जयपुर : बहुजन के नाम पर आरएसएस का साहित्योत्सव?

अब सोचना पड़ेगा कि क्या बहुजन साहित्य उत्सव उसे कहा जा सकता है जो सिर्फ दलित और पिछड़ी जाति के कुछ लोगों को एकत्रित करके मनाया गया हो या इसकी अपनी वैचारिकी धारा है?

पिंक सिटी जयपुर में 15 से 17 फरवरी तक हुए दूसरे ‘बहुजन साहित्य उत्सव’ ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जो बहुजन साहित्य के भविष्य के लिए खतरा हो सकते हैं। हमें सोचना पड़ेगा कि क्या बहुजन साहित्य उत्सव उसे कहा जा सकता है जो सिर्फ दलित और पिछड़ी जाति के कुछ लोगों को एकत्रित करके मनाया गया हो या इसकी अपनी वैचारिकी धारा है?

इस उत्सव के मुख्य संरक्षकों में एक नाम डाॅ. संजय पासवान का है। उनका नाता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से है।  वे वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। ऐसे व्यक्ति के संरक्षण में होने वाले उत्सव के उद्देश्य में संघ की दख़ल ना हो यह संभव नहीं है। संघ अपनी रणनीति में इतना परिवर्तन कर चुका है कि वह अप्रत्यक्ष रूप से बहुजनों के आंदोलनों और साहित्य को पोषित करके उनकी दिशा को भटकाना चाहता है।

संघ के साये में दलित राजनीति : पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजय पासवान लंबे समय से आरएसएस से जुड़े रहे हैं

हालांकि विदेश में होने के कारण संजय पासवान कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए, लेकिन पिछले वर्ष से ही इस आयोजन का ढांचा तैयार करने में उनकी भागीदारी रही है।

बहरहाल यह तो जानी हुई बात है कि संघ बहुजन राजनेताओं, लेखकों, पत्रकारों और संस्कृतिकर्मियों का इस्तेमाल करता रहा है। वह बहुजनों के खेमे में संघी विचार का वाहक किसी बहुजन को ही बनाएगा।

बहुजन साहित्य की स्पष्ट अवधारणा है कि “यह अभिजनों के साहित्य के विपरीत बहु-जनों का साहित्य है” (देखें, ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, संपादक, प्रमोद रंजन, द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन, 2016)। ऐसे में भारतीय अभिजनों (द्विजों) के हितों का पोषण करने वाले आरएसएस जैसे संगठन के ध्वजवाहकों की साहित्यिक पताकाएं लहराने वाले इस आयोजन को दरअसल किसी भी प्रकार से बहुजन साहित्य का आयोजन नहीं कहा जा सकता।

यदि जयपुर में हुए इस कथित बहुजन साहित्य महोत्सव के चरित्र को गहराई से देखें तो उसमें संघ के कुछ मूलभूत विचारों का प्रभाव दिखे। जैसे इसके सभी 9 सत्रों में एक सत्र महिलाओं से संबंधित था और वक्ताओं के तौर पर उनकी भागीदारी रस्मीभर रही। इसकी वजह यह कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था के मूल में ही महिलाओं को ज्ञान वंचित रखा जाना है। जबकि बहुजन साहित्य की अवधारणा में ही लैंगिक समानता है। सावित्रीबाई फुले के जीवन और विचारों से रौशन बहुजन साहित्य में महिलाओं के लिए कोई स्थान न हो यह तभी संभव है जब वहाँ ब्राह्मणवादी विचारों ने सेंध मार दी हो।

बहुजन विमर्श को विस्तार देतीं फारवर्ड प्रेस की पुस्तकें

दरअसल, पिछले वर्षों में भारत में बहुजन साहित्य ने तेजी से विस्तार पाया है और अपनी सघन वैचारिकी और तेवर से ब्राह्मणवादी इतिहास, साहित्य और कला के समक्ष एक चुनौती खड़ी की है। संघ इस चुनौती को पहचानता है, जिसका कई बार अपने मुखपत्र तक में उसने वर्णन किया है। ऐसे में यह बहुत आसान है कि संघ ऐेसे महोत्सव में अपने विचार के बहुजन समाज के लोगों के माध्यम से घुसपैठ करे।

जयपुर बहुजन साहित्य उत्सव में लोगों की कम रही उपस्थिति

अब इस महोत्सव के दूसरे संरक्षक से परिचित हो जाइये, वे हैं अरविंद नेताम। सन् 2012 में इनके कांग्रेस से निलंबन के बाद ये भी भाजपा में रह चुके हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अरविंद नेताम का भी संघ की विचारधारा से सीधा रिश्ता है और जब वे इस महोत्सव को वैचारिक दिशा देंगे तो संघ की ब्राह्मणवादी विचारधारा के विरोध में तो कभी नहीं देेंगे। यानी इनके माध्यम से भी संघ बहुजनों के वैचारिक तेवर को कमजोर करने का कार्य किया है। इसी तरह से एक तीसरे संरक्षक के.सी. घुमरिया आयकर आयुक्त हैं। वे अफसरों और प्रोफेसरों की उस फ़ौज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो साहित्य प्रेम के नाम पर अपने सामाजिक-राजनीतिक जीवन का विस्तार करना चाहते हैं।

बहरहाल, बहुजन साहित्य उत्सव मनाने के लिए किसी बहुजन रचनाकार के संरक्षण की जरूरत क्यों महसूस नहीं हुई? जबकि देश में आज बहुजन रचनाकारों की एक ऐसी पीढ़ी है जिससे ब्राह्मणवादी रचनाकार भी अपनी रचनाओं पर टिप्पणियाँ लिखवाने के लिए लाइन लगाए रखते हैं। जाहिर तौर पर इसकी वजह यह कि इनसे संरक्षण और दिशा लेने से ख़तरा यह है कि ये संघ के एजेंडे को पूरा नहीं होने देते। संघ का एक एजेंडा तो यहीं पर पूरा हो जाता है कि बहुजन साहित्य के नाम पर उत्सव होगा और उसमें संरक्षण रहेगा राजनेताओं और अधिकारियों का जबकि बहुजन साहित्य कभी राजसत्ता के संरक्षण में नहीं पनपा। वह तो हमेशा राजसत्ता के प्रतिरोध में अपना विकास करता रहा है, कबीर से लेकर कांचा आयलैया तक का उदाहरण हमारे सामने हैं।

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संघ ने बहुजन लेखकों को चुनौती दे दी है कि वह उनके खेमे में आकर उनकी उपेक्षा करवाने की शक्ति रखता है। जबकि इस साहित्य महोत्सव में आने वाले युवा, रचनाकार और अन्य प्रतिभागी बहुजन साहित्य के प्रति रूचि और प्रतिबद्धता के लिए आते हैं। उनके साथ भी यह एक तरह का छल है कि वे जिस मंच पर ब्राह्मणवाद की आलोचना करेंगे उसके पहिए वास्तव में ब्राह्मणवाद के रथ पर टिके हुए हैं।

इस बार श्रोताओं की संख्या सौ के करीब थी और यह भी एक स्थापना को पुष्ट करने वाला तथ्य है। उसी जयपुर शहर में होने वाले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में हजारों की संख्या में आने वाले युवाओं की भीड़ की संख्या बहुजन साहित्य के पाठकों को हतोत्साहित करती है। ब्राह्मणवादी रचनाकर आसानी से कहते हैं कि आपके महोत्सव में तो गिनती के लोग होते हैं जबकि आज देश में सबसे अधिक पाठक बहुजन साहित्य के हैं। कारवां के उत्साह और उमंग को कमजोर करना भी प्रतिद्वंदी का एक हथियार होता है।

इस उत्सव के मुख्य संयोजक हैं अभियंता राजकुमार मलहोत्रा जो ‘प्रभात पोस्ट’ नामक एक अखबार निकालते हैं। यह अखबार ही पूरे महोत्सव का आयोजक होता है। वे स्वयं कभी अपने इस आयोजन को छोड़कर बहुजन साहित्य के किसी विमर्श और आंदोलन में भागीदार होते नहीं देखे जाते हैं।

बहरहाल, संघ के इन कंधों पर सवार होकर बहुजन साहित्य सिर्फ वर्णवादी व्यवस्था का पोषण कर सकता है। दुखद तो यह है कि बहुजन लेखकों और पाठकों को यह सत्य दिखाई क्यों नहीं देता, संजय पासवान का नाम तो उनकी वेबसाइट से लेकर उनके पर्चों तक में मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा हुआ है। संरक्षक तो जानते हैं कि वे किस के लिए काम कर रहे हैं, बाकी लोगों को सोचने की जरूरत है।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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