आदिवासियों को केवल मजदूर नहीं बनाए सरकार : पी.एस. कृष्णन

आदिवासियों के प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल मजदूर के रूप में उन्हें रोजगार देना नहीं होना चाहिए। उन्हें तकनीकी, पर्यवेक्षी और प्रबंधकीय कार्य करने के लिए भी शिक्षित व प्रशिक्षित किया जाना चाहिए

आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 17

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उसमें पी.एस. कृष्णन भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते उदाहरण हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमनियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय, तमिलनाडु की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुतः आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। फारवर्ड प्रेस की इस किताब का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करने की योजना है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। आज पढ़ें आदिवासियों के लिए बने कानूनों और उनके क्रियान्वयन को लेकर पी एस कृष्णन की राय – संपादक)


आदिवासियों के अधिकारों को लेकर कानूनों के क्रियान्वयन में दोष

  • वासंती देवी

(गतांक से आगे)

वासंती देवी : देश में हुए सबसे शक्तिशाली नागरिक समाज आंदोलन जैसे नर्मदा बचाओ आंदोलन, आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए चलाए गए थे। वे अपने मिशन में किस हद तक कामयाब हुए हैं?

पी.एस. कृष्णन : आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए चलाए गए सामाजिक आंदोलन अपने मिशन में सफल नहीं हो सके हैं, परंतु इनका कुछ असर अवश्य हुआ है। इन आंदोलनों और सरकार में मानवीय और सामाजिक दृष्टि से संवेदनशील व्यक्तियों की मौजूदगी के कारण ही अनुसूचित जनजातियां व अन्य वनवासी (वनाधिकारों को मान्यता) अधिनियम 2006, जिसे संक्षेप में वनाधिकार अधिनियम कहा जाता है, और पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम 1996 अस्तित्व में आ सके। एक अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धि है सन् 1970 के दशक में आदिवासी उपयोजना की शुरूआत। यह मेरे दो साथियों और बैचमेंटों – डाॅ. ब्रम्हदेव शर्मा, जो दो साल पहले नहीं रहे और डाॅ. भूपिंदर सिंह – की उपलब्धि है। ये दोनों ही न तो आदिवासी थे और ना ही किसी अन्य वंचित वर्ग से।

आदिवासी अधिकारों के लिए आंदोलन और सरकार के भीतर उनके अधिकारों की रक्षा शुरू से ही एक विषम संघर्ष रहा है। एससी की तुलना में एसटी में जागृति बहुत धीरे फैली। महात्मा फुले व नारायण गुरू द्वारा चलाए गए आंदोलनों और डाॅ. आंबेडकर के प्रयासों से दलितों में जबरदस्त जागरूकता आई और उन्होंने कई तरह के संघर्ष शुरू किए। इसके विपरीत, एसटी के मेधावी नेता श्री जयपाल सिंह मुंडा को स्वतंत्रता-पश्चात भारत के नेतृत्व ने निष्प्रभावी कर दिया। आदिवासियों में जनजागृति लाने और उन्हें लामबंद करने की प्रक्रिया अत्यंत धीमी रही है, विशेषकर प्रमुख जनजातियों जैसे गोंड, भील, संथाल, मुंडा, उरांव, कोया इत्यादि के मामले में। ये जनजातियां भारत की एसटी आबादी का बड़ा हिस्सा हैं। इन जनजातियों के सदस्य शायद ही विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हो पाते हैं। परंतु इस अंधकार में भी प्रकाश की एक किरण है। धीरे-धीरे विभिन्न क्षेत्रों की बड़ी जनजातियों में जागृति आ रही है और वे लामबंद हो रही हैं। हमें आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।

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वासंती देवी : वनाधिकार अधिनियम को किस हद तक ठीक से लागू किया गया है?

पी.एस. कृष्णन : वनाधिकार अधिनियम, एसटी की बेहतरी की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है परंतु राज्यों के वन विभागों के अधिकारियों की अपने वर्चस्व में कटौती को स्वीकार न करने की प्रवृत्ति और नागरिक समाज और राजनैतिक नेतृत्व की उदासीनता के कारण यह अधिनियम उतना प्रभावी सिद्ध नहीं हो सका है जितना कि हो सकता था। कुछ अपवाद भी हैं। कुछ क्षेत्रों में सामाजिक संगठनाें और कार्यकर्ताओं की आदिवासियों को शांतिपूर्वक लामबंद करने में सफलता के चलते, अधिनियम का कुछ बेहतर क्रियान्वयन हुआ है परंतु अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। इस अधिनियम और पीईएसए (पेसा) के कारगर क्रियान्वयन के लिए सघन प्रयासों की जरूरत है।

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उन अपवादात्मक मामलों में, जहां व्यक्तियों और समुदायों के वनाधिकारों को औपचारिक मान्यता दी गई है, वहां पंचायतों और परिवारों की आय में काफी वृद्धि हुई है। लंबे समय तक वन विभाग के कुछ अधिकारी इसी बहस में लगे रहे कि कुछ आदिवासी क्षेत्रों में ऊगने वाला बांस पेड़ है या नहीं। यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि बांस पेड़ नहीं है और इसलिए लघु वनोपज या गैर-काष्ठ वनोपज है। सभी लघु वनोपज और गैर-काष्ठ वनोपज, पंचायतों के क्षेत्राधिकार में आते हैं। बांस को लघु वनोपज के रूप में स्वीकार करने से आदिवासी क्षेत्रों की पंचायतों और आदिवासी परिवारों की आय में खासी वृद्धि हुई है। उच्च मूल्य वाली इस तरह की वनोपजों को उगाने से आदिवासी अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव आ सकता है।

सामाजिक न्याय के लिए संघर्षरत योद्धा पी.एस. कृष्णन

इन सब उदाहरणों से पता चलता है कि एसटी को उनकी व्यक्तिगत और सामूहिक संपत्ति से वंचित किया जाता रहा है और काफी हद तक आज भी किया जा रहा है। इसका नतीजा यह हुआ है कि आदिवासियों की प्राकृतिक संपदा, ठेकेदारों आदि के जरिए आदिवासी क्षेत्रों से बाहर जा रही है और काली अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन रही है। इस संपत्ति का आदिवासी क्षेत्रों से बाहर जाना, हमारे औपनिवेशिक शासकों द्वारा देश की संपत्ति को बाहर ले जाने से कम भयावह त्रासदी नहीं है। देश की संपत्ति के बाहर जाने के प्रभाव पर दादाभाई नौरोजी की प्रसिद्ध पुस्तक ‘पावरटी एंड अनब्रिटिष रूल ऑफ इंडिया‘ (1901) विस्तृत प्रकाश डालती है। अगर वनाधिकार अधिनियम के उचित क्रियान्वयन द्वारा आदिवासी क्षेत्रों की संपत्ति को बाहर जाने से रोक दिया जाता है तो यह मध्य भारत की बड़ी आदिवासी आबादी के साथ-साथ तमिलनाडू, केरल और कर्नाटक के आदिवासियों के आर्थिक सशक्तिरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। जो लोग आदिवासियों को सामाजिक न्याय दिलवाने के लिए काम कर रहे हैं उन्हें वनाधिकार अधिनियम के पूर्ण व प्रभावी कार्यान्यवन को उच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। जिन इलाकों में इस अधिनियम को ठीक से कार्यान्वित किया गया है वहां के आदिवासियों की आर्थिक स्थिति पर इसके अनुकूल प्रभाव से संबंधित आंकड़ों को सरकारों के ध्यान में लाया जाना चाहिए ताकि केन्द्र और राज्य सरकारें इस अधिनियम के महत्व को समझ सकें। ये आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध करवाए जाने चाहिए और इन्हें सामाजिक विमर्श का हिस्सा बनाने के प्रयास होने चाहिए।

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कुछ लोगों ने यह आशंका व्यक्त की है कि वनाधिकार अधिनियम और उसके तहत आदिवासियों के व्यक्तिगत और सामूहिक वनाधिकारों को मान्यता दिए जाने से विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा क्योंकि भारत की खनिज संपदा का अधिकांश हिस्सा आदिवासी क्षेत्रों में है। हाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने एक भाषण में कहा कि आदिवासियों को उनकी भूमि से वंचित करने का अधिकार किसी को नहीं है और यह भी कि सरकार, भूमि की ऊपरी सतह पर आदिवासियों के अधिकार की सुरक्षा करने के लिए उद्धत है। उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासियों के भूमि की सतह पर मालिकाना हक और उस पर खेती करने के अधिकार को प्रभावित किए बिना जमीन के नीचे खनन किया जा सकता है।

प्रधानमंत्री के इस कथन से आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम कर रहे संगठनों और व्यक्तियों को प्रेरणा लेनी चाहिए। आदिवासियों के अधिकारों और देश के आर्थिक विकास में कोई विरोधाभास नहीं है और दोनों में सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। भूमि की ऊपरी सतह पर आदिवासियों के व्यक्तिगत और सामूहिक अधिकारों को प्रभावित किए बगैर, भूमि के गर्भ से खनिज निकालने की प्रक्रिया का निर्धारण इस तरह से किया जाना चाहिए कि इसका अधिकतम लाभ इलाके में रहने वाले आदिवासियों को मिले। इसके लिए खनन परियोजनाओं के निर्माण और उनके संचालन के लिए आवश्यक कौशलों की पहचान कर युवा आदिवासियों को इनमें प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, खनन कंपनियों के आर्थिक सहयोग से इलाके में उच्च गुणवत्ता वाले आवासीय विद्यालयों, महाविद्यालयों, अस्पतालों इत्यादि की स्थापना भी की जानी चाहिए। यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए और इसमें आदिवासियों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। आदिवासियों के प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल मजदूर के रूप में उन्हें रोजगार देना नहीं होना चाहिए। उन्हें तकनीकी, पर्यवेक्षी और प्रबंधकीय कार्य करने के लिए भी शिक्षित व प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। अगर आदिवासी क्षेत्रों में इस तरह की परियोजनाओं के लिए आवश्यक समस्त मानव संसाधन उसी इलाके से जुटा लिए जाएंगे और इसके लिए बाहर से कर्मियों को नहीं लाना पड़ेगा तो इससे आदिवासियों के शोषण और इससे जनित तनाव और टकराव को रोकने में मदद मिलेगी।

(क्रमश: जारी)

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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