विश्व पुस्तक मेला 2020 : आकर्षण के केंद्र में दलित-बहुजन पुस्तकें

विश्व पुस्तक मेले में दलित-बहुजन साहित्य की बढ़ती मांग का ही असर है कि वाणी प्रकाशन जैसे अग्रणी प्रकाशन संस्थान ने पृथक रूप से दलित साहित्य को जगह दी है और इसे ‘दलित का साहित्य’ कहा है

साहित्य समाज का ही प्रतिनिधित्व करता है। समाज में जिस तरह की हलचल होगी, साहित्य भी अपनी दिशा और दशा उसी हिसाब से बदलता रहता है। इसकी पुष्टि इस बार दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे  विश्व पुस्तक मेले (4-12 जनवरी, 2020) में भी हो रही है। दलित-बहुजन साहित्य की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसका एक सामयिक कारण यह है कि आज जिस तरह का माहौल देश में है, डॉ. आंबेडकर और उनके विचार अधिक प्रासंगिक हो रहे हैं। मेले में लोग सबसे अधिक भारतीय संविधान खरीद रहे हैं जिसके मुख्य शिल्पी डॉ. भीमराव आंबेडकर रहे हैं। 

थीम में गांधी, केंद्र में आंबेडकर  

सनद रहे कि आयोजकों ने इस बार पुस्तक मेले का थीम गांधी की 150 वीं जयंती को समर्पित किया है। इसके लिए बड़े-बड़े होडिंगों में गांधी  ‘लेखकों के लेखक’ करार दिया गया है। कई प्रकाशकों द्वारा गांधी साहित्य को प्रमुखता से दिखलाया भी जा रहा है। इसके बावजूद लोगों का अधिक जोर आंबेडकर और उनसे जुड़े साहित्य पर है। यह इस बात का प्रमाण भी है कि भले ही मुख्य धारा के नाम पर द्विज वर्ग आंबेडकर व उनके सिद्धांतों की उपेक्षा करे, लेकिन जो मशाल डॉ. आंबेडकर ने जलायी थी, वह बुझने वाली नहीं है।

ए. के. गौतम, गौतम प्रकाशन, नई दिल्ली

दलित-बहुजन साहित्य के प्रति लोगों की बढ़ती दिलचस्पी के संबंध में गौतम प्रकाशन से जुड़े ए. के. गौतम बताते हैं कि आज दलित-बहुजन समाज समझ गया है कि उसे किस तरह के विचार चाहिए और किस तरह का साहित्य पढ़ना चाहिए। जैसे द्विज वर्ग मनुवादी ग्रंथों को तरजीह देता है, वैसे ही हर जागरूक दलित-बहुजन भारतीय संविधान को पढ़ना चाहता है। बहुत सारे पाठक संविधान खरीद कर ले जा रहे हैं।

आकर्षण के केंद्र में फारवर्ड प्रेस की किताबें भी

वे अन्य किताबें कौन सी हैं, जो पाठकों को आकर्षित कर रही हैं, गौतम ने बताया कि सबसे अधिक आंबेडकर के भाषणों के संग्रह को लोग पसंद कर रहे हैं। इसके अलावा फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित किताबें जिनमें मदर इंडिया  (लेखक – मिस कैथरीन मेयो, अनुवादक – कंवल भारती) और जाति का विनाश (लेखक – डॉ. आंबेडकर, अनुवादक – राजकिशोर) आदि प्रमुख हैं। 

सम्यक प्रकाशन (हॉल नंबर 12ए, स्टॉल नंबर : 217-222) पर बिक्री के लिए उपलब्ध हैं फारवर्ड प्रेस की किताबें

दलित-बहुजन पुस्तकों के अग्रणी प्रकाशक सम्यक प्रकाशन के स्टॉल पर बड़ी संख्या में लोगों का आना भी इस बात की गवाही देता है कि दलित-बहुजन साहित्य की मांग बढ़ रही है। इस प्रकाशन से जुड़े कपिल बौद्ध ने बताया कि हम लोग हर बार इसकी कोशिश करते हैं कि दलित-बहुजन विचारों को समृद्ध करने वाली किताबें अधिक से अधिक प्रकाशित करें। इस बार हमलोगों ने दो चीनी यात्रियों ह्वेनसांग और फाहियान पर आधारित किताबें प्रकाशित की है। इन किताबों से बुद्ध के संबंध में उनके विचार सामने आते हैं। इन दोनों किताबों का संपादन राजेंद्र प्रसाद सिंह ने किया है।

कपिल बौद्ध, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली

कपिल बौद्ध ने बताया कि हमारे स्टॉल पर फारवर्ड प्रेस की सभी किताबें उपलब्ध हैं। इनमें ‘जाति का विनाश’ (डॉ. आंबेडकर), ‘मदर इंडिया’ (कैथरिन मेयो), ‘आरएसएस और बहुजन चिंतन’ (कंवल भारती), ‘दलित पैंथर: एक आधिकारिक इतिहास’ (अंग्रेजी, हिंदी, ज. वि. पवार), ‘महिषासुर: मिथक और परंपराएं’ (संपादन- प्रमोद रंजन), महिषासुर एक जननायक (संपादन- प्रमोद रंजन), ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ (संपादन- प्रमोद रंजन, आयवन कोस्का), ‘जाति के प्रश्न पर कबीर’ (कमलेश वर्मा), ‘बिहार की चुनावी राजनीति’ ( संजय कुमार), ‘फारवर्ड थिंकिंग’ (आयवन कोस्का), ‘चिंतन के जनसरोकार’ (प्रेम कुमार मणि), महिषासुर: ए पीपुल्स हीरो (संपादन- प्रमोद रंजन), ‘द केस फॉर बहुजन लिटरेचर’ (संपादन- प्रमोद रंजन, आयवन कोस्का) शामिल हैं।

दलित-बहुजन प्रकाशकों के स्टॉलों पर उमड़ रहा लोगों का हुजूम

दलित मीडिया संस्थान के रूप में स्थापित हो चुके दलित-दस्तक प्रकाशक के रूप में भी लोगों को प्रभावित कर रहा है। इनके स्टॉल पर भी लोग दलित-बहुजन सवालों पर आधारित किताबों में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। स्टॉल पर मौजूद कई लोगों की राय थी कि दलित-बहुजन समुदाय के लोगों को बहुजन पुस्तकों का अध्ययन जरूर करना चाहिए, क्योंकि द्विजों के साहित्य में इन समुदायों के विमर्शों को हाशिए पर जगह दी जाती है और उनका संदर्भ भी अक्सर नकारात्मक होता है।

क्या केवल दलितों के लिए है दलित साहित्य?

बहरहाल, विश्व पुस्तक मेले में दलित-बहुजन साहित्य की बढ़ती मांग का ही असर है कि वाणी प्रकाशन जैसे अग्रणी प्रकाशन संस्थान ने पृथक रूप से दलित साहित्य को जगह दी है और इसे ‘दलित का साहित्य’ कहा है। इस संबंध में एक खरीदार ने पूछा भी कि क्या ये किताबें (दलित साहित्य) केवल दलितों के हैं? क्या द्विज वर्गों को इन किताबों से कोई सरोकार नहीं? एक और खरीदार ने टिप्पणी की कि दलित का साहित्य कहकर वे बहुसंख्यकों के लिए आवश्यक किताबों का परिसीमन कर रहे हैं। इसकी आलोचना होनी चाहिए।

(संपादन : सिद्धार्थ/अनिल)

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