द्विज और उच्च पिछड़े समझें एससी/एसटी एक्ट का महत्व : पी.एस. कृष्णन

सामाजिक दृष्टि से अगड़ी जातियों और उच्च पिछड़ों के द्वारा अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम का विरोध करने के नकारात्मक परिणाम होंगे और ऐसा वातावरण निर्मित होगा जो समाज के एकीकरण, राष्ट्रीय एकता और देश की प्रगति व आर्थिक विकास के लिए घातक होगा

आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 13

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उसमें पी.एस. कृष्णन भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते उदाहरण हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमनियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय, तमिलनाडु की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुतः आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। फारवर्ड प्रेस की इस किताब का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करने की योजना है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। आज पढ़ें कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा के लिए कानून किन परिस्थितियों में बनाया गया और इसमें बाद में उनके हित में संशोधन कैसे सुनिश्चित हो सके। साथ ही इन सबमें पी.एस. कृष्णन की भूमिका क्या थी –संपादक)


एससी/एसटी एक्ट : अब तक का इतिहास

  • वासंती देवी

(गतांक से आगे)

वासंती देवी : हाल ही में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन विधेयक, 2015 का पारित होना आपकी एक बड़ी जीत थी। क्या आप यह बताएंगे कि इस संशोधन की आवश्यकता क्यों पड़ी और यह पुराने अधिनियम को किस प्रकार मजबूती देता है? क्या आप हमें यह भी बता सकते हैं कि आपने इस संशोधन विधेयक को पारित करवाने के लिए किस तरह के प्रयास किए और किन-किन लोगों से मिलकर उन्हें इसके लिए राजी किया? इससे यह पता चल सकेगा कि सामाजिक न्याय संबंधी कानूनों को पारित करवाने में आपकी किस तरह की भूमिका रही है।

पी.एस. कृष्णन : अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन विधेयक, 2015 का पारित होना, दलितों/अनुसूचित जातियों व आदिवासियों/अनुसूचित जनजातियों के जीवन के अधिकार की रक्षा हेतु कानून बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और नवीनतम कदम है। जीने के अधिकार में सुरक्षा और गरिमा के साथ जीने का अधिकार सम्मिलित है। इस अधिनियम को 31 दिसंबर 2015 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और यह 26 जनवरी 2016 से लागू हुआ। यह अधिनियम मूल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1998 (जो कि अनुसूचित जातियों व जनजातियों को कानूनी सुरक्षा कवच प्रदान किए जाने की दिशा में एक मील का पत्थर था) में महत्वपूर्ण संशोधन कर उसे और मजबूत बनाता है। इस संशोधन अधिनियम से ऐसी कुछ भयावह विकृतियों को दूर करने में मदद मिलेगी, जो हमारे समाज में घर कर गई हैं। इस संशोधन और हमारे देश के दो सबसे कमजोर सामाजिक वर्गों की बेहतरी के लिए इन दोनों अधिनियमों के महत्व को समझने के लिए उस सामाजिक पृष्ठभूमि और संदर्भ को समझना जरूरी है, जिनके चलते इन दोनों कानूनों का निर्माण आवश्यक हो गया था। इसके लिए हमें अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों पर होने वाले अत्याचारों के कारणों और हमारे समाज में व्याप्त अछूत प्रथा की इसमें भूमिका को समझना होगा।

भारतीय जाति व्यवस्था को (विशेषकर दलितों और आदिवासियों के मामले में) बनाए रखने के लिए इन वर्गों पर अत्याचार और अछूत-प्रथा को हथियार के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा है। जैसा कि मैंने प्रश्न क्रमांक आठ के उत्तर में बताया था कि पिछली कई सदियों से लेकर आज तक, भारतीय जाति व्यवस्था के मुख्य उद्देश्य और प्रभाव निम्न रहे हैं :

  • मजदूरों को मजदूर बनाकर रखना और खेतिहर श्रमिकों को यही काम करते रहने के लिए मजबूर करना।
  • दलितों को दबाकर रखना और उनकी मुक्ति की कोई राह उन्हें उपलब्ध न होने देना।
  • आदिवासियों को दूरदराज के क्षेत्रों में सीमित रखना सिवाय तब के, जब उनके श्रम की आवश्यकता हो।
  • दलितों और आदिवासियों को अलग-थलग रखना, उनके मनोबल को तोड़ना और उन्हें उनके आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक विकास और आगे बढ़ने के अवसरों से या तो पूर्णतः वंचित रखना या उन्हें ऐसा करने के न्यूनतम अवसर देना।

एससी, जिन्हें खेतिहर गुलाम बनाकर रखा गया, अतीत में और आज भी, खेतों में काम करने वालों का एक बड़ा प्रतिशत हैं। इसके अलावा, वे साफ-सफाई, मृत पशुओं को ठिकाने लगाने और अंतिम संस्कार इत्यादि से जुड़े काम भी करते रहे हैं। भारतीय जाति व्यवस्था ने उन्हें वंचित रखा, उनका मनोबल तोड़ा, उन्हें अपमानित किया और उनका शोषण किया। अछूत जातियों (जिन्हें अब एससी कहा जाता है) को बंधुआ और गुलाम बने रहने पर मजबूर किया गया और उन्हें सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से अलग-थलग रखा गया, ताकि वे कभी अपने हालात से ऊपर उठने या अपने पर थोप दी गई गुलामी से मुक्ति की बात सोच भी न सकें। जाति व्यवस्था के अतिरिक्त, अछूत प्रथा का इस्तेमाल भी इसके लिए किया गया। अछूत प्रथा आज भी जिंदा है और दलितों पर अत्याचार करने का बहाना बनी हुई है। भारतीय जाति व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अत्याचारों का एक हथियार के रूप में इस्तेमाल, आधुनिक काल में तेजी से बढ़ा, जब दलित जाति व्यवस्था को खारिज करने लगे और अपने हीन या दास होने की मानसिकता से मुक्त होने लगे। इससे उन्हें अनुशासित और पददलित रखने में अछूत प्रथा की प्रभावोत्पादकता कम होने लगी।

सामाजिक न्याय के लिए संघर्षरत योद्धा पी.एस. कृष्णन

सन् 1920 में गर्वमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1919 के क्रियान्वयन की समीक्षा करने के लिए एक समिति ने पूरे देश का दौरा किया। इस समिति ने पाया कि उस दौरान भी अछूतों पर अत्याचार किए जा रहे थे; परंतु उनकी इसलिए कोई चर्चा नहीं होती थी और न ही दोषियों को सजा मिल पाती थी, क्योंकि गवाही देने के लिए कोई आगे ही नहीं आता था। यह दिलचस्प है कि उच्च जातियों के आतंक और अपनी कमजोर स्थिति के चलते, गवाहों के सामने न आने की समस्या आज भी बनी हुई है। यह मार्च 2000 में कर्नाटक में हुए कमलबलापल्ली कांड से स्पष्ट है। इस प्रकरण में मुख्य गवाह, जो पक्षद्रोही बन गया था, ने बाद में कहा कि अगर उसे सुरक्षा प्रदान की जाती तो वह हत्याकांड के बारे में सच बोलता; -यह तब, जब कि उसके परिवार के सदस्य भी इस हत्याकांड में मारे गए थे। बतौर बंबई विधानमंडल के सदस्य डाॅ. आंबेडकर ने बहिष्कृत हितकारिणी सभा की ओर से इंडियन स्टेच्युटरी कमीशन (साइमन कमीशन) के समक्ष 29 मई 1928 को प्रस्तुत अपने वक्तव्य के परिशिष्ट ‘अ’ में दलितों पर अत्याचार के कुछ मामलों की चर्चा की थी। उन्होंने लिखा कि किस प्रकार कोलाबा जिले के महाड़ में सार्वजनिक चावदार तालाब से पानी लेने के अपने अधिकार को जताने के कारण उन पर सामूहिक हमले किए गए और इंदौर जिले में बलाइयों के विरुद्ध सामूहिक हिंसा हुई और उनके घर जला दिए गए। यहां यह याद दिलाना प्रासंगिक होगा कि कांग्रेस ने साइमन कमीशन का बहिष्कार किया था। कांग्रेस के इस निर्णय से असहमत डाॅ. आंबेडकर, आयोग के समक्ष प्रस्तुत हुए और अपने सबूत पेश किए। इससे दलितों पर होने वाले अत्याचारों का भयावह सच, सरकारी अभिलेखों में आ सका और इसी के कारण डाॅ. आंबेडकर कांग्रेस व गांधी जी के विरोध के बाद भी सन् 1935 में हुए संवैधानिक सुधारों में अंग्रेज सरकार से एससी के लिए विशेष रियायतें हासिल कर सके। डाॅ. आंबेडकर की रणनीति के महत्व और उनके असली उद्देश्य को समझे बिना, छद्म राष्ट्रवादी, साइमन कमीशन के समक्ष प्रस्तुत होने और वायसराय की कार्यकारी परिषद की सदस्यता स्वीकार करने के लिए डाॅ. आंबेडकर की आलोचना करते हैं। ऐसे लोगों, जिनके राष्ट्रवाद में सभी लोगों की समानता और गरिमा सुनिश्चित करना (विशेषकर उनकी, जो इनसे सदियों से वंचित रहे हैं) शामिल नहीं हैं; उनका राष्ट्रवाद कभी सच्चा राष्ट्रवाद नहीं हो सकता। न केवल दलितों वरन् सभी देशभक्त भारतीयों को डाॅ. आंबेडकर के इन दोनों कदमों के लिए उनका आभारी होना चाहिए।


स्वाधीनता के बाद देश में एससी पर सामूहिक अत्याचार की शुरुआती घटनाओं में एक सन् 1957 के रामनाथपुरम् दंगे थे। इनकी शुरुआत एक युवा शिक्षित दलित नेता इमेन्युअल शेखर की हत्या से हुई। उनकी जान इसलिए ले ली गई, क्योंकि उन्हाेंने अछूत प्रथा द्वारा दलितों पर थोपे गए असहनीय व दमनकारी प्रतिबंधों को तोड़ने की हिम्मत दिखाई। परंतु, यह घटना राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित नहीं हुई। अनुसूचित जातियों पर होने वाले अत्याचारों की ओर राष्ट्रीय नेतृत्व और संसद का ध्यान सबसे पहले किजावेनमनी हत्याकांड (जो सन् 1968 में क्रिसमस की पूर्व संध्या पर हुआ था) में 44 दलितों (जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे) को जिंदा जला दिए जाने की घटना के बाद हुआ। इसके पश्चात, आंध्र प्रदेश के कंचिकाचेरला में श्री कोटेशु को पीट-पीटकर मार डाला गया और राज्य के दो वरिष्ठतम मंत्रियों में से एक- श्री पेड्डीरेड्डी थिम्मा रेड्डी ने इसे औचित्यपूर्ण ठहराया। इसके बाद भारत के विभिन्न हिस्सों में दलितों पर अत्याचार की अनेक घटनाएं हुईं। दलित सांसदों के दबाव में भारत सरकार ने एससी के मामले में 1974 से और एसटी के मामले में 1981 से, अत्याचार की घटनाओं की निगरानी शुरू कर दी। सरकार विशेषकर ऐसे प्रकरणों पर नजर रखने लगी; जिनमें हत्या, बलात्कार, आगजनी या गंभीर चोट पहुंचाने के अपराध शामिल थे।

अंग्रेजी किताब क्रूसेड फॉर सोशल जस्टिस की तस्वीर (जिसका हिंदी अनुवाद फॉरवर्ड प्रेस से शीघ्र प्रकाश्य)

सन् 1977 के बाद से अनुसूचित जातियों पर अत्याचारों की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई। इसके पीछे जो कारण थे, उनका वर्णन में अन्यत्र कर चुका हूं। इसके बाद ही मैंने भारत सरकार के गृह मंत्रालय में एससी व बीसी विकास और कल्याण के प्रभारी संयुक्त सचिव के रूप में पदस्थ होने की इच्छा व्यक्त की और मुझे इस पद पर नियुक्त कर दिया गया। इस पद पर रहते हुए एससी-एसटी के विरुद्ध होने वाले अत्याचारों पर निगरानी रखना भी मेरे कर्तव्यों में शामिल था। मैंने इस काम को केवल आंकड़े इकट्ठा करने और उन्हें ऊपर भेजने तक सीमित नहीं रखा। मैंने गंभीर प्रकरणों में आगे की कार्यवाही पर नजर रखनी भी शुरू कर दी। इनमें शामिल थे बिहार के बेलछी (पटना, 1977), महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में मराठवाड़ा विश्वविद्यालय को डाॅ. आंबेडकर का नाम दिए जाने की मांग करने वाले आंदोलन के दौरान एससी व विशेषकर शिक्षित एससी पर हुए हमले, कर्नाटक के चिक्काबसवसवन्नाहल्ली में एससी बंधुआ मजदूरों से जुड़ी घटना और आंध्र प्रदेश के आदिवासी इलाके में इंदिरावली का प्रकरण। मैंने यह कोशिश की कि राज्य सरकारें इन प्रकरणों के आरोपियों पर मुकदमा चलाने के लिए विशेष न्यायालय और विशेष न्यायाधीश नियुक्त करें। मामलों की सुनवाई जल्द-से-जल्द हो और अदालतों के फैसले बिना किसी देरी के लागू किए जाएं। इसके कारण बड़ी संख्या में अदालतों ने अलग-अलग प्रकरणों में आरोपियों को दोषी पाकर उन्हें सजाएं दीं। इनमें बेलछी कांड में दी गई मृत्युदंड की सज़ा शामिल है।

परंतु, अत्याचार की घटनाओं की भयावहता और उनकी संख्या बढ़ती ही गई; क्योंकि राष्ट्रीय और राज्य स्तरों पर सरकारों ने मूल कमजोरियों और कारकों पर ध्यान देने की बजाय केवल सतही कार्यवाहियां कीं। उन्होंने लक्षणों का उपचार किया और बीमारी के इलाज के लिए जो क्रांतिकारी कदम उठाए जाने चाहिए थे, वे नहीं उठाए।

इसी पृष्ठभूमि में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 लागू किया गया। इस कानून के निर्माण में मेरी महत्वपूर्ण भूमिका थी। उस समय मैं एससी के लिए विशेष आयुक्त था। यह पद राष्ट्रीय अनुसूचित जाति व जनजाति आयोग के गठन के पूर्व तक, संवैधानिक प्रावधानों को पूरा करने के लिए सृजित किया गया था। मैं इस पद पर 2.10.1987 से 1.1.1990 तक रहा। मेरा पद भारत सरकार के सचिव के समकक्ष था, जो राज्य सरकारों के मुख्य सचिव के बराबर होता है।

   जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, यह अधिनियम दलित-संबंधी कानूनों में एक मील का पत्थर था। इस अधिनियम से एससी और एसटी को उनके खिलाफ होने वाली हिंसा और अपराधों के मामलों में कानूनी मशीनरी की मदद प्राप्त करने का औपचारिक अधिकार मिला। निःसंदेह, यह अधिकार संविधान ने सभी नागरिकों को प्रदान किया है। संविधान का अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद 46 (अनुसूचित जाति/जनजातियों के शैक्षिक एवं आर्थिक हितों के उन्नयन को बढ़ावा देना) इसी संबंध में हैं; परंतु इन संवैधानिक अधिकारों को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए विस्तृत प्रावधानों वाले एक विशिष्ट कानून की आवश्यकता थी और है। इस आवश्यकता को अत्याचार निवारण अधिनियम ने पूरा किया। परंतु, जिन परिस्थितियों में यह अधिनियम लागू किया गया; उनके चलते कुछ ऐसे प्रावधान, जिन्हें मैं जरूरी समझता था और जिन पर मैंने जोर भी दिया था, मूल अधिनियम में स्थान नहीं पा सके। उदाहरणार्थ, मैंने इस बात पर जोर दिया था कि अधिनियम में यह प्रावधान होना चाहिए कि देश के हर जिले में केवल इस अधिनियम के अंतर्गत दर्ज मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालय होना चाहिए। अधिनियम में केवल यह कहा गया है कि हर जिले में एक सत्र न्यायालय को इस अधिनियम के तहत विशेष न्यायालय का दर्जा दिया जाएगा। जिन न्यायालयों को यह दर्जा दिया गया है, वे अन्य प्रकरण भी सुनते हैं; जिसके कारण अधिनियम के अंतर्गत दर्ज प्रकरणों की त्वरित सुनवाई नहीं हो पाती। एक अन्य बड़ी कमी यह भी है कि इसमें हत्याओं, सामूहिक हत्याओं, बलात्कारों, सामाजिक बहिष्कार व आर्थिक बहिष्कार को अत्याचार नहीं माना गया है; जबकि मैं चाहता था कि ऐसा हो।

यह भी पढ़ें : जाति के विनाश के लिए मेरे प्रयास : पी.एस. कृष्णन

अत्याचार निवारण अधिनियम, 1990 के पारित होने के बाद मैंने हर उपलब्ध अवसर पर इन कमियों को दूर करवाने के प्रयास किए। इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था दलित घोषणा-पत्र, जिसमें अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के अधिकारों और पात्रताओं का विस्तृत विवरण है। इस घोषणा-पत्र को मैंने 1996 में नेशनल एक्शन फोरम फाॅर सोशल जस्टिस के तत्वावधान में तैयार किया था और यह मेरी पुस्तक ‘एम्पावरिंग दलित्स फाॅर एम्पावरिंग इंडिया: ए रोड मैप’ (मानक पब्लिकेशन्स, दिल्ली, 2009) में परिशिष्ट के रूप में प्रकाशित है। दलित घोषणा-पत्र में अत्याचार निवारण अधिनियम की कमियों को दूर करने के लिए विशिष्ट उपाय सुझाए गए थे। इस घोषणा-पत्र को उसकी संपूर्णता में संयुक्त मोर्चा सरकार ने अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम, 1996 में शामिल किया था। परंतु, संयुक्त मोर्चा सरकार इन संशोधनों को लागू करने के लिए कानून नहीं बना सकी, जिसके कई कारणों में एक यह था कि उसके शासन की अवधि बहुत कम थी। एक अन्य महत्वपूर्ण कदम था- सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश वैंकटचलैय्या की अध्यक्षता में गठित संविधान समीक्षा आयोग की सन् 2002 में प्रस्तुत रिपोर्ट के 10वें अध्याय और बैकग्राउंड नोट में इन संशोधनों की आवश्यकता पर जोर दिया जाना। ये दोनों दस्तावेज मैंने आयोग के लिए तैयार किए थे (मेरी पुस्तक ‘एम्पावरिंग दलित्स फाॅर एम्पावरिंग इंडिया : ए रोड मैप का परिषिष्ट 10)।

इस अधिनियम का महत्व समझने में दलितों, आदिवासियोें व उनके लिए काम करने वालों को कुछ समय लगा; परंतु वे जातियां, जिनके सदस्य अत्याचार करने वालों में शामिल थे; तुरंत इसका महत्व समझ गए और उनकी रातों की नींद उड़ गई। सन् 1990 में प्रधानमंत्री श्री वी.पी. सिंह की अध्यक्षता में आयोजित मुख्यमंत्रियों की बैठक में एक उत्तर भारतीय राज्य के मुख्यमंत्री ने इस अधिनियम को अत्यंत कठोर बताते हुए उसे निरस्त किए जाने की मांग की। ये मुख्यमंत्री एक ऐसी पार्टी के नेता थे, जो श्री वी.पी. सिंह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चा सरकार का समर्थन कर रही थी। इसके तुुरंत बाद, उत्तर भारत के एक राजनीतिक दल के एक महत्वपूर्ण नेता ने एक सार्वजनिक सभा में इस अधिनियम पर हमला किया। इन दिनों एक वर्चस्वशाली जाति के कुछ नेता महाराष्ट्र में इस अधिनियम का विरोध कर रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है।

जैसे-जैसे दलितों की रक्षा के लिए इस अधिनियम के महत्व का अहसास दलितों और उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को हुआ, ऊपर वर्णित कमियां और कुछ अन्य कमियां समाज के संवेदनशील वर्गों की नजरों में आईं। यह इस अधिनियम के क्रियान्वयन के 25 वर्षों के अनुभव का नतीजा था। नेशनल कैम्पेन फाॅर दलित ह्यूमन राइट्स से जुड़े नेशनल दलित मूवमेंट फॉर जस्टिस (एनडीएमजे) ने  अत्याचार निवारण अधिनियम और उसके क्रियान्वयन को बेहतर बनाने के लिए एक राष्ट्रीय मोर्चा बनाया। मैं इस मोर्चे का प्रमुख सलाहकार था। इस मोर्चे ने दिल्ली और अन्य स्थानों पर गोष्ठियां आयोजित कीं और इनके आधार पर अधिनियम में वांछित परिवर्तनों के संबंध में एक विस्तृत दस्तावेज तैयार किया। इनमें मुख्यतः ऐसे संशोधनों की सिफारिश की गई थी; जो मेरे द्वारा तैयार किए गए विधेयक के मसौदे में शामिल थे। कई अन्य संस्थाएं (जिनमें तमिलनाडु का एंटी अनटचेबिलिटी फोरम भी शामिल है) इस अभियान में हिस्सेदार बनीं। अधिनियम में जो संशोधन करने के सुझाव दिए गए वे मुख्यतः तीन स्रोतों से आए :

  1. हर जिले में केवल इस अधिनियम के अंतर्गत दर्ज प्रकरणों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना और हत्या, सामूहिक हत्याओं, हत्याकांडों, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक बहिष्कार, सामाजिक भयादोहन और आर्थिक भयादोहन को अत्याचार के रूप में परिभाषित किए जाने संबंधी संशोधनों का स्रोत था। मेरे द्वारा बैठकों में रखे गए प्रस्ताव और सन् 1988-89 में मेरे द्वारा कल्याण मंत्रालय को भेजे गए पत्र, जो दलित घोषणा-पत्र व राष्ट्रीय संविधान समीक्षा आयोग की रिपोर्ट में शामिल थे।
  2. अत्याचार की घटनाएं जिन स्थलों पर हुई थीं, जैसे हरियाणा का गोहाना (2005), वहां की यात्रा के दौरान मैंने जो कुछ देखा-समझा
  3. और दलित व आदिवासियों के अधिकारों व इन समुदायों की रक्षा के लिए काम करने वाले सामाजिक संगठनों और कार्यकर्ताओं के जमीनी अनुभव।

एनडीएमजे व राष्ट्रीय गठबंधन के संयोजक डाॅ. सिरिवेला प्रसाद और उनके साथियों श्री राहुल सिंह और सुश्री अबिरामी के साथ लंबी बैठकों में मैंने संशोधन अधिनियम के मसौदे के प्रत्येक खंड को कई बार लिखा और संशोधित किया। इन समग्र संशोधनों को संकलित करते हुए एक प्रस्ताव, मेरे द्वारा दिनांक 19.11.2009 (अत्याचार निवारण अधिनियम, 1976 के लागू होने की तिथि पर) तत्कालीन सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री श्री मुकुल वासनिक को सौंपा गया। मसविदे के साथ भेजे गए पत्र पर राष्ट्रीय गठबंधन के मुख्य सलाहकार बतौर मेरे और उसके संयोजक बतौर डाॅ. सिरिवेला प्रसाद के हस्ताक्षर थे।

इसके बाद सरकार में विचार-विमर्श और चर्चाओं का लंबा दौर शुरू हुआ। राज्य सरकारों के साथ-साथ भारत सरकार के संबंधित मंत्रालयों से भी विचार-विमर्श किया गया। इस प्रक्रिया में जरूरत से ज्यादा समय लगा। यह इस तथ्य के बावजूद कि मंत्री स्वयं इसमें व्यक्तिगत रुचि ले रहे थे। इसका कारण यह था कि हमारी व्यवस्था वैसे भी बहुत धीमी गति से काम करती है और जब मुद्दा एससी, एसटी या अन्य वंचित वर्गों से जुड़ा होता है; तब यह गति और भी धीमी हो जाती है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा संशोधन विधेयक का जो मसौदा तैयार किया गया, उसमें हमारे मसौदे के कई प्रावधान शामिल थे। परंतु, कई अन्य प्रावधानों को या तो पूरी तरह हटा दिया गया था, या उन्हें कमजोर कर दिया गया था।

इस विधेयक को संसद के सन् 2012 के शीतकालीन सत्र में प्रस्तुत किया जा सकता था। विभाग के मंत्री इसके प्रति प्रतिबद्ध थे और उस दिशा में आगे बढ़ रहे थे। परंतु, इसी बीच उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इससे कार्यवाही एक साल और पीछे हो गई। कुमारी शैलजा के मंत्रालय का प्रभार ग्रहण करते ही मैंने 30.12.2012 को उन्हें एक पत्र लिखा और बताया कि यह संशोधन विधेयक और विशेष घटक योजना विधेयक उनके मंत्रालय में तैयार हैं और जैसा कि उनके पूर्ववर्ती ने तय किया था। इन दोनों विधेयकों को सन् 2012 के शीतकालीन सत्र में प्रस्तुत किया जाना है। मैंने उनसे कहा कि अगर वे इन दोनों विधेयकों को संसद की स्वीकृति दिलवाएंगी, तो इससे मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल की शानदार शुरुआत होगी। कुमारी शैलजा ने मेरे तर्क को स्वीकार किया, परंतु लिखा कि ‘‘श्री कृष्णन, चूंकि आप सरकार में रहे हैं; इसलिए आप यह तो समझते ही हाेंगे कि मुझे इसके लिए कुछ समय चाहिए।’’ अंततः उन्होंने संशाेधन विधेयक को लोकसभा के शीतकालीन सत्र दिसंबर 2012 में प्रस्तुत कर दिया। परंतु, विधेयक पर चर्चा होने के पूर्व ही उन्हें मंत्रिमंडल से हटा दिया गया। अब इस मंत्रालय का अतिरिक्त कार्यभार तत्कालीन रेलमंत्री को सौंप दिया गया। वे उस समय इस भारी-भरकम मंत्रालय के लेखानुदान को संसद में प्रस्तुत करने में व्यस्त थे। मेरे और दलित संगठनों, विशेषकर एनडीएमजे (जिसके नए संयोजक श्री रमेश नाथन थे) के सघन प्रयासों के बावजूद, हम सरकार से केवल अध्यादेश जारी करवा सके। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अध्यादेश, 4.3.2014 को जारी किया गया। इसके तुरंत, बाद चुनाव आयोग ने 16वीं लोकसभा के चुनाव घोषित कर दिए। मुझे आशा है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह किसी न किसी दिन, लोगों और विशेषकर दलितों और आदिवासियों को यह बताएंगे कि वे कौन-सी परिस्थितियां थीं, जिनके चलते उन्हें एक के बाद एक, दो मंत्रियों को ठीक उस समय मंत्रिमंडल से हटाना पड़ा; जबकि यह संशोधन विधेयक पारित होने की कगार पर था। इसके कारण इस संशोधन को लागू करने और विशेष घटक योजना व आदिवासी उपयोजना के संबंध में कानून बनाने में दो साल की देरी हो गई। दलितों और आदिवासियों व भारत के संविधान और सामाजिक न्याय में आस्था रखने वालों का यह अधिकार है कि वे यह जानें कि किन कारणों से ऐसा हुआ?  

मैं हमेशा से एससी, एसटी व एसईडीबीसी के प्रभारी मंत्रियों से मिलकर उनके समक्ष इन वर्गों से जुड़े मुद्दों को लिखित व मौखिक रूप से प्रस्तुत करता आ रहा हूं। इसी तारतम्य में नई सरकार के सत्ता संभालने के बाद मैंने इस विभाग के मंत्री श्री थावरचंद गहलोत से मुलाकात की और उनके समक्ष एससी, एसटी व एसईडीबीसी के कल्याण हेतु जो नए कानून बनाए जाने चाहिए और योजनाएं लागू की जानी चाहिए, उनका रोडमेप प्रस्तुत किया। मैंने उनसे विशेष रूप से यह अनुरोध किया कि इन वर्गों पर अत्याचार के संबंध में विधेयक जल्द-से-जल्द संसद में प्रस्तुत किया जाना चाहिए और यह सुनिश्चित करने का भी अनुरोध किया कि वह आसानी से पारित हो जाए। इसलिए उसका स्वरूप वही होना चाहिए, जो कि पहले जारी किए गए अध्यादेश का था। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि वे ऐसा ही करेंगे। उन्होंने यही आश्वासन दलित संगठनों के एक प्रतिनिधिमंडल को भी दिया, जो उनसे मिला था। उन्होंने अपने वादे को पूरा करते हुए 17.7.2014 को यह विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत कर दिया। इस बीच एक साल और गुजर गया। क्योंकि, विधेयक को संसद की स्थाई समिति को सौंप दिया गया। अंततः इस विधेयक को लोकसभा ने 4.8.2015 को और राज्यसभा ने 21.12.2015 को पारित कर दिया। इस विधेयक पर चर्चा के दौरान लोकसभा और राज्यसभा में तनाव के कई मौके आए, कार्यवाही बाधित हुई और विपक्षी दलों ने बहिर्गमन किया। मैंने विपक्ष के ऐसे नेताओं को, जो इन वर्गों के प्रति सहानुभूति रखते थे; फोन कर यह अनुरोध किया कि वे बिल को पारित करवाने में मदद करें। उनकी सारी प्रतिबद्धता के बाद भी, राज्यसभा में ऐसा मौका आया, जब ऐसा लगने लगा कि अन्य मुद्दों पर कार्यवाही बाधित किए जाने और विरोध के कारण यह विधेयक पारित नहीं हो सकेगा। आखिरी मौके पर एक सांसद ने नई समस्या खड़ी कर दी। उन्होंने मांग की कि अत्याचार निवारण संशोधन विधेयक के पहले व्हिसल ब्लोअरों की सुरक्षा संबंधी एक अन्य विधेयक, जो लंबित था; पर चर्चा की जानी चाहिए। मैं उस समय विभिन्न नेताओं से लगातार फोन पर संपर्क में था। अंततः बिल को राज्यसभा ने बिना किसी चर्चा के अपनी स्वीकृति दे दी। यह तथ्य कि इस विधेयक को सर्वसम्मति से, बिना किसी चर्चा के, पारित किया गया; यह बताता है कि इसे काफी पहले लागू किया जा सकता था। सन् 2009, और विशेषकर 2012 के बाद से इसे पारित करने में जो विलंब हुआ, उससे बचा जा सकता था। राष्ट्रपति ने इस विधेयक को दिनांक 31.12.2015 को अपनी स्वीकृति दे दी। इस संक्षिप्त विवरण से यह स्पष्ट है कि हमारे देश के सबसे कमजोर और वंचित वर्गों के हितार्थ कानून बनवाने या अन्य कोई निर्णय करवाने और उन्हें लागू करवाने के क्रम में किस तरह की परेशानियां आती हैं और उनसे निपटने के लिए कितने प्रयास करने होते हैं। इन दिनों ‘‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’’ की बहुत चर्चा है। हमारे राजनीतिक दलों, नेताओं और जनमत निर्माण करने वालों को इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए और ऐसे उपाय करने चाहिए; जिनसे एससी, एसटी, एसईडीबीसी, महिलाओं, बच्चों, अपंगों व अन्य ऐसे ही वर्गों के लिए ‘‘ईज ऑफ एनेक्टिंग लेजिस्लेशनस” संभव हो सके।   

यह अधिनियम दलित संगठनों, कार्यकताओं और मेरे समर्पित व समन्वित प्रयासों का परिणाम और सही दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यद्यपि, यह हमारा अंतिम पड़ाव नहीं है। सन् 1989 के मूल अधिनियम की तुलना में इसमें निम्न बेहतर प्रावधान हैं :

  1. इसमें ‘अत्याचारों’ की सूची को विस्तार देते हुए, उसमें कई ऐसी अपराध जोड़े गए हैं, जो सन 1989 के मूल अधिनियम में नहीं थे। जहां मूल अधिनियम में केवल 22 अपराधों को ‘अत्याचार’ की श्रेणी में रखा गया था; वहीं इस अधिनियम में इनकी संख्या 37 है। जो नए अपराध जोड़े गए हैं, उनमें शामिल हैं :  
  • सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार : यह काफी आम है। डॉ. आंबेडकर ने इसके और इसके आतंक की ओर सन् 1928 में साइमन आयोग का ध्यान खींचा था। मैं चाहता था कि इसे मूल अधिनियम में भी शामिल किया जाए।
  • एससी व एसटी महिलाओं को अधिक सुरक्षा।
  • महिलाओं को देवदासी बनाना या ऐसी ही अन्य परम्पराएं।
  • महिलाओं के विरुद्ध कुछ श्रेणियों के यौन अपराध।
  • किसी महिला पर चुड़ैल होने का आरोप लगाना। इससे एससी व एसटी महिलाओं को बेहतर सुरक्षा मिली। सन् 1989 के अधिनियम की तुलना में इस तरह के अपराध को अधिक स्पष्ट शब्दों में परिभाषित किया गया है। एसटी के साथ-साथ एससी महिलाएं भी इस अपराध की अक्सर शिकार बनतीं हैं।
  • चुनाव संबंधी
  • डराना-धमकाना- मतदान या और किसी की उम्मीदवारी या स्वयं की उम्मीदवारी के संबंध में
  • स्थानीय संस्था के चुने हुए प्रतिनिधि या उसके अध्यक्ष को उसके कर्तव्यपालन में बाधा डालना।
  • चुनाव के बाद बदले की कार्यवाही- जिसमें सामाजिक या आर्थिक बहिष्कार शामिल हैं; जैसा कि तमिलनाडु  के मेलावलावु में हुआ।
  • किसी एससी अथवा एसटी से हाथ से मैला साफ करवाना या इस कार्य हेतु नियुक्त करना या इस कार्य हेतु नियुक्त करने की अनुमति देना। इससे हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 को मजबूती मिली। यह प्रत्यक्षतः एससी एसटी के हितार्थ यूपीए सरकार के 10 वर्ष के कार्यकाल में बनाया गया एकमात्र कानून है और उन 11 कानूनों में शामिल है, जिन्हें बनाने की सलाह मैंने दी थी।
  • किसी को मृत पशुओं को ठिकाने लगाने या कब्र खोदने के लिए मजबूर करना। इसका महत्व सन् 2016 में गुजरात के ऊना में हुई हिंसा और उसके बाद के घटनाक्रम से स्पष्ट है।
  • शत्रुता को बढ़ावा देना : किसी ऐसी वस्तु, मूर्ति, छायाचित्र या चित्र या मृत व्यक्ति को अपमानित या लांछित करना, जिसे पवित्र या सम्मानित माना जाता है। इसका उद्देश्य मूर्तियों, विशेषकर डॉ. आंबेडकर की मूर्तियों को अपमानित करने की घटनाओं को रोकना है।
  • सार्वजनिक संसाधनों जैसे श्मशान घाट या कब्रिस्तान, जल स्रोतों, सार्वजनिक सुविधाओं आदि के समान उपयोग से रोकना या साइकिल अथवा मोटरसाइकिल चलाने, बारात में घोड़े पर बैठने, चप्पल या नए कपड़े पहनने, आराधना-स्थलों, शैक्षणिक व स्वास्थ्य संस्थानों, दुकानों इत्यादि तक पहुंच रोकने, अपनी मर्जी से कोई भी पेशा अपनाने, कोई व्यवसाय करने या कोई रोजगार करने से रोकना। एससी जातियों के दूल्हों द्वारा शादी के समय घोड़े पर सवारी करने पर, जैसा कि अन्य जातियों के दूल्हे करते हैं; उन पर हमलों की घटनाएं उत्तर भारत में आम हैं। जैसे- कुम्हेर 1992, कपालता 1980 और हाल में हुई कई ऐसी ही घटनाएं। यह प्रावधान मूल अधिनियम के खंड-3 (1)(14) से कहीं अधिक व्यापक और स्पष्ट है।
  • आईपीसी के अंतर्गत गंभीर अपराधों, अर्थात जिनमें 10 साल या उससे अधिक के कारावास की सजा दी जा सकती है और जो अलग से सूचीबद्ध नहीं किए गए हैं; के मामले में नए अधिनियम में ‘एससी या एसटी होने के आधार पर’ के स्थान पर ‘यह जानते हुए कि पीड़ित एससी या एसटी है’ प्रतिस्थापित कर दिया गया है।
  • अधिनियम की अनुसूची में दिए गए आईपीसी अपराधों के लिए दंड।
  • एसटी के लिए अधिक सुरक्षा।
  • वन पर अधिकारों से वंचित किया जाना और
  • फसलें नष्ट करना- यह तमिलनाडु में सन् 1992 में आदिवासी गांव वचाति में हुई घटना में प्रासंगिक है; जब वन, पुलिस और राजस्व विभागों की एक संयुक्त टीम ने गांव पर छापा डालने के बाद वहां के खेतों, फसलों और कुओं को नष्ट कर दिया था या नुकसान पहुंचाया था व महिलाओं और लड़कियों के साथ बलात्कार किया था।
  1. मुकदमों को त्वरित गति से निपटाने के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना, जो कि सत्र न्यायालय के स्तर के होंगे और जिनमें विशेष लोक अभियोजक नियुक्त जाएंगेे।
  • राज्य सरकारों की यह जिम्मेदारी होगी कि वे पर्याप्त संख्या में विशेष न्यायालयों की स्थापना करें, ताकि अधिनियम के अंतर्गत प्रकरणों का दो माह के भीतर निपटारा किया जा सके। मूल अधिनियम में मेरी सलाह के विपरीत, विद्यमान सत्र न्यायालयों में किसी एक को विशेष न्यायालय का दर्जा देने का प्रावधान था।
  • रोजाना सुनवाई और दो माह के भीतर प्रकरण में निर्णय सुनाने का प्रावधान और उच्च न्यायालय में दायर की गई अपील के अधिकतम तीन माह में निपटारे की व्यवस्था।
  • विशेष न्यायालयों द्वारा सीधे प्रकरणों का संज्ञान लेने का प्रावधान, जिससे नीचे के न्यायालयों द्वारा सत्र न्यायालय को प्रकरण सुपुर्द करने की प्रक्रिया में होने वाली देरी से बचा जा सके।
  1. अधिनियम में एक नया अध्याय सम्मिलित किया गया है, जिसमें पीड़ितों और गवाहों के अधिकारों का वर्णन है
  • राज्य की यह जिम्मेदारी होगी कि वह पीड़ितों, उनके आश्रितों और गवाहों को डराने-धमकाने, हिंसा का डर दिखाने या लालच देने के प्रयासों को विफल करे।
  • न्यायालयीन कार्यवाही शुरू होने की सूचना समय पर दी जाना।
  • हर कार्यवाही, जिसमें जमानत की अर्जी पर विचारण शामिल है; में सुने जाने का अधिकार।
  • स्वयंसेवी संस्थाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों से सहायता पाने का अधिकार।
  • अदालत, पीड़ितों और गवाहों की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करेगी, उन्हें आने-जाने व भोजन इत्यादि का खर्च उपलब्ध करवाएगी, उनके सामाजिक-आर्थिक पुनर्वास या उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर रहने जाने की व्यवस्था करवाएगी व समय-समय पर राज्य द्वारा उपलब्ध करवाई जाने वाली सुरक्षा की समीक्षा कर उपयुक्त आदेश पारित करेगी।
  • पूरी कार्यवाही की वीडियो रिकार्डिंग की जाएगी।
  • राज्य, पीड़ितों को तुरंत राहत उपलब्ध करवाने के लिए योजना बनाएगा।
  • पीड़ितों के लिए भोजन, पानी, वस्त्र, चिकित्सकीय सहायता, परिवहन, दैनिक भत्ते व निर्वाह भत्ते की व्यवस्था करेगी।
  • पीड़ितों और गवाहों को पूरी सुरक्षा उपलब्ध करवाई जाएगी। उन्हें इस बात की जानकारी उपलब्ध करवाई जाएगी कि प्रकरण की जांच किस चरण में है।
  1. सार्वजनिक सेवकों द्वारा कर्तव्यों का अनुपालन सुनिश्चित किया जाना : अधिनियम में सार्वजनिक सेवकों के कर्तव्यों का वर्णन किया गया है।
  2. निर्वासन : निर्वासन संबंधी प्रावधान को विस्तार देते हुए, मूल अधिानियम में अधिसूचित क्षेत्रों और आदिवासी क्षेत्रों से निर्वासन के अतिरिक्त, ऐसे क्षेत्रों से भी निर्वासन की व्यवस्था, जहां अत्याचारों की घटनाएं अधिक होती हैं। इससे इस प्रावधान का लाभ एससी को भी मिलने लगा, जो कि मूल अधिनियम के अंतर्गत केवल एसटी को उपलब्ध था।
  3. उपधारणा संबंधी नया प्रावधान : नए अत्याचार निवारण अधिनियम में शामिल उपधारणाओं में दो नई उपधारणाएं जोड़ी गई हैं, जिनमें यह प्रावधान है कि अगर यह सिद्ध हो जाता है कि आरोपी पहले से पीड़ित या उसके परिवार से परिचित था तो अदालत यह मानकर चलेगी कि उसे उसकी जाति या जनजाति का ज्ञान था, जब तक कि अन्यथा साबित न हो जाए।

यह संशोधन एक सामाजिक यथार्थ पर आधारित है और इससे आरोपियों का यह दावा कर बच निकलने का रास्ता बंद हो जाता है कि वे इस तथ्य से वाकिफ नहीं थे कि पीड़ित एससी या एसटी हैं। अतः उन्होंने यह अपराध इसलिए नहीं किया, क्योंकि पीड़ित एससी या एसटी था।   

परंतु, इस संशोधन अधिनियम में हमारे मसविदे के कई संशोधनों को शामिल नहीं किया गया है। वे हैं :

अ. निम्नांकित गंभीर और बहुत आम अत्याचार :

क. हत्याएं, सामूहिक हत्याएं और हत्याकांड।

ख. दुष्कर्म, सामूहिक दुष्कर्म।

ब. एक नया अध्याय जिसका शीर्षक ‘राष्ट्रीय पर्यवेक्षण व प्रवर्तन प्राधिकरण’ था। इसके अंतर्गत एससी व एसटी को सामाजिक न्याय दिलवाने के प्रति प्रतिबद्ध गैर-राजनीतिक अनुभवी व्यक्तियों की एक संस्था का गठन, जो सरकारी तंत्र के समानांतर, अधिनियम के उचित व पूर्ण क्रियान्वयन पर नजर रखेगी।

उचित समय पर हमें एक नया संशोधन विधेयक लाकर इन प्रावधानों को भी शामिल करना चाहिए। परंतु, अभी जो जिम्मेदारी हमारे समक्ष है वह है संशोधित अधिनियम के प्रावधानों का उचित क्रियान्वयन सुनिश्चित करना। इनमें शामिल हैं :

अ. यह सुनिश्चित करना कि राज्य सरकारें, अधिनियम के प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए योजना बनाएं और उसे लागू करें। इस योजना में विभिन्न विभागों और अधिकारियों इत्यादि की भूमिका और उत्तरदायित्वों का वर्णन होना चाहिए और साथ में इसमें ऐसी योजनाएं भी शामिल होनी चाहिए, जिनके जरिए पीड़ितों को तुरंत राहत उपलब्ध करवाई जा सके; पीड़ितों और गवाहों के अधिकारों की रक्षा की जा सके, पीड़ितों को खेती की भूमि, आवास निर्माण हेतु भूमि, आवास आदि उपलब्ध करवाए जा सकें, उनके पुनर्वास और रोजगार की व्यवस्था हो सके, उन्हें पेंशन व मुआवजा उपलब्ध करवाया जा सके, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाया जा सके, उनके स्वास्थ्य की देखभाल की व्यवस्था हो सके और उनके आवासीय क्षेत्राें में मूलभूत सुविधाओं, जैसे- विद्युतीकरण, सड़कें, श्मशानघाट इत्यादि उपलब्ध करवाए जा सकें; जैसा कि संशोधित नियम 15 मेें कहा गया है।

ब. यह सुनिश्चित करना कि प्रत्येक राज्य सरकार, नियम 16 के अंतर्गत उच्चाधिकार प्राप्त सतर्कता व निगरानी समिति का गठन करे, जिसके अध्यक्ष मुख्यमंत्री हों।

स. यह सुनिश्चित करना कि सतर्कता व पर्यवेक्षण समिति की बैठक हर वर्ष जनवरी और जुलाई में हो, जिसमें संषोधित अधिनियम के प्रावधानों के कार्यान्वयन की समीक्षा के साथ-साथ, पीड़ितों और गवाहों के अधिकारों और पात्रताओं, जिसमें न्याय पाने का अधिकार शामिल है; पीड़ितों को राहत व पुनर्वास उपलब्ध करवाने और अत्याचार के प्रकरणों में अभियोजन की प्रक्रिया की भी समीक्षा की जाए, जैसा कि नियम 16 में वर्णित है।

द. यह सुनिश्चित करना कि प्रत्येक जिले में विशेष न्यायालयों की स्थापना हो।

इ. यह सुनिश्चित करना कि विशेष न्यायालय वास्तव में विशेष न्यायालय हों; अर्थात उन्हें एससी व एसटी पर अत्याचारों से संबंधित प्रकरणों के अतिरिक्त, कोई अन्य प्रकरण न सौंपा जाए।

ई. यह सुनिश्चित करना कि सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध अधिवक्ताओं की नियुक्ति विशेष लोक अभियोजक के रूप में की जाए और उन्हें कोई अन्य कार्य न सौंपा जाए।

उ. अत्याचार की प्रत्येक बड़ी घटना के मामले में, इस बात पर नजर रखना कि जांच, प्रकरण व अपील की सुनवाई के लिए संशोधन अधिनियम में निर्धारित की गई समय सीमा का पालन हो और संशोधित नियमों का कड़ाई से पालन किया जाए।   

ऊ. अत्याचारों से संबंधित प्रमुख प्रकरणों में कम से एक दलित संगठन को पक्षकार बनाया जाए।

अं. दलित अधिकार संगठनों द्वारा हर जिले में प्रतिबद्ध व सक्षम वकीलों की सूची बनाना और उसे सरकार को सौंपना, ताकि उन्हें विषेष न्यायालयों में विषेष लोक अभियोजक नियुक्त किया जा सके।

अः. विषेष लोक अभियोजकों के संपर्क में रहकर उन्हें आवश्यक जानकारी उपलब्ध करवाना।

क. दलित अधिकार संगठनों द्वारा दलितों और आदिवासियों में इस अधिनियम और उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों द्वारा उन्हें प्रदत्त अधिकारों के संबंध में जागरूकता और चेतना फैलाना व उन्हें यह भी समझाना कि वे अपने इन अधिकारों का प्रयोग किस प्रकार कर सकते हैं।

कानून द्वारा सुरक्षा उपलब्ध करवाए जाने के अतिरिक्त, ऐसे कदम उठाए जाने की आवश्यकता भी है, जिनसे एससी व एसटी की कमजोर स्थिति में सुधार लाया जा सके। एससी के कमजोर होने का एक कारण यह है कि यद्यपि वे जनसंख्या में अल्पसंख्यक हैं; परंतु, भूमिहीन खेतिहर श्रमिकों और अन्य दैनिक मजदूरी करने वालों में उनकी बहुसंख्या है। एससी भूमिहीन हैं और वे जिन लोगों की जमीनों पर खेती करते हैं, वे वर्चस्वशाली भूस्वामी जातियों के हैं। यह स्थिति अत्याचारों के लिए उर्वर भूमि उपलब्ध करवाती है। इस कमजोरी को दूर करने के लिए यह आवश्यक है कि केंद्र सरकार अपनी पहल पर और केवल अपने आर्थिक संसाधनों का उपयोग करते हुए, एससी भूमिहीनों को भूमि उपलब्ध करवाने के लिए व्यापक अभियान चलाए। इसके लिए उसी टास्क फोर्स प्रणाली का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जिसका सुझाव मैंने सरकार को दिया है और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध भी करवाया है। उनके मालिकाना हक को स्थाई बनाने और उनकी आय में वृद्धि के लिए यह जरूरी है कि उनकी सभी जमीनों को सिंचित बनाया जाए। इसके अलावा, एससी व आदिवासियों की भूमि को अन्य वर्गों द्वारा खरीदने या उस पर अन्यथा कब्जा करने पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए।

राज्य और केंद्र सरकारों पर दलितों और आदिवासियों व उनके शुभचिंतकों को शांतिपूर्ण ढ़ंग से एक कर व्यापक जनांदोलन के जरिए इस आशय का दबाव बनाया जाना चाहिए कि वे इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आवश्यक कदम उठाएं।

एक अन्य कार्य जो आवश्यक है वह है उन व्यक्तियों व नेताओं का मुकाबला करना, जो यह मांग कर रहे हैं कि इस अधिनियम को या तो निरसित किया जाए या उसके प्रावधानों को कमजोर किया जाए। जैसा कि मैंने बताया, सन् 1990 में ही इस अधिनियम का विरोध एक शक्तिशाली नेता ने किया था, जो उस समय एक राज्य के मुख्यमंत्री थे। तदोपरांत, कई नेताओं ने इसका विरोध किया। हाल में महाराष्ट्र और कुछ अन्य राज्यों में वर्चस्वशाली अगड़ी जातियों के संगठनों ने भी ऐसी ही मांग की है। तमिलनाडु में कुछ भूस्वामी एसईडीबीसी जातियों के नेताओं द्वारा भी इस अधिनियम के विरोध में आवाज उठाई जा रही है। इस तरह की मांगों का कड़ा विरोध किया जाना आवश्यक है। हमें आमजनों को यह समझाना होगा कि एससी व एसटी ने सदियों तक अत्याचार और शोषण झेला है और वे आजादी के बाद भी कई दशकों तक बदहाली की अवस्था में जीते रहे हैं और इस कारण यह अधिनियम अनिवार्य और अपरिहार्य है। उन्हें यह भी बताया जाना चाहिए कि यह अधिनियम दलितों और आदिवासियों के संबंध में संविधान द्वारा राज्य को सौंपी गई जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए आवश्यक है और पूरे समाज को इस अधिनियम के उचित व प्रभावी क्रियान्वयन में सहयोग देना चाहिए, ताकि इन वर्गों पर अत्याचार बंद हो सकें और अछूत-प्रथा समाप्त हो सके। आमजनों को यह बताया जाना भी आवश्यक है कि इस अधिनियम से न केवल दलितों और आदिवासियों को उनके अधिकार मिलेंगे और उनके साथ न्याय होगा, वरन् इससे हमारे खंडित समाज को एक करने में भी मदद मिलेगी; जिससे यह देश और उसकी अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। उन्हें यह चेतावनी भी दी जानी चाहिए कि इस अधिनियम को रद्द करने या उसके प्रावधानों को कमजोर करने की उनकी मांग कभी पूरी नहीं हो सकती। अगर अगड़ी जातियां इस अधिनियम के विरुद्ध गोलबंद होंगी, तो दलित व आदिवासी भी इस अधिनियम के पक्ष में और उसके उचित क्रियान्वयन की मांग करते हुए उठ खड़े हाेंगे। सामाजिक दृष्टि से अगड़ी जातियों और कुछ भू-स्वामी एसईडीबीसी जातियों के द्वारा अधिनियम का विरोध करने के नकारात्मक परिणाम होंगे और ऐसा वातावरण निर्मित होगा; जो समाज के एकीकरण, राष्ट्रीय एकता और देश की प्रगति व आर्थिक विकास के लिए घातक होगा। सामाजिक रूप से अगड़ी जातियों द्वारा जो एक अत्यंत धूर्ततापूर्ण मांग उठाई जा रही है; वह यह है कि अगर इस अधिनियम के अंतर्गत दायर प्रकरणों में दोषसिद्धि नहीं होती, तो शिकायतकर्ताओं को सज़ा दी जानी चाहिए। वे इस तथ्य को नजरअंदाज कर रहे हैं कि ऐसे अधिकांश प्रकरणों में न्यायालयों में आरोपियों का दोष इसलिए सिद्ध नहीं हो पाता; क्योंकि पीड़ितों और गवाहों को धमकियां दी जाती हैं। जांच मशीनरी वर्चस्वशाली जातियों के नेताओं के दबाव में काम करती है और कई बार आरोपियों और जांचकर्ताओं में मिलीभगत होती है। कई दलित हत्याकांडों में आरोपियों का बरी हो जाना इसका प्रमाण है। इनमें तमिलनाडु के किजावेनमनी, हाल में बिहार के छह प्रकरण और कर्नाटक का कंबलापल्ली प्रकरण शामिल हैं।

(क्रमश: जारी)

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : प्रेम बरेलवी/एफपी डेस्क)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें

आरएसएस और बहुजन चिंतन 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply