आंबेडकर के हाथ में संविधान ही क्यों?

लेखक हेसूस याचरेज बता रहे हैं कि आखिर आंबेडकर को हमेशा केवल संविधान के साथ ही क्यों दिखाया जाता है। उनके हाथों में कभी ‘जाति का विनाश’ या ‘बुद्ध और उनका धम्म’ क्यों नहीं होती?

चाहे मूर्ति हो या पोस्टर, डाक टिकट अथवा होलोग्राम, डॉ. बी. आर. आंबेडकर को लगभग हमेशा भारत के संविधान को अपने बाजू में दबाये दिखाया जाता है। यह दिलचस्प है कि संविधान की प्रति अपने हाथों में लेकर या बाजू में दबाकर उन्होंने कभी अपना फोटो नहीं खिंचवाया। उन्हें संविधान के साथ दिखाने का उद्देश्य शायद इस महान दस्तावेज के निर्माण में उनकी भूमिका की याद दिलाना है। परन्तु पिछले कुछ समय से आंबेडकर की इस छवि का इस्तेमाल उन्हें भारतीय राष्ट्र के एक समर्पित सेवक और ऐसे राजनैतिक आंदोलनों – जो उनके सिद्धांतों और लक्ष्यों के खिलाफ थे (जैसे हिन्दू दक्षिणपंथी आन्दोलन) – के समर्थक के रूप में प्रस्तुत करने के लिए किया जा रहा है। मुझे ऐसा करने वालों के इरादे संदेहास्पद लगते हैं। संविधान के निर्माण में आंबेडकर की भूमिका को कभी नहीं भुलाया जा सकता। परन्तु क्या हमें एक क्रन्तिकारी सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता और समालोचक के रूप में उनके काम को भी याद नहीं रखना चाहिये? यह अजीब है कि आंबेडकर को हमेशा संविधान के साथ दिखाया जाता है। उनके हाथों में कभी ‘जाति का विनाश’ या ‘बुद्ध और उनका धम्म’ नहीं होती (उन्हें मनुस्मृति का दहन करने वाले के रूप में भी तो याद किया जा सकता है!)। आंबेडकर ने जो कुछ भी कहा और किया, वह हिन्दू राष्ट्र के आख्यान से मेल नहीं खाता है परन्तु यह महत्वपूर्ण है कि हम उसे याद रखें। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि आंबेडकर अपने बाजू में संविधान क्यों दबाये हुए हैं और उन्हें उस रूप में ही क्यों याद किया जाता है?  

आंबेडकर को संविधान का मसविदा तैयार करने वाली समिति का अध्यक्ष क्यों बनाया गया, इस बारे में कई गलतफहमियां हैं। आम तौर पर माना जाता है कि समझदार, परिपक्व और उदार गांधी ने इस पद के लिए आंबेडकर का नाम नेहरु को प्रस्तावित किया था। डॉ. आंबेडकर पर जब्बार पटेल की फिल्म, जो मोटे तौर पर तथ्यात्मक है, भी हमें यही बताती है। परन्तु तत्कालीन घटनाक्रम को ध्यान से देखने पर हमें पता चलेगा कि गांधी ने आंबेडकर के मसविदा समिति का अध्यक्ष बनने की राह में भरसक रोड़े अटकाए थे। यह आश्चर्यजनक नहीं था क्योंकि 1930 के दशक से ही गांधी और आंबेडकर के रिश्ते तनावपूर्ण थे। दलितों के राजनैतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर दोनों के बीच टकराव शुरू हुआ और इसके  बाद 1932 में पूना पैक्ट पर दस्तखत हुए। उस समय, गांधी ने दलितों को ‘हरिजन’ का नाम दिया था। यह नामकरण दलितों के ‘हिन्दू’ होने पर जोर देता था। इसके विपरीत, आंबेडकर का तर्क था कि चूंकि हिन्दू ही दलितों के मुख्य दमनकर्ता हैं अतः केवल पृथक मताधिकार के ज़रिए ही दलित अपनी आवाज़ दुनिया को सुना पाएंगे। सन 1940 के दशक में भी आंबेडकर और गांधी के मतभेद सुलझ नहीं सके।

आंबेडकर की मूल प्रतिमा की तस्वीर पर आधारित काल्पनिक तस्वीर।

स्वतंत्रता के ठीक पहले के कुछ वर्षों में राजनैतिक दृष्टि से आंबेडकर अत्यंत विकट स्थिति में थे। उनकी मान्यता थी कि पूना पैक्ट ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि दलित कभी राजनैतिक दृष्टि से इतने शक्तिशाली नहीं बन सकेंगे कि वे अपने हालात को बेहतर बना सकें। आंबेडकर को आशंका थी कि स्वतंत्र भारत की सरकार, दलितों को गुलाम बना कर रखेगी और वे कष्ट भोगते रहेंगे। यह मान्यता पूरी तरह से बेबुनियाद भी नहीं थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण और कांग्रेस को खुश करने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने आंबेडकर को समर्थन देना बंद कर दिया था। मुस्लिम लीग पाकिस्तान के निर्माण के लिए दबाव बना रही थी। ऐसी परिस्थितियों में आंबेडकर राजनैतिक दृष्टि से अकेले पड़ गए थे। यही कारण था कि वे दलितों के लिए देश के बाहर से समर्थन जुटाने का यत्न करने लगे। उन्होंने इंग्लैंड की यात्रा की और विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं वाले अंतर्राष्ट्रीय नेताओं को पत्र लिखे। इनमें शामिल थे अफ्रीकी-अमरीकी समाजशास्त्री और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता डब्यू. ई. बी. डू बोयस और यहां तक कि विंस्टन चर्चिल भी। आंबेडकर ने कई पुस्तकें भी प्रकाशित कीं, जिनका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह बताना था कि हिन्दू धर्म और कांग्रेस किस तरह दलितों का दमन कर रहे हैं। ऐसी ही एक पुस्तक थी, ‘व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबिल्स’, जो 1945 में प्रकाशित हुई। 

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की उपस्थिति में, डॉ राजेंद्र प्रसाद, आंबेडकर को देश के विधि मंत्री के रूप में शपथ दिलाते हुए.

गाँधी भी चुपचाप नहीं बैठे। उन्होंने के. संथानम और सी. राजगोपालाचारी से आंबेडकर की पुस्तक का जवाब देने को कहा। तदानुसार, 1946 में संथानम और राजगोपालाचारी की क्रमशः ‘आंबेडकर्स अटैक’ और ‘आंबेडकर रिफ्युटिड’ शीर्षक पुस्तकें प्रकाशित हुईं। दोनों पुस्तकों में यह दावा किया गया था कि आंबेडकर दलितों के असली और सच्चे प्रतिनिधि नहीं हैं और ना ही दलितों पर उनका कोई प्रभाव है। गांधी ने सरदार पटेल को भी चेतावनी दी कि वे आंबेडकर से सावधान रहें। सन 1946 के आसपास, आंबेडकर और पटेल ने स्वतंत्र भारत में दलितों के भविष्य पर चर्चा शुरू की। आंबेडकर चाहते थे कि विधानमंडलों में दलितों को ज्यादा आरक्षण मिले जबकि पटेल को लग रहा था कि यह कांग्रेस के सबसे मुखर आलोचकों में एक को पार्टी में शामिल करने का सुनहरा मौका है। इस चर्चा के बारे में पता चलने पर, 1 अगस्त 1946 को, गांधी ने पटेल को लिखा कि आंबेडकर ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जिन पर भरोसा किया जा सके। उन्होंने लिखा – “ऐसे व्यक्ति से हमें बहुत सावधान रहना होगा जो अपनी सुविधानुसार कभी भी ईसाई, मुसलमान या सिक्ख बन जाता है और फिर अपने धर्म में वापस भी आ जाता है।” कुल मिलाकर, इस बात की बहुत कम सम्भावना है कि गांधी ने संविधान की मसविदा समिति के अध्यक्ष पद के लिए आंबेडकर का नाम प्रस्तावित किया होगा।  

दिल्ली में संसद भवन के सामने आंबेडकर की प्रतिमा

कांग्रेस ने व्यावहारिक कारणों से आंबेडकर को नेहरु सरकार में शामिल किया। स्वतंत्रता के बाद, आंबेडकर राजनैतिक दृष्टि से बहुत कमज़ोर हो गए थे। बंगाल से चुने जाने के बाद, उन्होंने संविधानसभा की अपनी सदस्यता खो दी थी। जोगेंद्र नाथ मंडल, जिन्होंने आंबेडकर के चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी, पाकिस्तान चले गए। आंबेडकर के सामने अब जो विकल्प थे वे बहुत सीमित और कठिन थे। वे बम्बई लौट कर अपने साथियों को फिर से इकठ्ठा करने का यत्न कर सकते थे या अन्दर से व्यवस्था को बदलने का प्रयास कर सकते थे। आंबेडकर ने दूसरा विकल्प चुना।

कांग्रेस और नेहरु को लगा कि नई सरकार के आलोचकों को तुष्ट करने का यह एक अच्छा मौका है। नेहरु और पटेल, देश में सभी प्रकार के मतभेदों और असहमतियों को कम करना चाहते थे, फिर चाहे वे दलितों से संबंधित हों, मुसलमानों से या फिर राजे-रजवाड़ों से। आंबेडकर की कमज़ोर स्थिति के मद्देनजर, कांग्रेस ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद के ज़रिए, संविधान सभा के सदस्य के बतौर एम.आर. जयकर के स्थान पर आंबेडकर का चुना जाना सुनिश्चित किया। संक्षेप में, आंबेडकर ने नेहरु मंत्रिमंडल का हिस्सा बनना इसलिए स्वीकार किया ताकि वे स्वतंत्र भारत में दलितों को अधिक से अधिक अधिकार दिलवा सकें।     

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परन्तु उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी। नेहरु की यह अपेक्षा थी कि आंबेडकर मज़बूत और एकताबद्ध भारत के पक्ष में खड़े हों और पाकिस्तान में रह गए दलितों को भारत में बसने के लिए प्रोत्साहित करें। नेहरु ने यह साफ़ कर दिया था कि आंबेडकर को कांग्रेस की निंदा करने से बचना होगा। जैसे, अप्रैल 1948 में जब आंबेडकर ने कांग्रेस के प्रति कुछ असंतोष जाहिर किया, तब नेहरु ने आंबेडकर को पत्र लिखकर यह चेतावनी दी कि कैबिनेट का सदस्य होने के नाते उन्हें, “कांग्रेस के प्रति मित्रवत भाव रखना होगा या कम से कम, ऐसी बातें करने से बचना होगा, जिन्हें कांग्रेस पर हमले के रूप में देखा जाए।”  इस प्रकार, नेहरु का आंबेडकर को उनकी सरकार में शामिल होने का निमंत्रण, एक तरह से उनकी नयी सरकार के विरोध और उसकी आलोचना को भोंथरा करने के प्रयास का हिस्सा था। 

संसद भवन के सामने डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा। इस प्रतिमा में उनके हाथ में संविधान की प्रति प्रदर्शित की गयी है।

संविधान की मसविदा समिति के सदस्य बतौर अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वहन करने के पश्चात भी आंबेडकर को यह लगता रहा कि संविधान शायद दलितों के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं ला सकेगा। आज हम पाते हैं कि संविधान के मिश्रित नतीजे हुए हैं। आज भी करोड़ों लोग अछूत प्रथा का दंश झेल रहे हैं और संविधान उन्हें इससे मुक्ति नहीं दिला सका है। संविधान की प्रति बाजू में दबाये आंबेडकर, दलित एकता और सशक्तिकरण के प्रतीक बन गए हैं। उनकी इस छवि का प्रयोग उन्हें देश के एक वफादार सेवक और जाति प्रथा पर आधारित राजनैतिक व्यवस्था के पक्षधर के रूप में प्रस्तुत करने के लिए किया जा रहा है। आंबेडकर को केवल संविधान निर्माता बताने से काम नहीं चलने वाला है। आंबेडकर को जाति, अछूत प्रथा, सामाजिक अन्याय, कांग्रेस और गाँधी के आलोचक के रूप में भी याद रखा जाना चाहिए।

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : नवल) 


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