मान्यवर आज होते तो देश पर दलितों-वंचितों का राज होता

उनका यह प्रयास रहा कि पिछड़े और दलित एक हों। वे मानते थे कि जिस दिन देश के दलित-पिछड़े एक हो जाएंगे, उन्हें इस देश का शासक होने से कोई नहीं रोक सकेगा। कांशीराम से जुड़े अपने संस्मरण बता रहे हैं बिहार सरकार के पूर्व मंत्री श्याम रजक

कांशीराम (15 मार्च, 1934 – 9 अक्टूबर, 2006) पर विशेष

मान्यवर कांशीराम ऐसी शख्सियतों में शामिल रहे, जिनकी आंखों में समतामूलक समाज का सपना था। हर समय अपने इसी सपने को पूरा करने में वे लगे रहे। आज भी जब मैं उन्हें याद करता हूं तो मुझे उनकी आंखों की चमक दिखायी देती है, उनके वे शब्द कानों में गूंजने लगते हैं जो उन्होंने मुझसे भी कहे। उनसे अनेक बार मुलाकातें हुईं। तब भी जब मैं विधायक और मंत्री नहीं था। 

उन दिनों मैं भूतपूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी के साथ था। कई अवसरों पर चंद्रशेखर जी और मान्यवर के बीच हुई मुलाकातों का साक्षी रहा हूं। दोनों घंटों तक इसी बात पर विचार करते कि कैसे समाज समतामूलक बने। जो विकास के क्रम में पीछे रह गया है, उसे आगे लाया जाय। कई बार ऐसा होता कि चंद्रशेखर जी कुछ कहते और मान्यवर असहमत होते तो वे अपनी असहमति व्यक्त भी करते। कई बार तो उन्होंने चंद्रशेखर जी को डांटा भी। लेकिन यह उन दोनों की परस्पर दोस्ती थी। न चंद्रशेखर जी को उनकी डांट बुरी लगती थी और ना ही मान्यवर को। उस दौरान मेरी खुशकिस्मती यह होती कि मैं दोनों की बातचीत को गौर से सुनता और देखता था कि कैसे देश के दो बड़े नेता एक साझा सवाल पर विचार मंथन करते हैं। 

मान्यवर कांशीराम(15 मार्च, 1934 – 9 अक्टूबर, 2006)

मुझे लगता है कि मान्यवर कांशीराम ने जो सपना देखा और उसे पूरा करने को अपना घर-बार छोड़कर निकल पड़े, वह उन्हें अलग श्रेणी में रखता है। उन दिनों जब वे देश भर के दलित-पिछड़ों को एकजुट करने का अभियान चला रहे थे तब उसकी अनुगूंज बिहार में भी सुनाई दी। उन्होंने बिहार में भी इसके प्रयास किए कि दलित वर्ग के विभिन्न जातियों के बीच एकता हो, पिछड़ों में एकता कायम हो। उनका यह प्रयास रहा कि पिछड़े और दलित एक हों। वे मानते थे कि जिस दिन देश के दलित-पिछड़े एक हो जाएंगे, उन्हें इस देश का शासक होने से कोई नहीं रोक सकेगा।

आज जब मान्यवर हमारे बीच नहीं हैं तो लगता है कि उनका कहा कथन हमारे बीच है। मुझे तो वह पल याद आता है जब लालू प्रसाद जी और मान्यवर की मुलाकात हुई। मैं इस मुलाकात का भी गवाह बना। यह बेहद खास पल था जब मान्यवर ने लालू प्रसाद जी के सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को सराहा और उन्हें दलितों को विकास की मुख्यधारा में लाने के संबंध में अपनी बातें कहीं। जब वे ऐसा कह रहे थे तो यह लग रहा था कि दोनों भविष्य के भारत की परिकल्पना को मजबूत आधार दे रहे हों। 

मान्यवर ब्राह्मणवाद को हर हाल में त्याज्य मानते थे। वे मानते थे कि जबतक ब्राह्मणवाद है, तबतक समाज में भेदभाव बना रहेगा। यह भेदभाव केवल ऊंची और निम्न वर्ग की जातियों तक सीमित नहीं है। असल में यह भेदभाव जातियों के अंदर तक है। मान्यवर इन बातों परिचित थे। वे कहते थे कि चमार जाति के लोग अन्य दलितों के साथ आएं। वाल्मीकि समाज के लोग पासवान व अन्य दलित जातियों के साथ आएं। ऐसा नहीं होगा कि सभी अपनी-अपनी जातियों के खोल में सिमटे रहे।

मुझे एक संस्मरण याद आ रहा है। तब मैं बिहार सरकार में राज्यमंत्री था और मुख्यमंत्री थीं राबड़ी देवी। तब उनके लिए हवाई जहाज में सीट आरक्षण से लेकर बिहार प्रवास में उनके साथ रहने की जिम्मेदारी मेरी होती थी। उस समय उन्हें नालंदा एक कार्यक्रम में शामिल होने जाना था। मैं भी उनके साथ हेलीकॉप्टर से गया। सुबह का समय था। मान्यवर को मधुमेह की बीमारी थी। इसलिए उन्हें इंसुलिन लेना पड़ता था। वे अपनी जांघ में इंसुलिन लेते थे। वे गुस्सैल भी थे। लेकिन उनका गुस्सा थोड़ी देर के लिए ही रहता था। उस दिन हुआ यह कि हेलीकॉप्टर से उतरकर हम सीधे सरकारी गेस्ट हाऊस पहुंचे। उन्हें इंसुलिन लेना था। उनके एक सहयोगी ने उन्हें इंसुलिन का इंजेक्शन लाकर दिया। इंसुलिन लेने के पहले कुछ खाना जरूरी होता है। लेकिन तबतक मान्यवर ने कुछ खाया नहीं था। वे नाराज हो गए। फिर उन्होंने मुझसे कहा। मैंने उनके लिए सुबह के नाश्ते का इंतजाम कराया। तब उन्होंने इंसुलिन लिया।

खास बात यह कि इस पूरी यात्रा के दौरान एक पल भी ऐसा नहीं था जब मान्यवर ने समाज के संबंध में अपनी बातें नहीं कही। वे अपना अनुभव सुनाते रहे और मुझे बताते रहे कि यदि इस देश में वंचितों को शासक बनना है तो इसकी भूख बढ़ानी होगी। लोगों को यह बताना होगा कि वे शासक बन सकते हैं और उन सभी पर अपना अधिकार हासिल कर सकते हैं, जिससे उन्हें सदियों से वंचित रखा गया है।

बातचीत में ही वे अपनी इस पीड़ा की अभिव्यक्ति भी करते थे कि बिहार में उन्हें निराशा मिली थी। वजह यह कि यहां जिस तरह की एकता वह दलितों और पिछड़ों में देखना चाहते थे, वह नहीं बन पाई। मैं आज भी यह मानता हूं कि यदि बिहार में आज दलित निर्णायक होने के बावजूद सत्ता में उनकी भागीदारी नगण्य है तो इसकी वजह एकता का नहीं होना ही है।

मेरी अपनी मान्यता है कि जिस तरह का आंदोलन पेरियार, डॉ. आंबेडकर और मान्यवर कांशीराम ने खड़ा किया, वह यदि उसी समर्पण व प्रतिबद्धता के साथ जारी रहता तो कोई सवाल ही नहीं था कि इस देश के शासक वे होते जो सदियों से वंचित रखे गए। मान्यवर ने अपना जीवन इसी उद्देश्य के लिए समर्पित कर दिया। यदि आज वे होते तो निश्चित तौर पर भारत की तस्वीर दूसरी होती।

(संपादन : नवल)

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  1. Rajnish Kumar roy Reply

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