वायकम सत्याग्रह : जातिवाद और छूआछूत के खिलाफ स्वतं:स्फूर्त अहिंसक मुक्ति-संग्राम

छूआछूत के खिलाफ आंबेडकर के महाड़ सत्याग्रह (1927) के पहले दक्षिण भारत के केरल राज्य में वायकम सत्याग्रह हुआ। पेरियार इस सत्याग्रह से बाद में जुड़े। उनका नेतृत्व परिवर्तनकारी साबित हुआ। इस सत्याग्रह की 96वीं वर्षगांठ के मौके पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

वायकम सत्याग्रह (31 मार्च 1924) पर विशेष

आधुनिक भारत के इतिहास में जाति-आधारित वैषम्य और छूआछूत को टक्कर देने में जिन दो आंदोलनों की बड़ी भूमिका है, उनमें पहला है – वायकम सत्याग्रह; तथा दूसरा है, महाड़ सत्याग्रह। दोनों आंदोलनों में सत्याग्रहियों की जीत हुई थी। वायकम सत्याग्रह सार्वजनिक मार्गों पर चलने के अधिकार के लिए शुरू हुआ स्वत:स्फूर्त अहिंसक आंदोलन था। दूसरे का आह्वान और नेतृत्व डॉ. आंबेडकर ने किया था। अनेक उतार-चढाव से भरे, लगभग 3 महीनों तक चलने वाले वायकम सत्याग्रह की शुरुआत 31 मार्च 1924 को हुई थी।[1]

रास्ते पर चलने की नहीं थी अनुमति

त्रावणकोर रियासत सहित मद्रास प्रेसिडेंसी के अधीन आने वाली कई रियासतों में, छूआछूत के चलते, दलितों और शूद्रों को सार्वजानिक मार्गों पर चलने की आजादी नहीं थी। उसे लेकर जनता में गहरा आक्रोश था। गैर-ब्राह्मणों की मांग को देखते हुए त्रावणकोर सरकार ने 1865 में अध्यादेश के जरिए कानून बनाया था। उसके अनुसार राज्य के सभी नागरिकों को सार्वजनिक स्थानों पर आने-जाने की छूट दी गई थी। व्यवस्था की गई थी कि राज्य की सभी सड़कें, सभी नागरिकों के लिए खुली रहेंगी। कोई भी नागरिक उनपर आ-जा सकेगा। किंतु ब्राह्मण तथा राज परिवार के सदस्य इस आदेश का विरोध करते आ रहे थे। उनकी परवाह न करते हुए 1884 में सरकार की ओर से एक और आदेश जारी किया गया, जिसमें पिछली व्यवस्था का समर्थन किया गया था। उसे अपने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप बताते हुए विरोध में ब्राह्मणों ने त्रावणकोर उच्च न्यायालय में अपील कर दी। जिसमें मंदिर के आसपास की कुछ सड़कों पर अछूतों के लिए चलना निषिद्ध कर दिया गया। उस आदेश की अछूतों में तीखी प्रतिक्रिया हुई।

उसी रियासत के वायकम नामक कस्बे में महादेव का पुराना मंदिर था। उसमें अछूतों का प्रवेश निषिद्ध था। मंदिर के आसपास की कुछ सड़कें ब्राह्मणों और राज परिवार के सदस्यों के लिए आरक्षित थीं। अछूत उनपर चल नहीं सकते थे। इस अमानवीय व्यवस्था का विरोध लंबे समय से चला आ रहा था। 1805-06 में इझ़वा जाति के दो सौ युवाओं ने मंदिर में प्रवेश की नाकाम कोशिश की थी। वे सभी जोश में थे। आंदोलन का दिन तय हो चुका था। इस बीच उनके आंदोलन की भनक मंदिर के प्रशासकों को लग गई। उन्होंने राजा से संपर्क किया। उस समय थिरुनल बलराम वर्मा त्रावणकोर का राजा था। वह कमजोर और अदूरदर्शी राजा था। राज्य का प्रबंधन मुख्यत: दीवान वेलु थंपी के हाथों में था। वेलु थंपी क्रूर और सामंती प्रवृति का था।  मदद की उम्मीद के साथ पहुंचे मंदिर के संचालकों को उसने सभी आवश्यक कदम उठाने का आश्वासन देकर वापस लौटा दिया।

आंदोलनकारियों की मंदिर के पूर्वी दरवाजे से प्रवेश की योजना थी। उस रास्ते पर चलना अछूतों के लिए निषिद्ध था। थंपी ने उस आंदोलन को असफल करने की पूरी योजना बना ली। मुख्य मंदिर से 150 मीटर दूर एक तालाब था, जिसे “दलवाकुलम” कहा जाता था। परंपरा के अनुसार दलवाकुलम में स्नान करने के बाद ही श्रद्धालु वायकम मंदिर में दर्शन के लिए जाते थे। वेलु थंपी ने अपने भरोसेमंद नायर जाति के कुंजू कुटृटी पिल्ले और वायकम पपनावा पिल्ले को आंदोलनकारियों को सबक सिखाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी। उन दोनों ने दर्जन-भर हथियारबंदों को तालाब के पास छिपा दिया। जैसे ही इझ़वा युवकों ने मंदिर की दिशा में अपना शांतिपूर्ण मार्च शुरू किया, कुंजू कुटृी पिल्ले के सैनिकों ने उनपर धावा बोल दिया। वे निहत्थे आंदोलनकारियों पर टूट पड़े। उस हमले में दर्जनों युवा मारे गए। अनेक घायल हुए। मारे गए इझ़वा युवाओं की लाशों को तालाब में दफना दिया गया। केरल के इतिहास में वह घटना “दलवाकुलम हत्याकांड” के नाम से दर्ज है।

वाइकम, केरल में स्थापित पेरियार स्मृति संग्रहालय में पेरियार की प्रतिमा (तस्वीर : एफपी ऑन द रोड, 2017)

बीसवीं सदी के पहले दशक में मलयाली कवि, चिंतक और समाज सुधारक कुमारन आशान ने कोचू कुंजन सन्नार तथा कुंजू पन्निकर के साथ मिलकर अछूतों के सार्वजनिक मार्गों पर चलने के अधिकार की मांग की थी। ये तीनों भी इझ़वा समुदाय के थे। संबंधित अधिकारियों ने धार्मिक मामला बताकर उनकी मांग को ठुकरा दिया था। 1920-21 में आशान ने मामले को फिर त्रावणकोर की विधायिका में उठाया। इस बार उन्हें थोड़ी कामयाबी मिली। आशान को आश्वासन दिया गया कि प्रतिबंधित मार्गों में से कुछ को अछूतों के लिए खोल दिया जाएगा, परंतु लंबे समय तक वह केवल आश्वासन बना रहा। इसके साथ-साथ सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी को लेकर इझ़वाओं का आंदोलन भी चलता रहा।

नारायण गुरु का योगदान

नारायण गुरु का दक्षिण भारत के समाज सुधारकों में बड़ा नाम है। वे इझ़वा जाति के थे। एक बार वे अपने शिष्यों के साथ गाड़ी में सवार होकर मंदिर के बराबर से गुजर रहे थे। महाकवि और समाज सुधारक आशान सहित दलित-पिछड़ों के अनेक नेता उनके साथ थे। अचानक उच्च जाति के कुछ गुंडे आकर उनकी गाड़ी के आगे खड़े हो गए। उनका नेतृत्व एक ब्राह्मण कर रहा था। उपद्रवियों ने नारायण गुरु की गाड़ी को वहां से हटने के लिए विवश कर दिया। उस घटना का वर्णन सुप्रसिद्ध मलयाली कवि मुलूर एस. पद्मनाभा पणिक्कर ने अपनी कविता में इस प्रकार किया है –

‘बहुत पहले की बात है। महान नारायण गुरु रथ पर सवार होकर वायकम की सड़क से गुजर रहे थे। अचानक एक मूर्ख ब्राह्मण जो खुद को पृथ्वी का देवता कहता था, वहां आया। उसने नारायण गुरु के रथ को वहां से हटने का आदेश देने लगा।’

पेरियार का आगमन

सार्वजनिक मार्गों पर चलने की अछूतों की आजादी को लेकर अगले संघर्ष की शुरुआत टी.के.माधवन की पहल पर हुई थी। पेशे से वकील टी. के. माधवन का संबंध इझ़वा जाति से था। एक बार उन्हें अपने मुवक्किल के केस के सिलसिले में अदालत में उपस्थित होना था। अदालत महाराजा के परिसर के भीतर था। उस दिन महाराजा का जन्मदिन था। इस कारण सभी रास्तों को अच्छी तरह से सजाया गया था। अदालत जाने के लिए माधवन जब वहां पहुंचे तो ब्राह्मणों ने उन्हें टोक दिया। उनसे बाहर-बाहर चक्कर काटते हुए दूसरे रास्ते से अदालत जाने को कहा गया। घुमाव के बाद कोर्ट का फासला करीब डेढ़ किलोमीटर बढ़ जाता था। अदालत का समय हो चुका था। समय पर उपस्थित न होने के कारण केस माधवन के मुवक्किल के विरुद्ध भी जा सकता था। उन्होंने ब्राह्मणों से रास्ता छोड़ने का अनुरोध किया। मगर ब्राह्मण अड़ गए।

इस घटना ने माधवन सहित सभी गैर ब्राह्मण नेताओं को नाराज कर दिया। “देशाभिमानी” के संपादक और प्रमुख कांग्रेसी नेता जार्ज जोसेफ, “मातृभूमि” के संपादक के. पी. केशवमेनन जैसे दर्जनों नेताओं ने सार्वजनिक मार्गों पर चलने की स्वतंत्रता को लेकर आंदोलन छेड़ने का एलान कर दिया। जार्ज जोसेफ कांग्रेसी नेता थे। आंदोलन छेड़ने से पहले उन्होंने गांधी को भी सूचित करना उचित समझा। 12 मार्च 1924 को प्रस्तावित आंदोलन की सूचना गांधी को भेज दी गई। गांधी ने उन्हें अहिंसक तरीके से आंदोलन की अनुमति दे दी।

गांधी की अनुमति के बाद नेताओं ने 31 मार्च 1924 को आंदोलन का बिगुल फूंक दिया। लेकिन विरोधी भी कम सक्रिय न थे। उन्होंने राजा को भड़काना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि आंदोलन शुरू होने के कुछ ही दिनों के बाद, उससे जुड़े सभी प्रमुख नेताओं को हिरासत में ले लिया गया। गिरफ्तार नेताओं में जार्ज जोसेफ, टी. के. माधवन तथा केशव मेनन भी शामिल थे। ब्राह्मणवादी एक तरह से अपनी योजना में कामयाब रहे थे। बड़े नेताओं के गिरफ्तार होने के बाद आंदोलनकारियों को एहसास हो चुका था कि बगैर कुशल नेतृत्व के आंदोलन को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाना मुश्किल होगा। उन्होंने निकटवर्ती मद्रास प्रेसीडेंसी के कांग्रेसी नेताओं से सहयोग की अपील की। परंतु कांग्रेस का नेतृत्व मुख्यत: ब्राह्मणों के हाथों में था, जिनकी उस आंदोलन में कोई रुचि न थी।

उसी दौरान जार्ज जोसेफ और केशव मेनन ने पेरियार के नाम एक व्यक्तिगत पत्र लिखा। उन दिनों पेरियार तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। पत्र में आंदोलन की आवश्यकता के बारे में बताते हुए, पेरियार से उसे संभालने का अनुरोध किया गया था। लिखा था कि यदि वे देर करते हैं तो एक आवश्यक आंदोलन असमय ही दम तोड़ लेगा।

वाइकम, केरल में पेरियार स्मृति संग्रहालय का प्रवेश द्वार (तस्वीर : एफपी ऑन द रोड, 2017)

पेरियार उस समय तक नास्तिक होने का संकल्प ले चुके थे। परंतु यहां मामला केवल धर्म तक सीमित नहीं था। उससे सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी भी जुड़ी थी। उसका संबंध नागरिक स्वतंत्रता से था। पेरियार वर्षों से शूद्रों और पंचमों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते आ रहे थे। “वायकम आंदोलन” का मकसद भी वही था। सो बगैर समय गंवाए उन्होंने वायकम पहुंचने का निर्णय ले लिया। 13 अप्रैल को वे वायकम पहुंचे। उनके पहुंचते ही आंदोलनकारियों में जान आ गई। पेरियार ने वहां जोरदार भावप्रवण भाषण दिया –

“उनका तर्क है कि अछूत यदि मंदिर तक जाने वाली सड़कों से गुजरते हैं तो वे अपवित्र हो जाएंगीं। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि वायकम का देवता अथवा ब्राह्मण क्या महज अछूतों की उपस्थिति से अपवित्र हो जाते हैं! यदि वे मानते हैं कि वायकम का देवता अशुद्ध हो जाएगा, तब वह देवता हो ही नहीं सकता। वह महज एक पत्थर है, जिसे केवल गंदे वस्त्र धोने के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।”[2]

इस तरह का निर्भीक, उत्तेजक और प्रेरित करने वाला भाषण उससे पहले किसी ने भी नहीं दिया था। देखते ही देखते लोग सत्याग्रह में भागीदारी के लिए उमड़ पड़े। पंडालों में जगह कम पड़ने लगी। पेरियार के भाषण ने ब्राह्मणों और उनके नेताओं को बुरी तरह हिला दिया था। सरकार स्वयं सकते में थी। नतीजा यह हुआ कि आंदोलन में उतरने के छठे दिन ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। एक महीने की सजा सुनाई गई। सजा पूरी होने पर अरिविक्कुटु जेल से रिहा होते ही उन्हें वारंट थमा दिया गया। उसमें तत्काल त्रावणकोर राज्य छोड़ने का आदेश था। पेरियार ने किसी की परवाह न की। आंदोलन के अंजाम तक पहुंचने तक उन्होंने वहीं डटे रहने का निर्णय लिया।

आंदोलनकारियों को दुनिया-भर से समर्थन मिल रहा था। लोग खुले मन से सत्याग्रह का हिस्सा बन रहे थे। आंदोलनरत दलितों को सिख, ईसाई सहित अन्य धर्माब्लंवियों का सहयोग भी मिल रहा था। सत्याग्रहियों के भोजन की व्यवस्था का काम दो सौ से अधिक सिख स्वयंसेवक कर रहे थे। गांधी स्वयं उस मामले में रुचि ले रहे थे। किंतु वे इसे हिंदुओं का आंतरिक मामला मानते हुए, अन्य धर्मावलंबियों के हस्तक्षेप के विरुद्ध थे। “यंग इंडिया” में लेख लिखकर उन्होंने गैर-हिंदुओं को वहां से हट जाने का आग्रह किया था।

गांधी, पेरियार को भी वायकम सत्याग्रह से दूर रखना चाहते थे। कांग्रेस गांधी के प्रभाव में थी, किंतु पेरियार का निर्णय अटल था। वे स्वयं को गांधी और कांग्रेस की छाया से बाहर लाने के लिए तैयार कर चुके थे। आंदोलन तेजी से आगे बढ़ने लगा। जेल से रिहा होने के बावजूद पेरियार का जोश और समर्थन पहले जैसा ही था। न ही उनके भाषणों में किसी तरह का परिवर्तन आया था। यह एक तरह से सत्ता को चुनौती जैसा था। वे तमिलनाडु कांग्रेस में जिम्मेदार पद पर थे। वायकम आने से पहले वे राजगोपालाचारी को, उनके लौटने तक अध्यक्ष पद का कामकाज देखने का अनुरोध करके आए थे। राजगोपालाचारी ने भी पत्र लिखकर उनसे कहा कि वे तत्काल लौटकर उन्हें अतिरिक्त जिम्मेदारी से मुक्त करें। लेकिन पेरियार के लिए वायकम का मुद्दा कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारियों से कहीं अधिक बड़ा था।  सो उन्होंने राजगोपालाचारी के पत्र को अनदेखा कर दिया। उत्तेजक भाषणों और वायकम छोड़ने के सरकारी आदेश का पालन न करने के कारण, इस बार उन्हें छह महीने की सजा सुनाई गई।

अंततः गांधी को भी वायकम सत्याग्रहियों के समर्थन में आना पड़ा। यंग इंडिया में उन्होंने लिखा –

“यदि ब्राह्मणों ने अछूतों को सड़कों पर चलने की आजादी नहीं दी तो यह आंदोलन दिनों-दिन उग्र होता जाएगा। अभी तक सड़कों पर चलने की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे आंदोलनकारी आगे मंदिर प्रवेश की स्वतंत्रता की मांग भी करने लगेंगे।”

वही हुआ। सरकार ने पेरियार को दबाने की कोशिश की। पेरियार वायकम आंदोलन को द्रविड़ अस्मिता का मुद्दा बनाने में सफल रहे थे। उनपर तरह-तरह के दबाव डाले गए। लेकिन पेरियार डटे रहे। आंदोलन के दौरान जब उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तो उसकी बागडोर उनकी पत्नी नागम्मल और बहन ने संभाल ली। दूसरी बार जब वे जेल में थे तो त्रावणकोर के राजा की मृत्यु हो गई। राज्य की सत्ता महारानी के हाथों में आ गई। राजा की आकस्मिक मौत से डरी रानी किसी भी तरह वायकम आंदोलन को समाप्त देखना चाहती थीं। उनके आदेश पर पेरियार को सजा पूरी होने से दो महीने पहले ही रिहा कर दिया गया। रानी के आदेश पर दीवान ने गांधी से संपर्क किया। गांधी मद्रास पहुंचे। पेरियार और उनकी बातचीत हुई। अंतत: एक फैसले के तहत सरकार ने दलितों को सड़कों पर चलने की स्वतंत्रता बहाल कर दी।

पेरियार के योगदान को केरल उच्च न्यायालय और सरकार दोनों की ओर से सराहा गया था। उस जीत ने पेरियार को संपूर्ण दक्षिण भारत में प्रतिष्ठित कर दिया। उसके फलस्वरूप वहां गांधी का प्रभाव क्षेत्र सिकुड़ने लगा। यह पेरियार की बड़ी जीत थी। यहां तक कि कांग्रेस को भी जो आरंभ में पेरियार के कार्यक्रमों का विरोध कर रही थी, अंततः उनके समर्थन में आना पड़ा। कांचीपुरम् अधिवेशन में जनता के दबाव में कांग्रेस ने उन्हें “वायकम वीरर” यानी, “वायकम का हीरो” कहकर सम्मानित किया। उनका समर्पण और हौसला लोक गीतों का हिस्सा बनने लगा। गांधी और कांग्रेस ने जान बूझकर उनके योगदान की उपेक्षा की। उस घटना से गांधी के प्रति पेरियार के मन में जो गांठ पड़ी, उसका असर हमेशा बना रहा। यह बात भी समझ में आई कि कांग्रेस और उसके नेताओं के लिए किसी गैर-ब्राह्मण को प्रतिष्ठा प्राप्त करने देखना पसंद नहीं है। लेकिन पेरियार को इसकी कोई परवाह न थी। इसी भरोसे के बल पर आने वाले दिनों में उन्हें परिवर्तन की ऐसी इबारत लिखनी थी, जिससे आने वाले वर्षों में दक्षिण भारत की राजनीति शेष भारत के लिए एक मिसाल बन सके।

वायकम सत्याग्रह ने दर्शा दिया कि हर बड़ा परिवर्तन संघर्ष की कोख से जन्म लेता है। खासकर अधिकारों की लड़ाई, वह तो बिना संघर्ष और एकजुटता के संभव ही नहीं है।

(संपादन : नवल/गोल्डी)

[1] ई. एस. विश्वनाथन, दि पोलिटिकल कैरियर ऑफ़ ई.वी. रामासामी नायकर, पृष्ठ-46

[2] वही, पृष्ठ-46

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