को सांप्रदायिक रंग देते हुए प्रतिक्रिया में एक बीजेपी नेता ने कहा था कि आतंकवादियों पर सुनवाई के लिए आधी रात कोर्ट लगाने वाला सुप्रीम कोर्ट अगर यह कहता है कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक राम मंदिर उसकी प्राथमिकता में नहीं है। तो हम उसे अयोध्या में धर्मसभा के जरिए करोड़ों हिंदुओं की ताकत का एहसास कराएंगे। इस सबकी शुरुआत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दीपावली पर पहले फैजाबाद का नाम बदलकर अयोध्या करने और फिर सरदार पटेल की स्टेच्यू आफ लिबर्टी से भी ऊंची 221 मीटर कांस्य की राम मूर्ति बनवाने की घोषणा से होती है।

वहीं अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महंत नरेंद्र गिरी ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई जनवरी तक टलने के बाद मंदिर निर्माण के लिए दो ही रास्ते बचे हैं। राम मंदिर निर्माण के लिए संसद कानून बनाए या फिर सभी पक्ष मिलकर आम सहमति से मंदिर निर्माण करें। उन्होंने कहा कि अखाड़ा परिषद न ही संत समिति के साथ है और न ही विहिप के साथ। उन्होंने सवाल खड़े करते हुए कहा कि जब विहिप और शिवसेना का उद्देश्य एक ही है तो फिर एक दिन ही अयोध्या में अलग-अलग कार्यक्रम रखने का क्या औचित्य है।

बहरहाल, अयोध्या मामले के याचिकाकर्ता इकबाल अंसारी ने अयोध्या में धर्मसभा के नाम पर भीड़ जमा करने की संघ की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें विधान भवन या संसद का घेराव करना चाहिए और अयोध्या के लोगों को सुकून से रहने देना चाहिए। किसी को मंदिर-मस्जिद के मुद्दे पर कोई बात कहनी है, तो उसे दिल्ली या लखनऊ जाना चाहिए।

(कॉपी संपादन : सिद्धार्थ/एफपी डेस्क)

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