जातिवादी कारणों से हुई मायावती-अखिलेश की हार

लेखक बापू राऊत के मुताबिक उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन की हार की एक बड़ी वजह यह रही कि मायावती ने खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया। आज भी यह देश एक दलित को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकारने को तैयार नहीं है

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का गठबंधन हुआ। यह गठबंधन केवल दो या तीन पार्टियों का नहीं था, वह था जाट-दलित-ओबीसी और मुस्लिम समुदाय का। लगता था यह गठबंधन भाजपा को पराजित करेगा। इसके पीछे की कहानी भी सटीक और गणनात्मक थी। वह थी गोरखपुर और फूलपुर में गठबंधन के उम्मीदवारों की अप्रत्याशित जीत। दोनों सीटें क्रमश: मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की गढ़ मानी जाती थीं। इस लिहाज से गठबंधन के जमीनी सामाजिक और जातीय आकड़ों का पलड़ा भाजपा से कहीं अधिक भारी था। लेकिन, उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन के जीतने की समाजशास्त्रियों तथा चुनावी पंडितों की  भविष्यवाणियां धरी की धरी रह गईं।

आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि कांग्रेस गठबंधन न होने से दस सीटों पर सपा-बसपा को नुकसान हुआ। भाजपा का वोट प्रतिशत 2014 के मुक़ाबले 42.3 प्रतिशत से बढ़कर 50.7 प्रतिशत होकर 62 सीटों पर जीत हासिल हुई। जब की सपा और बसपा का संयुक्त प्रदर्शन खराब रहा। 2019 में सपा-बसपा ने जिन सीटों पर चुनाव लड़ा, उसमें क्रमशः उनके वोट शेयर 38.4 प्रतिशत और 40.8 प्रतिशत रहे। इस प्रकार कुल वोटों में उनकी हिस्सेदारी 39.6 प्रतिशत रही। 10 सीटों के साथ बसपा का स्ट्राइक रेट 26.3 प्रतिशत औार 5 सीटों के साथ सपा का स्ट्राइक रेट 13.5 प्रतिशत रहा। इससे स्पष्ट होता है कि समाजवादी पार्टी के वोटरों ने गठबंधन का साथ नहीं निभाया। (आधार: द्विवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डाटा)

बसपा प्रमुख मायावती और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव

जैसे ही सपा-बसपा का गठबंधन की घोषणा की गयी, वैसे ही भाजपा ने छोटी जातियों पर डोरे डालने शुरू कर दिया। उत्तर प्रदेश में ओबीसी में 79 उपजातिया हैं। भाजपा ने यादव जाति को छोड़ मुख्यत: कुर्मी (4.5 प्रतिशत), लोध (2.1 प्रतिशत), निषाद(2.4 प्रतिशत), गुज्जर(2 प्रतिशत), तेली(2 प्रतिशत), कुम्हार(2 प्रतिशत), नाई(1.5 प्रतिशत), सैनी(1.5 प्रतिशत), कहार(1.5 प्रतिशत), काछी(1.5 प्रतिशत) आदि जातियों को सत्ता में भागीदारी के सपने दिखाए। इनके कारण भाजपा को ओबीसी का 26 से 27 प्रतिशत वोट प्राप्त हुआ। संघ और भाजपा ने ऐसी धारा चलाई, जहां संघ के घेरे में न जानेवाली जातियां भी चली गईं। वही, उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों का वोट शेयर 22 से 23 प्रतिशत है। अनुसूचित जातियों में 65 जातियां शामिल हैं। यहां पर भी भाजपा ने जाटव को छोड़ गैरजाटव जातियों यथा पासी (3.2 प्रतिशत), खटिक(1 प्रतिशत), धोबी(1.4 प्रतिशत), कोरी (1.3 प्रतिशत), वाल्मीकि(1 प्रतिशत) समुदायों को अपने साथ लिया। इस प्रकार इन जातियों का 9 से 10 प्रतिशत वोट भाजपा को मिल गया। इस तरह अनुसूचित जाति और पिछड़ों के करीब 37 प्रतिशत वोट भाजपा को मिले।  

सवाल एक बार फिर कि ऐसा क्या हुआ कि सपा को केवल 5 सीटें और बसपा 10 सीटों पर सिमट गई। जातिगत समीकरणों के लिहाज से 78  प्रतिशत वाला यह गठबंधन आखिर क्यों पराजित हुआ। बहुजनवाद प्रभावकारी साबित क्यों नहीं हुआ? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कह दिया है कि अंकगणित की जगह केमिस्ट्री ने काम किया।

क्या सचमुच मोदी की जीत केमिस्ट्री से हुई है? या गठबंधन की हार जातिवादी मानसिकता के कारण हुई? यह देखना जरूरी है। मोदी के केमिस्ट्री के तथ्यांश कुछ इस प्रकार हैं।

मोदी और अमित शाह मंजे हुए रणनीतिकार हैं। साम, दाम, दंड, भेद, लालच और भावुकता के प्रसार में वे माहिर हैं। मोदी की नीति को विरोधी पार्टियां समझ नहीं सकीं। वे अपने गणितीय  आकड़ों में ही लगी रहीं। मोदी-शाह ने चुनावी प्रचारों मे धर्म, हिन्दुत्व और मंदिर की राजनीति की। अनुसूचित जाति को लुभाने के लिए मोदी वाराणसी के संत रैदास के मंदिर में लंगर के लिए बैठ गए।  उन्होंने ‘समरसता भोज’ नाम से अनुसूचित जाति-पिछड़ों के घर भोजन के लिए अपने नेताओं को कहा। मोदी भले ही दोषियों पर कार्यवाही न करें, लेकिन दलितों की हत्या पर भावुक होकर रो देते हैं। वे मुसलमानों के लिंचिग पर चुप रहते हैं। यह हिंदूओं के लिए एक सीधा मैसेज होता है। वे खुद को गरीब से भी गरीब बताते हैं। उन्होंने कुंभ मेले में सफाई कर्मचारियों के पैर धोकर वाल्मिकी समाज को अपनेपन का मैसेज दे दिया। सफाई कामागारों के लिए यह प्रसंग सपनों से कम नहीं था।

कुंभ मेले के दौरान सफाईकर्मियों के पैर धोते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

दूसरा, अमित शाह ने बहराईच में राजभर जाति के राजा सुहेलदेव की मूर्ति का अनावरण किया। उन्होंने सुहेलदेव को हिंदू रक्षक कहकर सोमनाथ मंदिर तोड़ने आए मुसलमान राजाओं को पराजित करने का दावा किया। यह कहकर अमित शाह ने पिछड़ों को गोलबंद किया। तीसरा, भाजपा ने गैर यादव ओबीसी जातियों को समाजवादी पार्टी से और गैर जाटव समुदाय को बहुजन समाज पार्टी से तोड़ने की रणनीति बनाई। भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य द्वारा अनुसूचित जाति एवं पिछड़ों के 150 सम्मेलन करवाये। चौथा, चुनाव के समय में नीरव मोदी को अरेस्ट किया गया। भाजपा ने इसका भी फायदा उठाया। बालाकोट में हुए सैन्य कार्यवाही को हिंदू राष्ट्रवाद से जोड़ा। इन सभी ने मोदी को बंपर जीत दिला दी।

उत्तर प्रदेश के बहराइच में राजा सुहेलदेव की प्रतिमा का अनावरण करते अमित शाह

भाजपा के विजय में हमेशा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद्, वनवासी कल्याण संघ और दुर्गा वाहिनी जैसे संगठनों का हाथ रहा। इन संगठनों के अपने कैडर होते हैं। जिसका कैडर मजबूत होता है, उस पार्टी को चुनाव में हराना कठिन होता है। यह भविष्य में भाजपा के विरोधियों के लिए बड़ी चुनौती है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में कोई कैडर बेस कार्यकर्ता और सामाजिक संगठन नहीं है। समय आने पर गांधी परिवार को छोड़ सभी कांग्रेसी नेता भाजपा में शामिल हो सकते हैं। क्योंकि कांग्रेसी नेताओं के लिए विचारधारा नहीं सत्ता महत्वपूर्ण है। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम ने पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ विभिन्न सामाजिक संस्थागत कैडर बनाया था। कांशीराम फ़क़ीर के रूप में प्रसिद्ध थे। इसीलिए बहुजन समाज पर उनका प्रभाव था। लेकिन मायावती ने बसपा का नेतृत्व संभालते ही कैडर को ख़त्म किया। जनाधार वाले नेताओं को पदों से हटा दिया। कांशीराम ने बहुजन समाज के जिन छोटे-छोटे घटकों को साथ लिया उसे भी मायावती ने एक-एक कर अलग कर दिया। ‘जिसकी संख्या भारी उसकी उतनी भागीदारी’ के नारे को छोड़ दिया गया। बसपा में युवाओं और महिलाओं की भागीदारी को महत्त्व नहीं दिया जाने लगा।

यादें शेष : मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम

इस प्रकार मायावती ने कांशीराम द्वारा निर्मित बसपा के ढांचे को गिरा दिया। उनके (माायावती) उपर पिछड़ी जाति के नेताओं की अनदेखी करने और ऊंची जाति को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है। केवल आरक्षित सीटों पर दलितों को टिकट दिया जाता है। बसपा में भाई-भतीजावाद का आरोप भी लगता रहा है। इन सबका असर चुनावी नतीजों पर होना ही था।

सपा-बसपा गठबंधन की हार ‘जातिवादी’ मानसिकता’ के कारण हुई है। इसे नकारा नहीं जा सकता। मायावती द्वारा खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करना भी उत्तर प्रदेश में गठबंधन के पराजय का कारण बना। भारत की जातिवादी मानसिकता इतनी प्रबल है कि वह सरलता से किसी भी दलित को प्रधानमंत्री बनने नहीं देगी। मायावती प्रधानमंत्री न बनें, इसीलिए यादवों और गैर-यादवों ने भाजपा को वोट दिया। इसके स्पष्ट संकेत मिलते हैं। आरएसएस और उसके संगठनों ने इसका प्रचार भी किया। हालत यह रही कि मायावती के प्रधानमंत्री बनने के डर से यादवों ने समाजवादी पार्टी को भी वोट नही दिया।

बहरहाल, यही फर्क है अमेरिकी और भारत की जनता में। अमेरिकी जनता बराक ओबामा को राष्ट्रपति बना सकती है, लेकिन भारत की जनता आज भी उंच-नीच के दलदल में फंसी हुई है। भारत की पुरानी जातीवादी सामाजिक संरचना आज भी टस से मस नहीं हुई है। संघ के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए इसकी संभावना तेज होती जा रही है कि जातिवादी संकीर्णता मजबूत होगी। आज भारत का भविष्य अंधेरों से टकरा रहा है। पता नहीं, उजाले के दीये कब बुझा दिए जाएंगे?   

(कॉपी संपादन : नवल)


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