शाहू जी ने ब्रिटिश शासन से दलित-बहुजनों के लिए पृथक प्रतिनिधित्व एवं आरक्षण की मांग क्यों की?

गैर-ब्राह्मणों को सामुदायिक आधार पर प्रतिनिधत्व और सरकारी नौकरियों में आबादी के अनुपात में नियुक्ति की मांग करने वाला लार्ड सिडिन्हम को लिखा ऐतिहासिक पत्र बहुजनों के प्रतिनिधित्व और आबादी के अनुसार सरकारी नौकरियों में आरक्षण का ऐतिहासिक दस्तावेज है। इस दस्तावेज का निहितार्थ बता रहे हैं डॉ. सिद्धार्थ

आरक्षण दिवस (26 जुलाई, 1902) पर विशेष

सितंबर 1918 में क्षत्रपति शाहू जी महराज ने बॉम्बे प्रेसीडेंसी[1] के पूर्व गवर्नर लार्ड सिडिन्हम को गैर-ब्राह्मणों (पिछड़े-दलितों) को पृथक प्रतिनिधित्व और नौकरियों में आरक्षण देने के लिए एक पत्र लिखा था। करीब तीन हजार शब्दों का यह सारगर्भित पत्र ब्राह्मणों के अन्यायी एवं जातिवादी चरित्र को तथ्यों एवं तर्कों के साथ उजागर करते हुए यह बताता है कि किसी भी स्थिति में ब्राह्मण गैर-ब्राह्मणों के हितों के रक्षक नहीं हो सकते हैं, न ही उनका प्रतिनिधित्व कर सकते हैं और न ही उनके साथ न्याय कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में यह जरूरी है कि गैर-ब्राह्मणों को स्वयं अपने हितों की रक्षा के लिए काउंसिलों में प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया जाए।

यह पत्र शाहू जी ने लार्ड सिडिन्हम के माध्यम से तत्कालीन भारत सचिव लार्ड एडविन मांटेग्यू तक भी पहुंचाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने पत्र के अंत में लिखा है कि “मैं अपने पत्र की कुछ प्रतियां संलग्न कर रहा हूं ताकि आप एक प्रति सर जॉन हेवेट और एक सर वैलेंटाइन चिरोल को दे सकें और अगर आपको इसमें कोई आपत्ति न हो, तो श्री मोंटेग्यु को भी।”

यह सर्वविदित है कि ब्रिटिश शासन के तहत भारत सचिव ही भारत के मामले में अंतिम  निर्णायक अधिकार रखते थे, इसके बावजूद कि वायसराय भारत में उसके मुख्य प्रतिनिधि होते थे। शाहूजी महाराज ने यह पत्र ब्रिटिश संसद (कॉमन्स सभा) में लार्ड मांटेग्यू की 20 अगस्त, 1917 की उस घोषणा के बाद लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि “महामहिम सम्राट की सरकार की नीति, जिससे भारत सरकार भी पूर्ण सहमत है, यह है कि भारतीय शासन के प्रत्येक विभाग में भारतीयों की भागीदारी उत्तरोत्तर बढ़े तथा स्वशासी संस्थाओं का धीरे-धीरे विकास हो, जिससे अधिकाधिक प्रगति करते हुए भारत में उत्तरदायी प्रणाली की स्थापना हो तथा भारत ब्रिटिश साम्राज्य के अभिन्न अंग के रूप में आगे बढ़े।” उन्होंने यह निश्चय कर लिया है कि इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम अतिशीघ्र उठाया जाए। ये कदम मांटेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधार के रूप में सामने आए। इसका निहितार्थ यह था कि स्थानीय स्वायत्तशासी निकायों से लेकर प्रोविंशियल और इम्पीरियल काउंसिल (वायसराय की काउंसिल) तक में भारतीयों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की योजना। यह योजना 1919 में भारत  सरकार अधिनियम, 1919 (गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट) के रूप में सामने आई। मांटेग्यू तब भारत के सचिव थे और चेम्सफोर्ड उस समय भारत के वायसराय थे।

वर्ष 1920 में दक्षिण महाराष्ट्र बहिष्कृत वर्ग परिषद की बैठक को संबोधित करते छत्रपति शाहूजी महाराज व बगल में डॉ. भीमराव आंबेडकर

चूंकि 20 अगस्त, 1917 को भारत सचिव ने ब्रिटिश संसद में भारतीयों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने के निर्णय की घोषणा कर दी थी, इसलिए शाहू जी महराज को यह चिंता सता रही थी कि कौन से भारतीय इन स्वायत्तशासी निकायों और काउंसिलों में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। क्या भारतीय प्रतिनिधि के नाम पर ब्राह्मण और अन्य तथाकथित उच्च जातियों के लोग होंगे या गैर ब्राह्मणों – गैर उच्च जातीय समुदायों को भी इन निकायों और काउंसिलों में प्रतिनिधित्व मिलेगा?

शाहू जी साफ देख रहे थे कि इसके पहले जितने भी स्वायत्तशासी निकाय एवं काउंसिल बने और जिनमें भारतीयों को प्रतिनिधित्व दिया गया। उनमें भारतीयों के नाम पर ब्राह्मणों या अन्य उच्च जातियों के लोग ही प्रतिनिधि बने। पिछड़े-दलितों को इसमें नहीं के बराबर प्रतिनिधित्व मिला था। इसका सबसे ताजा उदाहरण मार्ले-मिंटो सुधार था, जिसे भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 (इंडियन काउंसिल एक्ट) के नाम से जाना जाता है। इस अधिनियम के तहत पहली बार चुने गए भारतीयों को वायसराय की सर्वोच्च कांउसिल में जगह दी गई थी, लेकिन इसमें पिछड़े और दलितों को कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया। जबकि इसमें मुसलमानों को पृथक प्रतिनिधित्व दिया गया था।

शाहू जी चाहते थे कि जिस तरह मुसलमानों को पृथक प्रतिनिधित्व दिया गया है, उसी तरह पिछड़े-दलितों (गैर-ब्राह्मणों) को सामुदायिक आधार पर पृथक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, क्योंकि ब्राह्मण किसी भी हालात में गैर-ब्राह्मणों के हितों के रक्षक नहीं हो सकते और न ही उनका प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। वे साफ शब्दों में कहते हैं कि जो कांग्रेस एवं उसके नेता भारत का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं, असल में वे केवल ब्राह्मणों के हितों के लिए कार्य करते हैं और उनका वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं। ये लोग न केवल ब्राह्मणों के हितों के लिए कार्य करते हैं, बल्कि गैर-ब्राह्मणों के हितों के लिए उठाए जाने वाले हर कदम का विरोध भी करते हैं। ऐसे करने वालों में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तिलक और उनका अखबार “केसरी” भी शामिल है। इस संदर्भ में वे लिखते हैं- “कांग्रेस के आन्दोलन के कारण सरकार को मोर्ले-मिन्टो सुधारों के अंतर्गत काउंसिलों का आकार बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ा है। अब तक कांग्रेस ब्राह्मण नौकरशाही का हित संवर्द्धन करती रही है और ब्रिटिश सरकार, अनजाने में ही सही, कांग्रेस के हाथों में खेलती रही है। कांग्रेस दबे-कुचले समुदायों की ज़रूरतों पर कोई ध्यान नहीं दे रही है और ना ही उनके लिए कुछ कर रही है। कांग्रेस के नेताओं का लक्ष्य आमजनों का दमन कर अपने समुदाय का राज बनाए रखना है। तिलक का अख़बार ‘केसरी’, मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का आलोचक है और दरभंगा के महाराज (ब्राह्मण), आम लोगों को शिक्षित करने की हर योजना का बिहार की काउंसिल में पूरी ताकत से विरोध करते हैं। यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि उनके समुदाय का एकाधिकार बना रहे। अगर काउंसिलों में समुदाय-आधारित प्रतिनिधित्व न देने के अपने निर्णय पर सरकार कायम रहती है तो इसका नतीजा यही होगा कि काउंसिलों में ब्राह्मण ही ब्राह्मण होंगे। और ब्राह्मणों के आदर्श नेता ये दोनों महानुभाव हैं जो बेशर्मी से अपने समुदाय को छोड़, अन्य सभी समुदायों के हितों की खिलाफत करते आए हैं। इससे निश्चय ही गैर-ब्राह्मणों की स्थिति और ख़राब होती जाएगी।”

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शाहू जी ब्राह्मणों के जातिवादी चरित्र और उनके गैर-ब्राह्मणवाद विरोधी रवैये से पूरी तरह परिचित थे। वे स्वयं इसका शिकार भी बने। शाहू जी के राजपुरोहित ने उन्हें शूद्र कहते हुए वैदिक रीति से उनके और उनके परिवार के लोगों के लिए धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराने से इंकार कर दिया और कहा कि शाहू जी चूंकि शूद्र हैं, इसलिए उनके एवं उनके परिवार के लोगों के लिए धार्मिक अनुष्ठान वैदिक मंत्रों एवं रीति से नहीं हो सकते हैं। वे सिर्फ पौराणिक मंत्रों एवं रीति से अपना धार्मिक अनुष्ठान करा सकते हैं। इसका समर्थन एक स्वर से तब सभी ब्राह्मणों ने किया, जिनमें लोकमान्य गंगाधर तिलक भी शामिल थे। जिस राज में ब्राह्मण राजा का अपमान करने की स्थिति में हो और उसके आदेशों का खुल्लंमखुल्ला उल्लंघन करते हों, उस राज्य में सामान्य शूद्रों-अतिशूद्रों (पिछड़े-दलितों) की क्या स्थिति रही होगी, इसका सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है।

छत्रपति शाहूजी महाराज व लार्ड सिडिन्हम

शाहू जी ने अपने पत्र में उदाहरण सहित बताया है कि गैर-ब्राह्मण विरोधी चरित्र सिर्फ सामान्य या फिर औसत दर्जे के ब्राह्मणों में ही नहीं पाया जाता है। धर्म के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता शंकराचार्य और बड़े-बड़े विद्वान एवं इतिहासकार ब्राह्मण भी गैर-ब्राह्मणों से नफरत करते हैं। इसका उदाहरण प्रस्तुत करते हुए वे अपने पत्र में लिखते हैं कि “कोल्हापुर के शंकराचार्य (डॉ. कुर्तकोटि), विद्वान व्यक्ति हैं, परन्तु मुझे कहना होगा कि वे ब्राह्मणों में भी ब्राह्मण हैं….  वे खुलकर अतिवादी कांग्रेस से जुड़ गए हैं। धर्म प्रमुख होने के नाते उन्हें राजनैतिक पचड़ों में नहीं पड़ना चाहिए, परन्तु ब्राह्मण अत्यंत लोलुप होते हैं और हर जगह अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते हैं। यहां तक कि श्री राजवाड़े (प्रसिद्ध इतिहासकार) जैसे शिक्षित व्यक्ति, जो यह दावा करते हैं कि वे इतिहास के प्रकांड विद्वान हैं, भी अपनी जाति से विशेष ही अनुराग रखते हैं और अन्य जातियों से इतना चिढ़ते और जलते हैं कि उन्होंने चंद्रसेनिया कायस्थ प्रभु जाति और मुसलमानों के बारे में झूठी और मानहानिकारक बातें लिखी हैं। निश्चय ही वे लोग उनके खिलाफ कार्रवाई करेंगे। परन्तु मैं इस घटना का हवाला सिर्फ इसलिए दे रहा हूं ताकि आपको ब्राह्मणों के चरित्र के बारे में बता सकूं।”

शाहू जी अपने पत्र द्वारा ब्रिटिश शासन को इस तथ्य से भी अवगत कराना चाह रहे थे कि जो ब्राह्मण गैर-ब्राह्मणों से नफरत करते हैं, सिर्फ ब्राह्मणों के हितों की ही चिंता करते हैं, उनका ही पूरे देश में नियंत्रण है। वे यहां तक कहते हैं कि कहने के लिए तो भारत में ब्रिटिश सत्ता है, लेकिन वास्तविक सत्ता ब्राह्मण नौकशाही के हाथ में हैं। इस संदर्भ में वे लिखते हैं- “ब्राह्मण नौकरशाही की शक्ति और प्रभाव की जो समझ योर लार्डशिप (सिडिन्हम) को है, वह बहुत कम लोगों को होगी। ब्राह्मण सभी सरकारी सेवाओं में सभी पदों पर प्रभावशाली हैं और इस कारण उनके लिए अन्य समुदायों को दबाए रखना आसान है। अन्य समुदायों को हर हालत में ब्राह्मणों की मांगें पूरी करनी ही होतीं हैं और भले ही स्वयं उनके साथ कितना ही अन्याय क्यों न हो, वे विरोध करने की स्थिति में नहीं होते।”

नौकरशाही में ब्राह्मणों के वर्चस्व को खुद शाहू जी ने राजा होते ही अपने राज्य में देखा। सन् 1894 में छत्रपति शाहू जी महाराज के कोल्हापुर के राजा बनने के समय कोल्हापुर राज्य में भी पूरी तरह ब्राह्मणों का शासन-प्रशासन पर नियंण था।। गांव से लेकर राज्य के शीर्ष पदों पर ब्राह्मणों का कब्जा था, जबकि कोल्हापुर में उनकी आबादी 3-4 प्रतिशत के बीच थी। शासन-प्रशासन के कुल 71 पदों में से 60 पदों पर ब्राह्मण विराजमान थे यानि 84.50 प्रतिशत पदों पर 3-4 प्रतिशत ब्राह्मणों का कब्जा था। इसी तरह सामान्य शासन-प्रशासन से इतर 53 पदों में 46 पदों यानि 86.79 पदों पर ब्राह्मण विराजमान थे। गांवों पर कुलकर्णी (गांव के सर्वोच्च अधिकारी), भट्ट (कर्मकांडी पुरोहित) और जोशी (पारंपरिक भविष्यवक्ता) का नियंत्रण था। ये सभी ब्राह्मण थे। शाहू जी ने ब्राह्मणों के इसी वर्चस्व को तोड़ने के लिए 26 जुलाई, 1902 को पिछड़े वर्गों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया और गांवों में परंपरागत कुलकर्णी पद को समाप्त कर गांव के सर्वोच्च सरकारी अधिकारी के रूप में सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति की, जो गैर-ब्राह्मण थे। इनमें दलित भी शामिल थे।

सच तो यह है कि उन दिनों जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नही था, जिस पर ब्राह्मणों का वर्चस्व न हो और गैर-ब्राह्मण उनके शोषण-उत्पीड़न का शिकार न हो। अपने पत्र की शुरूआत में ही ब्राह्मणों के जीवन के सभी क्षेत्रों में पूर्ण वर्चस्व और उनके द्वारा गैर-ब्राह्मणों के भयावह शोषण-उत्पीड़न का शाहू जी ने इन शब्दों में वर्णन किया है- “दक्कन[2] सदियों से ब्राह्मण पुरोहितों के ज़ुल्मों तले कराह रहा है। ब्राह्मणों ने हर क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया है – धर्म के क्षेत्र में भी और राजनीति, व्यापार-व्यवसाय, शिक्षा, बैंकिंग इत्यादि जैसे धर्मनिरपेक्ष क्षेत्रों में भी। अतः देश के आमजन आज़ाद नहीं हैं और अगर उनके हितों की रक्षा पर ध्यान नहीं दिया गया तो वे अपने ब्राह्मण मालिकों के ज़ुल्मो-सितम के आसान शिकार बन जाएंगे।”

शाहू जी देख रहे थे कि कांग्रेस के स्वशासन के नाम पर जो मार्ले-मिंटो सुधार हुआ है और जिस सुधार की मांटेग्यू ने घोषणा की है, उसके चलते स्थानीय निकायों और काउंसिलों में भारतीय प्रतिनिधि के नाम पर ब्राह्मणों का पूरी तरह वर्चस्व हो जाएगा। यह स्थिति गैर-ब्राह्मणों के लिए घातक होगी। इस पूरे हालात में शाहू जी को सिर्फ दो ही रास्ता दिखाई दे रहा था, पहला स्वशासी संस्थानों-काउंसिलों में गैर-ब्राह्मणों को पृथक सामुदायिक प्रतिनिधित्व और दूसरा सरकारी नौकरियों में गैर-ब्राह्मणों की नियुक्ति यानि दूसरे अर्थों में आरक्षण। इसके अलावा ब्राह्मणों के चंगुल में पूरी तरह से गैर-ब्राह्मणों को जाने से रोकने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है। वे पत्र में लिखते हैं- “प्रोविंशियल और इम्पीरियल काउंसिलों में समुदाय-आधारित प्रतिनिधित्व ही वह तरीका है, जिससे उनके (गैर-ब्राह्मणों) हितों की रक्षा हो सकती है।”

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शाहू जी इस तथ्य से अच्छी तरह अवगत थे कि सिर्फ काउंसिलों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलने से गैर-ब्राह्मणों के हितों की रक्षा नहीं हो पाएगी। उन्होंने मांग की कि काउंसिलों में राजनीतिक प्रतिधिनित्व के साथ सारे सरकारी सेवाओं में उपर से लेकर नीचे तक गैर- ब्राह्मणों को आनुपातिक प्रतिनिधित्व (आरक्षण) दिया जाए। वे ब्राह्मणों की किलेबंदी को तोड़ने के लिए इसे आवश्यक मानते थे। वे अपने पत्र में लिखते हैं- “ब्राह्मणों की इस मज़बूत किलेबंदी को तोड़ने का एक ही रास्ता है और वह है काउंसिलों में ही नहीं, बल्कि सभी सरकारी सेवाओं के सारे उच्च व निम्न पदों में समुदाय-आधारित प्रतिनिधित्व की व्यवस्था लागू करना। जहां भी अवसर मिले, योग्य गैर-ब्राह्मणों को नियुक्ति में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। केवल कुछ महत्वपूर्ण पदों पर गैर-ब्राह्मणों को बैठा देने से काम नहीं चलने वाला है। यह दवा तो रोग को और बढ़ाएगी ही, क्योंकि ये अधिकारी अपने ब्राह्मण अधीनस्थों की निहाई और इसी समुदाय के अपने वरिष्ठ अधिकारियों की हथौड़ी के बीच फंस जाएंगे। वे उसे जनता के हितों के विपरीत निर्णय लेने पर मजबूर करेंगे और उस बेचारे को उन गलत निर्णयों की ज़िम्मेदारी भी लेनी पड़ेगी। समस्या का सही इलाज यही है कि अधीनस्थ और लिपिकीय पदों पर भी समुदाय-आधारित आनुपातिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए। सबसे निचले दर्जे के क्लर्कों की भर्ती भी गैर-ब्राह्मणों में से होनी चाहिए और इसके लिए इन समुदायों के योग्य उम्मीदवारों की सूची तैयार की जानी चाहिए। इस सूची में शामिल व्यक्तियों की नियुक्तियां तब तक की जानी चाहिए जब तक कि गैर-ब्राह्मणों का प्रतिशत, आबादी में उनके हिस्से के बराबर न हो जाए।”

गैर-ब्राह्मणों को सामुदायिक आधार पर प्रतिनिधत्व और सरकारी नौकरियों में आबादी के अनुपात में नियुक्ति की मांग करने वाला लार्ड सिडिन्हम को लिखा यह पत्र बहुजनों के पृथक प्रतिनिधित्व और आबादी के अनुसार सरकारी नौकरियों में आरक्षण का महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक दस्तावेज है।


[1] बम्बई प्रेसीडेंसी में उन दिनों आज के महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तरी कनार्टक शामिल थे।

[2] दक्कन का पठार जिसे विशाल प्रायद्वीपीय पठार के नाम से भी जाना जाता है, भारत का विशालतम पठार है। दक्षिण भारत का मुख्य भू-भाग इसी पठार पर स्थित है। यह पठार त्रिभुजाकार है। इसकी उत्तर की सीमा सतपुड़ा और विन्ध्याचल है पर्वत शृंखला द्वारा और पूर्व और पश्चिम की सीमा क्रमशः पूर्वी घाट एवं पश्चिमी घाट द्वारा निर्धारित होती है। यह पठार भारत के 8 राज्यो में फैला हुआ है।

(संपादन : गोल्डी/नवल/अनिल)


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