आदिवासी संस्कृति और भाषा से संबंधित शोधों को बढ़ावा देना मेरी प्राथमिकता : प्रो. सोनाझरिया मिंज

जेएनयू में कंप्यूटर साइंस की प्रोफेसर सोनाझरिया मिंज को झारखंड के दुमका में सिद्धो-कान्हो मुर्मू विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया है। उनकी प्राथमिकता में आदिवासी संस्कृति और भाषा को लेकर शोध आदि को बढ़ावा देना है। नवल किशोर कुमार की खबर

“आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भले ही हमारे देश के विश्वविद्यालयों में आदिवासी भाषाओं को लेकर उपेक्षा का भाव है, नार्वे में संताली भाषा को लेकर विशेष पहल किये गये हैं। वहां पढ़नेवाले छात्र/छात्राएं हम आदिवासियों की सभ्यता, संस्कृति और भाषा के बारे में शोध कर रहे हैं। मैं भी यही चाहती हूं कि हमारे देश के विश्वविद्यालयों में हमारे आदिवासी पहचान से जुड़े विषयों पर शोध हो। यह मेरी प्राथमिकताओं में सबसे उपर है।” यह कहना है सिद्धो-कान्हो मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका, झारखंड की नवनियुक्त कुलपति प्रो. सोनाझरिया मिंज का।

फारवर्ड प्रेस से दूरभाष पर विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि “समाजशास्त्र के तमाम विषयों के संबंध में पहले से ही अभिरूचि रही, लेकिन कंप्यूटर साइंस की प्रोफेसर होने के कारण कई जटिलताएं आती थीं। अब जबकि यह नई जिम्मेदारी मिली है तो अब मेरे पास एक अवसर है कि मैं विमर्श को आगे बढ़ाऊं। हरसंभव कोशिश करूंगी कि विश्वविद्यालय में पठन-पाठन का माहौल बेहतर बने। इसके लिए गुणवत्ता पर भी मेरी विशेष निगाह रहेगी।”

कौन हैं प्रो. सोनाझरिया मिंज?

रांची की प्रो. सोनाझरिया मिंज जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में कंप्यूटर साइंस की प्रोफेसर हैं। इनके पिता डॉ. निर्मल मिंज एक चर्च में पादरी रहे। प्रो. मिंज की पढ़ाई रांची के संत माग्रेट स्कूल में हुई। रांची के ही गोस्सनर कॉलेज में इंटर की पढ़ाई एक साल तक करने के बाद वह बेंगलुरू चली गयीं। वहां ज्योति निवास कॉलेज से आईएससी की परीक्षा उत्तीर्ण की। स्नातक की पढ़ाई उन्होंने चेन्नई के वीमेंस क्रिश्चियन कॉलेज से तथा एमएससी की पढ़ाई मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से की। फिर बाद में उन्होंने जेएनयू से एमफिल और पीएचडी की डिग्री हासिल किया। तदुपरांत जेएनयू में ही कंप्यूटर साइंस की प्रोफेसर बनीं। 

स्कूल में झेलना पड़ा था भेदभाव का दंश

प्रो. मिंज के मुताबिक, “जब मेरी उम्र करीब पांच साल की थी तब पिताजी ने बताया था कि शिक्षा पर सभी का बराबर अधिकार है। लेकिन तब यह बात मुझे समझ में नहीं आयी। बाद में जब स्कूल में गयी तब अहसास हुआ कि आदिवासी होने का मतलब क्या है। कई अच्छे स्कूलों में मेरा दाखिला इस कारण से नहीं हुआ क्योंकि मैं आदिवासी थी। मेरे शिक्षक मेरी बुद्धि पर सवाल उठाते थे। वे यह हमेशा जताते भी कि आदिवासी समाज के लोग बुद्धिमान नहीं होते। यहां तक कि जब मैंने स्कूल संस्कृत विषय में भी सबसे अधिक अंक लाने में सफल हुई तब भी वे मेरी बुद्धि पर सवाल उठाते। एकबार गणित विषय को लेकर मुझे कहा गया कि गणित आदिवासी लड़कियों के लिए विषय नहीं है। मुझे हिकारत भरे अंदाज में आर्ट्स पढ़ने की सलाह दी गयी। लेकिन मैंने ठान लिया था कि मैं गणित ही पढूंगी और खुद को साबित करूंगी।”

बहरहाल, प्रो. सोनाझरिया मिंज कहती हैं कि शिक्षा पर सबका अधिकार है। यह मूल मंत्र उनके पिता ने दिया था और वह इसी मंत्र के आधार पर कार्य करेंगी। 

(संपादन : अनिल)

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