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लोकतंत्र के खिलाफ उच्च जातियों की बगावत

ज्यां द्रेज के मुताबिक, भारत में हिन्दू राष्ट्रवाद के उभार को हम समतामूलक प्रजातंत्र के खिलाफ ऊंची जातियों की बगावत के रूप में देख सकते है। ऊंची जातियों के लिए हिंदुत्व वह ‘लाइफबोट’ है जो उन्हें उस काल में वापस ले जाएगी, जब ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था का बोलबाला था

हिंदुत्व और जाति

हिन्दू राष्ट्रवाद जिसे “हिंदुत्व” के नाम से भी जाना जाता है की विचारधारा, उसकी मूलभूत अवधारणाओं और सिद्धांतों को समझना बहुत मुश्किल नहीं है। अपनी पुस्तक एसेंशियल्स ऑफ़ हिंदुत्व में विनायक दामोदर सावरकर (1923) ने इनका अत्यंत स्पष्टता से वर्णन किया है। इनकी और अधिक विस्तृत व्याख्या एम.एस. गोलवलकर जैसे अन्य हिंदुत्व विचारकों ने की है। इस विचारधारा की मूल अवधारणा है कि भारत “हिन्दुओं” का है। “हिन्दू” शब्द को इसमें धार्मिक आधार पर परिभाषित न करते हुए उसे सांस्कृतिक अर्थ दिया गया है। इसी के चलते हिन्दू की परिभाषा में सिक्खों, जैनियों और बौद्धों को तो शामिल किया गया है, परन्तु ईसाईयों और मुसलमानों को नहीं (क्योंकि इन दोनों धर्मों का जन्म भारत के बाहर हुआ था)। हिंदुत्व की विचारधारा का अंतिम लक्ष्य हिन्दुओं को एक करना, हिन्दू समुदाय को शक्तिसंपन्न बनाना और भारत को हिन्दू राष्ट्र के परिवर्तित करना है।

यह महत्वपूर्ण है कि इन अवधारणाओं और विचारों के समर्थन में जो तर्क प्रस्तुत किये गए और किये जा रहे हैं उनका तार्किकता, सामान्य समझ और वैज्ञानिक सोच से कोई वास्ता ही नहीं है। इसका एक उदाहरण है गोलवलकर का यह तर्क कि सभी हिन्दू एक ही नस्ल यानी आर्य नस्ल के हैं। जब गोलवलकर ने यह दावा किया था तब उनके पास वे वैज्ञानिक जानकारियां नहीं थीं, जो आज हमारे पास हैं । परंतु उनका कहना था कि आर्य उत्तरी ध्रुव में रहते थे। उससे भी एक कदम आगे बढ़कर उन्होंने यह दावा भी किया कि उत्तरी ध्रुव, भारत में था!

“…उत्तरी ध्रुव स्थिर नहीं है और सुदूर अतीत में, वह दुनिया के उस हिस्से में था, जिसे हम आज बिहार और उड़ीसा कहते हैं…फिर वह उत्तर पूर्व की ओर खिसकने लगा और कभी पश्चिम तो कभी उत्तर दिशा में चलते हुए, उस स्थान पर पहुँच गया जहाँ वह आज है…हम सब इस पूरे घटनाक्रम के दौरान यहीं बने रहे। आर्कटिक क्षेत्र हमें छोड़कर उत्तर की तरफ अपनी टेढ़ी-मेढ़ी यात्रा पर निकल गया” (गोलवलकर, 1939: 8)।

गोलवलकर ने यह स्पष्ट नहीं किया कि जब उत्तरी ध्रुव अपनी “टेढ़ी-मेढ़ी” यात्रा पर निकला तब आर्य भला यहीं कैसे बने रहे। इसी तरह के हवाई तर्कों से उन्होंने अपने इस बेतुके दावे को सही ठहराने का प्रयास किया कि सभी हिन्दुओं की भाषा एक है। 

हिंदुत्व की परियोजना का एक उद्देश्य उस पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था को पुनर्स्थापित करना है, जो हिन्दुओं की कथित साझा संस्कृति का भाग है। जाति प्रथा या कम से कम समाज का चार वर्णों में विभाजन, इस सामाजिक व्यवस्था का अभिन्न अंग है।  अपनी पुस्तक वी आर ऑवर नेशनहुड डिफाइंड  में गोलवलकर साफ़-साफ़ शब्दों में कहते हैं कि “वर्ण और आश्रम, हिन्दू समाज के ढांचे की विशेषताएं हैं” (गोलवलकर, 1939: 54)। वे अपने इस कथन को बंच ऑफ़ थॉट्स  (1966) में विस्तार देते हैं। वे लिखते हैं कि वर्ण व्यवस्था, “समरस सामाजिक व्यवस्था” का आधार है। जाति प्रथा के अन्य समर्थकों की तरह वे भी यह दावा करते हैं कि वर्ण व्यवस्था, सामाजिक पदक्रम का निर्धारण नहीं करती। परन्तु उनके इस दावे में कोई दम नहीं है। 

गोलवलकर और अन्य हिन्दुत्ववादी चिंतकों को जाति से कोई परेशानी नहीं है। उन्हें परेशानी “जातिवाद” से है। हिंदुत्व की शब्दावली में “जातिवाद” का अर्थ जाति के आधार पर भेदभाव नहीं है (जैसे नस्लवाद से आशय नस्ल के आधार पर भेदभाव से होता है)। बल्कि जातिवाद से उनका आशय है जातियों के बीच टकराव के विभिन्न स्वरूप जैसे दलितों का उनकी आवाज़ बुलंद करना और उनके लिए आरक्षण की मांग करना। हिंदुत्ववादियों के लिए यह जातिवाद है क्योंकि इससे हिन्दू समाज विभाजित होता है। 

हिन्दू राष्ट्रवाद का झंडाबरदार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस सोच के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध है। जाति के बारे में उसका दृष्टिकोण स्पष्ट है। वह जाति को “हमारे देश की विशिष्टता” मानता है, जैसा कि भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव ने द इंडियन एक्सप्रेस  में लिखा था (माधव, 2017)। उनके लिए जाति समस्या नहीं है, समस्या है जातिवाद।

आरक्षण से मिली ऊंची जातियाें के लोगों को सबसे बड़ी चुनौती

उत्तर प्रदेश सरकार के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने तीन साल पहले एनडीटीवी को दिए अपने एक साक्षात्कार में जो कहा था वह संघ की सोच को और स्पष्टता से प्रस्तुत करता है। गोलवलकर की तर्ज पर उन्होंने कहा था कि दरअसल जाति समाज के “व्यवस्थित संचालन” की कार्यप्रणाली है। उन्होंने कहा, “जाति की हिन्दू समाज में वही भूमिका है जो खेतों में क्यारियों की होती है। वह समाज को संगठित और व्यवस्थित बनाने में मदद करती है… जाति ठीक है परन्तु जातिवाद नहीं…।”

इस मुद्दे को हम एक दूसरे तरीके से भी देख सकते हैं। हिंदुत्व चिंतकों के समक्ष एक बहुत बड़ी समस्या यह है कि जाति के आधार पर विभाजित समाज को एकता के सूत्र में कैसे बांधा जाए। उसका हल है जाति को एक ऐसी संस्था के रूप में प्रस्तुत करना जो हिन्दुओं को बांटती नहीं, बल्कि एक करती है। कहने की ज़रुरत नहीं कि वंचित जातियां इस सोच से इत्तेफाक नहीं रख सकतीं और यही कारण है कि यह बात सामान्यतः उतनी खुलकर नहीं कही जाती जितनी कि योगी आदित्यनाथ ने अपने साक्षात्कार में कही। हिंदुत्ववादी नेतृत्व जाति प्रथा के संबंध में चुप्पी साधे रहना पसंद करता है, परन्तु यह चुप्पी इस व्यवस्था को उनकी मौन स्वीकृति का प्रतीक है। उनमें से शायद ही किसी ने कभी जाति प्रथा के विरुद्ध कुछ कहा होगा।  

कई मौकों पर हिंदुत्ववादी नेता यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि वे वचन और कर्म से अछूत प्रथा के खिलाफ हैं और इसलिए वे जाति प्रथा के भी विरोधी हैं। सावरकर भी अछूत प्रथा के विरोधी थे और उन्होंने डॉ. आंबेडकर द्वारा इस घृणास्पद प्रथा के विरोध में चलाये गए पहले सविनय अवज्ञा आन्दोलन महाड सत्याग्रह,का समर्थन किया था (जेलिअट, 2013: 80)। परन्तु अस्पृश्यता का विरोध, जाति प्रथा का विरोध नहीं है। ऊंची जातियों में जाति प्रथा का बचाव करते हुए अस्पृश्यता का विरोध करने और उसे इस प्रथा में बाद में घुस आई विकृति बताने की लम्बी परंपरा है।

सत्ता की अनिश्चितता 

हिंदुत्व की परियोजना ऊंची जातियों के लिए अच्छा सौदा है क्योंकि मूलतः यह उस पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था को पुनर्स्थापित करने का हिमायती है, जिसमें ऊंची जातियों का स्थान सर्वोच्च था। जाहिर है कि आरएसएस, ऊंची जातियों में खासा लोकप्रिय है। उसके सभी संस्थापक ब्राह्मण थे और अब तक उसके जितने भी मुखिया हुए हैं उनमें से एक (राजेंद्र सिंह, जो राजपूत थे) को छोड़कर अन्य सभी ब्राह्मण थे। हिंदुत्व आन्दोलन की सभी संस्थापक हस्तियां – सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर, नाथूराम गोडसे, श्यामाप्रसाद मुख़र्जी, दीनदयाल उपाध्याय  से लेकर मोहन भागवत और राम माधव तक- सभी की जाति ब्राह्मण है। समय के साथ, संघ ने ऊंची जातियों के बाहर भी अपना प्रभाव क्षेत्र का विस्तार किया परन्तु आज भी ऊंची जातियां हीं संघ का सबसे वफादार और विश्वसनीय आधार हैं।  

भारत की स्वाधीनता के साथ ही ऊंची जातियों की सामाजिक सर्वोच्चता खतरे में आ गई और ऐसे में हिंदुत्व उनके लिए वह “लाइफबोट” बन गया जो उन्हें डूबने से बचाएगा। कहने की आवश्यकता नहीं कि स्वाधीन भारत में भी ऊंची जातियां अपनी सत्ता और विशेषाधिकार बचाए रखने में काफी हद तक सफल रहीं हैं। उदाहरण के लिए सन 2015 में इलाहाबाद में “सत्ता और प्रभाव वाले पदों पर काबिज़ व्यक्तियों” – जिसमे विश्वविद्यालय शिक्षक, प्रेस क्लब और बार एसोसिएशन के सदस्य, उच्च पुलिस अधिकारी, ट्रेड यूनियन नेता, एनजीओ के प्रमुख आदि शामिल थे – के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि इनमें से 75 प्रतिशत ऊंची जातियों से थे। उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में ऊंची जातियां 16 प्रतिशत है। इन पदों पर विराजमान व्यक्तियों में से आधे ब्राह्मण या कायस्थ थे। यह दिलचस्प है कि सरकारी क्षेत्र की तुलना में नागरिक संस्थाओं जैसे ट्रेड यूनियनों, एनजीओ और प्रेस क्लब में जातिगत असंतुलन कहीं अधिक था। इलाहाबाद इस देश का केवल एक शहर है परन्तु कई अध्ययनों से यह सामने आया है कि मीडिया घरानों, कॉर्पोरेट संस्थाओं के संचालक मंडलों, क्रिकेट टीमों और वरिष्ठ प्रशासनिक पदों में ऊंची जातियों का दबदबा है। 

परन्तु इसमें कोई शक नहीं कि ऊंची जातियों की नाव में कई छेद हो गए हैं और उसमें तेजी से पानी भर रहा है। जैसे, एक समय था जब शिक्षा के क्षेत्र में ऊंची जातियों का एकाधिकार था। बीसवीं सदी की शुरुआत में जहां अधिकांश ब्राह्मण पुरुष साक्षर होते थे, वहीं दलितों में साक्षरों का प्रतिशत भी शून्य के करीब था। ऐसा नहीं है कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में भेदभाव और असमानता है ही नहीं, परन्तु कम से कम सरकारी स्कूलों में दलित और ऊंची जातियों के बच्चों के बीच कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता है। सभी जातियों के बच्चों को एक-सा मध्यान्ह भोजन मिलता है और वे उसे एक साथ खाते हैं। यह अलग बात है कि इस पहल से ऊंची जातियों के अनेक अभिवावक अप्रसन्न हैं (ड्रेज़, 2017)। हाल में, कुछ राज्यों में मध्यान्ह भोजन में अंडा शामिल किये जाने का ऊंची जातियों के शाकाहारियों ने कड़ा विरोध किया। इसी के चलते, भाजपा-शासित प्रदेशों की सरकारें स्कूलों में अंडे परोसने को तैयार नहीं हैं। 

स्कूली शिक्षा एक ऐसा क्षेत्र है जहां ऊंची जातियों को अपने दबदबे और विशेषाधिकारों से समझौते करना पड़ा है। चुनाव प्रणाली ऐसा ही एक दूसरा क्षेत्र है यद्यपि आंबेडकर (1945: 208))के शब्दों में, “वयस्क मताधिकार और निश्चित समयांतर पर चुनाव, शासक वर्गों के सत्ता और प्रभाव वाले पदों पर काबिज़ होने में बाधक नहीं हैं।”  लोकसभा में ऊंची जातियों का प्रतिनिधित्व (29 प्रतिशत), आबादी में उनके अनुपात से कुछ ज्यादा हो सकता है परन्तु सत्ता और प्रभाव वाले पदों पर उनके लगभग संपूर्ण कब्ज़े की तुलना में वह कुछ भी नहीं है (त्रिवेदी इत्यादि, 2019)। स्थानीय स्तर पर भी, पंचायती राज्य संस्थाओं में महिलाओं, एससी व एसटी के लिए पदों के आरक्षण से राजनीति के क्षेत्र पर ऊंची जातियों की पकड़ कमज़ोर हुई है। इसी तरह, न्यायिक व्यवस्था भी ऊंची जातियों की मनमानी पर कुछ हद तक लगाम लगी है (जैसे ज़मीनों पर अवैध कब्ज़े, बंधुआ मजदूरी और अस्पृश्यता से जुड़े मसलों में), यद्यपि विधि के समक्ष समानता अब भी एक स्वप्न ही है।   

कुछ आर्थिक परिवर्तनों ने भी ऊंची जातियों के वर्चस्व को कमज़ोर किया है, विशेषकर ग्रामीण इलाकों में। कई साल पहले, मुझे इसका एक उदाहरण पश्चिमी उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले के एक गांव पालनपुर में देखने को मिला था। यह सन 1983 की बात है। जब हमने वहां के एक रहवासी मानसिंह (परिवर्तित नाम), जो तुलनात्मक दृष्टि से शिक्षित था, से गांव में हुए सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों के बारे में लिखने को कहा, तो उसने यह लिखा:

  1. निम्न जातियों के लोग, ऊंची जातियों के लोगों से बेहतर जीवन गुज़ार रहे हैं। इसके कारण ऊंची जातियों के लोगों के मन में निम्न जातियों के प्रति बहुत ज्यादा जलन और नफरत का भाव पैदा हो गया है। 
  2. निम्न जातियों में शिक्षित व्यक्तियों का अनुपात बहुत तेजी से बढ़ रहा है।  
  3. कुल मिलाकर, हम यह कह सकते हैं कि निम्न जातियां ऊपर जा रहीं हैं और ऊंची जातियां नीचे आ रहीं हैं क्योंकि आधुनिक समाज में निम्न जातियों की आर्थिक स्थिति ऊंची जातियों से बेहतर नज़र आ रही है। 

मानसिंह ने जो कुछ लिखा उसे पढ़कर मैं यह समझ नहीं पा रहा था कि आखिर वह क्या कहना चाहता है। फिर मुझे पता चला कि “निम्न जातियों” से उसका आशय दलितों से नहीं बल्कि उसकी स्वयं की जाति, मुराव से था। मुराव उत्तरप्रदेश की एक ओबीसी जाति है। अब पूरी बात साफ थी और हमारे निष्कर्षों से मेल भी खा रही थी। मुराव एक कृषक जाति है जो जमींदारी के उन्मूलन और हरित क्रांति के चलते समृद्ध हो गई है। ऊंची जाति के ठाकुर, जमींदारी की ऐंठ में मुरावों से पीछे छूट गए हैं। वे अपनी शान बनाए रखने के फेर में फंसे रह गए क्योंकि पारंपरिक रूप से यह माना जाता था कि उन्हें हल का मूठ भी नहीं छूना चाहिए। इस बीच मुरावों ने कई फसलें उगानी शुरू कर दीं, उन्होंने अपने खेतों में ट्यूबवेल खोदे और अपनी बढ़ती आमदनी से और जमीनें खरीद लीं। जैसा कि मानसिंह ने लिखा, मुराव न केवल ठाकुरों से अधिक समृद्ध हो गए वरन् शिक्षा के मामले में भी उनकी बराबरी पर आ गए। जाहिर है कि ठाकुर इससे खुश नहीं थे। 

विभिन्न अध्ययनों से यह जाहिर है कि पालनपुर में जो हुआ वही अन्य कई गांवों में भी हुआ। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि स्वाधीनता के बाद ग्रामीण भारत में सभी स्थानों पर ऊंची जातियों की आर्थिक स्थिति कमजोर हुई है परंतु ऐसा काफी स्थानों पर हुआ है। 

संक्षेप में यद्यपि आज भी ऊंची जातियों का आर्थिक और सामाजिक जीवन के अनेक क्षेत्रों पर लगभग संपूर्ण नियंत्रण है परंतु कुछ मामलों में उनका वर्चस्व समाप्त हो रहा है या उसके समाप्त हो जाने का खतरा है। किसी मामूली से विशेषाधिकार को खो देने से भी ऊंची जातियां अपमानित महसूस कर सकती हैं और उन्हें लग सकता है कि उनका बहुत बड़ा नुकसान हुआ है।

जवाबी हमला

पिछले कुछ दशकों में ऊंची जातियों के विशेषाधिकारों को जो विभिन्न चुनौतियां मिलीं हैं, उनमें से सबसे बड़ी है शिक्षण संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था। इस व्यवस्था ने ऊंची जातियों को सबसे अधिक आक्रोशित किया है। आरक्षण के कारण ऊंची जातियों के लिए नौकरियों और शिक्षा के अवसरों में वास्तव में कितनी कमी आई है यह कहना कठिन है। वैसे भी, आरक्षण की व्यवस्था का ईमानदारी से कार्यान्वयन नहीं किया गया है और वह केवल सरकारी क्षेत्र में लागू होती है. परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि ऊंची जातियों में यह धारणा बन गई है कि उनकी नौकरियों और डिग्रियों पर एससी, एसटी और ओबीसी ने कब्ज़ा जमा लिया है।  

देश में भाजपा की ताकत में इजाफे की शुरुआत सन 1990 में हुई। तब तत्कालीन वीपी सिंह सरकार द्वारा ओबीसी को आरक्षण प्रदान करने के लिए मंडल आयोग की रपट लागू किये जाने की घोषणा की गई थी। इससे न केवल हिन्दू समाज के बंटने का खतरा था बल्कि यह सम्भावना भी थी कि ओबीसी, जो कि देश की कुल आबादी का लगभग 40 प्रतिशत हैं, भाजपा से दूर छिटक जायेंगे क्योंकि भाजपा मंडल आयोग की रपट लागू करने के विरोध में थी। एल.के आडवाणी की रथयात्रा और उसके बाद के घटनाक्रम (जिसमें 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना शामिल था) ने “जातिवाद” के इस खतरे को समाप्त कर दिया और हिन्दू एक बार भाजपा और ऊंची जातियों के नेतृत्व में एक हो गए। मुसलमानों के प्रति बैरभाव ने उन्हें एक सूत्र में बाँधा।

यह एक उदाहरण है कि उनके विशेषाधिकारों को खतरों से निपटने और हिन्दू समाज पर उनका नियंत्रण पुनः स्थापित करने में हिंदुत्व किस तरह ऊंची जातियों की मदद करता है। समकालीन हिंदुत्व आन्दोलन का यह एक महत्वपूर्ण कार्य है। इस आन्दोलन के संभावित विरोधियों में मुसलमान ही नहीं बल्कि ईसाई, दलित, आदिवासी, कम्युनिस्ट, धर्मनिरपेक्षतावादी, तर्किक्तावादी, नारीवादी आदि शामिल हैं। कुल मिलाकर, वे सब हिंदुत्व के शत्रु हैं जो ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना के खिलाफ हैं। 

यद्यपि हिंदुत्व को अक्सर “बहुसंख्यकवादी आन्दोलन” कहा जाता है तथापि शायद उसे “दमनकारी अल्पसंख्यकों का आन्दोलन” कहना बेहतर होगा।

हिंदुत्व आन्दोलन (बल्कि हाल में उसकी ताकत में जबरदस्त इज़ाफे) की इस व्याख्या पर एक आपत्ति यह हो सकती है कि बड़ी संख्या में दलित हिंदुत्व आन्दोलन का समर्थन कर रहे हैं। इस व्याख्या का जवाब आसान है। पहली बात तो यह है कि इसमें संदेह है कि बड़ी संख्या में दलित आरएसएस या हिंदुत्व के समर्थक है। सन 2019 के चुनाव में दलितों ने भाजपा को अपना मत दिया था, इसमें कोई संदेह नहीं है। परन्तु भाजपा को वोट देने का अर्थ हिंदुत्व का समर्थन करना नहीं है। भाजपा को मत देने के अनेक कारण हो सकते हैं। दूसरे, हिंदुत्व की विचारधारा के समर्थक न होते हुए भी, इस विचारधारा के कुछ पक्ष दलितों को आकर्षक लग सकते हैं। जैसे, संघ ने पूरे देश में स्कूलों का जाल फैलाया है और वह कई तरह के सामाजिक कार्य भी करता रहता है। इन कार्यों का फोकस मुख्यतः वंचित समूहों पर होते है। तीसरे, आरएसएस ने दलितों का समर्थन हासिल करने के लिए महती प्रयास किए हैं। इनमें सामाजिक कार्यों के अलावा धुआंधार प्रचार भी शामिल है। संघ ने डॉ आंबेडकर का नाम जपना शुरू कर दिया है।  सच पूछा जाय तो हिंदुत्व और डॉ. आंबेडकर के विचारों में कोई समानता नहीं है, परन्तु आरएसएस आंबेडकर को अपना बनाने के प्रयासों में जुटा हुआ है।  

अंत में यह तर्क भी दिया जा सकता है कि भले ही हिंदुत्व जाति के उन्मूलन का पैरोकार नहीं हैं परन्तु जाति के बारे में उसकी सोच और आचरण, उतनी दमनकारी नहीं है जितनी कि वर्तमान जाति व्यवस्था है। कुछ दलितों को लग सकता है कि कोई चाहे जो कहे, संघ में उसके साथ व्यापक समाज की तुलना में बेहतर व्यवहार होता है। जैसा कि एक संघ प्रेमी फरमाते हैं, “हिंदुत्व सभी हिन्दुओं को एक साझा पहचान देने का वायदा करता है और इसलिए दलितों और ओबीसी के एक बड़े तबके को लगता है कि हिंदुत्व उन्हें उनकी कमज़ोर जाति की संकीर्ण पहचान से मुक्ति दिलवाकर उन्हें शक्तिशाली हिन्दू समुदाय का हिस्सा बना देगा” (सिंह, 2019)। यह अलग बात है कि यह “वायदा” अक्सर मृगतृष्णा साबित होता है। आरएसएस के दलित कार्यकर्ता बतौर भंवर मेघवंशी का अनुभव इसका ज्वलंत उदाहरण है (मेघवंशी, 2020)।

जैसा कि पहले कहा जा चुका है, हिन्दू राष्ट्रवाद के उदय को भाजपा की चुनावी सफलता से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। परन्तु फिर भी, 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की जबरदस्त विजय, आरएसएस की विजय भी है। आज देश के सभी बड़े पदों (राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उप-राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, महत्वपूर्ण मंत्रालयों के मंत्री, राज्यपाल इत्यादि) पर ऐसे लोग बैठे हैं जो आरएसएस के या तो वर्तमान अथवा पूर्व सदस्य है और हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध है। 

प्रजातंत्र के खिलाफ ऊंची जातियों के दबे-छुपे विद्रोह ने अब प्रजातान्त्रिक संस्थाओं और मूल्यों – जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति का अधिकार – पर सीधे हमले का स्वरुप ले लिया है। प्रजातंत्र के क्षय से जाति मज़बूत होगी। 

संदर्भ :  

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(यह लेख ‘कास्ट: ए ग्लोबल जर्नल ऑन सोशल एक्सक्लूशन’ के प्रथम अंक में प्रकाशित है। लेखक की सहमति से हिंदी में  प्रकाशित)

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया संपादन : गोल्डी/नवल )

लेखक के बारे में

ज्यां द्रेज

ज्यां द्रेज बेल्जियन मूल के भारतीय नागरिक हैं और सम्मानित विकास अर्थशास्त्री हैं। वे रांची विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के अतिथि प्राध्यापक हैं और दिल्ली स्कूल आॅफ इकानामिक्स में आनरेरी प्रोफेसर हैं। वे लंदन स्कूल आॅफ इकानामिक्स और इलाहबाद विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य कर चुके हैं। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिति के दस्तावेजीकरण में उनकी महती भूमिका रही है। वे (महात्मा गांधी) राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के प्रमुख निर्माताओं में से एक हैं। उन्हाेंने नोबेल पुरस्कार विजेता अर्मत्य सेन के साथ कई पुस्तकों का सहलेखन किया है जिनमें ‘हंगर एंड पब्लिक एक्शन‘ व ‘एन अनसरटेन ग्लोरी : इंडिया एंड इटस कोन्ट्राडिक्शंस‘ शामिल हैं। सामाजिक असमानता, प्राथमिक शिक्षा, बाल पोषण, स्वास्थ्य सुविधाओं व खाद्य सुरक्षा जैसे विषयों पर शोध में उनकी विशेष रूचि है

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