आधुनिक केरल के निर्माण में दलित साहित्य और आंदोलन को रेखांकित करती एक किताब

समीक्षाधीन पुस्तक में केरल में दलित साहित्य का मूल्यांकन लेखक डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी ने तीन स्तरों पर किया है। बीसवीं शताब्दी के केरल रेनेसां के रूप में, अंग्रेज मिशनरियों द्वारा किये गए आर्थिक व सामाजिक सुधारों के रूप में और नारायण गुरु, कुमारन आशान, अय्यंकालि, योहन्नान आदि के क्रन्तिकारी समाज सुधार आंदोलनों के रूप में। पूनम तुषामड़ की समीक्षा

पुस्तक समीक्षा

हाल के वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर दलित आंदोलनों को लेकर चर्चाओं में तेज़ी आई है। फिर चाहे वह रोहित वेम्युला की सांस्थानिक हत्या के बाद उपजा आक्रोश हो या फिर एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम को कमजोर करता सुप्रीम कोर्ट का फैसला, दलितों ने यह दिखा दिया है कि अब वे न झुकने वाले हैं और ना ही रूकने वाले हैं। दलित आंदोलनों के बदलते स्वरूप पर चर्चा करने के पहले यह समझना आवश्यक है कि यह सब अचानक नहीं हुआ है। इसके पीछे संघर्ष की एक लंबी दास्तान है। कमोवेश देश के हर हिस्से में दलित अपने अधिकारों को लेकर अपने-अपने तरीके से आंदोलनरत रहे हैं। महाराष्ट्र को इसका एक प्रमुख केंद्र माना जा सकता है – खासकर, डॉ. आंबेडकर के संघर्ष काल (1915 से लेकर 1956 तक) को। लेकिन दक्षिण के राज्यों में हुए आंदोलनों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

दरअसल, भाषाई कारणों से दक्षिण के आंदोलनों की अनुगूंज हिन्दी प्रदेशों तक नहीं पहुंची है। परन्तु हाल के वर्षों में इस दिशा में प्रयास हुए हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी द्वारा लिखित पुस्तक ‘केरल में सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य’ इसका एक उदाहरण है। उत्तर भारतीय लेखकों एवं पाठकों की रूचि सामान्यतः उत्तर भारतीय साहित्य को पढ़ने-जानने तक ही सीमित रहती है। उसमें भी किसी भी शोध की समीक्षा और आलोचना की गुणवत्ता एवं प्रासंगिकता पर तो हम आज भी विचार नहीं करते। हम केवल वही साहित्य पढ़कर संतुष्ट हो जाते हैं जो हमें सरलता से उपलब्ध हो जाता है। 

डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी की दलित साहित्य एवं स्त्री विमर्श पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी पुस्तकों की भाषा शोधपरक होते हुए भी बेहद सरल, सहज होती है। ‘केरल में सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य’ को पढ़ते हुए उनकी इसी शैली से साक्षात्कार होता है। यह पुस्तक दक्षिण भारत में हुए सामाजिक परिवर्तन एवं आंदोलनों से तो हमें परिचित कराती ही है साथ ही इन आंदोलनों के लिए पृष्ठभूमि तैयार करने वाली विभिन्न परिस्थितियों और क्रांतिकारी योद्धाओं द्वारा किये गए संघर्षों का सिलसिलेवार तथ्यात्मक ब्यौरा भी देती हैं।

समीक्षित पुस्तक ‘केरल में सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य’ का कवर पृष्ठ

अपनी पुस्तक के माध्यम से लेखक ने केरल की आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों का वर्णन तो किया ही है, साथ ही दक्षिण भारत में अनेक जातियों के बीच धार्मिक एवं आर्थिक स्तर पर होने वाले भेदभाव को भी भी बेहद तार्किक रूप में प्रस्तुत किया है। उदाहरण के लिए पुस्तक की भूमिका के प्रारम्भ में ही लेखक ने स्पष्ट किया है, “1910 के पहले केरल की समाज व्यवस्था कई मामलों में शेष भारत से भिन्न थी। यहां की जातिप्रथा अपनी जड़ता, क्रूरता और विचित्रता के लिए जानी जाती थी। यह व्यवस्था पिछड़ों और दलितों के प्रति घोर असंवेदनशील थी और इसकी विचित्रता, असमीपता अदृश्यता और अस्पृश्यता में व्यक्त होती थी। यहां देखने भर से छूत लग जाती थी। दो भिन्न जातियों के लोग कितनी दूरी बनाकर रहेंगे यह तय था। यह दूरी कदमों से नापी जाती थी।”

पुस्तक में केरल में दलित साहित्य का मूल्यांकन लेखक ने तीन स्तरों पर किया है। सर्वप्रथम बीसवीं शताब्दी के केरल रेनेसां के रूप में, दूसरा अंग्रेज मिशनरियों द्वारा किये गए आर्थिक व सामाजिक सुधारों के रूप में और तीसरा नारायण गुरु, कुमारन आशान, अय्यंकालि, योहन्नान आदि के क्रन्तिकारी समाज सुधार आंदोलनों के रूप में। लेखक स्पष्ट करते हैं कि “जाति के पिरामिड के कंगूरे पर बैठे ब्राह्मण से इजावा को छत्तीस कदम की दूरी बनाकर रखना पड़ती थी।” यह पूरी तरह कठोर जाति मर्यादा में बंधा हुआ समाज था।

पुस्तक के दूसरे अध्याय “केरल में दास प्रथा” में लेखक अनेक उदाहरणों से दासों की भयावह दशा का वर्णन करते हैं। “मेजर वाकर ने मलाबार पर लिखी अपनी रपट (1848) में बताया है कि चेरमन (दास) परम संपत्ति हैं। वे जागीर के पशुधन का हिस्सा हैं। जमीन की खरीद-बिक्री के क्रम में जरुरी नहीं कि उन्हें भी ख़रीदा बेचा जाए। दोनों (चल व अचल) सम्पत्तियां अलग-अलग हाथों में जा सकती हैं।”

“नेटिव लाइफ इन त्रावणकोर” (1883) में मतिर ने लिखा हैं कि दासों को पशुओं की तरह ख़रीदा और बेचा जाता है और उनके साथ अक्सर जानवरों से भी ज्यादा बुरी तरह से व्यवहार किया जाता है। इनके मालिकों के पास पहले इन्हें कोड़े से पीटने और जंजीर में बांध कर रखने का अधिकार था।

उन्नीसवीं शताब्दी में त्रावणकोर में ईसाई मिशनरियों के द्वारा धर्मपरिवर्तन के प्रयासों से इन निम्न कही जाने वाली जातियों की सामाजिक दासता की बेड़ियां टूटीं। सन् 1810 में जनरल मुनरो के कार्यकाल में दलितों (ईसाई) का हौसला बढ़ा। इस हौसले का पहला ऐतिहासिक प्रस्फुटन चानार (शनार) विद्रोह के नाम से जाना जाता है। चानार दलित जाति थी जो त्रावणकोर के दक्षिण में रहती थी।

पुस्तक के छठे अध्याय में लेखक ने दलित आंदोलन के अग्रदूत के रूप में दलित नायक “अय्यंकालि” के दलितों की दशा सुधरने संबंधी कार्यों, संघर्षों और आंदोलनों का रोचक एवं विस्तृत वर्णन किया है। इसी अध्याय के पृष्ठ संख्या 91 में लेखक लिखते हैं. “पी. राजगोपालाचारी ने अय्यंकालि की याचिका पर एक अनुकूल आदेश 1907 में ही जारी कर दिया था और दलित बच्चों को सरकारी स्कूल में प्रवेश देने की संस्तुति कर दी थी, किन्तु अधीनस्थ कर्मचारियों ने इस आदेश को दबा दिया। लेकिन यह आदेश दबाया न जा सका। अय्यंकालि ने अपने समुदाय से कहा कि “शिक्षा का अधिकार यूं ही नहीं बदलने वाला है। इसके लिए उन्हें खुद आगे आकर संघर्ष करना होगा। जोखिम उठाना होगा।” यहां दलित नायक अय्यंकालि का किरदार डॉ. आंबेडकर के विचारों के समकक्ष नज़र आता है।

आगे “केरल में कम्युनिस्ट आंदोलन और जाति उन्मूलन की दिशा” जैसे महत्वपूर्ण अध्याय हैं, जिनमें मलाबार में कम्युनिज़्म के उद्भव का इतिहास लिखने वाले दिलीप मेनन उसे सिर्फ राजनीतिक आंदोलन मानने से इंकार करते हैं। अपने एक महत्वपूर्ण निबंध में रॉबिन जेफ्री ने रेखांकित किया है कि “यह संघर्ष जाति आधारित शोषण के विरुद्ध था। केरल में मार्क्सवाद को सफलता मिलने की एक बड़ी वजह जाति व्यवस्था के मूल्यों को तोड़ने में उसकी भूमिका रही है।” 

लेखक ने केरल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का भी बारीकी से अध्ययन एवं विश्लेषण करते हुए मलयालम भाषा के लोकगीतों पर भी प्रकाश डाला है, जिनमें दलित समाज का प्रतिरोध और पीड़ा झलकती है। इनमें से एक तुनचेतु एषुतचान हैं जो तथाकथित निम्न जाति (चाकल) में पैदा हुए थे। उनके साहित्यिक योगदान को ‘प्रतिरोध’ के रूप में देखा जाता है। आज का दलित साहित्य खुद को पाट्ट परंपरा से जुड़ा मानता है। लेखक ने पाट्ट परंपरा में दलितों द्वारा लिखे गए सुन्दर गीतों का उदाहरण भी पुस्तक में प्रस्तुत किया है। छुआछुत की समस्या को एक पुलयन पाट्ट में इस प्रकार देखा गया है :

छूने से कोई काला हो जाएगा ?
कोई गोरा हो जाएगा ?
कोई लाल हो जाएगा ?
फिर कैसी छुआछूत?
अभिजातों की छुआछूत।

दक्षिण भारत में जाति व्यवस्था की गहनता का अंदाज़ा आपको ‘पाट्ट पुलयन’ के गीतों की परम्परा से भली भांति हो जाएगा। इस अध्याय में लेखक ने ऐसे अनेक महत्वपूर्ण गीतों को शामिल किया है जो कृषि मजदूर से लेकर मछुआरों के जीवन की पीड़ा और वेदना को दर्शाते हैं।

लेखक ने केरल के दलित साहित्य में स्त्री स्वर को भी प्रमुखता के साथ कलमबद्ध किया है। 24वें अध्याय “दलित कविता का विस्तार : स्त्री स्वर” इस दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।  दलित स्त्रियों के जीवन की कठिनाइयों और चुनौतियों को लेखक ने उनकी चुनिंदा कविताओं के उद्दरणों के माध्यम से पुस्तक में उद्धृत किया है। मसलन शिवदास पुरामेरी (1966) के संग्रह ‘चोर्नेलिक्कुन्ना मुरि’ (टपकता कमरा) की कविता ‘पानी के सबक’ का ‘विषाद संगीत’ इन शब्दों में व्यक्त होता है :

हृदय में शुरू होती है खुदाई
शब्दों के पौधे उखाड़ लिए जाते हैं
बूंदें बिला जाती हैं, छाती की पथरीली दरारों में
चूसकर सूखा दी जाती हैं ,मधुर संकल्पनाएं
आत्म के अंतरतम की, करुणा के झरने
जिंदगी की कविता और संगीत/चेतना का गंदला तालाब।

दलित स्त्री की कविता पर विचार करते हुए लेखक ने दलित साहित्य लेखन में स्त्रियों की उपस्थिति कम होने को लेकर भी विचार किया है किन्तु फिर भी दलित स्त्री की उपस्थिति बेहद निर्भीक स्तर पर कविता में विस्तार पाती है। के.के. निर्मला की कविता इसका सटीक उदाहरण है :

एक दिन आउंगी मैं
दबावों के चलते नहीं,
न किसी की दासी बनकर
तनी हुई रीढ़ के साथ,
किसी के सामने झुकती हुई नहीं
बगैर किसी चूक के…
अगर कोई अदालत है, दुनिया में
होगी सिर्फ मेरी
होगा सिर्फ मेरा कानून
उसमें होंगे केवल कठोर दंड

लेखक के अनुसार, कवयित्री ने इस कविता में अन्याय और उत्पीड़न का उग्र प्रतिकार किया है। दलित कविता में स्त्रियों की भागीदारी दक्षिण में भी कम ही रही है, किन्तु दलित महिलाओं की जो कविताएं आप इस पुस्तक में देखेंगे उससे दक्षिण के दलित आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका पर एक समझ विकसित होगी। दरअसल, दलित कविता आंदोलन में ‘स्त्री स्वर’ पर भी उसी प्रकार के वामपंथी विचारों का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है जैसा केरल के अधिकांश दलित आंदोलनों पर देखा गया। कुल मिलाकर लेखक बजरंग बिहारी तिवारी द्वारा लिखी गई यह पुस्तक पाठकों को केरल में हुए ऐतिहासिक परिवर्तनों को समझने के साथ-साथ वहां के वामपंथी एवं दलित आन्दोलनों की साहित्यिक एवं सामाजिक स्थितियों से भी अवगत कराती है। यह शोधपरक कार्य दलित साहित्य को तो समृद्ध करेगा। साथ ही, यह दलित साहित्य पर शोधरत छात्रों के लिए भी महत्वपूर्ण नवीन साहित्यिक सामग्री उपलब्ध कराएगा। 

समीक्षित पुस्तक : केरल में सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य 

लेखक: डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी 

प्रकाशक : नवारुण प्रकाशन, नई दिल्ली

मूल्य : 490 रुपए (अजिल्द), 950 रुपए (सजिल्द)

(संपादन : नवल/अमरीश)


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