त्रिवेणी संघ, जिसने तैयार की बिहार में दलितों-पिछड़ों के लिए वैचारिक जमीन

बिहार में त्रिवेणी संघ का गठन 1933 में हुआ। पिछड़े वर्गों के इस आंदोलन ने देखते ही देखते सभी शोषित वर्गों को अपने साथ ले लिया। फुले और दक्षिण के आंदोलनों से प्रेरित इस आंदोलन की आयु हालांकि केवल 9 वर्ष रही, परंतु इसका प्रभाव बिहार की राजनीति में आज भी विद्यमान है। बता रहे हैं मनीष रंजन

त्रिवेणी संघ को हिंदी राज्यों में द्विजों के वर्चस्व के खिलाफ पिछड़े वर्गों के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संघर्ष का आगाज माना जा सकता है। हालांकि आदिवासियों द्वारा सशस्त्र संघर्ष पहले ही यहां तक कि 1857 के पहले ही शुरू हो गया था। इनमें संताल हूल विद्रोह (1771) शामिल है। परंतु, त्रिवेणी संघ इससे पृथक था। 1933 में गठित त्रिवेणी संघ ने पिछड़े वर्ग के लोगों को संघर्ष के लिए वैचारिक जमीन तैयार की। इसकी वैचारिकी में महाराष्ट्र में पहले जोतीराव फुले और फिर बाद में डॉ. आंबेडकर द्वारा चलाए जा रहे आंदोलनों का स्पष्ट प्रभाव तो था ही, दक्षिण में चल रहे आत्मसम्मान आंदोलन का असर भी था।

यह संगठन करीब 9 वर्षों तक अस्तित्व में रहा और 1942 में गांधी द्वारा “करो या मरो” आह्वान के बाद यह विघटित हो गया। परंतु, त्रिवेणी संघ ने 9 वर्षों के दौरान जो वैचारिक जमीन तैयार की थी, वह बांझ नहीं थी। उसकी कोख से जगदेव प्रसाद और जगदीश मास्टर जैसे जननायकों का जन्म हुआ। कहा जा सकता है कि आज भी बिहार की राजनीति में इसका असर है। हालांकि यह भी उतना ही सत्य है कि त्रिवेणी संघ के विचारों को मानने वाले नेताओं ने इसका मान नहीं रखा है। 

प्रस्तुत लेख में हम त्रिवेणी संघ के सह-संस्थापक रहे सरदार जगदेव सिंह यादव की एकमात्र उपलब्ध तस्वीर प्रकाशित कर रहे हैं। अन्य दो सह-संस्थापकों जेएनपी मेहता और  डॉ. शिवपूजन सिंह की तस्वीर हमें उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। उम्मीद है कि बिहार की राजनीति को नया आयाम देने वाले इन दोनों नायकों की तस्वीर भी हमें जल्द उपलब्ध होंगी। 


आजादी के बाद बिहार में त्रिवेणी संघ का प्रभाव

  • मनीष रंजन

त्रिवेणी संघ बिहार में दलित-पिछड़े वर्गों) को एक राजनैतिक शक्ति के रूप में संगठित करने वाला पहला संगठन था। इसके सिद्धांतों और कार्यक्रमों का लिखित विवरण “त्रिवेणी संघ का बिगुल” नामक एक ऐतिहासिक दस्तावेज में विस्तार से दिया गया है। कुछ ही दशक पहले तक इसके संबंध में लिखित विवरण का बहुत अभाव था। परंतु प्रसन्न कुमार चौधरी और श्रीकांत द्वारा लिखित “बिहार में सामाजिक परिवर्तन” नामक पुस्तक से यह कमी दूर हो गई। इसमें साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर त्रिवेणी संघ का इतिहास के साथ ही इसके बारे में लिखे गए एकमात्र पुस्तिका यदुनंदन मेहता द्वारा लिखित व 1940 में छपी “त्रिवेणी संघ का बिगुल” भी प्रकाशित कर दिया गया। इस पुस्तिका से इस आंदोलन की वैचारिकी को समझा जा सकता है। (यह फारवर्ड प्रेस द्वारा भी प्रकाशित है। इसे यहां क्लिक कर पढ़ा जा सकता है।)

हालांकि प्रसन्न कुमार चौधरी और श्रीकांत से पहले कल्याण मुखर्जी और राजेंद्र सिंह यादव ने भी अपनी पुस्तक “भोजपुर बिहार में नक्सलवादी आंदोलन” में त्रिवेणी संघ के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी थी। यह जानकारी बताती है कि आजादी के उपरांत त्रिवेणी संघ कैसे प्रभावी रहा। एक प्रसंग देखिए —

“17 फरवरी, 1967 को मतदान वाले दिन जगदीश मास्टर अपना वोट डालने मतदान केंद्र पर गए। वहां एक भूमिहार को वोटों की गड़बड़ी करते पकड़ा। उन्हें ऐसा करते देख चारों ओर से भूमिहारों ने उनपर हमला कर दिया और इतना पीटा कि अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। अपमान और क्षोभ से आक्रोशित जगदीश मास्टर ने उसी दिन संकल्प किया कि 1930 के दशक में जो युद्ध समाप्त हो गया था, उसे आगे बढ़ाना होगा ..”

जगदीश मास्टर, बिहार में नक्सलवादी आंदोलन के प्रणेता

इस प्रसंग में जिस युद्ध का जिक्र है वह त्रिवेणी संघ द्वारा किया गया आन्दोलन था। उतर भारत के इतिहास में यह अपनी तरह की पहली परिघटना थी, जब बिल्कुल ही अनचिन्हें (अपरिचित) योद्धाओं ने पिछड़ों और दलितों को एकजुट कर एक सामाजिक, राजनीतिक शक्ति का निर्माण किया ताकि सवर्ण शोषकों को कड़ी चुनौती दी जा सके। पहली बार एकता की शक्ति को पहचानते हुए शोषितों द्वारा यथार्थ के धरातल पर प्रयोग कर दिखाया गया। इससे सदियों से दमित-पीड़ित समाज आत्मसम्मान और आत्मविश्वास से लबरेज हो गया।

“त्रिवेणी संघ” का गठन 1933 में करगहर में जिला स्तर पर गठन किया गया। गठन की भूमिका बहुत पहले से ही बन रही थी। त्रिवेणी संघ का माता कहे जाने वाले सरदार जगदेव सिंह यादव, जिनके मन मे सर्वप्रथम इस संगठन का विचार आया, वे यादव महासभा में तो सक्रिय थे ही, डॉ. शिवपूजन सिंह के साथ कुर्मी सभा के अधिवेशनों में भी जाते थे। इन दोनों ने उत्तरप्रदेश के कानपुर में वर्ष 1919 में हुए उस अधिवेशन में भाग लिया था, जिसमें कोल्हापुर के छत्रपति शाहू जी महाराज ने अध्यक्षीय भाषण दिया था। तीसरे संस्थापक यदुनंदन मेहता थे।

दरअसल, त्रिवेणी संघ का गठन उस दौर में हुआ जब बहुसंख्यक समाज के मसलों और मुद्दों को लेकर कोई पहल नहीं हो रही थी। इसका असर भी दिखा। बिहार में इस आंदोलन ने एक झटके में पिछड़ों को नींद से जगा दिया और उन्हें यह अहसास कराया कि उनके हितों की रक्षा कोई दूसरा नहीं कर सकता। लोगों ने इस पहल को खूब सराहा। इसी के आधार पर त्रिवेणी संघ ने 1937 में हुए अंतरिम चुनाव में उतरने का एलान किया। हालांकि पहले कांग्रेस के टिकट पर ही अपने सदस्यों को चुनाव लड़ाने की कोशिशें की गई। परंतु, जब कांग्रेस ने तवज्जो नहीं दी तब त्रिवेणी संघ के लोगों ने अपने संगठन के नाम से ही उम्मीदवार उतारने का निर्णय लिया। 

यह निर्णय आसान नहीं था। यह उस दौर में एक साहसपूर्ण निर्णय था। अनजान और आम-किसान पृष्टभूमि के साधारण नायकों के रणनीति और कार्यक्रम में बिहार भर के कांग्रेस से असंतुष्ट पढ़े-लिखे और धनी पिछड़ों को अपने लिए एक संभावना दिखी। जब उन्होंने इसके नीतियों और कार्यक्रमों को जाना-समझा तब झट से इससे जुड़ गए।

वर्ष 1935 में त्रिवेणी संघ की राज्य इकाई गठित हुई तथा वर्ष 1937 में इसे राष्ट्रीय स्तर पर गठित करने हेतु छपरा में सम्मेलन बुलाया गया। 1941 तक इसका राजनीतिक अभियान बहुत जोरों से चला। मसलन, 16-17 अक्टूबर, 1937 को बड़हरा (पीरो, भोजपुर का एक प्रखंड) में त्रिवेणी संघ का पांचवा सम्मेलन हुआ। इसमें करीब 5 हजार लोग शामिल हुए। इसकी अध्यक्षता करते हुए गणपति मंडल ने कहा था कि त्रिवेणी संघ वास्तविक खेतिहर समुदायों, व्यवसायियों और मजदूरों का संगठन है। 

वहीं, 26 दिसम्बर, 1941 को डुमराँव में हुए एक सभा की अध्यक्षता करते हुए नंद किशोर सिंह ने संघ के निर्माण और उसके उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि त्रिवेणी संघ जमींदारों, बड़े व्यवसायियों, पूंजीपतियों तथा उच्च वेतनभोगी सरकारी अधिकारियों के खिलाफ किसानों, मजदूरों और व्यवसायियों का संगठन है। इस सम्मेलन को यदुनंदन मेहता, कोकिल प्रसाद, रामकुमार तिवारी, शिवपूजन सिंह, शिवपूजन कोइरी, गया हलवाई, चुतुर राय, कपिलदेव राम, रामचंद्र राम, दयाल हलवाई, रामप्रसाद हलवाई, जगदीश सिंह, इकराम सिंह, लक्ष्मी राम, रामस्वरूप अहीर और दुलारचंद हरिजन आदि ने संबोधित किया था।

त्रिवेणी संघ के बिगुल का कवर पृष्ठ

राजनीतिक मोर्चे पर भारत छोड़ो आन्दोलन के बाद यह मद्धिम पड़ गया। परंतु, 1948 के बाद यह पूर्णतः सामाजिक-सांस्कृतिक अभियान बन गया। जबकि राजनीतिक मोर्चे पर इससे जुड़े ज्यादातर  लोग समाजवादी और वामपंथी धारा की पार्टियों से जुड़ गए। एकाध कांग्रेसी भी बने।

त्रिवेणी संघ के बारे में  भ्रांति फैलाई गई है कि इसने जनेऊ आंदोलन चलाया था। जबकि जनेऊ आंदोलन आर्य समाज द्वारा चलाया गया था।  ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है जब संघ के किसी सदस्य ने जनेऊ पहना हो। गौरतलब है कि 1879 में कायस्थ माधोलाल को यग्योपवित कर दयानंद सरस्वती ने खुद बिहार में जनेऊ आंदोलन की नींव रख दी थी। ध्यान रहे उस काल में कायस्थों के जनेऊ पहनने की भी ब्राह्मण मनाही करते थे, वे उनको भी शुद्र मानते थे। जनेऊ कार्यक्रम को आन्दोलन का रूप, 1899 के हाथीटोला (मनेर, पटना का एक गांव) के एक आयोजन में ब्राह्मणों द्वारा दंगा फैलाने, के बाद मिली। करीब 25 वर्षों तक उठा-पटक  चलता रहा, तब 1925 में लाखोचक (मुंगेर) में हुई घटना के बाद ब्राह्मणवादियों ने सरेन्डर कर दिया। इसके बाद कही भी जनेऊ पहनने का खुलेआम विरोध बंद हो गया। अंततः कुछ दिनों बाद जनेऊ अपनी प्रासंगिकता खो बैठी। 

त्रिवेणी संघ के संस्थापकों में से एक सरदार जगदेव सिंह यादव

जाति-लगान बनाम जनेऊ आन्दोलन उन दिनों की बिहार की विशिष्ट लाक्षणिकता थी। इसे समझने के लिए   तत्कालीन जिलेवार सर्वे सेटलमेंट रिपोर्टों को देखा जा सकता है। इन रिपोर्टों से पहले बुकानन और हंटर अपने विवरणों में भी इसकी काफी स्पष्ट तस्वीर पेश कर चुके थे। जिलों के सर्वे सेटलमेंट रिपोर्ट यह खुलासा करता हैं कि जाति लगान एक प्रचलित तथ्य था। इसके अनुसार उच्च जाति के रैयतों को कम लगान देना  था पर वे प्रायः कम लगान देने में भी आनाकानी करते। दूसरी तरफ निम्न जाति के रैयत बिना ना नुकुर किए लगान अदा कर देते थे। 

अब जो कारण पिछड़ी जातियों को जनेऊ आन्दोलन से जोड़ता था वही कारण अगड़ी जातियों को इसका विरोध करने के लिए प्रेरित करता था। वे जनेऊ के आधार पर मिल रहे फायदे को पिछड़ी जातियों के साथ बांटने के लिए तैयार नही थे। यही कारण रहा कि दोनों के बीच संघर्ष हुआ। पिछड़ों की जीत हुई। बाद में बदली परिस्थितियों में यह मुद्दा अप्रासंगिक हो गया। आज के संदर्भ में आरक्षण के मामले से इसे आसानी से समझा जा सकता है। इससे आर्थिक लाभ और सामाजिक हैसियत सीधा जुड़ा हुआ था। जनेऊ आन्दोलन के प्रति तात्कालिक बदहाल पशुपालक, खेतिहर, कामगार-मजदूर जातियों के आग्रह को इन परिस्थितियों के संदर्भ में आसानी से समझा जा सकता है। लेकिन यह “आर्य समाज” और विभिन्न जातीय संगठनों के नेतृत्व में चला था, न कि त्रिवेणी संघ द्वारा।

त्रिवेणी संघ के लोग शाहूजी के मार्फ़त फुले के आन्दोलन से परिचित थे जब कि संत थिरुवल्लुवर का प्रभाव तो “त्रिवेणी संघ के बिगुल” में साफ-साफ देखा जा सकता है, जिसमें चार स्थानों पर दर्शाया गया है। यह स्पष्ट दर्शाता है कि त्रिवेणी संघ के लोग द्रविड़ आन्दोलन से भी खूब परिचित थे। 

बिहार में ब्राह्मणवाद से मुक्ति की शुरुआती लड़ाई त्रिवेणी संघ ने ही लड़ी। ब्राह्मणी विधि से अलग जयमाला और प्रतिज्ञा पत्र द्वारा शादी तथा भंडारा कर श्राद्ध शुरू किया गया, जिसमें ब्राह्मण पुरोहित की कोई जरूरत नहीं रहती। जयमाला एवं शपथपत्र युक्त गैर-ब्राह्मण पद्धति से उतर भारत मे पहला विवाह 1960 में सम्पन्न हुआ, जो तमिलनाडु में 1925 के आस-पास पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन से ही शुरू हो गया था। बिहार में यह ऐतिहासिक विवाह त्रिवेणी संघ के संस्थापक सरदार जगदेव सिंह के पोते एवं विक्रमगंज से सांसद रहे शिवपूजन सिंह शास्त्री की बेटी के बीच हुआ। इसमें पुरोहित की भूमिका बाबू जगजीवन राम ने निभाई थी।

त्रिवेणी संघ का मुख्य कार्यक्षेत्र शाहाबाद जिला था जो आज चार भाग में बंट गया है। भोजपुर, बक्सर, रोहतास और कैमूर। इसी के तैयार किये गए जमीन की ताकत पर बाबू जगजीवन राम एक *भी चुनाव नहीं हारे और “सहार” बन सका जिसके बारे में शहीद जगदेव प्रसाद आह्वान करते थे कि सारा बिहार को सहार बना दो।

त्रिवेणी संघ के बारे में एक यह भी भ्रांति फैलाई गई है कि यह मध्यवर्ती जातियों को क्षत्रिय का दर्जा दिलाने का आंदोलन था। जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। इसके नेताओं ने सभी पिछड़ी जातियों के लिए अलग-अलग जाति सूचक टाइटिल को ख़त्म कर सबके लिए एक ही टाइटिल “सिंह” को अपनाए जाने की वकालत की। और लगभग सभी मध्यवर्ती जातियों ने अपना टाइटिल त्याग कर इसे अपनाया भी। यह वैसा ही कदम था जैसा सिख धर्म के गुरुओं ने चलाया था। ज्ञात रहे कि संघ के लोग पटना में जन्में सिखों के दसवे गुरु, गुरु गोविंदसिंह के विचार से पूर्ण परिचित थे और इनसे बहुत प्रभावित भी थे। फतुहां (पटना जिला का एक प्रखंड) के इसके एक नेता जगदेव सिंह यादव, जो जिला बोर्ड और विधानसभा का त्रिवेणी संघ के टिकट पर चुनाव भी लड़े थे, सिक्ख धर्म अपनाकर सरदार बन गए थे। उनके गांव के अधिकांश खेतिहर और पशुपालक जातियों के लोगों ने सिक्ख धर्म अपना लिया था।

त्रिवेणी संघ के नीति-सिद्धांत और कार्यक्रमों से बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि यह किसी भी तरह के भेदभाव व अन्याय के खिलाफ़ था एवं समाज मे सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक – सभी तरह के न्याय के लिए दृढ़संक्ल्पित था।

(संपादन: नवल/गोल्डी)

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  1. अनित्य बौद्ध ,राजकोट Reply

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