ओबीसी आरक्षण : केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत का अजीबोगरीब बयान

ओबीसी वर्ग के आरक्षण को लेकर जहां एक ओर खबर है कि पिछड़े वर्गों के लिए राष्ट्रीय आयोग ने बी. पी. शर्मा कमेटी की अनुशंसा को हरी झंडी दे दी है, वहीं केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने अजीबोगरीब बयान दिया है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि शर्मा कमेटी की अनुशंसा लागू हो गई तब बड़ी संख्या में ओबीसी अभ्यर्थी आरक्षण से बाहर कर दिए जाएंगे। नवल किशोर कुमार की खबर

अब यह लगभग साफ हो गया है कि केंद्र सरकार, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण को लेकर एक ऐसा कदम उठाने जा रही है जिसका एक संभावित परिणाम यह भी हो सकता है कि आरक्षण का लाभ अधिकांश ओबीसी लोगों को मिले ही ना। ऐसा इसलिए क्योंकि केंद्रीय कार्मिक व प्रशिक्षण मंत्रालय (डीओपीटी) द्वारा गठित बी. पी. शर्मा कमेटी की उस अनुशंसा को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने अंतरिम सहमति दे दी है, जिसके मुताबिक क्रीमीलेयर के निर्धारण में वेतन से प्राप्त आय को भी शामिल किया जा सकेगा। इसे लेकर जहां एक ओर भाजपा के ओबीसी सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ट्वीट कर गुहार लगा रहे हैं कि वार्षिक आय में वेतन से प्राप्त आय को शामिल न किया जाय तो दूसरी ओर फारवर्ड प्रेस से दूरभाष पर बातचीत में केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने एक अजीबोगरीब बयान दिया है। उनके मुताबिक वार्षिक आय में वेतन से प्राप्त आय पहले से ही शामिल रही है!

क्या है मामला?

दरअसल, भारत में ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण लागू करने का निर्णय भूतपूर्व प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह की सरकार द्वारा लिया गया था। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिसे इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार प्रकरण कहा जाता है। सन 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के लिए दो शर्तें रख दीं। पहली तो यह कि आरक्षण की सीमा हर हाल में 49.5 फीसदी को पार न करे। और दूसरी यह कि उन ओबीसी को आरक्षण से बाहर रखा जाए जो पहले से समृद्ध हैं। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर भारत सरकार द्वारा एक विशेषज्ञ कमेटी का गठन किया गया जिसने क्रीमीलेयर का सिद्धांत प्रतिपादित किया। इस समय यदि किसी ओबीसी परिवार की वार्षिक आय आठ लाख रुपए से कम है तभी उसके बच्चों को आरक्षण का लाभ मिल सकता है। लेकिन इस आय में वेतन और कृषि से प्राप्त आय को शामिल नहीं किया जाता। इस संबंध में एक ऑफिस मेमोरेंडम [ऑफिस मेमोरेंडम 36012/12/93 इस्टैब्लिशमेंट (एससीटी) दिनांक 08/09/1993] जारी किया गया। इसी के आधार पर पहले क्रीमीलेयर की वार्षिक आय सीमा एक लाख रुपए निर्धारित की गयी जो कि वर्तमान में 8 लाख रुपए है। 

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गौरतलब है कि डीओपीटी का उपरोक्त ऑफिस मेमोरेंडम केवल केंद्र व राज्य सरकार के ग्रुप सी और ग्रुप डी  कर्मियों के लिए लागू किया गया। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के कर्मियों के लिए कोई पृथक प्रावधान नहीं किए गए। पदों की समतुल्यता संबंधी नीति के अभाव के कारण लोक उपक्रमों में तृतीय व चतुर्थ वर्ग के कर्मियों के बच्चों को भी क्रीमीलेयर में माना जाता रहा है।

गणेश सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति  द्वारा सरकार को प्रस्तुत रिपोर्ट में एक अनुशंसा यह भी थी कि वेतन व कृषि से प्राप्त आय को आय का हिस्सा न माना जाय। वहीं दूसरी अनुशंसा यह थी क्रीमीलेयर की आय सीमा 8 लाख से बढ़ाकर 15 लाख कर दी जाय ताकि अधिक से अधिक लोगों को ओबीसी आरक्षण का लाभ मिल सके। लेकिन सरकार ने संसदीय समिति की रिपोर्ट को स्वीकार न करते हुए वर्ष 2018 में एक और तकनीकी कमेटी का गठन किया जिसके अध्यक्ष डीओपीटी के पूर्व सचिव बी. पी. शर्मा बनाए गए। 

थावरचंद गहलोत, केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री

मिली जानकारी के अनुसार इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट इसी वर्ष के आरंभ में सरकार को सौंप दी। यह समिति सुर्खियों में रही क्योंकि इसने वेतन से प्राप्त आय को वार्षिक आय में शामिल करने की अनुशंसा की। इससे भी महत्वपूर्ण यह कि अब यह प्रावधान केवल सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के कर्मियों पर ही नहीं बल्कि केंद्र व राज्य सरकार के कर्मियों पर भी लागू होगा। इसके अलावा इस कमेटी ने क्रीमीलेयर की राशि को 8 लाख रुपए से बढ़ाकर 12 लाख रुपए करने का निर्णय लिया है।

एनसीबीसी की हरी झंडी

द टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित एक खबर के मुताबिक एनसीबीसी ने आंतरिक बैठक में बी. पी. शर्मा कमेटी की रिपोर्ट पर अपनी मुहर लगा दी है। इस आशय से संबंधित एक नोट कैबिनेट द्वारा 12 मार्च, 2020 को एनसीबीसी को भेजा गया था ताकि वह अपनी राय व्यक्त कर सके। अब इस प्रस्ताव को कैबिनेट की मंजूरी मिलना बाकी है। जैसे ही प्रस्ताव को कैबिनेट की मंजूरी मिल जाएगी, वह लागू हो जाएगा और इसके साथ ही वार्षिक आय में वेतन से प्राप्त आय को शामिल किया जा सकेगा। इसका फौरी परिणाम यह होगा कि बड़ी संख्या में ओबीसी अभ्यर्थी स्वत: ही क्रीमीलेयर में शामिल हो जाएंगे और आरक्षण से वंचित कर दिए जाएंगे।

थावरचंद गहलोत का बयान चौंकाने वाला

फारवर्ड प्रेस ने जब केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत से दूरभाष पर इस संबंध में जानना चाहा तब उन्होंने कहा कि वार्षिक आय में वेतन से प्राप्त आय को शामिल करने की परिपाटी पहले से रही है। इसमें कुछ भी नया नहीं है।

गहलोत का यह कथन चौंकाने वाला इसलिए है क्योंकि वेतन और कृषि से प्राप्त आय को वार्षिक आय में शामिल न करने का विधान 8 अक्टूबर, 1993 से लागू है। यहां तक कि आरक्षण से संबंधित अनेकानेक दस्तावेजों में इस बात का जिक्र है। फिर उनका यह कहना कि वेतन से प्राप्त आय वार्षिक आय में शामिल रहा है, हैरतअंगेज है। 

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संसदीय समिति के अध्यक्ष गणेश सिंह ने कहा – गलत कर रही सरकार

वहीं ओबीसी आरक्षण को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा गठित संसदीय समिति के अध्यक्ष गणेश सिंह ने फारवर्ड प्रेस से बातचीत में कहा कि बी. पी. शर्मा कमेटी की अनुशंसा को स्वीकार कर डीओपीटी गलत कर रही है। उन्होंने कहा कि ग्रुप ए, बी और सी में ओबीसी के लिए आरक्षित पद बड़ी संख्या में रिक्त पड़े हैं। कहा जाता है कि योग्य अभ्यर्थी नहीं मिल रहे हैं इसलिए पद रिक्त हैं। इसलिए हम लोगों ने कहा कि क्रीमीलेयर की सीमा बढ़ा दिया जाय ताकि अभ्यर्थी मिलने लगें। लेकिन यदि वेतन को आय में शामिल कर लिया गया तो फिर से वापस वही स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। वे फिर से आरक्षण से वंचित हो जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी कमेटी ने अपनी अनुशंसा में साफ कहा था कि वार्षिक आय में वेतन से प्राप्त आय को शामिल नहीं किया जाय। उन्होंने कहा कि अभी ओबीसी के लोगों को 27 फीसदी आरक्षण नहीं मिल पा रहा है। एक बार 27 फीसदी आरक्षण मिलने लगे तब सरकार बेशक कुछ प्रतिबंध लगाए। 

ओबीसी को लेकर गठित संसदीय समिति के अध्यक्ष गणेश सिंह

गणेश सिंह ने कहा कि बी. पी. शर्मा कमेटी की अनुशंसाओं को लागू नहीं करने की मांग को लेकर उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को ट्वीट किया है। साथ ही ऐसा ही ट्वीट करने का अनुरोध उन्होंने अन्य सांसदों से भी किया है।

(संपादन : अनिल/अमरीश)

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