शूद्र और ब्राह्मण कौन? संतराम बी.ए. और आंबेडकर की राय

कंवल भारती 1948 में सन्तराम बी.ए. द्वारा लिखित किताब ‘हमारा समाज’ की मुकम्मिल समीक्षा प्रस्तुत कर रहे हैं। इस क्रम में वे यह बताते हैं कि डॉ. आंबेडकर की किताब ‘जाति का विनाश’ ने सन्तराम बी.ए. की सोच पर व्यापक प्रभाव डाला। हालांकि दोनों के बीच कुछ सवालों पर स्पष्ट भेद रहे

[कोई जन्मना श्रेष्ठ या निम्न कैसे हो सकता है? हिंदू धर्म की मान्यता चातुर्वर्ण्य व्यवस्था पर आधारित है और इसकी बुनियाद में ही इसकी परिभाषा शामिल है। डॉ. आंबेडकर और उनके समकालीन रहे विचारक सन्तराम बी.ए. इस सवाल के आलोक में कई मौकों पर एक समान विचार रखते हैं, वहीं अनेक बिंदू असहमतियों के भी हैं। कंवल भारती ने सन्तराम बी.ए. की किताब ‘हमारा समाज’ जो कि 1948 में प्रकाशित हुई थी, उसकी विस्तृत समीक्षा की है, जिसे हम तीन खंडों में प्रकाशित कर रहे हैं। पहले खंड में पढ़ें शूद्र और ब्राह्मण के संबंध में दोनों विचारकों के बीच सहमति और असहमति के विविध आयाम]

हमारा समाज’ : सन्तराम बी.. के जातपांत तोड़क आन्दोलन को समझने का आधार ग्रंथ

– कंवल भारती

19वीं सदी के हिन्दू नवजागरण काल में स्वामी दयानन्द और उनकी संस्था आर्यसमाज ने जो दस्तक दी, उसका प्रभाव पंजाब में ज्यादा पड़ा। स्वामी दयानन्द ने मूर्तिपूजा का विरोध् किया, एकेश्वरवाद की स्थापना पर जोर दिया और जन्म के स्थान पर गुणकर्म पर आधारित वर्णव्यवस्था का समर्थन किया। उन्होंने शूद्रों की शिक्षा को भी शास्त्र-सम्मत माना था। इसी आधार पर बीसवीं सदी में कुछ आर्यसमाजियों ने जातिप्रथा तोड़ने का संकल्प लिया, जिनमें से एक थे सन्त राम, जो सन्तराम बी.ए. के नाम से मशहूर हुए।

सन्तराम (1887-1988) का जन्म 14 फरवरी 1887 को होशियारपुर (पंजाब) के एक छोटे से गांव पुरानी बसी में हुआ था। उनके पिता राम दास गोहाल (शायद यह गोशाल से गोहाल हुआ हो) यारकन्द के जाने-माने व्यापारी थे, और व्यापार के सिलसिले में अक्सर बाहर रहते थे, और महीनों घर नहीं लौटते थे। व्यापार के कारण इनका परिवार काफी समृद्ध था। इसलिए उनके पिता ने अपने सभी बच्चों को सुशिक्षित किया था। कुछ लोगों ने उन्हें जाति से मेघ माना है, पर अधिकांश उन्हें कुम्हार जाति का मानते हैं। यद्यपि, सन्तराम ने स्वयं अपनी जाति का उल्लेख नहीं किया है, पर वे पिछड़े वर्ग से थे, इसमें सन्देह नहीं। हालांकि वे अपनी पढ़ाई के दौरान ही स्वामी दयानन्द के विचारों से प्रभावित होकर आर्य समाजी हो गए थे, पर आगे चलकर, काम करने के तरीकों को लेकर, आर्यसमाजियों के साथ उनका मतभेद हुआ, सो उन्होंने अपना अलग रास्ता बनाया। उन्होंने ‘जातिभेद से होने वाली सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हानियों को अनुभव करके 10 मार्ग शीर्ष संवत 1979 विक्रमी, अर्थात नवम्बर सन् 1922 ई. को कुछ मित्रों के सहयोग से, लाहौर में ‘जात-पांत तोड़क मंडल’ नाम की संस्था स्थापित की[1], जिसका उद्देश्य अन्तरजातीय खानपान और अन्तरजातीय विवाह के माध्यम से जातिप्रथा को तोड़ना था। लेकिन ऐसा नहीं था कि सन्तराम जाति-व्यवस्था को गलत मानते थे। ऐसा उन्होंने स्वयं अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हमारा समाज’ के अठारहवें परिच्छेद में शंकाओं के समाधन के अन्तर्गत कहा है। जैसे यह शंका : ‘हमारे जिन पूर्वजों ने जातिभेद बनाया था, क्या वे मूर्ख थे?’ समाधान में उन्होंने कहा : ‘हमारे पूर्वज मूर्ख न थे। उन्होंने समाज के लिए जो व्यवस्था बनाई थी, वह अपने समय और परिस्थिति को देखकर बनाई थी।’[2]

इन्हीं सन्तराम जी ने 1936 में डॉ. आंबेडकर को ‘जात-पांत तोड़क मंडल’ के वार्षिक अधिवेशन में अध्यक्षीय व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया था। डॉ. आंबेडकर ने अपने व्याख्यान में जातिप्रथा और वर्ण-व्यवस्था के संबंध में आर्यसमाजियों के विचारों की तीखी आलोचना की थी। यहां तक कि उन्होंने जातिप्रथा का समर्थन करने वाले धर्मशास्त्रों को भी डायनामाइट से उड़ा देने की बात कही थी। यह व्याख्यान सन्तराम और उनके मित्रों को हजम नहीं हुआ, अतः उन्होंने उस अधिवेशन को निरस्त कर दिया, जिसमें वह व्याख्यान पढ़ा जाना था। बाद में, डॉ. आंबेडकर का वह व्याख्यान अलग से पुस्तकाकार में छपा। सन्तराम ने उसका अनुवाद किया, और उसे ‘क्रान्ति’ में प्रकाशित किया, जो मंडल की उर्दू मासिक पत्रिका थी।

सन्तराम बी.ए. (14 फरवरी, 1887 – 5 जून, 1988) की पेंटिंग, नालंदा प्रकाशन, बम्बई द्वारा प्रकाशित हमारा समाज किताब का शीर्षक पृष्ठ व डॉ. भीमराव आंबेडकर (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956) की पेंटिंग

सन्तराम सामाजिक कार्यकर्ता और प्रचारक के साथ-साथ एक सशक्त लेखक भी थे। उन्होंने अपने ‘जाति तोड़ो’ मिशन के अन्तर्गत छोटे-छोटे 28 ट्रैक्ट लिखे, जिनमें हिन्दुओं सॅंभलो (1953), युग धर्म (1953), वास्तविक व्याधि क्या है (1956), कौन जात? (1957), अन्तरजातीय विवाह ही क्यों? (1959), हिन्दुत्व, जो हिन्दुत्व को ही ले डूबा (1962), राष्ट्रीय एकता और जातिभेद, (1963), क्या जात-पात मिटाई जा सकती है? (1968), पाकिस्तान की स्थापना में हिन्दुओं का हाथ (1969) और हिन्दू और स्वराज्य प्रमुख ट्रैक्ट हैं। उन्होंने छोटी-बड़ी कुल मिलाकर 97 पुस्तकें भी लिखीं। इनमें ‘अलबेरूनी का भारत’, ‘इत्सिंग की भारत यात्रा’, ‘भारत में बाइबल’, ‘दयानन्द’, ‘वीर पेशवा’, ‘विश्व की विभूतियां’, ‘भारत के महापुरुष’, ‘हरिसिंह नलवा’, ‘हमारा समाज’, ‘पत्नी धर्म’, ‘पंजाबी गीत’ और ‘रोमांचक वन्य जीवन की झांकी’ आदि उनकी महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं।

इनमें 1948 में प्रकाशित ‘हमारा समाज’ उनकी बहुचर्चित और महत्वपूर्ण पुस्तक है। यह पुस्तक उन्होंने इन शब्दों के साथ ‘अपने युग के सबसे पहले और सबसे बड़े सुधारक महात्मा मुंशीराम स्वामी श्रद्धानन्द जी की सेवा में’ समर्पित की है। 1947 तक सन्तराम का कार्य-क्षेत्र लाहौर ही रहा। किन्तु भारत के विभाजन के बाद वे अपने जन्म-स्थान होशियारपुर में आ गए, और 1982 तक वहीं रहे। इसके बाद वे अपनी बेटी गार्गी चड्ढा के नई दिल्ली स्थित (51, नवजीवन विहार) आवास पर आ गए, जहां वे अपनी मृत्यु तिथि 5 जून 1988 तक रहे।

सन्तराम इतने अधिक चर्चा में शायद न आ पाते, अगर वे जाति-पांति तोड़क मंडल के लाहौर अधिवेशन का सभापति बनने के लिए डॉ. आंबेडकर को आमंत्रित न करते, और उनके व्याख्यान से असहमत होकर अधिवेशन को निरस्त न करते। डॉ. आंबेडकर के कारण जात-पांति तोड़क मंडल को कटुतम आलोचना का शिकार होना पड़ा, और सभी क्षेत्रों से कड़ी फटकार सुननी पड़ी। यहां तक कि परमानन्द (पूर्व अध्यक्ष हिन्दू महासभा), महात्मा हंसराज, डा. गोकलचन्द्र नारंग, राजा नरेंन्द्र नाथ आदि ने भी मंडल का साथ छोड़ दिया था, जो पहले उसमें सक्रिय थे।[3] डॉ. आंबेडकर का वह व्याख्यान ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ (जाति का विनाश) नाम से पुस्तकाकार में प्रकाशित होने के बाद उसका सर्वप्रथम नोटिस महात्मा गांधी ने लिया। उन्होंने ‘हरिजन’ (2 जुलाई 1936 और 18 जुलाई 1936) में उस पर दो टिप्पणियां लिखीं, जिनमें डॉ. आंबेडकर पर शास्त्रों की गलत व्याख्या करने के अभियोग लगाते हुए उन्हें हिन्दू धर्म के लिए चुनौती बताया। इन टिप्पणियों पर सन्तराम और डॉ. आंबेडकर के प्रत्युत्तर भी प्रकाशित हुए। इस चर्चा में सन्तराम मुख्य रूप से उभरकर आए। सन्तराम पर डॉ. आंबेडकर के व्याख्यान का व्यापक प्रभाव पड़ा। और कहना न होगा कि उनकी पुस्तक ‘हमारा समाज’ इसी व्याख्यान के सन्दर्भ में लिखी गई थी, जिसमें डॉ. आंबेडकर को एक जवाब देने की कोशिश की गई है, और हिन्दुओं को जातिभेद के दुष्परिणामों से जागरूक भी किया गया है।

सन्तराम ने ‘हमारा समाज’ के पहले संस्करण की भूमिका ‘मैंने यह पुस्तक क्यों लिखी’ शीर्षक से लिखी। उसमें वे एक स्थान पर लिखते हैं-

‘अब तक भारत के रोग का गलत उपचार होता रहा है। भीतर के सामाजिक दोषों को दूर करके सब देशवासियों को बंधुता और एकता के सूत्र में पिरोने पर ध्यान ही नहीं दिया गया। देश की रक्षा के लिए सारा बल शास्त्रास्त्र को बढ़ाने और क्षत्रियों को उकसाने पर ही लगता रहा है। इस गलत उपचार का परिणाम यह हुआ है कि गत 13 सौ वर्षों से, जब से सातवीं शताब्दी में मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध् पर आक्रमण किया, आज तक हमारा पग पीछे और पीछे ही हटता आ रहा है। नवीं शताब्दी में काबुल में पाल वंश के राजा राज्य करते थे। पर आज अमृतसर के आगे भी हिन्दू का बच्चा देख नहीं पड़ता। यह पश्चाद्गति है या प्रगति? इसका कारण क्या है? कोई मनुष्य या तो निरोग होता है या रुग्ण। यह नहीं हो सकता कि वह एक तिहाई निरोग हो और दो तिहाई रोगी। इसी प्रकार राष्ट्र भी या तो सारा का सारा स्वतन्त्र होगा या सारा का सारा परतन्त्र। यह नहीं हो सकता कि उसके कुछ लोग तो स्वतन्त्र रहें और शेष सब परतन्त्र। यदि शूद्र गुलाम और परतन्त्र होगा, तो द्विज भी स्वामी और स्वाधीन न रह सकेगा।[4]

सन्तराम ने देश का रोग सही पकड़ा था। गांधी के स्वराज-आन्दोलन में यही प्रश्न डा. आंबेडकर ने उठाया था। उन्होंने कहा था कि जातिविहीन समाज की स्थापना के बिना स्वराज्य प्राप्ति का कोई महत्व नहीं है। अगर ऐसा स्वराज्य मिल भी गया, तो उसमें उच्च जातियां ही स्वतन्त्र रहेंगीं, शेष जातियां गुलाम ही बनी रहेंगीं। इसलिए स्वतन्त्र समाज के निर्माण के लिए जाति का विनाश जरूरी था। आंबेडकर की दृष्टि में जाति हिन्दू धर्म का एक दोष है, किन्तु सन्तराम का मत था कि हिन्दुओं के धर्म में कोई दोष नहीं है। ‘इनका उच्च तत्वज्ञान, इनका उत्कृष्ट ब्रह्मवाद और इनकी शान्तिदायिनी संस्कृति आज भी संसार के बड़े-से-बड़े दार्शनिकों को आकर्षित करती है।’ लेकिन वे यह मानते थे कि ‘दोष हमारी संरचना में है। हमारी जात-पांत एक भारी दुर्गुण है, जो हम में अनेक दूसरे सद्गुणों के रहते भी हमें दिन पर दिन नीचे लिए जा रहा है।[5]

‘हमारा समाज’ ग्रन्थ में अठारह परिच्छेद हैं। इसमें दो परिच्छेद सात और आठ विशिष्ट हैं। सातवें परिच्छेद में ‘निरपराध की हत्या’ शीर्षक से एक नाटक दिया गया है, जिसमें श्रीराम द्वारा शम्बूक का, प्राणदण्ड के रूप में, वध् किए जाने का दृश्य है। यह नाटक बंगाल के द्विजेन्द्रलाल राय और योगेशचन्द्र चौधुरी के ‘सीता’ नाटक का एक अंश है, जो हिन्दी में राधमोहन काव्यतीर्थ द्वारा अनूदित है। हालांकि हिन्दी में शम्बूक-वध् पर पहला नाटक स्वामी अछूतानन्द ‘हरिहर’ ने 1927 में लिखा था, पर इस नाटक की विशेषता यह है कि इसमें शम्बूक की पत्नी तुंगभद्रा का चरित्र गढ़ा गया है, जो वाल्मीकीय रामायण में नहीं है। इस नाटक में श्रीराम के साथ तुंगभद्रा का वार्तालाप बहुत ही विचारोत्तेजक है। जब श्रीराम शम्बूक को प्राणदण्ड देने शम्बूक के आश्रम में आते हैं, तो तुंगभद्रा उनसे पूछती है, ‘आज आपका यह कैसा विचित्र न्याय है? महाराज, आप बिना किसी अपराध् के ही मेरे स्वामी को मारने आए हैं।’ तब श्रीराम जवाब देते हैं, ‘तुम्हारे स्वामी ने शास्त्र के प्रति, समाज के प्रति विद्रोह किया है। उसका अपराध् भारी है। तुम स्त्री हो, तुम इसे क्या समझोगी?’ तब तुंगभद्रा अपने पति के अपराध् को क्षमा करने की प्रार्थना करती है, पर श्रीराम यह कहकर कि यह अपराध क्षम्य नहीं है, शम्बूक का वध कर देते हैं। तुंगभद्रा अचेत होकर गिर पड़ती है। फिर होश में आने पर वह श्रीराम को शाप देती है, ‘हे अत्याचारी राघव! इस जीवन में तुम घड़ी भर के लिए भी चैन न पाओगे। तुम्हारा सारा जीवन दुःख और शोक में ही बीतेगा। फूलों की सेज तुम्हें कांटों का बिछौना जान पड़ेगी। तुम चैन से एक दिन भी न सो सकोगे। घोर निराशा, भारी चिंता और मर्मांतक पीड़ा के साथ तुम्हारी मृत्यु होगी। तुम चाहे भगवान के अवतार साक्षात नारायण ही क्यों न हो, सती का यह शाप तुम्हें भोगना ही पड़ेगा।[6]’ और रामायण से पता चलता है कि यह शाप श्रीराम को भोगना पड़ा था। पश्चाताप की अग्नि में जलकर उन्होंने सरयू में जल-समाधि लेकर आत्महत्या की थी।

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आठवां परिच्छेद इस दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है कि इसमें सन्तराम जी ने बौद्ध विद्वान अश्वघोष की बहुचर्चित संस्कृत कृति ‘वज्रसूची’ का अनुवाद प्रस्तुत किया है। सन्तराम के अनुसार, ‘हिन्दू राष्ट्र को जिस जातिभेद ने उस समय बौद्ध और वैदिक, इन दो दलों में विभक्त कर दिया था, उसी वादग्रस्त विषय पर इस बौद्ध विद्वान ने संस्कृत भाषा में एक तर्कपूर्ण प्रबन्ध लिखा था, जिसका नाम वज्रसूची है।’ उनके मतानुसार, ‘वज्रसूची’ पुस्तक सन् 1829 में श्री हडसन को नेपाल में मिली थी। एक प्रति इसकी नासिक में भी मिली थी, जिसे वहां के पंडितों ने उसे शंकराचार्य की रचना माना। दसवीं सदी में इसका अनुवाद चीनी भाषा में हो चुका था। अश्वघोष की वज्रसूची के समान ही एक और ग्रन्थ ‘वज्रसूचिकोपनिषद’ भी मिलता है। यह भी जातिभेद के खण्डन में है। सन्तराम ने इस परिच्छेद में ‘वज्रसूची’ और ‘वज्रसूचिकोपनिषद’ दोनों का अनुवाद दे दिया है, जो शायद इससे पूर्व हिन्दी में उपलब्ध् नहीं था। ‘वज्रसूची’ से एक उद्धरण इस प्रकार है –

‘अब यदि यह कहा जाए कि ब्राह्मण्य माता-पिता के रज-वीर्य से पैदा होता है, और जो ब्राह्मण माता-पिता के पेट से जन्म लेता है, वही ब्राह्मण होता है, तो यह कल्पना भी शास्त्र-विरुद्ध है। स्मृति के प्रसिद्ध श्लोक से यह बात स्पष्ट है कि अचल मुनि का जन्म हथिनी के पेट से, केश पिंगल का उल्लू के पेट से, कौशिक का घास से, द्रोणाचार्य का दोने से, तैतिरी ट्टषि का पक्षी के पेट से, व्यास का धीवरी के पेट से, कौशिकी का शूद्रिणी के पेट से, विश्वामित्रा का चाण्डालिनी के पेट से, वसिष्ठ का वेश्या के पेट से हुआ था।

‘इन सबके माता-पिता ब्राह्मण नहीं थे, तो भी आप उनको ब्राह्मण कहते हैं। इसलिए ब्राह्मण माता-पिता के गर्भ से जन्म लेने से ही मनुष्य ब्राह्मण हो सकता है, यह बात झूठी है।[7]

‘वज्रसूचिकोपनिषद’ भी जाति-भेद का खंडन ‘वज्रसूची’ की ही शैली में करता है। वह कहता है, ब्राह्मण न जन्म से होता है, न ज्ञान से, न कर्म से और न धर्मिक भाव से। यथा –

‘तो ज्ञान को ब्राह्मण कहें? नहीं, यह भी ठीक नहीं। कितने ही क्षत्रियादि भी तो परमार्थदर्शी और विद्वान होते हैं। इसलिए ज्ञान भी ब्राह्मण नहीं हो सकता।’

‘कर्म को भी ब्राह्मण मानना ठीक नहीं। कारण यह है कि कर्म तो सभी लोग करते हैं। कर्म भी सबका संक्षिप्त, प्रारब्ध तथा आगामी होने से समान ही होता है। अतः कर्म भी ब्राह्मण नहीं हो सकता।’

‘धर्मिक भाव भी ब्राह्मण नहीं हो सकता। क्षत्रियादि लोग भी दान आदि में प्रवृत्तिशील देखे जाते हैं। इसीलिए यह पक्ष भी ठीक नहीं।[8]

‘वज्रसूची’ और ‘वज्रसूचिकोपनिषद’ दोनों ही वस्तुतः ब्राह्मण-क्षत्रियादि का जन्म से खण्डन करते हैं। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि वे वर्णव्यवस्था को नकारते हैं, बल्कि वे उसे गुणों से स्वीकार करते हैं। ‘वज्रसूची’ के अनुसार, ब्राह्मण वह है, जिसका आचरण अच्छा हो, और शूद्र वह है, जिसका आचरण बुरा हो।[9] इसी तरह ‘वज्रसूचिकोपनिषद’ के अनुसार, ‘जो एक अद्वितीय, जन्म-गुण-क्रिया से रहित, नाना प्रकार के दोषों से रहित, सब प्राणियों के अन्तर्यामी, अखण्ड-आनन्द स्वभाव, काम-रागादि से मुक्त, भाव, मात्सर्य, तृष्णा, आशा, मोह आदि से रहित है, जो दम्भ, अहंकार को पास फटकने नहीं देता, ऐसे लक्षणों वाला जो भी हो, उसे ही ब्राह्मण समझना चाहिए।[10]

ये लक्षण सुनने में अच्छे लगते हैं, पर इन लक्षणों की परख करके मनुष्यों के वर्ण का निर्धरण करने का कार्य आज तक नहीं हुआ। ऐसी कोई एजेंसी न पूर्व में कभी थी, और न आज अस्तित्व में है।

जाति कैसे उत्पन्न हुई?

पहला परिच्छेद ‘जाति का लक्षण’ है, जिसमें सन्तराम  कहते हैं, ‘हिन्दुओं का जातिभेद सचमुच कल्पित, अस्वाभाविक और भ्रममूलक है। इसकी कोई ठीक-ठीक परिभाषा करना, इसे किसी विदेशी को समझा सकना बड़ा कठिन है। यदि हम जातिभेद को एक रोग मान लें, तो इसके बड़े-बड़े बाह्य लक्षण ये हैं – स्पर्श-बन्दी, व्यवसाय-बन्दी, रोटी-बन्दी और बेटी-बन्दी।’

दूसरे परिच्छेद में सन्तराम ने जातिभेद के आरम्भ की कथा का वर्णन किया है। उन्होंने डॉ. आंबेडकर की तरह स्वीकार किया है कि इस समय जितनी भी जातियां और उपजातियां हैं, ‘वे सब चातुर्वर्ण्य का ही दुष्परिणाम हैं। लेकिन वे कहते हैं कि यह चातुर्वर्ण्य वेद में कहीं नहीं है।[11] ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में जो चार वर्णों की उत्पत्ति का उल्लेख आया है, उसे सन्तराम ‘अर्वाचीन’ (बाद में जोड़ा गया) मानते हैं, और उसका अर्थ भी इस तरह करते हैं: ‘कि उस (प्रजापति) के मुख ब्राह्मण, बाहु क्षत्रिय, उरू वैश्य थे और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए।[12]’ फिर चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति कैसे हुई? इसकी एक बहुत भोली सी कहानी सन्तराम ने इस तरह गढ़ी –

‘ऐसा जान पड़ता है कि आदिकाल में मनुष्य-समाज गंगोत्री के निकट गंगा-जल के समान निर्मल था। लोग सात्विक, सरल, सदाचारी और शुद्ध-हृदय थे। पहले मनुष्यों की संख्या बहुत कम थी और खान-पान की सामग्री प्रचुर थी। लोग फल-फूल खाकर सहज में पेट भर लेते थे। कालान्तर में यह समाज वैसा शुद्ध, निर्व्याज और सरल न रह सका। तब अपनी-अपनी प्रकृति, रुचि और योग्यता के अनुसार लोग विभिन्न कार्य करने लगे। जैसे आजकल नाना प्रकार के व्यवसाय देखने में आते हैं, वैसे उस समय न थे। उस समय कुछ लोग गाय आदि पशु चराते थे, कुछ शत्रुओं से समाज की रक्षा करते थे और कुछ बालकों को लिखाते-पढ़ाते थे। इस प्रकार वे लोग सब मिलकर एक-दूसरे की आवश्यकताओं को पूरा करते थे। जो लोग खेती-बाड़ी करते और पशु चराते थे, उनको उस समय की भाषा में वैश्य कहा जाता था। जो शत्रुओं से लड़ते-भिड़ते थे, वे क्षत्रिय कहलाते थे और जो पठन-पाठन का काम करते थे, उनका नाम ब्राह्मण था। कहने का तात्पर्य यह कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की यह बांट जन्म पर नहीं, काम पर थी।[13]

लेकिन, इस कहानी में शूद्र कौन लोग कहलाए, यह नहीं बताया गया। और यह बांट अगर कर्म पर थी, तो आज जन्म पर कैसे हो गई? इसका समाधान इस परिच्छेद में नहीं है। सन्तराम ने बहुत से वर्णों और जातियों के बीच अन्तरविवाह किए जाने का वर्णन किया है, और यह भी बताया है कि पूर्वकाल में एक वर्ण का मनुष्य यदि दूसरे वर्ण का व्यवसाय करता था, तो उसे बुरा नहीं समझा जाता था। इस सम्बन्ध् में उन्होंने महाभारत के द्रोणाचार्य और कृपाचार्य का उदाहरण दिया है, जो दोनों ब्राह्मण थे, और उन्होंने युद्ध में लड़कर क्षत्रिय का काम किया[14]। किन्तु यह स्वतंत्रता द्विजों में पहले से ही थी, जिसका प्राविधान मनुस्मति में भी मिलता है।

सन्तराम ने शूद्रों के बारे में विस्तार से चर्चा तीसरे परिच्छेद में की है। उनका मुख्य प्रामाणिक स्रोत वेद हैं। वे कहते हैं कि वेद में ऐसी किसी घटना का उल्लेख नहीं मिलता है कि आर्य लोग बाहर से भारत में आए और उन्होंने यहां के आदिवासियों को जीतकर दास बनाया, और उन्हीं का नाम शूद्र है[15]। वे भृगु के हवाले से कहते हैं कि ब्रह्मा ने पहले सब ब्राह्मण ही बनाए थे। पर, बाद में वे अपने-अपने कर्मों से अलग-अलग वर्ण के बन गए। भृगु ने शूद्र के बारे में कहा कि ‘जो नित्य सब तरह की वस्तुएं खाता है, जो अशुचि (मैला) है, जो सब प्रकार के अच्छे-बुरे कर्म करता है और जो वेद को छोड़कर आचार-हीन हो गया है, वही शूद्र है।[16]’ उन्होंने भृगु का एक और उद्धरण दिया है, जिसमें कहा गया है कि ‘यदि ब्राह्मण के लक्षण शूद्र के यहां उत्पन्न हुए बालक में पाए जाएं तो वह बालक शूद्र नहीं कहला सकता, और यदि ये लक्षण जन्म के ब्राह्मण में न हों, तो वह ब्राह्मण नहीं।[17]’ सवाल यह है कि यह परीक्षण कौन करेगा? और अब तक इस परीक्षण के द्वारा कितने दुःशील ब्राह्मणों को शूद्र वर्ण का दर्जा दिया गया, और कितने शीलवान शूद्रों को ब्राह्मण वर्ण में ढकेला गया? उत्तर है, एक भी नहीं। गुणकर्म की दुहाई असल में वर्णव्यवस्था का औचित्य सिद्ध करने के लिए दी गई थी। अगर वर्णव्यवस्था जन्मना नहीं होती, गुण-आधरित होती, तो काशीप्रसाद जायसवाल, डॉ. आंबेडकर और स्वयं सन्तराम का वर्ण परिवर्तन क्यों नहीं हुआ?

सन्तराम आर्यसमाजी थे, और दयानन्द की वर्णध्र्म की गुण-आधरित व्याख्या पर बिना किसी सन्देह के विश्वास करते थे। किन्तु डॉ. आंबेडकर ने जात-पांत तोड़क मंडल के सम्मेलन के लिए लिखे गए अपने व्याख्यान में दयानन्द की इसी व्याख्या पर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने कहा था –

‘आर्यसमाजियों के चातुर्वर्ण्य में यदि व्यक्ति को अपनी योग्यता के अनुसार हिन्दू समाज में अपना स्थान ग्रहण करने की छूट है, तो मैं यह समझने में असमर्थ हूं कि फिर मनुष्यों को चार वर्णों – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में बांटने की क्या जरूरत है? ब्राह्मण का लेबल न हो, तब भी किसी विद्वान व्यक्ति का सम्मान किया जायेगा। सैनिक का सम्मान तब भी किया जायेगा, जब क्षत्रिय का लेबल न होगा। यदि यूरोपीय समाज अपने सैनिकों और अपने सेवकों का सम्मान उन पर कोई स्थायी लेबल लगाए बिना कर सकता है, तो हिन्दू समाज के लिए ऐसा करना कठिन क्यों होना चाहिए? यह एक ऐसा प्रश्न है, जिस पर विचार करने की परवाह आर्यसमाजियों ने नहीं की है।[18]


संदर्भ :

[1] हमारा समाज, सन्तराम, बी.ए., दूसरा संस्करण, 1957, पृष्ठ 17

[2] वही, पृष्ठ 264-267

[3] जाति का विनाश, डॉ. आंबेडकर, अनुवादक : राजकिशोर, फारवर्ड प्रेस, 2018, पृष्ठ 19

[4] हमारा समाज, पृष्ठ 10-11

[5] वही, पृष्ठ 16

[6] वही, सातवां परिच्छेद, पृष्ठ 71-80

[7] वही, आठवां परिच्छेद, पृष्ठ 83

[8] वही, पृष्ठ 93

[9] वही, पृष्ठ 89-90

[10] वही, पृष्ठ 93

[11] वही, दूसरा परिचछेद, पृष्ठ 6

[12] वही, पृष्ठ 7

[13] वही, पृष्ठ 12

[14] वही, पृष्ठ 17

[15] वही, तीसरा परिच्छेद, पृष्ठ 19

[16] वही, पृष्ठ 23

[17] वही, पृष्ठ 24

[18] जाति का विनाश, डॉ. आंबेडकर, अनुवादक : राजकिशोर, फारवर्ड प्रेस, संस्करण, 2018, पूष्ठ 81

(संपादन : नवल)


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