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गोदान का कथ्य : वर्ण-जाति व्यवस्था ही भारतीय समाज की धुरी है

वर्ण-जाति व्यवस्था ही भारतीय समाज की धुरी है, इसे रेखांकित करने वाली दो अलग-अलग विधाओं की कृतियां- ‘जाति का विनाश’ और ‘गोदान’ एक ही वर्ष 1936 में ही प्रकाशित होती हैं। प्रेमचंद की कालजयी रचना ‘गोदान’ का पुनर्पाठ कर रहे हैं सिद्धार्थ

एक श्रेष्ठ उपन्यास से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपने युग के नाभिकीय यथार्थ को सृजनात्मक तरीके से अभिव्यक्त करे। मार्क्स और एंगेल्स अपने मित्रों को सलाह दिया करते थे कि वे फ्रांस में पूंजीवाद के उदय को जानने–समझने के लिए आर्थिक इतिहासकारों के उबाऊ ब्योरों के बजाय बाल्जाक के उपन्यास पढ़ें। मार्क्स ने यह भी लिखा है कि फ्रांस के इतिहास को उन्होंने, जितना बाल्जाक के उपन्यासों से समझा, उतना फ्रांसीसी इतिहासकारों की किताबों से नहीं समझ पाए।

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लेखक के बारे में

डॉ. सिद्धार्थ रामू

डॉ. सिद्धार्थ रामू लेखक, पत्रकार और अनुवादक हैं। “सामाजिक क्रांति की योद्धा सावित्रीबाई फुले : जीवन के विविध आयाम” एवं “बहुजन नवजागरण और प्रतिरोध के विविध स्वर : बहुजन नायक और नायिकाएं” इनकी प्रकाशित पुस्तकें है। इन्होंने बद्रीनारायण की किताब “कांशीराम : लीडर ऑफ दलित्स” का हिंदी अनुवाद 'बहुजन नायक कांशीराम' नाम से किया है, जो राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है। साथ ही इन्होंने डॉ. आंबेडकर की किताब “जाति का विनाश” (अनुवादक : राजकिशोर) का एनोटेटेड संस्करण तैयार किया है, जो फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित है।

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