h n

यह संघ-भाजपा की जीत नहीं, वंशवाद की हार है

लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम सामने आ चुके हैं। भाजपा गठबंधन ने पंजाब और दक्षिण के कुछेक राज्यों को छोड़ पूरे देश में प्रभावशाली जीत दर्ज किया है। खास बात यह है कि इस बार वंशवादियों को करारा झटका भारत की जनता ने दिया है

त्वरित टिप्पणी

लोकसभा चुनाव-2019 सचमुच ऐतिहासिक बन गया है। इस चुनाव में भारत की जनता ने वंशवाद को करारा झटका  दिया है। राहुल गांधी भले ही केरल के वयनाड से जीतने में कामयाब रहे लेकिन उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट से भाजपा की स्मृति इरानी से करीब 44 हजार मतों के अंतर से चुनाव हार चुके हैं। 

पूरे परिदृश्य को देखते हुए यह कहना उचित होगा कि यह संघ-भाजपा की जीत नहीं, बल्कि वंशवाद की हार है। विकल्पहीन भारतीय जनता ने स्वाभविक रूप से राजकुमारों को गद्दी सौपने से इनकार कर दिया है।

यह हार केवल नेहरू खानदान तक सीमित नहीं है। बिहार में लालू प्रसाद की पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया है। उनकी बेटी डा. मीसा भारती भाजपा के रामकृपाल यादव के हाथों पराजित हो चुकी हैं।  यह हार लालू प्रसाद के परिवारवाद का है जो एक समय कहा करते थे कि अब राजा रानी के गर्भ से पैदा नहीं होगा। लेकिन बाद में वे स्वयं इसके पर्याय बनकर रह गए। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव का परिवार अपनी सीट बचाने में किसी प्रकार कामयाब हो सका है। उनकी पार्टी केवल 5 सीटों पर जीत रही है। वहीं उसकी सहयोगी बहुजन समाज पार्टी को कुल 11 सीटें मिलने की संभावना है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी

वंशवाद की अमरबेल केवल यूपी और बिहार में ही नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में भी कमजोर होती दिख रही है। मसलन, मध्य प्रदेश के भोपाल सीट से राजा के परिवार में जन्मे दिग्विजय सिंह चुनाव हार चुके हैं। वहीं राजा के खानदान में ही जन्मे ज्योतिरादित्य सिंधिया भी गुणा सीट से पराजित हो चुके हैं। उनकी यह ऐतिहासिक पराजय है। इसकी वजह यह कि यहां से राजा के परिवार के सदस्य ही जीतते रहे थे।

राजा-महाराजा भी हारे : भोपाल से दिग्विजय सिंह और गुना सीट से ज्योतिरादित्य सिंधिया को मिली हार

राजा-महाराजा परंपरा की महारानी कविता सिंह खजुराहो लोकसभा क्षेत्र से चुनाव हार चुकी हैं। उन्हें भाजपा के विष्णु दत्त शर्मा ने 4 लाख 92 हजार 382 वोटों के अंतर से हराया है। हालांकि छिंदवाड़ा सीट से मुख्यमंत्री कमलनाथ के पुत्र नकुल कमलनाथ को महज 37 हजार 536 मतों के अंतर से जीत मिली है। इस एक सीट के लिए कमलनाथ ने पूरे प्रदेश में कांग्रेस को उसके हाल पर छोड़ दिया था।

वहीं, भाजपाई खेमे के वंशवादियों को नरेंद्र मोदी के नाम का सहारा मिला है। नेहरू खानदान से संबंध रखने वाली मेनका गांधी और वरूण गांधी इनमें शामिल हैं। वहीं बिहार में ही रामविलास पासवान का परिवारवाद कामयाब रहा है। उनके दोनों भाई और पुत्र चुनाव जीत चुके हैं। लेकिन इनकी जीत कोई खास मायने नहीं रखती है क्योंकि इनकी जीत सीधे तौर पर नरेंद्र मोदी की जीत है। रामविलास पासवान ने उन्हें आगे रखकर अपने परिजनों को मैदान में उतारा था।

बहरहाल, वंशवादियों की हार से राजनीतिक संभावनाएं बनेंगी। जिस विकल्प के अभाव की बात आज कहकर भाजपा के नरेंद्र मोदी प्रचंड बहुमत पाने में एक बार फिर सफल हुए हैं, संभव है कि आने वाले समय में वह विकल्प जनता स्वयं चुन लेगी।  

(कॉपी संपादन : नवल)

परिवर्धित : 23 मई, 2019, 10:36 PM


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें

 

आरएसएस और बहुजन चिंतन 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

लेखक के बारे में

फारवर्ड प्रेस

संबंधित आलेख

भारतीय ‘राष्ट्रवाद’ की गत
आज हिंदुत्व के अर्थ हैं– शुद्ध नस्ल का एक ऐसा दंगाई-हिंदू, जो सावरकर और गोडसे के पदचिह्नों को और भी गहराई दे सके और...
जेएनयू और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के बीच का फर्क
जेएनयू की आबोहवा अलग थी। फिर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में मेरा चयन असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर हो गया। यहां अलग तरह की मिट्टी है...
बीते वर्ष 2023 की फिल्मों में धार्मिकता, देशभक्ति के अतिरेक के बीच सामाजिक यथार्थ पर एक नज़र
जाति-विरोधी फिल्में समाज के लिए अहितकर रूढ़िबद्ध धारणाओं को तोड़ने और दलित-बहुजन अस्मिताओं को पुनर्निर्मित करने में सक्षम नज़र आती हैं। वे दर्शकों को...
‘मैंने बचपन में ही जान लिया था कि चमार होने का मतलब क्या है’
जिस जाति और जिस परंपरा के साये में मेरा जन्म हुआ, उसमें मैं इंसान नहीं, एक जानवर के रूप में जन्मा था। इंसानों के...
फुले पर आधारित फिल्म बनाने में सबसे बड़ी चुनौती भाषा और उस कालखंड को दर्शाने की थी : नीलेश जलमकर
महात्मा फुले का इतना बड़ा काम है कि उसे दो या तीन घंटे की फिल्म के जरिए नहीं बताया जा सकता है। लेकिन फिर...