जातिगत प्रमेय से समाज का कौन सा सवाल हल करना चाहते हैं अभयानंद?

बिहार के सामाजिक व राजनीतिक परिवेश में यह नए बदलाव का परिचायक भी है कि जो शिक्षण संस्थानों व सरकारी नौकरियों में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के आरक्षण का विरोध करते थे, इसे जातिगत राजनीति की उपमा देते थे, वे अब स्वयं ही अपने-अपने जातिगत दरबे में समाते जा रहे हैं। नवल किशोर कुमार की खबर

बिहार के द्विज इन दिनों  गदगद हैं। उनकी खुशी का एक  कारण यह है कि केंद्र में सत्तासीन नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले वर्ष आर्थिक आधार पर दस प्रतिशत आरक्षण दे दिया और बिहार में नीतीश कुमार पहले ऐसे मुख्यमंत्री हुए जिन्होंने आनन-फानन में इसे राज्य में लागू भी करवा दिया। उनकी खुशी का दूसरा कारण पूर्व पुलिस महानिदेशक अभयानंद द्वारा 5 मार्च, 2020 को एक संवाददाता सम्मेलन में किया गया  एलान है। उन्होंने “ब्रह्मजन सुपर-100” नामक नए उद्यम की घोषणा की है। इस संदर्भ में उन्होंने कहा है कि वे सौ द्विज छात्रों और 50 द्विज छात्राओं को आईआईटी की कोचिंग मुफ्त कराएंगे। इसके साथ ही विद्यार्थियों को रहने और खाने का पैसा भी नहीं देना होगा। उनके मुताबिक यह एक सामाजिक कार्य है और इसका मकसद धन अर्जन करना नहीं है।

गौरतलब है कि अभयानंद की यह परियोजना ब्रह्मजन विद्यापीठ का हिस्सा है, जिसकी स्थापना ब्रह्मजन चेतना मंच द्वारा की गई है। बिहार के सामाजिक व राजनीतिक परिवेश में यह नए बदलाव का परिचायक है कि जो शिक्षण संस्थानों व सरकारी नौकरियों में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के आरक्षण का विरोध करते थे, इसे जातिगत राजनीति की उपमा देते थे, वे अब स्वयं ही अपने-अपने जातिगत दरबे में समाते जा रहे हैं।

पाठकों को बता दें कि बिहार में इसी तरह का एक स्कूल भी है जिसका नाम भूमिहार-ब्राह्मण कॉलेजिएट स्कूल है। इसका नाम आज तक नहीं बदला गया है। हालांकि इस स्कूल में धार्मिक और जातिगत भेदभाव अब नहीं किया जाता है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, यहां भेदभाव अब इतिहास बन चुका है।

बिहार के मुजफ्फरपुर में भूमिहार-ब्राह्मण कॉलेजिएट स्कूल का मुख्य द्वार

वैेसे यह पहला मौका नहीं है जब भूमिहार जाति के अभयानंद ने यह उद्यम किया है। पूर्व वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी के अलावा उनकी पहचान भौतिकी  के शिक्षक के रूप में रही है। उन्हाेंने सबसे पहले आनंद के साथ मिलकर सुपर-30 की स्थापना की। तब पिछड़े वर्ग के गरीब परिवार के आनंद पटना के एक उपेक्षित इलाके में रामानुजन स्कूल ऑफ मैथेमैटिक्स चलाते थे। दोनों ने मिलकर सुपर-30 प्रारंभ किया। इसके जरिए 30 मेघावी छात्रों को निशुल्क कोचिंग की व्यवस्था की गई। हालांकि यह एक विशुद्ध रूप से व्यापार  था। सुपर-30 एक शानदार मार्केटिंग टूल साबित हुआ लेकिन साथ ही आनंद और अभयानंद के बीच विवाद भी बढ़ा। अभयानंद ने सुपर-30 से स्वयं को अलग कर लिया और पटना में उसके समानांतर रहमानी-30 नामक उद्यम शुरू किया, जिसमें केवल मुसलमान छात्रों को पढ़ाया जाता है।

संवाददाता सम्मेलन में ब्रह्मजन सुपर 100 के गठन का एलान करते अभयानंद

लेकिन अब अभयानंद ने जो एलान किया है, उससे बिहार के द्विज प्रसन्न हैं। पटना से प्रकाशित अखबारों ने उनके इस प्रयास की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। मसलन, दैनिक हिन्दुस्तान ने “अभ्यानंद ने शुरू किया ब्रह्मजन सुपर 100, गरीब भूमिहार ब्राह्मण छात्रों को मिलेगी आईआईटी एंट्रेंस की फ्री कोचिंग” शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया है। अखबार में प्रकाशित खबर के मुताबिक जातिगत आधार पर कोचिंग शुरू करने के पक्ष में अभयानंद ने कहा है कि “ब्रह्मजन सुपर 100′ एक सामाजिक प्रयास है। इससे ब्राह्मण और भूमिहार समाज के उन छात्र-छात्राओं को फायदा होगा, जो पैसे की कमी और अन्य दूसरी वजहों से पिछड़े हैं। इसमें सरकार का कोई योगदान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि मैंने सुपर 30 की शुरुआत की और उसे आगे बढ़ते देखा। वर्ष 2008 में अल्पसंख्यक समुदाय ने भी ऐसी पहल की, उसे भी हमने मदद की। ‘ब्रह्मजन सुपर 100′ भी उसी दिशा में ब्राह्मण और भूमिहार समाज के गरीब बच्चों के लिए एक सार्थक कदम है।”

लेकिन बड़ा सवाल यही है कि इस तरह जातिगत आधार पर शैक्षणिक संस्थाएं शुरू कर क्या अभयानंद जातिगत विषमताओं का विस्तार नहीं कर रहे हैं? क्या इससे यह संदेश समाज में नहीं जाएगा कि अलग-अलग जातियों के लिए अलग-अलग स्कूल-कॉलेज हों, अलग-अलग जातियों के लिए अलग-अलग अस्पताल हों?

ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अभयानंद केवल यही  रूकना नहीं चाहते हैं। पटना में एक दैनिक हिंदी समाचारपत्र से संबद्ध व अभयानंद के स्वजातीय वरिष्ठ पत्रकार मानते हैं कि अभयानंद ने जो कहा है, वह कहीं से गलत नहीं है। उनके मुताबिक, अभयानंद अलग-अलग जातियों के ऐसे ही संगठन चाहते हैं मसलन, सुपर यादव, सुपर पासी, सुपर पासवान, सुपर चमार आदि। लेकिन शर्त यह कि संबंधित जाति/समुदाय के लोग आगे आएं और केवल छात्रों के रहने और खाने का प्रबंध कर दें।

बहरहाल, अभयानंद जातिगत प्रमेयों से भले ही सुर्खियों में बने रह सकते हैं, लेकिन यह तो साफ है कि इससे समाज में विद्वेष ही बढ़ेगा। बिहार के युवा रंगकर्मी व सामाजिक कार्यकर्ता अनीश अंकुर भी अभयानंद के नए उद्यम को अनुचित व संविधान विरोधी मानते हैं। उनके अनुसार, 1947 के पहले अलग-अलग जातियों के संगठन हुआ करते  थे। लेकिन देश में संविधान लागू होने के बाद इस तरह का भेदभाव गलत है। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के प्रयास से व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति तो हो सकती है, लेकिन किसी भी समाज का भला नहीं हो सकता।

वहीं सुपर-30 के संचालक व प्राख्यात गणितज्ञ आनंद ने फारवर्ड प्रेस से बातचीत में अभयानंद द्वारा शुरू किए गए उद्यम पर टिप्पणी करने से  इंकार कर दिया। लेकिन उन्होंने यह जरूर कहा कि उनके लिए जाति और धर्म महत्वपूर्ण नहीं है। वे इस तरह के विभाजन नहीं करते हैं। 

(संपादन : अमरीश/अनिल)

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