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इंडियन एक्सप्रेस ने मेरे हवाले से प्रकाशित की गलत खबर : इंदिरा साहनी

आरक्षण की सीमा 50 फीसदी करवाने के लिए चर्चित अधिवक्ता साहनी का कहना कि ऐसे नियम बनाए जाने चाहिए जिससे, एससी, एसटी, ओबीसी के प्रतिभाशाली उम्मीदवार 'जनरल' कोटे में न आ पाएं। द्विजवाद की हदें पार करते हुए वे कहती हैं कि इन तबकों के आरक्षण को कम किया जाना चाहिए ताकि 'सामान्य वर्ग' को अधिक जगह मिल सके। प्रस्तुत है फॉरवर्ड प्रेस की उनसे हुई बातचीत का संपादित अंश :

फारवर्ड प्रेस : गरीब सवर्ण के आरक्षण पर आपका क्या कहना है?

इंदिरा साहनी : संविधान की मूल भावना के साथ छेड़छाड़ कर संविधान में संशोधन किया गया है और इस तरह सरकार द्वारा अपनायी गई पूरी प्रक्रिया पर ही सवाल खड़ा होता है। यह मंडल आयोग के उस फैसले के खिलाफ भी है जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि आर्थिक आधार रिजर्वेशन का आधार नहीं हो सकता।

फा.प्रे. : सवर्ण के लिए आर्थिक आधार ही पैमाना रखा गया है तो फिर आगे इसका क्या होगा?

इं. सा. : देखिए, आगे क्या होगा यह तो अदालत ही तय करेगा क्योंकि इसके खिलाफ याचिका वहां दायर की गई हैं। लेकिन कल इंडियन एक्सप्रेस ने मुझसे बातचीत के आधार पर जो खबर छापी है, उसमें उन्होंने कई ऐसी बातें दे दी हैं, जो मैंने कही ही नहीं। मसलन उन्होंने लिखा है कि मैं इसके खिलाफ पीआईएल करने जा रही हूं। जबकि ऐसा नहीं है।

इंदिरा साहनी

फा.प्रे. : प्रथम दृष्टया आपको गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण में कहां-कहां कमियां और त्रुटियां दिख रही हैं?

इं. सा. :सवर्ण आरक्षण को लेकर संसद में पेश 124वां संविधान संशोधन विधेयक आर्टिकल 14, 15 व 16 का उल्लंघन करता है। यानि संविधान की मूल भावना में ही आर्थिक आधार पर सवर्ण आरक्षण फिट नहीं बैठता है।

फा.प्रे. : इसके अलावा और कौन-कौन सी बातें व तथ्य हैं जिनसे आपको लगता है कि सवर्ण आरक्षण का मामला कोर्ट में नहीं टिक पाएगा?

इं. सा. : सवर्ण आरक्षण मामले की दूसरी बड़ी खामी यह है कि इस बारे में फैसला लेने से पहले कोई ग्राउंड वर्क नहीं किया गया। आश्चर्य है कि आप जिस आधार पर आरक्षण देने का फैसला कर रहे हैं, उसका आपके पास डाटा ही नहीं है।  लेकिन, उसी आधार पर क्रियान्वयन का फैसला ले लेते हैं। इसे आप क्या कहेंगे? इतना ही नहीं, आरक्षण का लाभ लेने वाले अभ्यर्थी के परिवार की सालाना आय आठ लाख रुपए से ज्यादा नहीं होने की बात की गई है और साथ ही यह भी जोड़ दिया गया है कि राज्य सरकारें अपने-अपने यहां आर्थिक आधार पर आरक्षण के लिए आय सीमा क्या हो यह वहां की परिस्थितियों को देखते हुए तय कर सकती है। कोर्ट इस पर भी गौर करेगा।

फा.प्रे. : कृपया एक वाक्य में बताएं कि सवर्णों के आरक्षण का क्या हश्र होने वाला है?

इं. सा. : देखिए, इस पर टिप्पणी करना उचित नहीं है, क्योंकि इस मामले पर अब कोर्ट को निर्णय लेना है। उसके अधिकार क्षेत्र में जाकर कुछ भी कहना गलत है। हां, तथ्यात्मक कमियों पर हम सब जरूर चर्चा कर सकते हैं और उस आधार पर हर व्यक्ति अनुमान लगा सकता है कि क्या हश्र होने वाला है।

फा.प्रे. : आपकी नजर में सरकार के इस फैसले का क्या दूरगामी प्रभाव हो सकता है?

इं. सा. : यह तो आप भी तय कर सकते हैं क्योंकि सरकार के इस फैसले से जनरल कैटेगरी की सीमा अब 40 फीसदी रह गई है। यानी जनरल कैटेगरी में मारामारी इसके क्रियान्वयन से और बढ़ेगी।

फा.प्रे. : तो फिर इसका क्या तोड़ निकाला जा सकता है?

इं. सा. : देखिए आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से बढ़ाकर 60 फीसदी की जो परंपरा शुरू की गई है, उसका परिणाम काफी खतरनाक हो सकता है। यह संविधान सम्मत नहीं है। इसलिए सरकार को हर पहलु को ध्यान में रखकर इस तरह के सेंसिटिव मामलों पर फैसला लेना चाहिए।  मेरा व्यक्तिगत मानना है कि  रिजर्व कैटेगरी के तहत आने वाले मेरिटोरियस बच्चों को भी जनरल कैटेगरी में नहीं माना जाए। रिजर्व कैटगरी के जितने उम्मीदवार जनरल के बराबर या उससे अधिक अंक लाएं, उतनी संख्या रिजर्व कैटेगरी से कम कर देनी चाहिए। साथ ही आरक्षण के  प्रतिशत और कम करना चाहिए।

नागराज जजमेंट के संबंध में भी जो-जो बातें इंडियन एक्सप्रेस में मेरे हवाले से छापी  गई हैं, वो सही नहीं है। 50 फीसदी आरक्षण सीमित करने की बात ही यहां नागराज जजमेंट के हवाले से पब्लिश करनी चाहिए। मैंने उन्हें बताया है, उन्होंने सुधार करने का वादा किया है। बहरहाल, एक बार फिर से दोहरा दूं जिससे क्लियर हो जाए कि इन रिजर्व कैटेगरी के मैरिटोरियस बच्चों को जब उनके कोटे के तहत रखा जाएगा तभी जनरल कैटेगरी का प्रतिशत बढ़ना शुरू होगा। यह कटु सत्य है और इस पर सरकार को विचार करना चाहिए।

(कापी संपादन : एफपी डेस्क)


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लेखक के बारे में

कुमार समीर

कुमार समीर वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने राष्ट्रीय सहारा समेत विभिन्न समाचार पत्रों में काम किया है तथा हिंदी दैनिक 'नेशनल दुनिया' के दिल्ली संस्करण के स्थानीय संपादक रहे हैं

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