अद्वितीय स्त्रीवादी पेरियार, जिन्होंने करीब एक सदी पहले गढ़ी लैंगिक समानता की वैज्ञानिक परिभाषा

‘वह हर चीज जो व्यक्तिगत है, वह राजनैतिक भी है,’ इस सूत्र वाक्य को आधुनिक युग में मान्यता मिलने के बहुत पहले ही पेरियार ने इसे लैंगिक समानता के अपने संघर्ष का आधार बनाया था। यही कारण है कि वे महिलाओं और पुरूषों को बराबर का भागीदार मानने वाले आत्मसम्मान विवाहों पर जोर देते थे, बता रही हैं दामिनी केन

पेरियार (17 सितंबर, 1879 – 24 दिसंबर, 1973) जिन सामाजिक परिवर्तनों की वकालत करते थे, उन्हें आज करीब एक सदी बीत जाने के बावजूद, क्रांतिकारी माना जाता है। इससे हम अनुमान लगा सकते हैं कि अपने समकालीनों के लिए पेरियार कितने क्रांतिकारी समाज सुधारक रहे होंगे। उन्होंने महिला अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष किया। महिलाओं के लिए जिन अधिकारों की मांग वे उस समय करते थे, वे आज भी हमारे पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को अप्राप्त हैं। उनका कहना था कि महिलाओं को प्रेम करने और अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने का पूर्ण अधिकार होना चाहिए7 उन्होंने हर उस प्रतिगामी प्रतिमान का विरोध किया जो महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित या बाधित करता था। उनकी राजनैतिक सोच मानवीय गरिमा, स्वतंत्रता और समानता के मूल्यों पर आधारित थी और इन्हीं मूल्यों ने महिलाओें के संबंध में उनके चिंतन को आकार दिया था।

ई. वी. रामास्वामी को ‘पेरियार (महान)’ की उपाधि मद्रास में 1938 में आयोजित तमिलनाडु वीमेन्स कान्फ्रेंस में दी गई थी। उनका तर्क था, “क्या देश की आधी आबादी के साथ मूक पशुओं से भी खराब व्यवहार करना राष्ट्रीय अपराध नहीं है?” (वीरामणी, 2011)

पेरियार की मान्यता थी कि “ऐसी कोई भी संहिता जो पुरूषों को अपनी महिलाओं के साथ जानवरों से भी खराब व्यवहार करने की सलाह देती है, वह बर्बर संहिता है्, जिसे केवल बर्बर लोग ही स्वीकार कर सकते हैं।” उन्होंने ब्राम्हणों की श्रेष्ठता और जातिगत व लैंगिक असमानताओं को प्रतिपादित करने वाले धर्मग्रंथों का समालोचनात्मक अध्ययन किया। इन ग्रंथों के उनके गहन अध्ययन के निष्कर्ष को हम तिरूचिरापल्ली में उनकी मूर्ति के नीचे लगी पट्टिका में पढ़ सकते हैं। उसमें कहा गया है, “ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है। ईश्वर का अविष्कारक मूर्ख है। ईश्वर का प्रचार करने वाला लुच्चा है और ईश्वर की आराधना करने वाला बर्बर है।” (गुहा, 2010: 242-261)

आत्मसम्मान आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी

आत्मसम्मान आंदोलन पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष था और उसने सामाजिक समानता की लड़ाई पूरी आक्रामकता से लड़ी। इस आंदोलन में महिलाओं की उल्लेखनीय भूमिका थी। आंदोलन की प्रमुख महिला कार्यकर्ताओं में शामिल थीं के. वी. कामाटची, नागाममई, के. ई. वीरा कल्याणी, मुवालूर रामामिरथममई और एस. आर. कन्नाममल। आत्मसम्मान सम्मेलनों में महिलाओं की स्वतंत्रता, गरिमा और स्वाभिमान के समर्थन में अनेक क्रांतिकारी और प्रगतिशील प्रस्ताव पारित किए गए। 

के. विजया ने इन सम्मेलनों की कार्यवाही का तफसील से वर्णन किया है। प्रथम आत्मसम्मान सम्मेलन 1929 में हुआ था, जिसमें पारित एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव में कहा गया था “इस सम्मेलन की यह राय है कि पारिवारिक संपत्ति के उत्तराधिकार के मामले में लड़कियों और लड़कों में बराबरी होनी चाहिए।”  सन् 1930 में आयोजित द्वितीय आत्मसम्मान सम्मेलन में घोषित किया गया कि “विवाह के लिए लड़कियों की न्यूनतम आयु 16 वर्ष और लड़कों की 19 वर्ष होनी चाहिए और अंतरजातीय विवाहों को प्रोत्साहित करने के लिए कानून बनाया जाना चाहिए।” तीसरा सम्मेलन 1931 में हुआ, जिसमें विधवा विवाह, तलाक के अधिकार और देवदासी प्रथा के उन्मूलन के संबंध में प्रस्ताव पारित किए गए। (विजया: 1993) 

ब्राम्हणवाद मुक्त शिक्षा की ओर

सन् 1927 में मद्रास के पचईअप्पा हॉल में भाषण देते हुए पेरियार ने रूढ़िवाद को बढ़ावा देने वाली ब्राम्हणवादी शिक्षा और प्रगतिशील शिक्षा के बीच विभेद करते हुए कहा, “वैदिक काल की शिक्षा इंग्लैड, यूरोप या अरब प्रायद्वीप के इतिहास की तरह नहीं थी। ना ही वह शेक्सपियर या मैकाले की किताबों की तरह थी। उन दिनों केवल नैतिक शिक्षा दी जाती थी। जो नैतिक सिद्धांत पढ़ाए जाते थे, वे ही आगे चलकर वेद बने और हमारे लिए वेदों को पढ़ना प्रतिबंधित है।” उसी भाषण में ब्राह्मणों के पाखंड और उनके कर्म के सिद्धांत के खोखलेपन को उजागर करते हुए उन्होंने कहा, “अगर आप ब्राह्मण से पूछेंगे कि जन्मकुंडली के सभी गुणों का मिलान करने के बाद भी इस विवाह में ऐसा क्यों हुआ तो वह कहेगा कि ‘ये दंपत्ति के कर्मों का फल है। इसमें मैं क्या कर सकता हूं’ और अगर उससे पूछा जाए कि यदि सभी को अपने कर्मों का फल ही भोगना है तो उसने कुंडलियां क्यों मिलाईं, ढ़ेर सारे अनुष्ठान क्यों किए और पैसा क्यों लिया, तो वह कहेगा कि ‘तुम मूर्ख हो’। अगर किसी दंपत्ति को बच्चे नहीं होंगें तो वह कहेगा कि तुम्हें कम से कम एक बच्चा तो होना ही चाहिए। काशी जाओ, रामेश्वरम जाओ, दान पुण्य करो, ईश्वर की आराधना करो वरना तुम नर्क में जाओगे।” (गुहा, 2010: 251, 253)

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के. वीरामणी के अनुसार, पेरियार की यह मान्यता थी कि “यह (आत्मसम्मान आंदोलन से प्रेरित) शिक्षा प्रणाली महिलाओं और पुरूषों के लिए एक समान होगी और उनके व्यावहारिक जीवन के लिए उपयोगी होगी। वह उन्हें भय और अंधविश्वासों से मुक्त कराएगी।” (वीरामणी, 1991) 

आत्मसम्मान आंदोलन ऐसी पुस्तकों के पठन-पाठन को प्रोत्साहित करता था जिनमें युवा विधवाओं की दुर्दशा का वर्णन होता था ताकि अज्ञानी और दकियानूसी लोगों को शिक्षित किया जा सके। (एंटोनी)

प्रेम

पेरियार के अनुसार, “अगर किसी व्यक्ति के मन में दूसरे लिंग के किसी व्यक्ति के प्रति सच्चा प्रेम उत्पन्न हो जाए तो वह प्रेम स्थायी रूप से उसके ह्रदय में स्थापित हो जाता है और फिर उस व्यक्ति के मन में किसी अन्य व्यक्ति के प्रति कामवासना, आसक्ति आदि नहीं जागती।” (वीरामणीः 1992) पेरियार के अनुसार, वैवाहिक संबंधों की स्थापना केवल दोनों संबंधित व्यक्तियों का निर्णय होना चाहिए और किसी युगल पर उनके परिवारों द्वारा कोई रिश्ता लादा नहीं जाना चाहिए। वे पूछते थे कि कोई तीसरा व्यक्ति आखिर कैसे यह तय कर सकता है कि किन्हीं दो अन्य व्यक्तियों के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। आज जब कुछ राजनैतिक-सामाजिक समूह विवाहित युगलों पर सिर्फ इसलिए हमला करते हैं क्योंकि उन्हें उनका परस्पर रिश्ता मंजूर नहीं है तब हमें पेरियार की और उनकी इस मान्यता की याद आना स्वाभाविक है कि विवाह के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार केवल और केवल विवाह करने वालों का होना चाहिए।  

सतीत्व व व्यभिचार

पेरियार का कहना था कि सतीत्व की अवधारणा मूलतः स्त्री-द्वेषी है क्योंकि वह केवल स्त्रियों पर लागू की जाती है और उसका उद्देश्य उनकी कामेच्छा पर नियंत्रण रखना है। उनका कहना था कि आर्य विमर्श में ‘पवित्र स्त्री’ की जो अवधारणा है वह महिलाओं और उनके पतियों के बीच गुलाम-मालिक और प्रजा-राजा का रिश्ता कायम करती है। महिलाओं के दिमाग में यह भर दिया जाता है कि पुरूष उनसे उच्च हैं। पेरियार का यह मानना था कि महिलाओं को यदि सच्चे अर्थों में स्वतंत्रता प्रदान की जानी है तो लैंगिक पूर्वाग्रह पर आधारित सतीत्व की अवधारणा को समाप्त करना होगा। सतीत्व पर बात करते हुए पेरियार दैनिक जीवन की उन वर्जनाओं और नियमों पर तीखे हमले करते थे जो महिलाओं को उनके पति की संपत्ति बनाते थे। वे जोर देकर कहते थे कि चूंकि ‘आज्ञाकारिता’, ‘सतीत्व’ व ‘व्यभिचार’ जैसी अवधारणाएं पुरूषों पर लागू नहीं होतीं अतः वे केवल महिलाओं का दमन करने के लिए बनाईं गईं हैं। पेरियार यह मानते थे कि सतीत्व और व्यभिचार की अवधारणाएं कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा अपने हित साधने के लिए गढ़ी गई हैं और महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता में बाधक हैं।

विवाह

पेरियार लिखते हैं, “जिस तरह ब्राह्मणवाद ने श्रमजीवियों के एक बड़े वर्ग को शूद्र के रूप में जीवन जीने के लिए मजबूर कर दिया है, उसी तरह विवाह की संस्था, महिलाओं को गुलामी का जीवन जीने के लिए मजबूर करती है।” (अनईमथ्थूर, 1974) पेरियार ने विवाह की संस्था की गहन पड़ताल इसलिए की, क्योंकि उसे पवित्र माना जाता था और समाज उसपर कोई प्रश्न नहीं उठाता था। शास्त्रों ने विवाह के बारे में किसी भी चर्चा को घर की चहारदीवारी तक सीमित कर दिया था। अगर कोई पत्नी इस ‘लक्ष्मण-रेखा’ को पार करने का प्रयास करती थी तो इसे एक गंभीर अपराध समझा जाता था और वह महिला स्वयं को खतरे में डाले बिना ऐसा नहीं कर सकती थी। ब्राम्हणवादी विचारधारा, पुरूषों को महिलाओं का मालिक और उनकी नैतिकता का चौकीदार मानती थी। पेरियार के लिए न्याय सर्वोपरि था और इसलिए उन्होंने ब्राम्हणवादी विवाह की संस्था की कड़ी आलोचना की और ‘आत्सम्मान विवाह’ के रूप में उसका विकल्प प्रस्तुत किया। जरूरत पड़ने पर इन विवाहों को समाप्त करने का विकल्प दंपत्तियों को उपलब्ध रहता था। पेरियार का मानना था कि विवाह को दैवीय या पवित्र घोषित करना एक धोखा है। उनका तर्क था कि अगर, जैसा कि दावा किया जाता है, विवाह दैवीय और स्थायी रिश्ता है तो उसमें इतनी कमियां, जटिलताएं और उलझनें क्यों होती हैं? (पेरियार, 2009) 

पेरियार (दाएं) व एक आत्मसम्मान विवाह समारोह में पेरियार

आत्मसम्मान विवाह परस्पर सम्मान और स्वीकृति पर आधारित थे। वे ‘दैवीय विवाह’ की अवधारणा का खंडन करते थे और लैंगिक समानता के प्रतिपादक थे। ललिता धारा लिखती हैं, “पेरियार ने 1929 में आत्माभिमान विवाह (सेल्फ-रिस्पेक्ट मैरिज या एसआरएम) की जिस अवधारणा का विकास और प्रतिपादन किया, वह एक अनूठा मास्टर स्ट्रोक था। यह अवधारणा विवाह को दो व्यक्तियों के बीच एक ऐसे समझौते के रूप में देखती थी, जिसमें जाति, वर्ग या धर्म के लिए कोई जगह नहीं थी और जिसके लिए न तो पुरोहितों की आवश्यकता थी और ना ही अभिवावकों की सहमति की। इसमें विवाह सदा के लिए पवित्र बंधन न होकर दो समकक्ष व्यक्तियों के बीच समझौता था, जिसे दोनों में से कोई भी पक्ष जब चाहे समाप्त कर सकता था। विवाह स्वर्ग में ईश्वर द्वारा नहीं वरन धरती पर दो व्यक्तियों द्वारा परस्पर समझौते से निर्धारित किये जाते थे।” (धारा, 2016) आत्माभिमान आंदोलन की महिला कार्यकर्ता, जो इस आंदोलन के सिद्वांतों के अनुरूप विवाहित थीं, जाति, राष्ट्रवाद और पितृसत्तात्मकता के विरूद्ध खुलकर बोलती थीं। (गीता, 1998) 

लुई एंटोनी के अनुसार, “आत्मसम्मान विवाह तार्किकता पर आधारित थे। ऐसे विवाह करने वाले पुरूषों और नारियों का दर्जा समान होता था। इन विवाहों से महिलाएं सड़ी-गली परंपराओं और गुलामी और शोषण की जंजीरों से मुक्त हो जाती थीं।”

गर्भनिरोधक उपाय

पेरियार का मानना था कि महिलाओं और स्वतंत्रता और स्वायत्तता के लिए गर्भनिरोधक उपाय आवश्यक हैं जबकि अन्य लोग महिलाओं और बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य, देश की अर्थव्यवस्था में सुधार और पैतृक संपत्ति के विभाजन रोकने जैसे कारणों से इन उपायों  की वकालत करते थे। पेरियार के लिए महिला अधिकार अपने आप में साध्य थे; किसी साध्य को पाने के साधन नहीं। उनका मानना था कि बच्चे पैदा करना महिलाओं के लिए आवश्यक नहीं होना चाहिए। इसलिए वे गर्भनिरोधक उपायों को महिलाओं के उत्थान के लिए ज़रूरी मानते थे। 

वैध्वय व संपत्ति अधिकार

पेरियार की मान्यता थी कि हमारे समाज में विधवाओें को जो कष्ट भोगने पड़ते हैं उसके पीछे शक्तिशालियों का शक्तिहीनों को अपने अधीन रखने का षड़यंत्र है। उन्होंने स्वयं एक युवा विधवा की पुनर्विवाह करने में मदद की थी। 

अपनी रचना “पेन येन अदिमय्यानल” में पेरियार लिखते हैं, “हिन्दू धर्म में संपत्ति और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवियां महिला हैं। फिर हिन्दू महिलाओं को शिक्षा और संपत्ति का अधिकार क्यों नहीं देते। महिलाओं के दमन का एक बहुत बड़ा कारण यह है कि उन्हें संपत्ति का अधिकार नहीं है।” उनका कहना था कि पारिवारिक संपत्ति का लड़के व लड़कियों के बीच समान विभाजन होना चाहिए ताकि महिलाएं स्वतंत्र रूप से जीवनयापन कर सकें और उन्हें पुरूषों के बराबर दर्जा मिल सके। उनका मानना था कि महिलाओं को संपत्ति के अधिकार से वंचित किया जाना उनकी प्रगति की राह में एक बड़ा रोड़ा है। 

पेरियार, स्त्रीवादी आदर्शों के बड़े पैरोकार थे, परंतु उनका आग्रह केवल महिलाओें को सार्वजनिक जीवन में अधिक स्थान दिए जाने तक सीमित नहीं था। वे महिलाओं को उनके घर में बराबरी का दर्जा दिए जाने के पक्षधर थे। वे महिलाओं को कमजोर मानने के विरोधी थे और उनकी मान्यता थी कि देश को एक क्रांतिकारी सामाजिक आंदोलन की ज़रुरत है। “हर चीज जो व्यक्तिगत है वह राजनैतिक भी है” इस सूत्र वाक्य को आधुनिक युग में मान्यता मिलने के बहुत पहले पेरियार ने इसे लैंगिक समानता के अपने संघर्ष का आधार बनाया था। वे पुरूषत्व की अवधारणा को तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे और उसे महिलाओं का गुलाम बनाने का साधन मानते थे। जाति विरोधी आंदोलन के भाग के रूप में महिला अधिकारों के आंदोलन के इतिहास में पेरियार का अनूठा स्थान है।  

सन्दर्भ :

  • वीरामणी, के/ (2011). थॉट्स ऑफ़ पेरियार. चेन्नई: द्रविड़ कषघम पब्लिकेशन्स
  • गुहा, आर. (सम्पादित). (2010). मेकर्स ऑफ़ मॉडर्न इंडिया. पेंगुइन, नयी दिल्ली: 2010
  • विजया, के. (1993). “रोल ऑफ़ वीमेन इन सेल्फ-रेस्पेक्ट मूवमेंट” प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस, खंड 54, 1993, पृष्ठ 591-597 www.jstor.org/stable/44143032 से 1 सितम्बर 2020 को लिया गया. 
  • वीरामणी, के. (1992) पेरियार ऑन विमेंस राइट्स. मद्रास. एमराल्ड पब्लिशर्स
  • एनटोनी, एल. (अप्रकाशित). पॉलिटिकल फिलोसफी ऑफ़ पेरियार 
  • पेरियार, ई.वी. (2009). वीमेन एन स्लेवड (अनुवाद: जी. एलॉयसीयस). नयी दिल्ली: क्रिटिकल क्वेस्ट
  • अनैमुथ्हू, वी. (सम्पादित). (1974).पेरियार ई.बी. रा सिथानैकल (पेरियार के विचार), तीन खंड, सिंथानेयालर पथिप्पगम: त्रिचीनोपोली (एक सीमित संस्करण के रूप में कई खण्डों में पुनर्प्रकाशित, 2000)  
  • धारा, एल. (2016). फॉरवर्ड प्रेस. https://www.forwardpress.in/2016/07/women-called-him-periyar-or-the-great-one/ से 1 सितम्बर 2020 को लिया गया.
  • गीता, वी. (1998). “पेरियार, वीमेन एंड एन एथिक ऑफ़ सिटीजनशिप” इकनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली, वर्ष 33, अंक 17, 1998, पृष्ठ डब्ल्यूएस9-डब्ल्यूएस15  www.jstor.org/stable/4406695 से 1 सितम्बर 2020 को लिया गया. 

(अनुवादः अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल)


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