कोरोना काल में सामंतों व सूदखोरों से गरीबों को निजात दिला सकता है मनरेगा

प्रवासी मजदूरों के लौटने से गांवों में रोजगार का संकट गहराने लगा है। ऐसे में मनरेगा योजना के जरिए हालात में बदलाव संभव है। लेकिन इसके लिए सरकार को अपनी नीति और नीयत दोनों बदलने की जरूरत है। बता रहे हैं नवल किशोर कुमार

कोविड-19 का संक्रमण रोकने के लिए लागू किये गए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन का असर चहुं ओर दिखने लगा है। कल-कारखानों के बंद होने व निर्माण क्षेत्र में काम-काज ठप्प होने के कारण मजदूर अपने घरों को लौट रहे हैं। इस कारण गांवों में रोजगार का संकट गहराता जा रहा है। इसके अलावा लॉकडाउन के सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी होंगे।

गांवों में फैलेगी अराजकता, बढ़ेगा सामंतवाद : उर्मिलेश

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश मानते हैं कि लॉकडाउन के कारण भारत में हालात तेजी से बदलने वाले हैं। ये बदलाव आगे की ओर नहीं बल्कि पीछे ले जाने वाले होंगे। खासकर उत्तर भारत के गांवों में जहां जागरूकता को लेकर कोई बड़ी पहल नहीं हुई है और जहां आज भी वर्ण व्यवस्था मजबूत है। यह भी कहा जा सकता है कि ये गांव अभी भी जातिवादी वर्चस्ववाद व सामंतवाद के मजबूत किले हैं। उर्मिलेश के मुताबिक पलायन करने वालों में कमेरा वर्ग के लोग हैं जिन्हें दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग का माना जाना चाहिए। पलायन के बाद इन लोगों ने चाहे छोटी-मंझोली औद्योगिक इकाइयों में काम किया हो या फिर बड़े कारखानों में परन्तु इससे उनकी हालत में सुधार तो हुआ है। वजह यह कि गांवों के विपरीत शहरों में समाज ने अपने कपाट बंद करके नहीं रखे थे। जानकारी व समझ की खिड़कियां खुली थीं। यही वजह रही कि पलायन करने वाले मजदूरों ने अपनी कमाई का एक हिस्सा अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने में खर्च किया। परंतु, अब जबकि सत्ता का क्रूरतम चेहरा सामने आ रहा है यह निस्संदेह इस ओर इशारा करता है कि आने वाले दिनों में भारत में हालात बदलेंगे और न केवल आर्थिक बल्कि राजनीतिक क्षेत्र में भी सामंती तबकों का वर्चस्व बढ़ेगा।

पहले से संकटग्रस्त हैं गांव

गांवों में किस तरह का रोजगार का संकट है, उसे बिहार के आंकड़ों से समझा जा सकता है। बिहार सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट 2019-20 में इसका ब्यौरा दर्ज है। राज्य में सबसे अधिक, 44.6 फीसदी रोजगार, कृषि और मत्स्यपालन के क्षेत्रों में सृजित होता है। निर्माण क्षेत्र में 17.1 प्रतिशत, थोक व खुदरा व्यापार और वाहनों की मरम्मत आदि में 12.3 प्रतिशत लोगों को रोज़गार मिलता है जबकि विनिर्माण क्षेत्र में 9.3 फीसदी रोजगार का सृजन होता है।

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, सामाजिक कार्यकर्ता शंकर सिंह और आरती वर्मा

ध्यातव्य है कि सबसे अधिक रोजगार कृषि, पशुपालन व मत्स्यपालन के भरोसे ही है। ऐसे में यह कह पाना मुश्किल है कि ये क्षेत्र लौटने वाले मजदूरों को रोजगार व वाजिब मजदूरी उपलब्ध करा पाने में सक्षम होंगे।

मनरेगा कारगर, लेकिन नीति और नीयत दोनों बदले सरकार : शंकर सिंह

लेकिन यदि सरकार की तरफ से इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गयी तब उनके हालात बदतर होंगे। राजस्थान के सामाजिक कार्यकर्ता शंकर सिंह के मुताबिक गांवों में रोजगार का संकट तो पहले से ही है। अब जबकि लॉकडाउन के कारण लोग अपने घरों को लौट रहे हैं, गांवों पर दबाव बढ़ा है। उनके मुताबिक, राजस्थान में पिछले एक महीने में मनरेगा योजना के तहत जॉबकार्ड के लिए आवेदन करनेवालों की संख्या 30 लाख से अधिक हो गयी है। इसकी वजह बताते हुए वे कहते हैं कि पहले परिवार के एक या दो व्यक्ति जॉबकार्डधारी थे लेकिन अब जो लोग लौट चुके हैं, वे भी रोजगार पाने की आस में आवेदन कर रहे हैं। शंकर सिंह ने यह भी बताया कि केंद्र और राज्य सरकार दोनों ने मनरेगा योजना को प्राथमिकता नहीं दी है। इस कारण योजना के लिए वित्तीय आवंटन इतना नहीं है कि सभी लोगों को रोजगार दिया जा सके। यही कारण है कि सरकार तरह-तरह के बहाने बनाकर लोगों को रोजगार देने की अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हट रही है। राज्य सरकार का कहना है कि लॉकडाउन में सोशल डिस्टेंसिंग जरूरी है।  राजस्थान में लोग यह भी करने को तैयार हैं परंतु सरकार अब यह कह रही है कि उसके पास गांवों में देने के लिए काम ही नहीं है। शंकर सिंह के मुताबिक यह सब महज बहानेबाजी है। सरकार मनरेगा योजना के क्रियान्वयन में शिथिलता बरत रही है। जबकि वह जानती है कि मनरेगा मांग-आधारित योजना है। यदि जॉबकार्डधारी काम मांगता है तो उसे सरकार को काम देना ही है। नहीं देने की स्थिति में उसे बेरोजगारी भत्ता देना होगा। सरकार इस जिम्मेदारी से भी पीछे हट रही है। जबकि होना यह चाहिए कि जिस तरह सरकार राशन का वितरण परिवार के सदस्यों की संख्या के आधार पर करती है, वैसे ही रोजगार भी परिजनों के हिसाब से उपलब्ध करवाया जाए। मतलब यह कि परिवार में किसी एक व्यक्ति को सौ दिनों का रोजगार देने तक सरकार सीमित न रहे। परिवार के सभी बालिग सदस्य जो मजदूरी करना चाहें, उन्हें रोजगार उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

मनरेगा योजना के तहत सामुदायिक परियोजनाओं को मिले प्राथमिकता

सामूहिकता को महत्व दे सरकार : आरती वर्मा

बिहार में मनरेगा मजदूरों के बीच काम कर रहीं आरती वर्मा भी यह मानती हैं कि मनरेगा के जरिए गांव लौटने वाले मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है। परंतु, इसके क्रियान्वयन में अभी भी अनेक खामियां हैं। एक समस्या तो पारिश्रमिक के भुगतान की है। हालांकि सरकार ने यह तय कर रखा है कि पंद्रह दिन बाद मनरेगा मजदूर का पारिश्रमिक सीधे उसके बैंक खाते में भेज दिया जाय। परंतु, अभी के हालात इतने खराब हैं कि मजदूरों को रोज पैसे की आवश्यकता है। वे पन्द्रह दिनों तक इंतजार करने की स्थिति में नहीं हैं। दूसरी बड़ी खामी तंत्र आधारित है। इसमें भ्रष्टाचार भी शामिल है। 

आरती बताती हैं कि सरकार चाहे तो मनरेगा के जरिए गांवों की स्थिति बदल सकती है। इसके लिए उसे एक परिवार-एक जॉब कार्ड की नीति को बदलना होगा। दक्षिण के राज्यों में ऐसा हुआ भी है। इसके अलावा सरकार सौ दिन की अवधि को बढ़ाकर दो सौ दिन का रोजगार उपलब्ध कराए। मौजूदा हालात को देखते हुए यह आवश्यक प्रतीत होता है। साथ ही सरकार सामुदायिक परियोजनाओं को प्राथमिकता दे ताकि गांवों में रोजगार की कमी न हो और साथ ही परियोजनाओं का लाभ सामूहिक रूप से  लोगों को मिल सके। इसके लिए सामुदायिक तालाब, सामुदायिक गौशाला, सामुदायिक पॉल्ट्री फार्म आदि का निर्माण कराया जाना चाहिए।

बहरहाल, मनरेगा या फिर मनरेगा जैसी कोई दूसरी योजना, जो गांवों में रोजगार का सृजन करे, से ही लॉकडाउन से उपजे रोज़गार के संकट का निदान हो सकता है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो निश्चित तौर पर गांवों में लोग एक बार फिर सूदखोर महाजनों और सामंती तबकों के जुल्म के शिकार होंगे। उनके पास इसके अलावा कोई चारा भी नहीं होगा।

(संपादन : अनिल/अमरीश)

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