जेएनयू को द्विजों की “ज्ञानस्थली” बनाने की साजिश

कोरोना लॉकडाउन के दौरान जेएनयू में रामायण और गीता पर वेबिनार का आयोजन किया गया। क्या यह जेएनयू की मुक्त वैचारिकी को खत्म कर इस शैक्षणिक संस्थान को हिंदू धर्म व उसके दर्शन तक सीमित करने की साजिश है? हालिया घटनाओं के मद्देनज़र नवल किशोर कुमार की रिपोर्ट

बीते 7 मई, 2020 को प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के तत्वावधान में गीता  पर एक घंटे का वेबिनार आयोजित किया गया। वेबिनार मतलब इंटरनेट के जरिए सेमिनार। शीर्षक था – “लेसंस फ्रॉम द भगवद्गीता ड्यूरिंग कोविड-19”। इस वेबिनार का आयोजक थे विश्वविद्यालय के अटल बिहारी वाजपेयी स्कूल ऑफ मैनेजमेंट एंड एंट्रेप्रेन्योरशिप और सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज। जेएनयू के कुलपति ममिडाला जगदीश कुमार द्वारा ट्विटर  पर जारी संदेश के मुताबिक इस वेबिनार में 400 छात्रों/शोधार्थियों ने हिस्सा लिया। इसे संबोधित किया प्रो. सुभाष काक ने। वे अमेरिका के ओक्लाहोमा विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं।

जेएनयू में गीता ज्ञान के पहले 2 व 3 मई को रामायण पर वेबिनार का आयोजन किया गया, जिसमें प्रोफेसर संतोष कुमार शुक्ला और प्रोफेसर मजहर आसिफ ने इस महाकाव्य पर व्याख्यान दिए थे।जेएनयू में यह सब कुलपति प्रो. मामिडाला जगदीश कुमार की देख-रेख में हो रहा है। दिलचस्प यह है कि वे विज्ञान के अध्येता और नैनोटेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ हैं। 

प्रो. सुभाष काक, जेएनयू के सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के ऑनररी विजिटिंग प्रोफेसर भी हैं। वे साइबर सिक्यूरिटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कम्प्यूटिंग, आर्कियोएस्ट्रोनॉमी और हिस्ट्री ऑफ साइंस के क्षेत्रों में भी काम कर रहे हैं। यानी वे आधुनिक विज्ञान के अध्येता हैं। इनकी सामाजिक पृष्ठभूमि की बात करें तो इनका जन्म कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में हुआ। भले ही इनका विषय विज्ञान रहा है लेकिन ये वैदिक अध्येता के रूप में भी जाने जाते हैं. इन्हें दक्षिणपंथी विचारक माना जाता है। यह सबसे बड़ी वजह थी जिसके कारण पिछले साल इन्हें पद्मश्री से नवाजा गया।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली का प्रशासनिक भवन

विश्व प्रसिद्ध पत्रिका “द इकोनॉमिस्ट” ने पिछले वर्ष जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पतन पर रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसके मुताबिक देश के प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थानों में शुमार यह विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के निशाने पर है। इस लेख में यह बताया गया कि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जगदीश कुमार को भारत के हिंदू-राष्ट्रवादी संगठन आरएसएस का ठोस समर्थन प्राप्त है। दशकों से यह संगठन इस संस्थान पर “वामपंथी तथा आजाद खयालों” की मजबूत पकड़ के खिलाफ आक्रोशित रहा हैं। 2014 के आम चुनाव में इसी संघ परिवार के एक अन्य आनुषांगिक संगठन, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सत्ता में आने के बाद, जेएनयू इनके आक्रोश का शिकार हुआ।

एक नजर गीता पर

“श्रीमद्भगवद्गीता” अथवा “गीता” महाभारत का हिस्सा है। महाभारत को कई पर्वों में बांटा गया है और जिस पर्व में गीता को शामिल किया गया है, उसे भीष्म पर्व कहा जाता है। महाभारत की कथा के मुताबिक गीता का उपदेश कृष्ण ने अर्जुन को तब दिया था जब कौरवों और पांडवों के बीच लड़ाई शुरू होने ही वाली थी। भीष्म पर्व इसलिए क्योंकि कौरवों की ओर से इस लड़ाई के लिए भीष्म को सेनानायक बनाया गया था। लड़ाई शुरू होने के पहले अर्जुन असमंजस में फँस कर युद्ध करने से इंकार कर देता है। तब कृष्ण युद्ध को आवश्यक बताते हुए उसे गीता का उपदेश देते हैं। इस पूरे उपदेश को 18 अध्यायों में बांटा गया है और इसमें 700 से अधिक श्लोक हैं। 

जेएनयू प्रशासन द्वारा जारी पोस्टर

गीता को लेकर इतिहासविदों ने अनेक सवाल उठाये हैं। प्रख्यात इतिहासकार डी.डी. कोसांबी इसे महाभारत में बाद में जोड़ा गया अध्याय बताते हैं। वहीं “संदेह के घेरे में गीता” शीर्षक अपने लेख में भाषा वैज्ञानिक व चिंतक राजेंद्र प्रसाद सिंह बताते हैं कि “प्राचीन काल में आदि शंकराचार्य से पूर्व गीता का उल्लेख बहुत कम या यों कहें कि नहीं के बराबर मिलता है। वाणभट्ट की ‘कादंबरी’ को छोड़कर प्राचीन काल की किसी भी पुस्तक में ‘गीता’ का उल्लेख नहीं है। यदि कालिदास की रचनाओं में ‘गीता’ का प्रयोग है, तो वह अन्य अर्थ में है और उसका संबंध कृष्ण की गीता से नहीं है। भारत के इतिहास में 7वीं सदी का चीनी यात्री ह्वेनसांग वह पहला व्यक्ति है, जिसने गीता की ओर संकेत करते हुए कहा है कि वह किसी ब्राह्मण का जाली ग्रंथ है। यदि गीता प्राचीन है तो 9वीं सदी से पहले भी इस पर कई भाष्य लिखे गए होते। आश्चर्य कि गीता जैसे लोकप्रिय ग्रंथ पर पहला भाष्य 9वीं सदी में शंकराचार्य द्वारा लिखा जाता है।”

अपने इसी लेख में प्रो. सिंह कहते हैं कि “वस्तुत: गीता एक बहुजन नायक के कंधे पर बन्दूक रख कर चलायी गए द्विजवादी गोली है। गीता और कुछ नहीं मनुस्मृति का प्रतिरूप है। फिर गीता के उस बहुजन नायक और प्रवक्ता की हत्या एक बहुजन बहेलिए के ही तीर से कराई जाती है। पहले इस्तेमाल और फिर काम तमाम। ऐसे होते हैं गीतावादी। गीतावादियों की दोहरी मार। साँप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी।”

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. ईश मिश्र ने अपने लेख “बौद्ध दर्शन को पराजित करने के लिए रची गयी गीता” में सविस्तार वर्णन किया है कि कैसे द्विजवादी वर्चस्व को बनाए रखने के लिए गीता की रचना की गयी। उन्होंने लिखा है, “पुराण इतिहास का मिथकीकरण है इसलिए पुराण से इतिहास समझने के लिए, पुराणों के अमिथकीकरण की जरूरत है। पिछले लगभग साढ़े तीन दशकों से राम के जन्मस्थान और जन्मदिन के नाम पर मुल्क में सांप्रदायिक नफरत और लामबंदी का उद्यम फल-फूल रहा है। अब गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की कवायद शुरू हो गई है।”

वे यह भी लिखते हैं कि “गीता दरअसल, ब्राह्मणवादी कर्मकांड तथा वर्णाश्रमी श्रेणीबद्धता के विरुद्ध बौद्ध वैचारिक-सामाजिक क्रांति के बाद ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि के पौराणिक प्रयासों का हिस्सा है। बाबा साहब आंबेडकर ने गीता पर अपने लेख (अधूरे), ‘प्रतिक्रांति की दर्शनिक पुष्टि: कृष्ण और उनकी गीता’ में शीर्षक की सार्थकता को तथ्य-तर्कों तथा दृष्टांतों से स्थापित किया है। डॉ. आंबेडकर मानते हैं कि गीता न तो बाइबिल या कुरान की तरह कोई धार्मिक ग्रंथ है और ना ही दार्शनिक।”

“हिंदुत्व का दर्शन” शीर्षक लेख में डॉ. आंबेडकर लिखते हैं, “गीता में जो कुछ कहा गया है, उसके बारे में इतने भिन्न-भिन्न मतों का होना केवल आश्चर्य की बात नहीं हैं। कोई भी व्यक्ति यह पूछ सकता है कि विद्वानों में इतना मतभेद क्यों है? इस प्रश्न के उत्तर में मेरा निवेदन है कि विद्वानों ने ऐसे लक्ष्य की खोज की है, जो मिथ्या हैं। वे इस अनुमान पर भगवद‍्गीता के संदेश की खोज करते हैं कि कुरान, बाइबिल अथवा धम्मपद के समान भगवद‍्गीता भी किसी धार्मिक सिद्धांत का प्रतिपादन करती है। मेरे मतानुसार यह अनुमान ही मिथ्या है। भगवद‍्गीता कोई ईश्वरीय वाणी नहीं है, इसलिए उसमें कोई संदेश नहीं है और इसमें किसी संदेश की खोज करना व्यर्थ है। निस्संदेह यह प्रश्न पूछा जा सकता है : यदि भगवद‍्गीता कोई ईश्वरीय वाणी नहीं है, तो फिर यह क्या है? मेरा उत्तर है कि भगवद‍्गीता न तो धर्म ग्रंथ है और न ही यह दर्शन का ग्रंथ है। भगवद‍्गीता ने दार्शनिक आधार पर धर्म के कतिपय सिद्धांतों की पुष्टि की है।”  

अपने इसी लेख में डॉ. आंबेडकर इस निष्कर्ष पर भी पहुंचते हैं कि “वेद तथा भगवद्गीता में एक सर्वसाधारण सिद्धांत का विचार है, जबकि मनुस्मृति में उस सिद्धांत की विशेषताएँ तथा अन्य विस्तारित बातों को स्पष्ट करने पर ध्यान दिया गया है, लेकिन जहाँ तक मनुस्मृति, वेद तथा भगवद्गीता के सार के संबंध हैं, ये सभी एक ही नमूने पर बुने गए हैं। इन सभी के भीतर एक ही प्रकार का धागा चलता है और वास्तव में यह सभी एक ही वस्त्र के हिस्से हैं।”

छात्रों को कौन सा ज्ञान दे रहे हैं कुलपति महोदय?

जेएनयू में राम के उपर वेबिनार क्यों? इस सवाल का जवाब कुलपति ममिडाला जगदीश कुमार ने बीते 30 अप्रैल, 2020 को ट्वीटर पर जारी अपने वीडियो संदेश में दिया है। दिलचस्प यह है कि वीडियो संदेश में उन्होंने गांधी का हवाला देकर यह बताने का प्रयास किया है कि उनका यह निर्णय अकाट्य और किसी भी तरह से आलोचना का विषय नहीं है। उन्होंने कहा है कि गांधी राम को सर्वशक्तिमान मानते थे। उन्हें भगवान राम का चरित्र सबसे आदर्श लगता था जिसमें न्याय, समानता और भाईचारे सभी के भाव निहित हैं। 

प्रो. ममिडाला जगदीश कुमार, कुलपति, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

दूसरी ओर जेएनूय की बात करें तो इस विश्वविद्यालय को मुक्त विचारों वाले संस्थान के रूप में जाना जाता रहा है। लेकिन 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से इसके इस स्वरूप को नष्ट करने की लगातार कोशिशें जारी हैं। प्रयास किया जा रहा है कि इसे ज्ञान-विज्ञान के केंद्र के बजाय किसी मठ-मंदिर में तब्दील कर दिया जाय। इस संबंध में प्रख्यात चिंतक कांचा आइलैया शेफर्ड ने भी अपने एक लेख में सवाल उठाया है। उनके मुताबिक, “संघ-भाजपा की एक चिंता यह भी है कि इन दिनों धनी परिवारों और उच्च जातियों के युवा उनकी विचारधारा के रक्षा करने के लिए सामाजिक विज्ञानों के अध्ययन की ओर आकर्षित नहीं हो रहे हैं। नतीजा यह कि सामाजिक विज्ञानों के अध्येताओं में शूद्र / ओबीसी / दलित / आदिवासियों की बहुलता हो गयी है। उनको लगता है कि ये लोग अगर सामाजिक विज्ञानों और हिन्दू धर्मग्रंथों का गंभीर अध्ययन करेंगे तो कहीं वे उन्हीं निष्कर्षों पर न पहुँच जायें, जिन पर डॉ. आंबेडकर पहुंचे थे। इसलिए, सामाजिक विज्ञानों में उच्च शिक्षा – विशेषकर जेएनयू जैसे गंभीर विश्वविद्यालयों में – का सत्यानाश करने पर वे आमादा हैं।”

जाहिर तौर पर कांचा आइलैया शेफर्ड का उपरोक्त निष्कर्ष गैर वाजिब नहीं है। ममिडाला जगदीश कुमार उसी एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसका झंडाबरदार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। ऐसे में जेएनयू में रामायण और गीता पर परिचर्चायें बता रही हैं कि ज्ञान के लिए प्रसिद्ध इस विश्वविद्यालय में अब हिंदूवादी मिथकों का पुनर्पाठ होगा। जो यह पुनर्पाठ करेंगे, उनका ही यह विश्वविद्यालय होगा और यह भी कि अन्य तरह के ज्ञान-विज्ञान के लिए इस विश्वविद्यालय ने अपने कपाट बंद कर लिये हैं। फिलहाल तो इसी तरह के प्रमाण मिल रहे हैं। 

(संपादन : अनिल/गोल्डी/अमरीश)

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