महान वीरांगना ऊदा देवी पासी : भारतीयों से अधिक अंग्रेजों ने दिया सम्मान

ऊदा देवी के बारे में भारतीय इतिहासकारों ने बहुत कम, अंग्रेज अधिकारियों और पत्रकारों ने ज्यादा लिखा। लंदन के अखबारों में खबरें और रिपोर्ट आदि प्रकाशित हुए। यहां तक कि कार्ल मार्क्स ने भी उनकी वीरता के बारे में चर्चा की

आजादी की लड़ाई में समाज के सभी वर्गों और जातियों के लोग थे। इसके बावजूद इतिहास में उन्हीं लोगों के नाम दर्ज किया गया, जो समाज के अगड़े वर्ग से आते थे। उदाहरण के तौर पर हम आजाद हिन्द फौज को देख सकते हैं, जिसमें हजारों स्वतंत्रता सेनानी मारे गये। परंतु तीन-चार बड़े नामों के अलावा शेष के बारे में कोई नहीं जानता। इससे पहले जब 1857 का संघर्ष हुआ तब भी यही हुआ था। लोगों को मंगल पांडे के बारे में बताया जाता है। पक्षपातपूर्ण तरीके से लिखे गए इतिहास में प्रमाणों के बावजूद यह नहीं बताया गया कि भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 में मंगल पांडे ने नहीं, 1771 में तिलका मांझी ने शुरु किया था। बाद में 1855 में सिदो-कान्हू ने संताल विद्रोह को आगे बढ़ाया। यह हूल विद्रोह था।

इसी कड़ी में हम 1857 के स्वतंत्रता आन्दोलन की नायिका ऊदा देवी पासी को देख सकते हैं। उन्होंने 32 ब्रिटिश सैनिकों को मार गिराया और अंतत: वीरगति को प्राप्त हुई। उनकी वीरता का ब्रिटिश अधिकारियों पर इतना जबरदस्त असर रहा कि ऊदा देवी की वीरता के बारे भारतीय इतिहासकारों से अधिक ब्रिटिश पत्रकारों और अधिकारियों ने लिखा है।

लखनऊ के सिकंदर बाग में ऊदा देवी पासी की प्रतिमा

कहना ना होगा कि उन्हें वह यश और सम्मान नहीं मिला जिसकी वह हकदार थीं। शायद इसलिए कि वह किसी राजघराने या सामंती परिवार में नहीं, बल्कि एक गरीब दलित परिवार में पैदा हुई थीं और एक मामूली सैनिक थीं।

उत्तर प्रदेश के लखनऊ के पास उजिरियांव गांव की ऊदा देवी एक दलित वर्ग की पासी जाति में पैदा हुई थीं। बचपन से वह जुझारू स्वभाव की थीं। उनके पति मक्का पासी अवध के नवाब वाजिद अली शाह की पलटन में एक सैनिक थे। देशी रियासतों पर अंग्रेजों के बढ़ते हस्तक्षेप के मद्देनज़र जब वाजिद अली शाह ने महल की रक्षा के उद्देश्य से स्त्रियों का एक सुरक्षा दस्ता बनाया तो उसके एक सदस्य के रूप में ऊदा देवी को भी नियुक्त किया। अपनी बहादुरी और तुरंत निर्णय लेने की उनकी क्षमता से नवाब की बेगम और देश के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की नायिकाओं में एक बेगम हजरत महल बहुत प्रभावित हुईं। नियुक्ति के कुछ ही दिनों बाद में ऊदा देवी को बेगम हज़रत महल की महिला सेना की टुकड़ी का कमांडर बना दिया गया।

महान वीरांगना ऊदा देवी पासी की तस्वीर

महिला दस्ते के कमांडर के रूप में ऊदा देवी ने देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जिस अदम्य साहस, दूरदर्शिता और शौर्य का परिचय दिया था, उससे खुद अंग्रेज सेना भी चकित रह गई थी। ऊदा देवी की वीरता पर उस दौर में कई लोकगीत गाए जाते थे। इनमें एक गीत था –

“कोई उनको हब्शी कहता, कोई कहता नीच अछूत,

अबला कोई उन्हें बतलाए, कोई कहे उन्हें मजबूत।”

जब 10 मई 1857 को मेरठ के सिपाहियों द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध छेड़ा गया संघर्ष तेजी से पूरे उत्तर भारत में फैलने लगा था तब लखनऊ के क़स्बा चिनहट के निकट इस्माईलगंज में हेनरी लारेंस के नेतृत्व में ईस्ट इंडिया कम्पनी की फौज की मौलवी अहमदउल्लाह शाह की अगुवाई में संगठित विद्रोही सेना से ऐतिहासिक लड़ाई हुई। चिनहट की इस ऐतिहासिक लड़ाई में विद्रोही सेना की विजय तथा हेनरी लारेंस की फौज का मैदान छोड़कर भाग खड़ा होना प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी। देश को गौरवान्वित करने वाली और स्वाधीनता सेनानियों का मनोबल बढ़ाने वाली इस लड़ाई में सैकड़ों दूसरे सैनिकों के साथ मक्का पासी की भी शहादत हुई थी। ऊदा देवी ने अपने पति की लाश पर उनकी शहादत का बदला लेने की कसम खाई थी। मक्का पासी के बलिदान का प्रतिशोध लेने का वह अवसर ऊदा देवी को मिला चिनहट के महासंग्राम की अगली कड़ी सिकंदर बाग़ की लड़ाई में।

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अंग्रेजों की सेना चिनहट की पराजय का बदला लेने की तैयारी कर रही थी। उन्हें पता चला कि लगभग दो हजार विद्रोही सैनिकों ने लखनऊ के सिकंदर बाग में शरण ले रखी है। 16 नवंबर 1857 को कोलिन कैम्पबेल के नेतृत्व में अंग्रेज सैनिकों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत सिकंदर बाग़ की उस समय घेराबंदी की, जब विद्रोही सैनिक या तो सो रहे थे या बिल्कुल ही असावधान थे। ऊदा के नेतृत्व में वाजिद शाह की स्त्री सेना की टुकड़ी भी हमले के वक्त इसी बाग में थी। असावधान सैनिकों की बेरहमी से हत्या करते हुए अंग्रेज सैनिक तेजी से आगे बढ़ रहे थे। हजारों विद्रोही सैनिक मारे जा चुके थे। पराजय सामने नजर आ रही थी। मैदान के एक हिस्से में महिला टुकड़ी के साथ मौजूद ऊदा देवी ने पराजय निकट देखकर पुरुषों के कपडे पहन लिए। हाथों में बंदूक और कंधों पर भरपूर गोला-बारूद लेकर वह पीपल के एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गयी।

ब्रिटिश सैनिकों को मैदान के उस हिस्से में आता देख ऊदा देवी ने उनपर फायरिंग शुरू कर दी। पेड़ की डालियों और पत्तों के पीछे छिपकर उसने हमलावर ब्रिटिश सैनिकों को सिकंदर बाग़ के उस हिस्से में तब तक प्रवेश नहीं करने दिया था जबतक उनका गोला-बारूद खत्म नहीं हो गया। ऊदा देवी ने अकेले ब्रिटिश सेना के दो बड़े अफसरों कूपर और लैम्सडन सहित 32 अंग्रेज़ सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। गोलियां खत्म होने के बाद ब्रिटिश सैनिकों ने पेड़ को घेरकर उनपर अंधाधुंध फायरिंग की। कोई उपाय न देख जब वह पेड़ से नीचे उतरने लगी तो उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया गया।

लाल रंग की कसी हुई जैकेट और पैंट पहने ऊदा देवी की लाश जब पेड़ से ज़मीन पर गिरी तो उसका जैकेट खुल गया। कैम्पबेल यह देखकर हैरान रह गया कि वीरगति प्राप्त वह बहादुर सैनिक कोई पुरुष नहीं, एक महिला थी। कहा जाता है कि ऊदा देवी की स्तब्ध कर देने वाली वीरता से अभिभूत होकर कैम्पबेल ने हैट उतारकर उन्हें सलामी और श्रद्धांजलि दी थी।

ऊदा देवी के शौर्य, साहस और शहादत पर भारतीय इतिहासकारों ने बहुत कम, अंग्रेज अधिकारियों और पत्रकारों ने ज्यादा लिखा। ब्रिटिश सार्जेण्ट फ़ॉर्ब्स मिशेल ने अपने एक संस्मरण में बिना नाम लिए सिकंदर बाग में पीपल के एक बड़े पेड़ के ऊपर बैठी एक ऐसी स्त्री का उल्लेख किया है जो अंग्रेजी सेना के बत्तीस से ज्यादा सिपाहियों और अफसरों को मार गिराने के बाद शहीद हुई थी। लंदन टाइम्स के तत्कालीन संवाददाता विलियम हावर्ड रसेल ने लड़ाई का जो डिस्पैच लंदन भेजा उसमें उसने पुरुष वेश में एक स्त्री द्वारा पीपल के पेड़ से फायरिंग कर अंग्रेजी सेना को भारी क्षति पहुंचाने का उल्लेख प्रमुखता से किया गया था। लंदन के कई दूसरे अखबारों ने भी ऊदा की वीरता पर लेख प्रकाशित किए थे। संभवतः लंदन टाइम्स में छपी खबरों के आधार पर ही कार्ल मार्क्स ने भी अपनी टिप्पणी में इस घटना को समुचित स्थान दिया।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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