पेरियार ललई सिंह यादव के नाटक ‘सन्त माया बलिदान’ को पढ़ते हुए

वर्ष 1926 में स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ का ‘मायानन्द बलिदान’ नाटक प्रकाशित हुआ। इसे दूसरे रूप में पेरियार ललई सिंह यादव ने वर्ष 1966 में गद्य के रूप में लिखा। दोनों रचनाओं में वैचारिक समानताओं के बावजूद अनेक अंतर हैं। बता रहे हैं कंवल भारती

जुलाई, 1926 में स्वामी अछूतानन्द ‘हरिहर’ का एक नाटक ‘मायानन्द बलिदान’ नाम से प्रकाशित हुआ था, जो लोक संगीत के रूप में पद्य में लिखा गया था। उसके 40 साल बाद उसी नाटक की कहानी में कुछ फेरबदल करके ‘सन्त माया बलिदान’ नाम से पेरियार ललई सिंह यादव ने गद्य में लिखा था, जो 23 अक्टूबर, 1966 को प्रकाशित हुआ। उनके अनुसार वह कथा उन्हें मेहसाना, गुजरात के एक 66 वर्षीय कवि शिवराम अम्बाराम भाट ने 1 जनवरी, 1964 को जयेंन्द्र बिल्डिंग, अहमदाबाद में सुनाई थी। मायानन्द जी के बलिदान की घटना भी गुजरात प्रदेश की ही है। पेरियार ललई सिंह यादव ने इस नाटक में अपने ‘दो शब्द’ में लिखा है, ‘कुछ भाटों का मत है कि वीर सन्त माया का बलिदान नरमेध यज्ञ के ढंग पर हुआ, फलस्वरूप वरुण देव ने नीचे से पाताल तोड़कर तालाब को पानी से लबालब भर दिया। यह मत अंधविश्वास पर आधारित होने के कारण अमान्य है।’

इस नाटक में चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु की ‘सम्मति’ भी छपी है। जिज्ञासु इस नाटक के बारे में लिखते हैं – ‘महान विद्वान माया पहले हिन्दूधर्म के अनन्य भक्त थे। किशोरावस्था में राममन्दिर की आरती के समय जातीय अपमान से खिन्न होकर बौद्धधर्म के अनुयायी बन गए और बाद में सफल प्रचारक भिक्षुवर बने। यहां तक कि अंत में दलितों, पीड़ितों को जन्मसिद्ध सामाजिक अधिकार दिलाने के लिए राजाज्ञानुसार वे पाटण के जल-रहित तालाब की पिटकुइयां में बीचोंबीच खूंटानुमा नोकदार लम्बे लट्ठ को ठोकते हैं। एकाएक तालाब से बड़े वेग से जल-धारा प्रवाहित हो उठती है। परम परोपकारी भिक्षुवर वीर सन्त माया उसी में डूबकर पंचमहाभूतों में विलीन होेकर निर्वाण पद प्राप्त करते हैं। यह ऐसी रोमांचकारी घटना है, जिसका चित्त पर गहरा प्रभाव पड़ता है।’

इस नाटक में दूसरी प्रमुख पात्रा मजदूर नेता के रूप में ‘जसमा’ है, जो गरीब मजदूर है और जिसका सपरिवार खून कर दिया गया है।

स्वामी अछूतानन्दजी के नाटक के अनुसार यह कथा संवत 1100 विक्रमी की है। सिद्धनगर गुजरात के शहर पाटण में सहस्रलिंग मन्दिर पर बांध का निर्माण किया जा रहा था। पर जब भी बांध तैयार होता, उसे पानी बहा ले जाता था। जब राजा ने ब्राह्मणों को बुलाकर उपचार पूछा, तो ब्राह्मणों ने कहा कि बांध नरबलि मांग रहा है। ब्राह्मण हमेशा इस तरह के कर्मकांड करते-कराते आए हैं। रानी नरबलि का विरोध करती है, पर ब्राह्मण-भक्त राजा ब्राह्मणों के दबाव में नरबलि की स्वीकृति दे देता है। उस समय मायानन्द नामक एक शूद्र साधु से ब्राह्मण बहुत दुखी थे, क्योंकि वह वर्णव्यवस्था और वैदिक धर्म का खंडन करता था। ब्राह्मणों ने मायानन्द के विरुद्ध राजा को भड़काया और उसे मायानन्द की बलि चढ़ाने के लिए मना लिया। फलतः तुरन्त ही राजा की आज्ञा से मायानन्द को पकड़कर लाया गया। उसे राजा की आज्ञा पढ़कर सुनाई गई। राजा ने मायानन्द से पूछा, तुम्हारी कोई आखिरी इच्छा? मायानन्द ने इच्छा बताई – आज से अछूतों को स्वतंत्र किया जाए, उनके गले में हांडी लटकाने और कमर में झाड़ू बांधने की परंपरा खत्म करने की राज्याज्ञा जारी की जाए। कहा जाता है कि इधर राजा ने राज्याज्ञा जारी की और उधर मायानन्द ने अपना बलिदान दे दिया।

स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ की तस्वीर

पेरियार ललई सिंह यादव के नाटक में भी यही कहानी है, पर किंचित परिवर्तन के साथ। यहां बांध की जगह तालाब है। इस नाटक में आठ दृश्य हैं। पहले दृश्य में राम की संध्या-आरती होती है। पुजारी की प्रतीक्षा है। पर वह नहीं आता है। एक वृद्ध शूद्र संत के कहने पर एक श्रेष्ठ विद्वान युवक माया को पुजारी का काम सौंप दिया जाता है, जो महाशूद्र है, अर्थात अछूत। जब वह आरती करता है, तो एक ब्राह्मण युवक गांव में दौड़कर सबको खबर कर देता है कि एक माया ने मंदिर को छूत कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप सवर्ण और उनके धर्म के ठेकेदार पिछड़ी जातियों के लोग आकर मन्दिर में मौजूद भक्तों पर जालिमाना हमला बोल देते हैं। इस हमले से तीन लोग मर जाते हैं और दस लोग घायल हो जाते हैं। माया जंगल में चला जाता है। मुखिया के बुलावे पर पुलिस आती है। 

ध्यातव्य है कि पेरियार ललई सिंह यादव ने पिछड़े वर्ग की गुलाम मानसिकता को दिखाने के लिए इस दृश्य का सृजन किया है। इसमें राम-मंदिर और हिन्दू धर्म की, लाठी-हथियारों से रक्षा करने का काम शूद्र वर्ग करता है, जिसे पिछड़ी जातियां या ओबीसी कहा जाता है। यह काम वह आज भी कर रहा है। सच भी यही है, कि पिछड़ा वर्ग ही ब्राह्मणवाद के पाखंड का भार ढो रहा है।

दूसरा दृश्य पाटण की राज्यसभा का है। महाराज सिद्धराज सिंहासन पर बैठे हैं। चोबदार समाचार सुनाता है कि हिन्दू धर्म के अपमान की चोट खाया हुआ महाशूद्र माया बौद्धधर्म ग्रहण करके भिक्षु बन गया है। वह वर्णाश्रम व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है। इसी बीच प्रधानमंत्री राज्य का समाचार बताता है कि राज्य में पानी की विकट समस्या है, जिसके कारण अकाल पड़ गया है और जनता में हाहाकार मचा हुआ है। इस समाचार के बाद दरबार में नर्तकियों का नाच होता है, जो बताता है कि शासक वर्ग जनता के कष्टों की चिन्ता नहीं करता है। इसी बीच राजपुरोहित केशो माधो का प्रवेश होता है। फिर गिरधर भाट आता है और बताता है कि बिना पानी के सहस्त्रों की संख्या में पशु मर गए हैं। प्रजा चाहती है कि सरकार पाटण में एक बड़ा तालाब खुदवाए। गांवों के कुछ प्रतिनिधि भी आते हैं और वे भी महाराज से तालाब खुदवाने का अनुरोध करते हैं। फलतः सिद्धराज तालाब खुदवाने की घोषणा कर देते हैं।

तीसरे दृश्य में मालवा प्रदेश के खानदेश में जसमा ओड़न के मकान के दरवाजे का सहन है। बुद्ध की पूजा का अवसर है। भिक्षुवर माया वहां उपस्थित लोगों को त्रिशरण और पंचशील ग्रहण कराते हैं और बौद्धधर्म की शिक्षा देते हैं। उसी समय कविराज गिरधर भाट का प्रवेश होता है, जो जसमा को तालाब खुदवाने के लिए बुलावा देने आया है। मजदूरी करना जसमा का जातीय पेशा है। वह हजारों गरीब मजदूर परिवारों के पेट पालने की खातिर कविराज का बुलावा स्वीकार कर लेती है। चौथे दृश्य में तालाब खुदाई का अन्तिम दिन है। जसमा की निगरानी में मराठी, गुजराती, राजस्थानी और मालवा स्त्री-पुरूष चारों दिशाओं में काम पर लगे हुए हैं। इसी बीच तालाब का काम देखने के लिए महाराज सिद्धराज का आगमन होता है। निरीक्षण के दौरान उसकी कुदृष्टि जसमा के सुन्दर रूप पर पड़ जाती है। 

पेरियार ललई सिंह यादव की तस्वीर

पांचवे दृश्य में अर्धरात्रि का समय है। मजदूर खा-पीकर अपनी-अपनी झोंपड़ियों में बेसुध सोए हुए हैं। उसी समय महाराज सिद्धराज, प्रधान सेनापति, कुछ सैनिकों तथा गुप्तचरों का प्रवेश होता है। वे चुपके-चुपके पंजों के बल धीरे-धीरे झोंपड़ियों की ओर बढ़ते हैं।

महाराज पूछते हैं : जसमा की झोपड़ी कौन सी है?

गुप्तचर : यह है टिमटिमाते चिराग वाली।

महाराज : झोपड़ी के दरवाजे पर कौन सो रहा है?

गुप्तचर : यह जसमा का पति जसवंत सो रहा है।

महाराज : जसमा कहां है?

गुप्तचर : झोंपड़ी के भीतर…चूल्हे के पास अपने दुधमुंहे बच्चे को बगल में लिटाए…अचेत पड़ी सो रही है।

महाराज सेनापति को जसमा के पति को खत्म करने और जसमा को पकड़कर बाहर लाने का आदेश देता है। सेनापति तुरंत ही तलवार के एक ही वार में जसवंत को मौत के घाट उतार देता है। फिर वह झोपड़ी में घुसकर जसमा को खींच कर बाहर लाता है। वह पति का रक्त-रंजित शरीर देखकर चिल्लाती है, दौड़ो, बचाओ, बचाओ! शोर सुनते ही महाराज जसमा को भी साफ करा देते हैं। पर सेनापति की तलवार का वार जसमा की गरदन पर तिरछा पड़ता है, जिससे वह घायल हो जाती है। महाराज और उनके सभी लोग भाग जाते हैं। तुरंत सभी मजदूर आ जाते हैं। एक सहेली जसमा का सिर गोद में रखकर बैठ जाती है। कुछ होश आने पर जसमा बोलती है : ‘हे कामी हत्यारे सिद्धराज! तूने मेरा सतीत्व नष्ट करने का असफल प्रयास किया। मैं तुझे श्राप देती हूं, कि विश्व का किसान-मजदूर दल भविष्य में सामंती युग समाप्त करने में अवश्य सफल होगा।’ इसके बाद जसमा दम तोड़ देती है।

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छठे दृश्य का विषय पूंजी का राष्ट्रीयकरण है। इसी दृश्य में भिक्षुवर माया का भी प्रवेश होता है। राजदरबार में चोबदार किसानों और मजदूरों के दुखों का हाल बताता है, और यह भी कि सेठ साहूकार उनका शोषण करके कितने मालामाल हैं। सिद्धराज उससे पूछता है : ‘इसका उपाय क्या है?’

चोबदार कहता है : ‘इसका सबसे अच्छा सरल उपाय है, ‘पूंजी का राष्ट्रीयकरण।’

प्रधानमंत्री और अन्य सामंत इसका विरोध करते हैं। लेकिन इस विषय पर इस चर्चा को आगे नहीं बढ़ाया गया है। इसी बीच अचानक कविराज गिरधर भाट के साथ भिक्षुवर माया का प्रवेश होता है। माया कहता है: ‘मैं तालाब के काम में अपनी बलि देने के लिए सहर्ष तैयार हूं। परंतु, आपके पूर्वजों ने केवल महाशूद्रों के नाम जो तीन आज्ञाएं प्रसारित की थीं, आप उन्हें बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय वापिस ले लें।’

यह सुनकर राजा अपने राजपुरोहित और अन्य ब्राह्मणों से सलाह लेता है। वे सभी ऐसा करने से मना कर देते हैं, कहते हैं : ‘महाशूद्रों को ऐसी स्वतंत्रता देने से आपका व हम लोगों का भविष्य समाप्त हो जाएगा।’

राजा सिद्धराज एकदम क्रोधित होकर बोलता है : ‘अरे मानवता के शत्रु ब्राह्मणों! जलती आग की भट्टी में झोंक दो, उन स्वार्थी हिन्दूधर्म शास्त्रों को, जो कोटि-कोटि मानवों को जरा भी स्वतंत्रता नहीं देना चाहते। तुम लोगों को दिन-रात धर्म ही धर्म सूझ रहा है। परन्तु राज्य की अकाल-पीड़ित जनता पानी चाहती है।’

तब महाराज प्रधानमंत्री से पूछते हैं – ‘तुम्हारी क्या सम्मति है?’

वह कहता है – जैसे बने, तैसे निकले, तालाब में पानी।’

इसके बाद सिद्धराज राज्याज्ञा प्रसारित करता है : भविष्य में महाशूद्र –

  1. पीठ के पीछे तीसरी बांह, अंगरखा, कुरता, सलूरा, पतोही आदि में नहीं सिलावेंगे।
  2. मार्ग में चलते समय थूकने के लिए मिट्टी की हांडी गले में नहीं लटकावेंगे।
  3. मार्ग में चलते समय पैरों के निशान मिटाने के लिए कमर में झाड़ू या झालर नहीं बांधेंगे।

नेपथ्य में ब्राह्मण कहते हैं: यह राजाज्ञा हम लोग कभी भी लागू नहीं होने देंगे।

सातवें दृश्य में माया सूखे तालाब में उतरता है। तालाब के बीचोंबीच बनी पिटकुइयां (छोटे कुएं) के भीतर बीच में खूंटानुमा नोकदार रखे लम्बे लट्ठे को हथौड़े से ठोकना आरम्भ करता है। अचानक पाताल से पानी बड़े वेग से ऊपर को उछाल मारता है। और माया पिटकुइयां के भीतर ही पानी के वेग में फंसकर मर जाता है।

नाटक के अन्तिम आठवें दृश्य में लगभग सात सौ साल के बाद का समय है। जनता जश्न के साथ माया और जसमा जैसी महान विभूतियों का गुणगान करती है।

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ललई सिंह के ‘सन्त माया बलिदान’ नाटक पर अनेक आपत्तियां हैं। इसका कथानक स्वामी अछूतानन्द के ‘मायानन्द बलिदान’ नाटक की कथा से भिन्न है। इसमें संदेह नहीं कि एक कथा को कई तरह से कहा जा सकता है और उसमें कुछ नई घटनाओं की कल्पना भी की जा सकती है। लेकिन उसका कोई तार्किक आधार जरूर होना चाहिए। यह तार्किक आधार पेरियार ललई सिंह यादव के परिकल्पित नाटक के किसी दृश्य में दिखाई नहीं देता। कुछ नाटक ऐतिहासिक होते हैं, कुछ धार्मिक होते हैं, और कुछ सामाजिक तथा राजनीतिक भी होते हैं। ललई सिंह का यह नाटक किसी एक श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यह ऐतिहासिक मूल का है, पर बौद्ध धर्म की बात करता है, इसलिए धार्मिक भी है। यह किसान-मजदूरों की और पूंजी के राष्ट्रीयकरण की बात करता है, इसलिए राजनीतिक भी है। पर, यह महाशूद्रों अर्थात अछूतों की स्वतंत्रता की बात भी करता है, इसलिए यह सामाजिक भी है। लेकिन क्या यह अपने उद्देश्य में एक सफल नाटक है? 

मेरा उत्तर है, कदापि नहीं। इसका कारण यह है कि ललई सिंह यादव ने इनमें से किसी भी विषय पर अपनी अवधारणा को स्पष्ट नहीं किया है। यह नाटक न इस प्रश्न का उत्तर देता है कि पूंजी का राष्ट्रीयकरण क्या है? और राजशाही में पूंजी के राष्ट्रीयकरण का क्या अर्थ है? यह नाटक यह भी स्पष्ट नहीं करता कि मजदूरों की समस्याएं क्या हैं, और उनका शोषण किस तरह होता है? गोया, मजदूरों की नेता के रूप में जसमा का चरित्र गढ़ा गया है, पर वह कहीं भी मजदूरों का प्रतिनिधित्व करती दिखाई नहीं देती है। मजदूर नेता के रूप में मजदूरों की समस्याओं पर उसका एक भी संबोधन नहीं है। बस, वह विभिन्न राज्यों से मजदूर मेंटों के साथ तालाब खोदने चली जाती है, जहां अन्तिम दिन राजा उसके साथ हमबिस्तर होने के प्रयास में विफल होने पर उसका कत्ल करा देता है। इसके बाद शेष मजदूरों का भी कोई विद्रोह नहीं होता है। मरने से पूर्व घायल जसमा यह श्राप जरूर देती है कि विश्व का किसान-मजदूर दल भविष्य में सामंती युग समाप्त कर देगा। फ्रांस और रूस में सामंती युग समाप्त भी हुआ। भारत में भी सामन्तशाही खत्म हुई और लोकतंत्र आया, पर क्या यहां किसान-मजदूरों का राज आया?

ललई सिंह के नाटक में जिस महाराज सिद्धराज ने मजदूर स्त्री जसमा की इज्जत लूटने का प्रयास किया और उसे मौत के घाट उतारा और जिसे जसमा श्राप देती है, उसे अन्त में दलितो का मुक्ति-दाता दिखाया गया है, जिसने अछूतों के गले में हांडी और कमर में झाड़ू बांधने की परंपरा खत्म करने की राज्याज्ञा जारी की है। स्वामी अछूतानन्द के ‘मायानन्द बलिदान’ में भी सिद्धराज मनु की निषेधाज्ञाओं को खत्म करने की राज्याज्ञा जारी करता है। किन्तु उसमें मायानन्द को सिपाहियों द्वारा जबरदस्ती पकड़कर लाया गया है, जबकि ललई सिंह यादव के नाटक में माया स्वयं तालाब में खूंटा ठोकने के लिए राजा के पास आया है। यह जानकर भी कि वह उस काम का जानकार नहीं था, और न उसने कभी उस काम को किया था, वह पानी के वेग में मरने के लिए तालाब में उतर गया। जब राजा द्वारा तालाब का निर्माण करवाया गया है, और उस राज्यक्षेत्र में उस तरह के तालाब बनते ही रहे हैं, तो फिर यह कैसे हो सकता है कि उस कला के जानकार दक्ष लोग वहॉं न हों। दक्ष और निपुण कारीगरों द्वारा ही इस तरह के तालाब बनवाए जाते थे। फिर सिद्धराज को उस काम के लिए सर्वथा एक अयोग्य और अकुशल माया की आवश्यकता क्यों पड़ी, और वह भी अछूतों की मुक्ति की शर्त पर? यह अविश्वसनीय प्रतीत होता है। किन्तु स्वामी अछूतानन्द के नाटक में मायानन्द का बलिदान अविश्वसनीय नहीं है। वहां तालाब नहीं है, बल्कि बांध का मामला है। ऐसे निर्माण-कार्यों में ब्राह्मणों द्वारा विधिवत पूजन कराया जाता रहा है, और कहीं-कहीं उनमें नरबलि की प्रथा भी रही है। नरबलि के लिए हमेशा एक गैर-ब्राह्मण, गरीब और स्वस्थ व्यक्ति को ही चुना जाता रहा है, और इस खोज में कभी-कभी ब्राह्मणों द्वारा अपने शत्रु को भी साजिश के तहत मरवा दिया गया है। स्वामी जी का मायानन्द चरित्र एक ऐसा ही निर्गुण भक्ति का संत है, जो गैर-ब्राह्मण है और वेद-विरोधी होने के कारण ब्राह्मणों का शत्रु भी है। ब्राह्मणों की साजिश से राजा के सैनिकों द्वारा उसे बलि के लिए बलपूर्वक पकड़ कर लाया गया है। उसका बचना असम्भव था। इसलिए जब राजा के सामने उसे पेश किया जाता है, तब भी वह नरबलि का विरोध करता है। परंतु, राजा ब्राह्मणों के आगे मजबूर है। तब मायानन्द अपने बलिदान के लिए राजा के आगे अछूतों को स्वतंत्र करने की शर्त रखता है, जिसे स्वीकार करने के सिवा राजा के पास कोई विकल्प नहीं था। 

पेरियार ललई सिंह यादव के नाटक में माया का बलिदान वस्तुतः बलिदान ही नहीं है, वह जानबूझकर प्राण देने का आत्मघात है। वह अस्पृश्यता की दृष्टि से भी अविश्वसनीय है, क्योंकि ग्यारहवीं शताब्दी का समय इतना उदार नहीं था कि हिन्दू समाज एक अछूत के द्वारा तालाब में पानी निकालने के कार्य को स्वीकार कर लेता। जिसकी परछाईं मात्र से हिन्दू अशुद्ध हो जाता था, और जिसके छूने भर से घड़े का पानी अपवित्र हो जाता था, उस अछूत का तालाब में उतरना और पानी निकालने का कार्य भला हिन्दुओं को सहन होता? इसलिए मुझे स्वामी अछूतानन्द के नाटक में बांध और नरबलि की कल्पना ज्यादा मौलिक लगती है।

(संपादन : नवल)


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