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बाबुराव बागुल के लिए कष्टों के बीच प्रतिरोध का नाम था दलित साहित्य

बाबूलाल बागुल ने एक नया विमर्श शुरू किया जिसमें दलित साहित्य केवल दुखों-कष्टों और पीडाओं का विवरण न होकर एक क्रन्तिकारी अभिव्यक्ति है, जो जाति के उन्मूलन के आन्दोलन का हिस्सा और तत्कालीन हाशियाकृत समुदायों की गरिमा का उत्सव है, बता रहीं हैं दामनी कैन

बाबुराव बागुल की साहित्यिक रचनाएं समाज को तो प्रतिबिंबित करतीं हीं हैं वे ब्राह्मणवादी ताकतों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल भी हैं। उन्होंने मराठी साहित्य में ‘दलित चेतना’ का विकास कर एक नए अध्याय की शुरुआत की।

उनके पात्र जाति-आधारित अमानवीय पदक्रम पर तो प्रश्न उठाते ही हैं, वे उसके मूल आधार पर भी कठोर प्रहार करते हैं, वे क्रोधित हैं, वे असहमत हैं, वे विद्रोही हैं। उन्हें असहनीय पीड़ा से गुज़रना पड़ता है परन्तु वे उसे अपनी नियति मानने को तैयार नहीं हैं। वे अपने आत्माभिमान और गरिमा के लिए आक्रामक संघर्ष करते हैं। बागुल की कहानियों में कोई ‘उद्धारक’ नहीं हैं; उनके नायक वे पददलित हैं जो अपनी अधोगति के लिए ज़िम्मेदार व्यवस्था के खिलाफ आक्रोशित हो उठ खड़े होते हैं। बागुल की एक कहानी का नायक मस्थुर कहता है, “जब वे मुझे मार रहे थे तब दरअसल मनु मुझे मार रहा था।” (बागुल 2018)

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लेखक के बारे में

दामनी कैन

दामनी कैन दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से राजनीति शास्त्र में एम.ए. की छात्रा हैं तथा छात्र राजनीति में सक्रिय हैं

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