पी.एस. कृष्णन : एक सामाजिक कार्यकर्ता जो नौकरशाह भी थे 

पी.एस. कृष्णन जब करीब 10 साल के थे, तब उन पर एक जुनून सवार हो गया। और इस जुनून ने जीवनपर्यन्त उनका साथ नहीं छोड़ा। यह जुनून था भारतीय समाज के कोढ़ जाति से मुकाबला करने का। वासंती देवी लिखती हैं कि कृष्णन का मत था कि जाति, भारत की सभ्यतागत विभाजक रेखा है  

पी.एस. कृष्णन (30 दिसंबर 1932 – 10 नवंबर 2019) भारतीय समाज के दमित और शोषित तबकों के असाधारण पैरोकार थे। उनके जीवन का एक ही लक्ष्य था – देश के वंचितों, तिरस्कृतों और शोषितों के लिए काम करना। बचपन से लेकर मृत्यु तक उनके संपूर्ण जीवन को जोड़ने वाला यदि कोई सूत्र था तो वह था सामाजिक न्याय।   

पी.एस. कृष्णन जब करीब 10 साल के थे, तब उन पर एक जुनून सवार हो गया। और इस जुनून ने जीवनपर्यन्त उनका साथ नहीं छोड़ा। यह जुनून था भारतीय समाज के कोढ़ जाति से मुकाबला करने का। कृष्णन मानते थे कि जाति भारत की सभ्यतागत विभाजक रेखा है।

‘उच्चतम’ जाति में जन्में कृष्णन ने इतिहास की सबसे लम्बे समय तक जिंदा रहनी वाली नितांत अमानवीय व्यवस्था के खिलाफ धर्मयुद्ध छेड़ा – मनुष्यों का अवमूल्यन करने वाली उस कुत्सित व्यवस्था के खिलाफ, जिसका अंत दूर-दूर तक नज़र नहीं आता। वे अपने उद्देश्य के प्रति इतने समर्पित थे कि उसे पाने के संघर्ष में उन्हें जो सफलताएं और असफलताएं मिलीं, वे उनके जीवन की व्यक्तिगत सफलताएं और असफलताएं बन गईं।

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अपने गृह प्रदेश केरल में अपने बचपन के दिनों से लेकर आंध प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी के बतौर राज्य में विभिन्न पदों और फिर केंद्रीय सरकार में सचिव के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान कृष्णन ने पूरी शिद्दत और  समर्पण से अनुसूचित जातियों (एससी), अनुसूचित जनजातियों (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) और इन वर्गों के अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों की उन्नति और सशक्तिकरण के लिए काम किया। आईएएस से सेवानिवृत्ति के बाद भी वे इस मिशन में जुटे रहे। 

पी.एस. कृष्णन

उन्होंने शासन प्रणाली और प्रशासनिक व्यवस्था को वंचित वर्गों की भलाई का जरिया बनाने का प्रयास किया। ऐसा नहीं है कि भारतीय समाज में व्याप्त असमानताओं को पहले कभी चुनौती नहीं दी गयी हो। परन्तु कृष्णन के मामले में जो अलग था वह यह कि उन्होंने व्यवस्था के अन्दर से, भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के फौलादी ढांचे के अंग के रूप में और एक शीर्ष नौकरशाह की हैसियत से उसे चुनौती दी। पी.एस. कृष्णन का जीवन और उनके कार्य अनूठे थे। देश में शायद ही उनकी तरह का कोई दूसरा नौकरशाह होगा।    


कृष्णन ने जब अपना करियर शुरू किया, उस समय भारत में कई तरह के दमन आम थे – और काफी हद तक आज भी हैं। वे एक अनूठी विचारधारा से प्रेरित थे, जो, उनके अनुसार, आंबेडकर, गाँधी, मार्क्स, नारायण गुरु, विवेकानंद और पेरियार की विचारधाराओं का संश्लेषण थी। विचारधाराओं के इस संश्लेषण से प्रेरणा ग्रहण करते हुए और भारत की हजारों जातियों और उनके क्षेत्रीय स्वरूपों की अपनी गहन जानकारी का उपयोग करते हुए उन्होंने अपनी रणनीतियां बनायीं. ये रणनीतियां संविधान और विधि सम्मत होने के साथ-साथ, अत्यंत विस्तृत और गहन भी होती थीं। वे कहते थे कि जब वे प्रशासनिक सेवा में दाखिल हुए, तभी से वे भारत में गहरे तक जडें जमाए जाति व्यवस्था के खिलाफ और सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए बिना कोई समझौता किये लड़ने के लिए कटिबद्ध थे। 

एक युवा अधिकारी के तौर पर उन्होंने 1957 में एससी बस्तियों, आदिवासी गांवों और श्रमशील पिछड़े वर्गों के रहवास के स्थलों में कैंप लगाने की परंपरा शुरू की। इससे इन वर्गों में तो आत्मविश्वास और आत्मसम्मान जागा परन्तु ‘ऊंची’ जातियों के लोग आगबबूला हो गए। इस शुरूआती दौर के उनके किस्से बहुत दिलचस्प हैं। गांवों में रहने के दौरान जातिगत दमन के दानव और भीषण गरीबी से उनका सामना हुआ। डिप्टी-कलेक्टर और बाद में कलेक्टर की हैसियत से गांवों की उनकी यात्राओं का अभावों और पीड़ा के इन केन्द्रों पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे गांवों में ‘जमाबंदी’ करते और स्थानीय लोगों के साथ खाते-पीते और रहते। उस समय दलित प्रतिरोध और दलित चेतना तो छोड़िये, दलित शब्द ही प्रचलन में नहीं था। हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं कि जब ‘ऊंची’ जातियों के लोगों को ‘निम्न’ वर्गों की बस्तियों की तंग और मलिन गलियों से गुज़र कर, कलेक्टर से अपना कोई काम करवाने जाना पड़ता होगा तो उन पर क्या गुज़रती होगी। आश्चर्य नहीं कि उन्हें समाज के वर्चस्वशाली वर्गों के विरोध, शत्रुता और प्रताड़ना का सामना करना पड़ा।


केवल ‘ऊंची’ जातियां ही उनसे नाराज़ नहीं थीं। स्वयं को आम लोगों से ऊपर समझने वाले प्रशासनिक तंत्र को भी यह समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपने इस विद्रोही सदस्य से कैसे निपटे – एक ऐसे सदस्य से जो उस तंत्र की शक्ति की जड़ों पर निर्मम प्रहार कर रहा था। उन्हें अपने वरिष्ठों के गुस्से और प्रतिशोध का सामना भी करना पड़ा। लीक से हट कर प्रशासन चलने के कारण उन्हें कई बार उनके ऊपर के अधिकारियों का कोपभाजन बनना पड़ा। परन्तु उनके अफसरों को निराशा ही हाथ लगी क्योंकि कृष्णन को सज़ा बतौर जहाँ भी पदस्थ किया जाता, वे वहीं अपना काम करने के रास्ते ढूँढ लेते। 

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उनके वरिष्ठ अधिकारी उन्हें कितनी बड़ी आफत और प्रशासनिक सेवा के लिए कितना बड़ा कलंक मानते थे, यह उनके सेवाकाल के प्रारंभिक दौर में उनकी वार्षिक गोपनीय चरित्रावली में उनके एक वरिष्ठ अधिकारी की इस टिपण्णी से जाहिर है :

“वे दमित वर्गों के प्रति अवांछित झुकाव रखते हैं, अंतर्जातीय विवाहों की जरूरत से ज्यादा वकालत करते हैं, संस्कृत के अपने ज्ञान का प्रयोग धर्म को खोखला सिद्ध करने के लिए करते हैं और ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी अधिकारियों पर विश्वास करने के बजाय गांव के निवासियों की बातों पर विश्वास करते हैं, जिससे ‘विध्वंसकारी तत्वो’ की मदद होती है।”


इस टिपण्णी का हर शब्द कृष्णन के अदम्य साहस और न्याय के लिए संघर्ष के प्रति उनके अडिग समर्पण की कहानी कहता है। उन्होंने इस प्रतिकूल टिपण्णी का जवाब देना तक गवारा नहीं किया। उलटे, उन्होंने ‘अंतर्जातीय विवाहों’ की जगह ‘जाति-विरोधी’ विवाहों की वकालत करनी शुरू कर दी। यहाँ तक कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह राय तक व्यक्त की कि एक ही जाति में विवाह को प्रतिबंधित करने वाला कानून बनाया जाना चाहिए। उनके शब्दों में, “मैंने जैविक व्यभिचार के अतिरिक्त, ‘सामाजिक व्यभिचार’ की संकल्पना प्रतिपादित की।”     

आंध्र प्रदेश में अपने सेवाकाल के शुरूआती वर्षों में उन्होंने भूमिहीनों और आवासहीनों को खेती करने और मकान बनाने के लिए भूमि आवंटित करने के व्यापक अभियान शुरू किए। ये अभियान आंध्र प्रदेश के प्रशासनिक इतिहास में मील के पत्थर हैं। 

भारत सरकार में सचिव और अन्य पदों पर काम करते हुए उन्होंने एससी,एसटी, ओबीसी व अल्पसंख्यकों के कल्याणार्थ और उनके सशक्तिकरण के लिए कई महत्वपूर्ण कानूनों की परिकल्पना की और उन्हें लागू करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। अनेक संवैधानिक संशोधनों और अधिनियमों के पीछे उनका दिल,-दिमाग और हाथ था। इनमें शामिल हैं संविधान (65वां संशोधन) अधिनियम, 1990, जिसने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति आयोग को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया; दलित बौद्धों को एससी कर दर्जा देने वाला कानून, एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (और बाद में, एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2015); मैनुअल सफाई कर्मचारियों और शुष्क शौचालयों के निर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1993  (और बाद में, उसका संशोधित संस्करण, हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013)। उनके अथक प्रयासों से ही मंडल आयोग की रपट को ठंडे बस्ते से निकाला जा सका और विश्वनाथ प्रताप सिंह को इस बात के लिए राजी किया जा सका कि सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देते हुए उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था की जाय। 

कानूनों के अलावा, कृष्णन समाज के हाशियाकृत वर्गों की स्थिति में सुधार के लिए कई कार्यक्रमों के निर्माता भी थे। इनमें शामिल थे, 1978 में लागू एससी विशेष घटक योजना, राज्यों की विशेष घटक योजनाओं के लिए विशेष केंद्रीय सहायता योजना और राज्यों के एससी विकास निगमों के लिए विशेष केंद्रीय सहायता योजना। 

जिन कानूनों और कार्यक्रमों के निर्माण और क्रियान्वयन में कृष्णन ने भूमिका अदा की थी, उनमें से लगभग प्रत्येक को न्यायालय में चुनौती दी गयी। कृष्णन को यह पहले से ही पता रहता और हर बार उन्होंने अत्यंत कुशाग्रता से मुकाबला करने के लिए विस्तृत तर्क तैयार किया, जिनसे यह साबित हुआ कि ये सभी निर्णय, क़ानूनी दृष्टि से वैध थे। इनमें शामिल थे ओबीसी के लिए शासकीय नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण और आंध्र प्रदेश में पिछड़े मुसलमानों को चार प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय।

सन् 1990 में, आईएएस से अपनी सेवानिवृत्ति के बाद, वे 1991-92 में राष्ट्रीय एससी-एसटी आयोग के सदस्य, 1993 में पिछड़े वर्गों पर विशेषज्ञ समिति के सदस्य और 1993-2000 तक राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य-सचिव रहे। पिछड़ा वर्ग आयोग में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था का क्रियान्वयन करवाया और इन वर्गों की केंद्रीय सूची तैयार की। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि ऐसे पिछड़े समुदायों को उसमें शामिल किया जाए, जो किसी कारण उसमें शामिल नहीं हो सके थे और जो समुदाय पिछड़े नहीं थे, उन्हें उससे बाहर रखा जाये। 

सन् 2006 में, भारत सरकार ने पिछड़े वर्गों को शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण देने के निर्णय का उच्चतम न्यायालय में बचाव करने के लिए सलाहकार के रूप में उनकी सहायता ली। नतीजे में, 2008 में अदालत ने इस निर्णय को वैध ठहराया। सन् 2007 में आंध्र प्रदेश सरकार ने मुसलमानों के सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान करने हेतु सलाहकार के रूप में उन्हें नियुक्त किया। राज्य सरकार ने इन वर्गों को चार प्रतिशत आरक्षण देने के लिए कानून बनाया। कृष्णन ने पहले उच्च न्यायलय और उसके बाद उच्चतम न्यायलय में इस निर्णय का बचाव करने में राज्य सरकार का पथ प्रदर्शन किया।

वे एससी, एसटी व ओबीसी, जिनमें मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के पिछड़े तबके शामिल थे, के अधिकारों के लिए काम करने वाले अनेक गैर-सरकारी संगठनों से जुड़े थे। वे इन समुदायों से सम्बद्ध योजना आयोग के अनेक कार्यकारी समूहों और संचालन समितियों व शासकीय समितियों के अध्यक्ष और सदस्य रहे। 

कृष्णन सामाजिक न्याय पर कई पुस्तकों, दस्तावेजों और शोधप्रबंधों के लेखक हैं. इनमें से कुछ प्रकाशित हो चुके हैं और कुछ प्रकाशनाधीन हैं। अपनी अंतिम सांस तक वे एससी, एसएसटी व ओबीसी, विशेषकर उनकी अत्यंत व अति पिछड़ी जातियों की समग्र प्रगति के लिए क़ानूनी उपायों व कार्यक्रमों का रोड मेप तैयार करने के लिए अत्यंत गंभीरता से काम कर रहे थे। उनका अंतिम लक्ष्य यही था कि ये समुदाय अगड़ी जातियों के समकक्ष पहुँच सकें। वे विशेष रूप से जिन मुद्दों पर काम कर रहे थे, उनमें शामिल था एससी के लिए विशेष घटक योजना, आदिवासी उप-योजना और एससी-एसटी विकास प्राधिकरणों के लिए केंद्रीय और राज्य विधानमंडलों में उपयुक्त कानून पारित करवाना। इस सिलसिले में पूरे देश की यात्राएं भी कर रहे थे।  

वह कौन-सी विचारधारात्मक और रणनीतिक राह है जिस पर चल कर हम देश के दमित वर्गों को उनकी दासता से पुर्णतः मुक्त कर सकते हैं? कृष्णन का यह दृढ विचार था कि भारत की समग्र प्रगति और विकास, केवल और केवल समाज के दमित वर्गों की मुक्ति और उनकी समानता से ही संभव हो सकता है। इस छोटे-से आलेख में कृष्णन की बहुआयामी योजना के विविध पहलुओं का विस्तार से वर्णन संभव नहीं है। वे यह मानते थे कि दमित वर्गों की लामबंदी से ही यह ऐतिहासिक लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। वे एकीकृत जाति-वर्ग दृष्टिकोण अपनाने के पक्षधर थे। वर्तमान में ग्रामीण भारत में मुख्य संघर्ष वर्चस्वशाली, भूस्वामी पिछड़ी जातियों और भूमिहीन दलितों, जिनमें से अधिकांश कृषि श्रमिक हैं, के बीच है। इसके साथ ही, यह भी सच है कि ओबीसी का एक बड़ा हिस्सा, जो सेवा प्रदायकर्ता और शिल्पकार है, भी भूमिहीन है। अगर गैर-वर्चस्वशाली, भूमिहीन पिछड़ी जातियां और दलित, जाति की हदों को लांघ कर लामबंद हो जाएं तो इससे दमित वर्गों की एकता स्थापित हो जाएगी और पूरे समाज की मुक्ति की राह प्रशस्त होगी। यह संयुक्त संघर्ष और सभी भूमिहीनों को भूमि का वितरण ही भारतीय समाज के समग्र परिवर्तन की कुंजी है।  

कृष्णन अपने पीछे हमारे लिए क्या ज़िम्मेदारी छोड़ गए हैं? उनके शब्दों में, “दलितों और अन्य वंचित वर्गों के सन्दर्भ में मैंने कई महत्वपूर्ण लक्ष्य हासिल किये हैं. परन्तु कई ऐसे मसले हैं, जिनके मामले में मैं अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुँच सका और उन पर आगे काम करना बाकी है। अपनी इस यात्रा में जो मुसीबतें और प्रताड़नाएं मैंने झेलीं, वे प्रशासन और अन्य पेशों की युवा पीढ़ी की सहायता करेगीं और उसे रास्ता दिखायेंगीं।”

कृष्णन का गुज़र जाना उन सब लोगों के लिए अपूर्णीय क्षति है जो न्याय, मानवाधिकारों और भारतीय संविधान के आदर्शों में आस्था रखते हैं और सभी भारतीयों की सामाजिक और आर्थिक प्रगति के हामी हैं। उनकी विरासत हमें जाति के पूर्ण उन्मूलन और न्याय और मानवाधिकारों पर आधारित दुनिया का निर्माण करने की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित करते रहेगी।  

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया संपादन : नवल)


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