आपदाओं के संकटमोचक

मौजूदा समय में कोविड-19 के कारण पूरे विश्व में दहशत है। भारत में भी प्रभावितों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे विषम हालात में अतीत के संकटमोचक याद आते हैं, जिन्होंने मानव सेवा की अनूठी मिसाल कायम की। बता रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

इन दिनों पूरी दुनिया कोरोना की चपेट में है। विश्व स्वास्थ्य संगठन उसे वैश्विक महामारी घोषित कर चुका है। दुनिया-भर में एक लाख से ऊपर जानें जा चुकी हैं। अब तक के रिपोर्टों के मुताबिक भारत में भी अब तक लगभग 250 के जाने गयी है और 7600 के अधिक लोग इसकी चपेट में हैं। लोग भय से घरों में कैद हैं। बड़े-बड़े देशों में चक्का जाम की स्थिति बनी है। सड़कें सुनसान, बाजार वीरान हैं। लोग करीबियों से मिलने में भी कतराने लगे हैं। सिर्फ अस्पतालों में भीड़ है, बीमार हैं। भयावह दौर में भी वहां डाक्टर्स और नर्सें हैं। प्राणों को दांव पर लगा वे दिन-रात रोगियों की देखभाल में लगे हैं। महामारी उनके अनेक साथी डाक्टरों और नर्सों के प्राण ले चुकी है। फिर भी उन्हें जिम्मेदारी का एहसास है, सो जूझ रहे हैं।

सावित्रीबाई फुले का बलिदान

मनुष्यता और महामारी के लंबे संघर्ष की इससे पुरानी घटना 125 साल पहले की है। जरा देखते हैं, क्या हुआ था उस समय वर्ष 1896 का महाराष्ट्र। वहां प्लेग ने मुंबई के रास्ते घुसपैठ की थी। मुंबई में महामारी ने अपना रौद्र रूप दिखाया तो रोजगार की तलाश में वहां रह रहे लोग वापस अपने स्थानों पर लौटने लगे। उनमें से कुछ महामारी के विषाणु भी साथ ले गए। पुणे और सतारा जैसे शहर ऐसे ही महामारी के शिकार बने। मुंबई में प्लेग के कारण हजारों जानें जा चुकी थीं। सड़कें, चौराहे, पार्क, दुकान, घर, मकान सब जगह प्लेग का आतंक फैला हुआ था। घर-घर से लाशें निकल रही थीं। लोग अपनेपन का अर्थ भूलने लगे थे। बाकी शहरों के हालात भी अच्छे नहीं था। खासकर पुणे और सतारा जैसे शहरों में। वहां भी प्रतिदिन दर्जनों लोग मौत का शिकार बन रहे थे। आंखों के आंसू सूख चुके थे। छूत के डर से परिजन रोगी के पास जाने से कतराते थे।

कुछ लोग तब भी थे जो अपनी जान की परवाह न कर, महामारी से जूझ रहे थे। एक घटना ऐसी है कि एक 66 वर्षीय एक वृद्धा झोपड़ी के आगे रुकती है। पैदल चलकर आने के कारण वह बुरी तरह थक चुकी है। जानती है कि अभी आराम करने का समय नहीं है। रुकेगी तो मरीज की हालत और भी बिगड़ सकती है। भीतर जर्जर चारपाई पर 10-11 वर्ष का बालक प्लेग से पीड़ित लेटा हुआ है। बुखार से देह तप रही है। परिजन डरे-सहमे दूर खड़े हैं। कोई उसके करीब जाने को तैयार नहीं है। स्त्री बिना पल गंवाए आगे बढ़ती है। बालक को उठाकर अपनी पीठ पर लाद लेती है। फिर पैदल चलते हुए उसे अस्थायी अस्पताल तक पहुंच जाती है, जो उसने प्लेग के रोगियों की देखभाल के तैयार कराया था। वृद्धा का एकमात्र दत्तक पुत्र सेना में डॉक्टर के पद पर कार्यरत था। उसने उसे वापस बुला लिया है। मां-बेटा दोनों महामारी से जूझ रहे हैं।

सावित्रीबाई फुले की प्रतिमा के साथ बच्चे (फाइल फोटो)

महामारी को इसलिए भी महामारी कहा जाता है, क्योंकि वह किसी की सगी नहीं होती। निष्ठुर, क्रूर, कुटिल प्लेग ने उस स्त्री को भी नहीं बख्शा था जो साहस और करुणा की प्रतिमूर्ति बनकर रोगियों की सेवा में दिन-रात लगी रहती थी। एक दिन उस वृद्धा को दबोच ही लिया। कुछ दिनों के बाद उसका बेटा भी महामारी की चपेट में आ गया।[1] मरने से पहले वह स्त्री तथा उसका बेटा सैकड़ों लोगों को प्लेग के चंगुल से बचा चुके थे। वह कोई और नहीं, सावित्रीबाई फुले थीं, जिन्हें प्रथम भारतीय शिक्षक, स्त्री-मुक्तिदाता, कवि, लेखक, आंदोलनकारी, समाज सुधारक जैसे न जाने कितने विशेषणों से सम्मानित किया जाता है।

प्रेरणा, सूझबूझ और मानव सेवा की और भी कहानियां

मुंबई बंदरगाह के इलाके में मांडवी नामक बस्ती। चारों ओर भीड़-भाड़। गरीबी का आलम। सड़क के दोनों ओर पड़ी झुग्गियां। उनके बीच से कबाड़ से अटी नालियां। नालियों से उठती दुर्गंध। झुग्गियों में बेताज बादशाहों की तरह बेरोक-टोक आते-जाते चूहे। उस गंदी बस्ती में एक डाक्टर अपना क्लीनिक चलाता है। नाम है—अकाशियो गेबरियल वीगास। 18 सितंबर, 1896 का दिन। वीगास ने अपना क्लीनिक खोला ही था कि एक रोगी को देखने का बुलावा आ गया। वीगास का मन कुछ ठीक नहीं था। पर डाक्टर का कर्तव्य तो साधना ही था। सो उन्होंने अपना बस्ता उठाया जहां से संदेश आया था, निकल पड़े।

पहुंचे तो देखा कि एक अधेड़ उम्र की स्त्री चारपाई पर पड़ी है। अर्धमूर्छित अवस्था में। मूक, निस्पंद। देह बुखार से तप रही है। नाम लखमीबाई। पता चला कि वह तीन दिनों से सो नहीं पाई है। आंखों में रक्त के धब्बे हैं। जांघ और पेढ़ू (पेट के नीचे का हिस्सा) के बीच संतरे के आकार की गांठ थी। वीगास उसकी जांच करते हैं। शरीर का तापमान 104.2 फारेनहाइट, नाड़ी की दर 140। वीगास की चिंता बढ़ जाती है।[2] समझ में नहीं आता कि गिल्टी क्यों बनी! अनुभव के आधार पर मलेरिया में इस्तेमाल होने वाली दवाइयां कुनैन, सोडियम सिलिकेट वगैरह देकर लौट आते हैं। शाम होते-होते लखमीबाई की तबियत बिगड़ जाती है। अगले दिन जब वे उसे देखने पहुंचे तो पता चला कि वह मर चुकी है। वीगास की चिंता बढ़ जाती है। बुखार में मरीज इतनी जल्दी दम नहीं तोड़ता। यदि यह बुखार नहीं तो और क्या है? सोचते हैं, परंतु समझ में कुछ नहीं आता।

मुंबई में अकाशियो ग्रेबरियल वीगास की प्रतिमा

एक-दो दिन बाद बंदरगाह क्षेत्र से एक लड़का अपने चाचा के साथ उनके क्लीनिक पर पहुंचता है। उसकी हालत बहुत ही खराब है। बीमारी के लक्षण लखमीबाई से मिलते-जुलते हैं। वीगास उसकी जांच करते हैं। दवा भी देते हैं। परंतु बचा नहीं पाते। लखमीबाई की तरह लड़का भी मर जाता है। डॉ. वीगास हैरान हैं। महीने-भर में इस तरह की पचासों मौतें हो चुकी हैं। शहर में सैकड़ों डाक्टर हैं। सब एक से बढ़कर एक और काबिल। परंतु रोग का कारण किसी की समझ में नहीं आ रहा।

उस लड़के का चाचा डॉ. वीगास को बताता है कि इस तरह की बीमारी से बस्ती में और भी कई मरीज दम तोड़ चुके हैं। मौत की दर बढ़ती ही जा रही है। वीगास इसे अनमने भाव से सुनते हैं। उनके लिए यह नई जानकारी नहीं है। पूरी मुंबई से ऐसी ही खबरें मिल रही हैं। लेकिन लड़के के चाचा की एक बात उन्हें चौंका देती है। वह बताता है कि आदमी के साथ-साथ भारी संख्या में चूहे भी दम तोड़ रहे हैं। खासकर गोदामों के बाहर, ढेर के ढेर मरे हुए चूहे दिखाई पड़ते हैं। डॉ. वीगास की उलझन एकाएक समाप्त हो जाती है। उनके मुंह से एकाएक निकलता है, “गिल्टी प्लेग….यह बीमारी गिल्टी प्लेग है।” उसके बाद वे अपने अनुमान की जांच में लग जाते हैं। उसी शाम “पेटिट लेबोरेटरी” में लड़के के शरीर से लिए नमूनों की जांच करते हैं। माइक्रोस्कोप से गुलाबी, धब्बेनुमा, दो-ध्रुवी विषाणुओं के बारे में पता चलता है। उनका विश्वास पुख्ता हो जाता है।

वीगास अपने शोध के बारे में स्वास्थ्य अधिकारियों को बताया। सुनकर सब चकित रह गए। बीमारी का नाम सामने आने पर सब प्रसन्न थे। चिंता थी कि यदि वीगास की सूचना सही हुई तो महामारी कभी भी विकराल रूप धारण कर सकती है। वीगास के निष्कर्ष के सत्यापन हेतु सरकार ने आनन-फानन में चार जांच दलों का गठन कर दिया। उनमें स्थानीय अधिकारियों तथा निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को रखा गया। जांच दलों ने अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर जांच की। अंततः सभी ने वीगास के निष्कर्षों की पुष्टि कर दी।

मुंबई प्लेग के दौरान एक अस्पताल का अंदरूनी दृश्य

रिपोर्ट में लिखा कि बीमारी से प्रभावित जिलों में चूहों के दल, यहां से वहां चक्कर काट रहे हैं। अपने साथ वे बीमारी के कीटाणु भी ले जा रहे हैं। 29 सिंतबर, 1896 को गवर्नर विलियम सेंडहर्स्ट के कार्यालय से अधिसूचना जारी हुई — “मुंबई प्लेग की गिरफ्त में है।”[3] प्लेग का स्थायी इलाज खोजने के लिए वैज्ञानिक, डाक्टर सभी सक्रिय हो जाते हैं। इस बीच उसका प्रकोप बढ़ता ही जाता है। 1896 के आखिरी महीनों में मुंबई में महामारी से मरने वालों की संख्या, प्रति सप्ताह 1900 तक पहुंच जाती है।

अकाशियो गेबरियल वीगास का जन्म 1 अप्रैल, 1856 को गोवा के आर्पोरा नामक गांव में हुआ था।[4] बचपन से ही वे तीक्ष्ण बुद्धि थे। कमाल की याददाश्त पाई थी। वीगास की तीक्ष्ण बुद्धि से प्रभावित उनके माता-पिता ने उन्हें डाक्टर बनाने की ठान ली थी। स्कूली शिक्षा के दौरान ही उन्हें मुंबई पढ़ने के लिए भेज दिया गया। वहां से उन्होंने 10वीं की परीक्षा पास की। परीक्षा में अच्छे अंकों के आधार पर उन्हें मुंबई के ग्रांट मेडिकल कॉलेज में दाखिला भी मिल गया। वहां से 1880 में “लाइसेंस इन मेडीशिसन एंड साइंस” (एलएमएंडएस) विषय में डिग्री प्राप्त की। यह ब्रिटिशकालीन भारत में एमबीबीएस जैसी पांच वर्षीय डिग्री थी, मगर उसका पाठयक्रम अपेक्षाकृत छोटा था। वीगास ने यह डिग्री प्रथम श्रेणी में पास की थी। उसके बाद वे मुंबई के मांडवी इलाके में मेडिकल प्रैक्टिशनर के रूप में अपनी सेवाएं देने लगे। अपने हुनर के बल पर उन्होंने बहुत जल्दी मांडवी और आसपास के इलाकों में ख्याति अर्जित कर ली। उसके बाद वीगास फिरोजशाह मेहता से भी जुड़े। मुंबई नगर निगम के सदस्य भी रहे।

प्लेग के दौरान मुंबई की सड़कों पर दवाओं का छिड़काव

प्लेग से निपटने की सरकार की तैयारी

महामारी के कारण का पता चल चुका था। यह भी पता चल चुका था कि चूहे उसके संवाहक बने हुए हैं। इसलिए सरकार ने रोगियों के उपचार के इंतजाम के अलावा तत्काल दो कदम उठाए। पहला प्रभावित इलाकों में दवा का छिड़काव। जिससे प्लेग के विषाणु आगे न पनप सकें। दूसरे चूहों की पकड़ा-धकड़ी और साज-सफाई। वीगास खुद भी स्वास्थ्य अभियान की निगरानी में जुट गए। स्वयं-सेवी संस्थाएं आगे आकर लोगों को जागरूक करने लगीं।

उधर गवर्नर सेंडहर्स्ट ने यूक्रेन के सूक्ष्मविज्ञानी वाल्दीमिर  हॉफकिन (15 मार्च 1860-26 अक्टूबर, 1930) को आमंत्रित किया। ये वही हॉफकिन थे जिन्होंने पाश्चर इंस्टीटयूट, पेरिस में काम करते हुए 18 जुलाई 1882 को मलेरिया की वैक्सीन का आविष्कार किया था।[5]

यूक्रेन के सूक्ष्मविज्ञानी वाल्दीमिर  हॉफकिन(15 मार्च 1860—26 अक्टूबर, 1930)

जिन दिनों मुंबई में प्लेग ने हमला किया, उन दिनों हॉफकिन की ख्याति शिखर पर थी। गवर्नर के आमंत्रण पर वे मुंबई पहुंचे। वहां अस्थायी प्रयोगशाला बनाकर काम करने लगे। लगातार तीन महीनों तक वे अपनी प्रयोगशाला में व्यस्त रहे। इस बीच मुंबई में प्लेग ने घमासान मचा दिया था। अक्टूबर 1896 से जनवरी 1897 के बीच नगर में, तमाम सुरक्षा इंतजामों के बावजूद प्लेग 3148 लोगों की जान ले चुकी थी। अफवाहों का बाजार जोरों पर था। उधर हॉफकिन जल्दी से जल्दी अपनी चुनौती पर खरा उतरना चाहते थे।

तीन महीनों के अनथक परिश्रम के बाद अंततः 10 जनवरी 1897 को हॉफकिन को प्लेग की वैक्सीन बनाने में कामयाबी हाथ लगी। उनके लिए यह जीवन का दूसरा यादगार दिन था। पहला यादगार दिन वह था जब उन्हें मलेरिया की वैक्सीन बनाने में कामयाबी मिली थी। परंतु वैक्सीन के परीक्षण की चुनौती जैसी पहले थी, वैसी ही अब थी। समझाने पर कोई मलेरिया की वैक्सीन की जांच में सहयोग करने को भले ही तैयार हो जाए, प्लेग के नाम पर राजी करना तो जीवन दाव पर लगाने जैसा था। सो एक बार फिर हॉफकिन ने  खुद को आगे किया। उन्होंने 10 मिलीलीटर वैक्सीन की खुराक इंजेक्शन के जरिए अपने शरीर में ली। यह निश्चित होने के बाद कि वैक्सीन मानव शरीर के लिए नुकसानदेह नहीं है, हॉफकिन उसके उत्पादन में जुट गए। एक महीने में वैक्सीन बड़े पैमाने पर जांच के लिए तैयार थी। आगे की जांच के लिए मुंबई की बाइकुला जेल के कुछ कैदी स्वेच्छा से आगे आ आए। फरवरी में वह जांच संपन्न हुई। संतोषजनक परिणाम आने के बाद वैक्सीन का रोगियों पर इस्तेमाल शुरू कर दिया गया। इस तरह अकाशियो गेबरियल वीगास द्वारा शुरू की गई शोध एक अंजाम तक पहुंची।

वैक्सीन बनने के बाद वीगास ने रोगियों पर उनका इस्तेमाल करना आरंभ कर दिया। मुंबई के प्रसिद्ध डॉक्टर डॉ. भालचंद्र कृष्ण, डॉ. एडम्स वायली, डॉ. पुरुषोत्तम हरीचंद, डॉ. त्रिलोकेकर, डॉ. डि’सूजा, डॉ. कलापेसी, और जे.बी. क्वाड्रोस आदि भी उनके साथ थे। गरीब-मजदूर, टीका लगवाने ज्यादा से ज्यादा चलकर आएं, इसके लिए एक टीका लगवाने पर चार आना इनाम की व्यवस्था की गई थी। इसलिए वगीस और उनके साथियों ने कुछ ऐसे लोगों को तैयार कर लिया, जो इनाम की धनराशि दान करने को तैयार थे। इतने इंतजामों के बावजूद 1894 से 1938 के बीच प्लेग दुनिया भर में 13152000 जानें ले चुका था, उसमें भारत में मरने वालों की संख्या सर्वाधिक, 12500000 थी।

इस बार महामारी एक नए नाम-रूप के साथ हमारे बीच है। उसकी संक्रमण दर भी पहली से कई गुना ज्यादा है। रहीम ने कहा था कि कुछ दिन के आई विपत्ति भी भली होती है, क्योंकि उससे मित्र-अमित्र की परख हो जाती है। आपदा बड़ी हो और लंबे समय तक चले तो वह समाज के धैर्य, उसकी एकता और बंधुत्व की कसौटी होती है। दूसरे शब्दों में थोड़े दिन की मेहमान बनी विपत्ति जैसे मनुष्य के धैर्य, उसके सद्गुणों की परख करती है, वैसे ही थोड़ी बड़ी विपत्ति समाज में समृद्धि, सहनशीलता तथा उसमें व्याप्त भाईचारे के लिए कसौटी बन जाती है। इसी से जुड़ा एक अटल सत्य : महामारियां मनुष्य की गलती से आती हैं और सावधानी बरतने पर चली भी जाती हैं।

(संपादन : नवल/गोल्डी)

[1] ए फारगॉटन लिब्रेटर, सावित्रीबाई फुले, ब्रजरंजन मणि द्वारा संपादित, पृष्ठ 26
[2] ज्ञान प्रकाश, मुंबई फेबल्स,प्रिंसटन यूनीवर्सिटी प्रेस, न्यू जर्सी,  पृष्ठ 68—69
[3] नताशा सरकार, फ्लीज, फेथ एंड पॉलिटिक्स, एनाटॉमी ऑफ़ एन इंडियन एपीडेमिक, 1890.1925,  शोध प्रबंध, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर, 2011, पृष्ठ 47
[4] जे. क्लेमेंट वाज, प्रोफाइल ऑफ एमीनिएंट गोआन, पास्ट एंड प्रजेंट, पृष्ठ 170-171
[5] नताशा सरकार, फ्लीज, फेथ एंड पॉलिटिक्स, एनाटॉमी ऑफ़ एन इंडियन एपीडेमिक, 1890.1925,  शोध प्रबंध, नेशनल यूनीवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर, 2011, पृष्ठ 47

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