जोतीराव फुले की नजर में नैतिकता, समानता और स्वतंत्रता

सदाचारी कौन है? इस सवाल का जवाब जोतीराव फुले ने अपनी पुस्तक ‘सार्वजनिक सत्य धर्म’ में तैंतीस नैतिक शिक्षाओं के जरिए दिया है। उन्होंने ऐसे समाज की परिकल्पना की जिसमें सभी व्यक्तियों को स्वतंत्रता और समानता का अधिकार हो

अठारहवीं सदी के महान् क्रांतिकारी विचारक जोतीराव फुले (11 अप्रैल 1827 – 28 नवंबर 1890) के नैतिक विचार उनके सामाचिक चिंतन पर आधारित हैं। उनका मानना था कि नैतिकता सामाजिक जीवन का आधार है। समाज के विकास के लिए नैतिक मूल्यों का पालन आवश्यक है। जबतक नैतिक मूल्यों का पालन नहीं किया जाता, समाज का विकास असंभव है।

उनके नैतिक विचार उनकी पुस्तक ‘सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक’ में प्राप्त होती है। उनका मानना था कि समाज का संगठन ऐसा हो कि समाज के सभी व्यक्तियों को स्वतंत्रता एवं समानता के अधिकार प्राप्त हों। जैसा कि हम जानते हैं स्वतंत्रता के बिना नैतिक मूल्यों की कल्पना नहीं की जा सकती। नैतिकता के लिए स्वतंत्रता एक आवश्यक तत्व है।

फुले का मानना था कि व्यक्ति अपने कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी हो तथा वह स्वयं के द्वारा किये गये कर्मों का ही उत्तरदायी हो। क्योंकि जबतक उसे अपने कर्मों को करने की स्वतंत्रता न हो अर्थात् किसी व्यक्ति को बलात् किसी कर्म को करने के लिए बाध्य किया गया हो तो उसे उस कर्म के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।

वे मानते थे कि प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए स्वतंत्रता के साथ-साथ समाज में समानता का होना भी आवश्यक है। जबतक उसे समान अधिकार नहीं प्राप्त हो जाते, तबतक उसका समुचित विकास नहीं हो सकता। इसलिए वैसे नियम कानून या धार्मिक मान्यताएं जो किसी व्यक्ति या व्यक्ति समूह के समान अधिकार के विरूद्ध हैं, वह अनैतिक, असत्य और अनुचित हैं। इसी लिए वे पूर्वजन्म के कर्मों पर आधारित वर्ण-जाति-व्यवस्था को सरासर गलत मानते थे। उनका मानना था कि  वर्ण-जाति-व्यवस्था पूर्णतः असत्य, नैतिक मूल्यों के विरूद्ध है तथा अबौद्धिक मान्यताओं पर आधारित है।

महाराष्ट्र के पूना जिले के फुलेवाड़ा में जोती राव फुले के निवास स्थान में बने संग्रहालय में रखी गयी फुले दंपत्ति की पेंटिंग (फोटो : एफपी ऑन द रोड 2017)

उनका मानना था कि सभी व्यकितयों को सदाचरण का पालन करना चाहिए। उनके समय में बहुविवाह, सत्ती-प्रथा, आदि कई तरह की कुरीतियां समाज में प्रचलित थीं। उनके अनुसार, वे प्रथाएं अनैतिक के साथ-साथ समाज एवं देश के विकास में भी सर्वाधिक बाधक थीं। फुले ने उसे ही पापकर्म कहा है। उन्होंने कहा है ‘‘नारी और पुरूष दोनों समान रूप से सभी मानवीय अधिकारों का उपभोग करने के लिए हकदार हैं। फिर नारियों को एक अलग प्रकार का नियम और लोभी, अहंकारी पुरूषों के लिए एक अलग प्रकार का नियम व्यवहार में लाना, पक्षपात के अलावा और कुछ नहीं है।’’     

 महात्मा फुले का मानना था कि जातिभेद समाज में प्रचलित सबसे बड़ी बुराई है। वह समाज में नैतिकता, बौद्धिकता एवं सहिष्णुता के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। समाज में नैतिकता, बौद्धिकता एवं सहिष्णुता के विकास के विकास के लिए जातिभेद का उन्मूलन आवश्यक है। उनके अनुसार वह नैतिकता के साथ-साथ अबौद्धिक मान्यताओं एवं परंपराओं पर आधारित है। उन्होंने पूछा है कि जब पक्षियों, पेड़-पौधों, अन्य जीव-जन्तुओं में जातिभेद नहीं है तो मानवों में क्यों होना चाहिए।

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कुछ लोग गुण के आधार पर जातिभेद को उचित ठहराते हैं। फुले ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि मानव प्राणियों में जातिभेद को उचित नहीं ठहराया जा सकता। उनके अनुसार, कई लोग अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देते हैं और वे अपने स्वभाव के अनुसार तेज बुद्धि होने के कारण सफल होते हैं। जबकि कुछ लोगों के अपने बच्चों को लाख शिक्षा देने के प्रयास के बावजूद जड़बुद्धि होने के कारण वे मूर्ख और निष्क्रिय होकर गलत कार्य करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। इसलिए अच्छे गुणों एवं बुरे गुणों का संबंध खानदान या वंश परंपरा से नहीं होता।          

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जोतीराव फुले ने सदाचरण को सबसे महत्वपूर्ण माना है। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘सार्वजनिक सत्य धर्म’ में तैंतीस नैतिक शिक्षाओं का उल्लेख किया है, जो उनके नैतिक चिंतन के मूलस्रोत हैं, जो निम्नवत् हैं :   

  • हम सभी के निर्माता ने सभी जीव प्राणियों को पैदा किया है। उनमें नर और नारी दोनों जन्म से ही स्वतंत्र हैं। नारी या पुरूष जो सभी के समानता और स्वतंत्रता के हक को मानता हो तथा निर्माणकर्ता द्वारा पैदा किए गए वस्तुओं को समान रूप से सभी को उपयोग करने देता है। उसे सदाचरण करनेवाला कहना चाहिए।
  • नारी या पुरूष जो निर्माणकर्ता के अलावा किसी ग्रह-उपग्रह या तारे या किसी पत्थर की मूर्ति को न पूजता हो, उसे सदाचरण करने वाला जानना चाहिए।
  • जो निर्माणकर्ता द्वारा उत्पन्न सभी चीजों को सभी को उपभोग करने तथा उसके लिए निर्माता के प्रति आभार प्रकट करने देता है, उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • विश्वकर्ता द्वारा निर्मित सभी प्राणियों के लिए जो कोई परेशानी पैदा नहीं करता, उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • जो दूसरों को किसी प्रकार से नीच नहीं मानता तथा इस प्रकार का विचार व्यक्त नहीं करता। उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • जो सभी मानव नारी-पुरूष में धर्म, स्थानीय और क्षेत्रीयता संबंधी हर मनुष्य की स्वतंत्रता, संपत्ति-संरक्षण और जुल्म से रक्षा करने में कठिनाईयां नहीं पैदा करता। उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • जो अपने माता-पिता की सहमति से कार्य करते हैं तथा वृद्धजनों को सम्मान देते हैं या माता-पिता एवं वृद्धजनों को सम्मान देनेवाले का आदर करते हैं। उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • जो मद्यपान या अन्य हानिकर नशा करके किसी तरह का अन्याय नहीं करता या ऐसा करनेवाले की मदद नहीं करता। उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • जो कुछ अपवाद छोड़कर किसी प्राणी की हत्या नहीं करता या हत्या करनेवाले की मदद नहीं करता। उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • जो नारी या पुरूष एक-दूसरे के साथ प्रेम एवं सौहार्द्र के साथ रहते हैं। उन्हें सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • जो अपने लाभ के लिए तथा दूसरे को नुकसान करने के लिए झूठ नहीं बोलता या झूठ बोलनेवाले की मदद नहीं करता। उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • जो व्यभिचार नहीं करता या व्यभिचार करनेवाले का सम्मान नहीं करता। उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • जो किसी भी प्रकार की चोरी नहीं करता या चोरी करनेवाले की मदद नहीं करता। उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • जो घृणा से दूसरों के मकान या सामान को जलाता नहीं या आग लगानेवालों से कोई संबंध नहीं रखता। उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • जो स्वयं को एवं अपने संबंधियों को खानदानी श्रेष्ठ एवं पवित्र नहीं मानता तथा अन्य मनुष्य प्राणियों को खानदानी नीच एवं अपवित्र नहीं मानता। उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • जो ग्रंथों के विश्वास करके किसी को खानदानी दास नहीं मानता या दास माननेवालों की परवाह नहीं करता । उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • जो शिक्षा एवं न्याय में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं करते तथा ऐसा करनेवाले का निषेध करते हैं। उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • जो शारीरिक श्रम करके जीविकोपार्जन करनेवालों को श्रेष्ठ मानता है तथा किसानों की मदद करता है तथा मेहनत- मजदूरी करनेवालों को नीच नहीं मानता। उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • जो अज्ञानी लोगों में कलह नहीं पैदा करता तथा किसी प्रकार का विधि-निषेध किए बगैर पवित्र मन से आचरण करता है। उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।
  • जो सभी मानव नर-नारियों में किसी के प्रति पसंदगी-नापसंदगी रखे बगैर उनमें से महारोगी को, अपाहिज को और बेसहारा बच्चों को अपनी क्षमता के अनुसार मदद करता है या मदद करनेवालों को सम्मान देता है, उसे सदाचरण करनेवाला जानना चाहिए।

इस प्रकार हम देखते हैं कि जोतीराव फुले का नैतिक चिंतन उनके व्यापक सामाजिक  दृष्टिकोण पर आधारित है; जिसके मूल में स्वतंत्रता एवं समानता के मौलिक मानवीय अधिकार हैं तथा जिनका उद्देश्य समाज में व्याप्त सामाजिक एवं आर्थिक विषमता तथा धार्मिक कट्टरता को दूर कर; वर्ण-जातिव्यवस्था का उन्मूलन कर, समाज में बंधुता और भाईचारा को स्थापित करना है; ताकि सभी व्यक्ति अपने धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक अधिकारों का उपयोग कर सकें।

संदर्भ ग्रंथ :

1 महात्मा ज्योतिबा फुले रचनावली भाग 2, सं. विमलकीर्ति, एल.जी.मेश्राम, राधाकृष्ण   प्रकाशन, नई दिल्ली, 1994, पृष्ठ सं. 111

2  वही पृष्ठ सं. 113

3  वही पृष्ठ सं. 114

4  वही पृष्ठ सं. 117

5  वही पृष्ठ सं. 169-173  

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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