बाबुराव बागुल के लिए कष्टों के बीच प्रतिरोध का नाम था दलित साहित्य

बाबूलाल बागुल ने एक नया विमर्श शुरू किया जिसमें दलित साहित्य केवल दुखों-कष्टों और पीडाओं का विवरण न होकर एक क्रन्तिकारी अभिव्यक्ति है, जो जाति के उन्मूलन के आन्दोलन का हिस्सा और तत्कालीन हाशियाकृत समुदायों की गरिमा का उत्सव है, बता रहीं हैं दामनी कैन

बाबूराव बागुल (17 जुलाई, 1930 – 26 मार्च, 2008) पर विशेष

बाबुराव बागुल की साहित्यिक रचनाएं समाज को तो प्रतिबिंबित करतीं हीं हैं वे ब्राह्मणवादी ताकतों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल भी हैं। उन्होंने मराठी साहित्य में ‘दलित चेतना’ का विकास कर एक नए अध्याय की शुरुआत की। 

उनके पात्र जाति-आधारित अमानवीय पदक्रम पर तो प्रश्न उठाते ही हैं, वे उसके मूल आधार पर भी कठोर प्रहार करते हैं, वे क्रोधित हैं, वे असहमत हैं, वे विद्रोही हैं। उन्हें असहनीय पीड़ा से गुज़रना पड़ता है परन्तु वे उसे अपनी नियति मानने को तैयार नहीं हैं। वे अपने आत्माभिमान और गरिमा के लिए आक्रामक संघर्ष करते हैं। बागुल की कहानियों में कोई ‘उद्धारक’ नहीं हैं; उनके नायक वे पददलित हैं जो अपनी अधोगति के लिए ज़िम्मेदार व्यवस्था के खिलाफ आक्रोशित हो उठ खड़े होते हैं। बागुल की एक कहानी का नायक मस्थुर कहता है, “जब वे मुझे मार रहे थे तब दरअसल मनु मुझे मार रहा था।” (बागुल 2018)

बाबुराव बागुल ने 1952 में लेखन कर्म प्रारंभ किया। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में शामिल है लघु कहानियों का उनका पहला संग्रह, ‘जेव्हा मी जात चोरली होती (जब मैंने अपनी जाति छुपाई)’, जो 1963 में प्रकाशित हुआ था। के. सत्यनारायण और सुसी थारू (2013) के अनुसार, बागुल की इस प्रथम पुस्तक का स्वागत ‘दलितों के महाकाव्य’ के रूप में किया गया। इस संग्रह ने एक नयी कथ्यपरक रूपात्मकता का उद्घाटन किया और दलित साहित्यिक विमर्श को ज़बरदस्त गति दी। आगे चलकर, उनकी ‘मरण स्वस्त होत आहे (मौत सस्ती हो रही है)’ 1969 में और ‘सुद (बदला)’, 1970 में प्रकाशित हुईं। 

उनकी लघु कहानियों के विशाल संग्रह में से ‘रिवोल्ट’ और ‘जेव्हा मी जात चोरली होती’ उस व्यवस्था की खिलाफत करतीं हैं जिसे आंबेडकर ‘श्रमिकों का विभाजन’ कहते थे। ‘रिवोल्ट’ में जय और उसके पिता के बीच निम्नांकित  संवाद, इस विभाजन की धज्जियां उड़ाता है:   

जय पूछता है, “यह कहां लिखा है कि भंगी के लड़के को भंगी ही बनना चाहिए?”

उसके पिता जवाब में कहते हैं, “हमारी गरीबी में, हमारे धर्म में, हमारे देश में।” 

जय हार नहीं मानता। वह कहता है, “कौन-सा धर्म? जो किसी व्यक्ति को तोड़ देता है, उसे जानवर बना देता है, क्या वह धर्म है? वह भी इस देश में जहां पत्थर की मूरत को मनुष्य से ज्यादा महत्व दिया जाता है? मैं ऐसे धर्म को नहीं मानता। जिस धर्म ने हमें यह गरीबी, यह वंचना दी है, उसे हमें ख़ारिज करना ही चाहिए” (बागुल, 1999: 29-37)

‘जेव्हा मी जात चोरली होती’ में जन्म-आधारित आजीविका को अपनाने की अनिवार्यता से आक्रोशित काशीनाथ चिल्ला कर कहता है, “मैं महार हूं परन्तु इसका यह मतलब तो नहीं है कि मैं मनुष्यों का मैला साफ़ करूंगा और दीवारों से पेशाब साफ करूंगा।”  

दोनों एक ऐसे भविष्य की कल्पना करते हैं जिसमें उनके दर्द से उन्हें मुक्ति मिलेगी। वे शिक्षा के ज़रिए जाति के चंगुल से मुक्त होना चाहते हैं। जय अपने पिता के सामने जो तर्क रखता है वे आंबेडकर के “शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित हो” के उद्घोष की याद दिलाता है: “क्या सिर्फ इन कारणों से मुझे भंगी बनना चाहिए? मुझे अपनी पढ़ाई छोड़कर, गांव की गंदगी साफ़ करनी चाहिए? अपने सिर पर मैला ढोना चाहिए? अगर तुम्हें मुझसे यही काम करवाना था तो तुमने मुझे पढ़ाया-लिखाया ही क्यों? तुमने मेरे मन में स्वतंत्रता, ज्ञान और मानवता का दीपक जलाया ही क्यों?”

इसी तरह काशीनाथ वकील बनने में अपनी मुक्ति देखता है। कहानी के नायक के साथ बातचीत में वह कहता है, “मस्थुर, मैं यह काम छोड़ने वाला हूं। मैं मुंबई जा रहा हूं और वहां मैं कोई भी काम पकड़ लूंगा। मैं अपनी स्कूल की पढाई पूरी करूंगा, मैं कॉलेज जाऊंगा। मैं वकील बनूंगा…हाय, यह जीवन, यह दारुण जीवन।” 

इन दोनों कहानियां की पृष्ठभूमियां एकदम अलग हैं, परन्तु उनमें स्पष्ट समानताएं हैं। ‘रिवोल्ट’ की कहानी ग्रामीण परिवेश में बुनी गई है और ‘जेव्हा मी जात चोरली होती’ की आधुनिक, शहरी दुनिया में। जाति किसी व्यक्ति के साथ उसकी छाया की तरह चलती है। जहां तक वंशानुगत सामाजिक पदक्रम में स्थिति का प्रश्न है, जाति अत्यंत मजबूत है और वह सीमाओं के पार विस्तृत भी हो सकती है। यहां तक कि शहरी जीवन की चमकदमक ‘जाति मुक्त’ नहीं है। शहरों में गर्व से सीना ताने खड़ीं गगनचुम्बी इमारतें जाति-आधारित अलगाव की प्रतीक हैं।   

‘जेव्हा मी जात चोरली होती’ में मस्थूर को कमरा किराये पर देते समय, मकान मालिक रामचरण कहता है, “जब भी हम किसी अजनबी से मिलते हैं, हम उससे उसकी जाति ज़रूर पूछते हैं। हमारे देश में ऐसा ही होता है।” एक अन्य व्यक्ति इसी में अपनी बात जोड़ते हुए कहता है, “भैया, हम अपने जात भाई के साथ तो मिट्टी भी खा सकते हैं, परन्तु हमें नीची जाति के आदमी के साथ किसी शानदार भोज में भी नहीं जाना चाहिए।”  

रामचरण, जो शुरू में मस्थुर के कवि होने के कारण उसका प्रशंसक बन जाता है, उसकी जाति के बारे में जानते ही हिंसा पर उतारू हो जाता है। वह मस्थुर की पिटाई इसलिए नहीं करता क्योंकि उसने सच को छुपाया बल्कि इसलिए करता है क्योंकि मस्थुर, ज्ञान पर ब्राह्मणवादी एकाधिकार को तोड़ने का दुस्साहस करता है। मस्थुर के साथ क्रूरता इसलिए की जाती है क्योंकि वह लिखता-पढ़ता है जबकि ‘नीची जातियों’ के लोगों के ज्ञान हासिल करने पर सदियों से रोक है। यह घटना उस समाज के असली मंशा को उजागर करती है जो चिल्ला चिल्लाकर कर ‘योग्यता’ की दुहाई देता है। मस्थुर की योग्यता को केवल उसकी जाति के कारण दरकिनार कर दिया जाता है। 

बाबुराव बागुल की लघु कहानियों का पहला संग्रह, ‘जेव्हा मी जात चोरली होती’ (जब मैंने अपनी जाति छुपाई) 1963 में प्रकाशित हुआ था। इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद ‘व्हेन आई हिड माय कास्ट’ 2018 में प्रकाशित हुआ

दलित साहित्य में बागुल का योगदान   

दलित साहित्य केवल एक साहित्यिक धारा या रचनाओं का कोई औपचारिक विभाजन नहीं है। यह एक सामाजिक आन्दोलन है जो अन्याय का विरोध करता है और मुक्ति की आशा से चालित है। बाबूलाल बागुल का तर्क है कि  “भारत का स्थापित साहित्य, हिन्दू साहित्य है” और उसके हिन्दू चरित्र के कारण ही नीची जातियों के लिए उसमें कोई जगह नहीं है। अपनी बात को विस्तार देते हुए वे लिखते हैं, “जिन लोगों ने हिन्दू मूल्यों के ढांचे को आत्मसात कर लिया है, उनके लिए फुले और आंबेडकर के दर्शन से उद्भूत विचारों, कथानकों और नायकों को स्वीकार करना असंभव है।” (डांगले, 1992) इस सन्दर्भ में बागुल की राह एकदम अलग है। उनके कथानक, हाशिए के समाज से आते हैं। ‘गैंगस्टर’ और ‘स्ट्रीटवॉकर’ के विद्रोही नायक इसी समाज से हैं।  

मराठवाड़ा के दीवाली, 1959 अंक में प्रकाशित अपने एक लेख में बागुल लिखते हैं:  

“दलित साहित्य मानता है कि सामाजिक बहसों या दार्शनिक अथवा राजनैतिक घोषणापत्रों में जीवन का अर्थ खोजने से जीवन से रंग और उत्साह दोनों जाते रहेंगे। हमें अपने जीवन का असली अर्थ प्रकृति में मिलेगा। मनुष्य, दरअसल, प्रकृति का मूर्त रूप है। उसकी इच्छाएं, आवेग और भावनाएं, असल में सूर्य, चंद्रमा, तूफ़ान और आंधियों के समान हैं। जब इन प्राकृतिक इच्छाओं और भावनाओं को ‘षड रिपु’ निरुपित कर उनका दमन किया जाता है, तब धर्म और भगवान अमरत्व को प्राप्त हो जाते हैं और जीवन, जो कभी सुबह की देवी उषा का गीत था, अंधेरे में कैद हो जाता है। हम आए हैं तूफ़ान, प्रकाश और दावानल के विजयी रथों पर सवार। युग अब पेड़ों पर उड़ते-उतरते पक्षियों की तरह आएंगे और जाएंगे और चारों ओर खुशियां ही खुशियां होंगीं।”    

अतः बागुल यह नहीं मानते कि दलित साहित्य का उद्देश्य केवल राजनैतिक और दार्शनिक विमर्शों का प्रतिवाद करना होना चाहिए। क्योंकि अगर हम केवल इसी मार्ग पर चलेंगे, केवल इसे ही सब कुछ मान लेंगे तो हम मनुष्य को उसकी रचनात्मकता और उसके भावनात्मक आवेगों से दूर कर देंगे। बागुल के लिए साहित्य, मनुष्यों की भावनाओं और इच्छाओं से जुड़ा हुआ है। पर जब मानवीय आवेगों, भावनाओं और इच्छाओं को विकृति बताकर दरकिनार कर दिया गया तो ईश्वर और धर्म का प्रधान हो गया और वे मनुष्यों के नियंता बन बैठे। बागुल द्वारा मनुष्यों की भावनाओं की तुलना तूफ़ान, जंगलों और प्रकाश से करना क्रन्तिकारी है। वे उस मार्ग का त्याग कर रहे हैं जिसमें भावनाओं को धार्मिक आज्ञाओं के आसपास घूमता हुआ बताया जाता था। 

बाबुराव बागुल के नेतृत्व में दलित साहित्य परिषद् की स्थापना की गई। दया पवार और अर्जुन डांगले इस परिषद् के महासचिव थे। (पवार, 2019)

योगेश मैत्रेय (2018) का तर्क है कि बाबूलाल बागुल, शरद पाटिल और शरणकुमार लिम्बाले ने दलित साहित्य का एक नया सिद्धांत गढ़ा। बागुल की 1981 में प्रकाशित रचना, ‘दलित साहित्य: आजचे क्रन्तिविद्न्यां’ इस सिद्धांत का आधार प्रस्तुत करती है, जिसमें दलितों के अनुभवों को दलित साहित्य का भाग मानने का प्रभावी आग्रह किया गया है।  

आर. किम्भौने (1999) बताते हैं कि बागुल का रचना कर्म अनूठा क्यों है। वे कहते हैं कि इसका कारण है विषयवस्तु और भाषा, दोनों के स्तर पर उनकी मौलिकता और उनकी उपलब्धियां। बागुल की कहानियां पददलित जातियों, निराश्रितों, विकृत मानसिकता वालों और अपराधियों के जीवन के ऐसे यथार्थपूर्ण विवरणों से परिपूर्ण हैं, जिन्हें सावधानीपूर्वक चुना गया है। उनकी कहानियों की महिला पात्र, भारतीय महिलाओं के गरिमापूर्ण जीवन का उत्सव मनाती दिखतीं हैं।   

‘जेव्हा मी जात चोरली होती’ के अंग्रेजी अनुवाद, ‘व्हेन आई हिड माय कास्ट’ में अपनी भूमिका (2018 ए) में शांता गोखले लिखतीं हैं: “उनकी कहानियों का आवेग और उनका अनगढ़ कथ्य, पाठकों के मर्म को स्पर्श करता है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने युवा दलित साहित्यकारों को साहित्यिक मराठी की बेड़ियों से मुक्त किया। वे अब अपनी-अपनी बोलियों में लिखने के लिए स्वतंत्र थे। और यदि ऊंची जातियों के मराठी लेखकों के रूमानी साहित्य के आदी पाठकों के लिए इन नयी आवाज़ों को पचाना कठिन था, तो ऐसा ही सही।”  

बाबुराव बागुल उन कवियों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं जो भारत के जातिवादी समाज की क्रूर सच्चाईयों से रू-ब-रू हैं। उनकी सोच, आज के कवियों को सही दिशा दिखती है, उनमें आशा का संचार करती है। योगेश मैत्रेय (2018 बी) लिखते हैं, “यह सही है कि बाबुराव बागुल के कथा साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है दलितों की रोजाना की ज़िन्दगी के दर्द को शाब्दिक अभिव्यक्ति देने की उनकी अद्भुत् क्षमता। परन्तु वे यहीं नहीं रुकते। उनकी रचनाओं में एक अजीब सा आकर्षण है क्योंकि वे पाठकों को वह अनुभव करवातीं हैं, जो भारतीय साहित्य अमूमन नहीं करवाता। बागुल हमारे अमानवीय जातिवादी समाज को मानवीय परिप्रेक्ष्य विकसित करना सिखाते हैं। 

बागुल के लेखन में सामाजिक क्रांति   

‘व्हेन आई हिड माय कास्ट’ की अपनी भूमिका में गोखले (2018) लिखतीं हैं कि नाटककार दत्ता भगत ने बागुल के लेखन के राजनैतिक महत्व पर जोर दिया है। गोखले के अनुसार, बागुल ने दलित साहित्य को एक ऐसे आन्दोलन के रूप में स्थापित किया जो जोतीराव फुले, डॉ. बी.आर. आंबेडकर और गोपाल गणेश अगरकर के नेतृत्व वाले उस सामाजिक आन्दोलन को प्रतिबिंबित करता है जो आज़ादी, न्याय और समानता का पैरोकार है। 

लेखक के अलावा बागुल एक प्रखर वक्ता भी थे। एलिनोर ज़ेलियट (1982) के अनुसार, उनके भाषण, तीखी भावनाओं को जगाने वाले और दलित साहित्य की मनःस्थिति समाज के सामने रखने वाले होते थे। वे बागुल को उद्धृत करते हुए लिखतीं हैं, “मनु को भले ही अंधेरे में धकेल दिया गया हो, परंतु वह मरा नहीं है। वह आज भी किताबों, धार्मिक ग्रंथों और मंदिरों में जीवित है। वह दिमागों में जिंदा है। आज के समाज का ढांचा वही है जो उसने बनाया था। वह इतना महान है कि सामाजिक व्यवस्थाएं आज भी उसके नियंत्रण में हैं। और उसके ‘प्रिय पात्र’ ही सत्ता में हैं। आज भारत में दो दुनिया हैं, दो सत्ताएं हैं, दो जीवन परंपराएं हैं और दो ग्रन्थ हैं। जो विजेता बनना चाहता है, जो प्रभावशाली बनना चाहते है, उसे भविष्य के निर्धारण में अपनी भूमिका का निर्वहन करना ही चाहिए।”  

बागुल एक विद्रोही थे और दूरद्रष्टा भी। उन्हें यह अहसास था कि दलितों की बदहाली की जड़ कहां है। वे इस मामले में भी अन्य लेखकों से भिन्न हैं कि जाति प्रथा के विरोध के क्रम में वे मनु पर भी तीखे हमले करते हैं। इसके विपरीत, अन्य लेखक, जाति प्रथा से उपजी पीडाओं और कष्टों का वर्णन तो करते हैं, परन्तु उसके मूल कारण की बात नहीं करते। आज भी समाज पर मनु का शासन होने की जो व्याख्या बागुल ने की है, उस पर जोर दिया जाना आवश्यक है। विशेषकर मनु के उन ‘प्रिय पात्रों’ के लिए जो पुराणों और धर्मशास्त्रों, जो जाति प्रथा का सैद्धांतिक आधार हैं, को गुज़रे ज़माने की चीज़ें बताते हैं। 

बाबूलाल बागुल ने एक नया विमर्श शुरू किया जिसमें दलित साहित्य केवल दुखों-कष्टों और पीडाओं का विवरण न होकर एक क्रन्तिकारी अभिव्यक्ति है, जो जाति की उन्मूलन के आन्दोलन का भाग और तत्कालीन हाशियाकृत समुदायों की गरिमा का उत्सव है। एक ऐसे समाज में जहां लोगों को आज भी महत्वाकांक्षी दलित फूटी आंखों नहीं सुहाता। जाहिर है कि बागुल के रचनाओं को बार-बार और ज़ोर-ज़ोर से पढ़ा जाना चाहिए।  

सन्दर्भ:

बागुल, बाबुराव. (1999). रिबेलीयन. (अनुवाद: जयंत देशपांडे). इंडियन लिटरेचर 43/6 (194): 29-37. www.jstor.org/stable/23342843 से 6 जुलाई 2020 को लिया गया. 

बागुल, बाबुराव. (2018). व्हेन आई हिड माय कास्ट. (अनुवाद: जेरी पिंटो). मुंबई: स्पीकिंग टाइगर पब्लिकेशन. 

डांगले, अर्जुन. (सम्पादित) (1992). पोईजंड ब्रेड: ट्रांसलेशन्स फ्रॉम मॉडर्न मराठी दलित लिटरेचर. हैदराबाद: ओरिएंट लोंगमेन

गोखले, शांता. (2018). ‘व्हेन आई हिड माय कास्ट’ की भूमिका. मुंबई: स्पीकिंग टाइगर पब्लिकेशन. 

किम्बाहुने, आर.एस. (1999) ‘ए नोट ऑन कंटेम्पररी शार्ट स्टोरी इन मराठी’. इंडियन लिटरेचर 43/6 (194): 17:23. www.jstor.org/stable/23342841 से 6 जुलाई 2020 को लिया गया.

मैत्रेय, योगेश. (2018ए). ‘टूवर्ड्स ए थ्योरी ऑफ़ दलित लिटरेचर’. इकनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली, 53/51.

मैत्रेय, योगेश. (2018बी) ‘व्हेन आई हिड माय कास्ट: बाबूलाल बागुल्स स्टोरीज वर स्टीप्ड इन हिज आईडियोलोजिकली वाइब्रेंट यूथ. स्क्रॉल डॉट इन (2018) https://scroll.in/article/892521/when-i-hid-my-caste-baburao-baguls-short-stories-were-steeped-in-his-ideologically-vibrant-youth से 1 जुलाई 2020 को लिया गया. 

पवार, जे.वी. (2019). द हिस्ट्री ऑफ़ मराठी लिटरेचर. फॉरवर्ड प्रेस (2019). https://www.forwardpress.in/2019/04/the-history-of-marathi-ambedkarite-literature/ से 1 जुलाई 2020 को लिया गया. 

सत्यनारायण, के. व सुसी थारू (सम्पादित) (2013). ‘द एक्सरसाइज ऑफ़ फ्रीडम: एन इंट्रोडक्शन टू दलित राइटिंग’. नयी दिल्ली: नवायन पब्लिशिंग

 ज़ेलियट, एलिनोर. (1982). ए नोट ऑन बाबुराव बागुल. जर्नल ऑफ़ साउथ एशियन लिटरेचर 17/1: 56. www.jstor.org/stable/40874005 से 6 जुलाई 2020 को लिया गया.

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल)

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