पटना में उपलब्ध है बौद्ध धर्म से जुड़ी पांडुलिपियों की दुर्लभ किताब, राहुल सांकृत्यायन और काशी प्रसाद जायसवाल की थी विशेष भूमिका

राहुल सांकृत्यायन द्वारा तिब्बत से लायी गईं पांडुलिपियां आज भी पटना संग्रहालय परिसर में स्थित बिहार रिसर्च सोसायटी में संरक्षित हैं। वर्ष 1998 में एक खास किताब का प्रकाशन जापान की एक संस्था के सहयोग से किया गया। दुर्लभ पांडुलिपियों की यह किताब बिक्री के लिए भी उपलब्ध है, बता रहे हैं गुलजार हुसैन

दुनिया की सबसे महंगी किताब ‘द कोडेक्स लिसेस्टर बुक’ है, जो असल में लियोनार्डो द विंसी की हस्तलिखित पांडुलिपि है। वर्तमान ने यह किताब, बिल गेट्स के पास है। बिल गेट्स ने इस किताब को 200.2 करोड़ रुपए में खरीदा और वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बनाया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में एक किताब ऐसी भी है जिसकी कीमत सवा लाख रुपए है? यह किताब बिक्री के लिए सहज रूप से उपलब्ध है। यह किताब बौद्ध धर्म पर आधारित है और इसका प्रकाशन बिहार रिसर्च सोसायटी और जापान की संस्था नारीतासन इंस्टीट्यूट ऑफ बुद्धिस्ट स्टडीज ने संयुक्त रूप से वर्ष 1998 में किया। भारत में इस किताब की कीमत सवा लाख रुपए है। जबकि जापान में इसकी कीमत करीब दो लाख रुपए है।

इस किताब को खोजने का श्रेय राहुल सांकृत्यायन को जाता है। बिहार रिसर्च सोसाइटी, पटना के प्रभारी डॉ. शिवकुमार मिश्र ने इस संबंध में दूरभाष पर जानकारी दी कि यह किताब बेहद खास है। यह बौद्ध धर्माचार्य धर्मकीर्ति द्वारा लिखे गए ग्रंथों के आधार पर टीकाओं का संग्रह है। इसमें प्रमाण वार्तिक भाष्य, प्रमाण वार्तिक वृत्ति और प्रमाण वार्तिक स्ववृत्ति शामिल है। इन तीनों टीकाओं के रचनाकार क्रमश: कर्णक गोमिन, प्रज्ञाकर गुप्त और मनोरथ नंदिन थे। ये तीनों छठी-सातवीं शताब्दी में नालंदा विश्वविद्यालय के शोधार्थी छात्र थे।

पटना संग्रहालय के परिसर में बिहार रिसर्च सोसायटी में संरक्षित हैं बौद्ध धर्म की पांडुलिपियां

शिव कुमार मिश्र के अनुसार इस किताब के बारे में समझने के लिए बौद्ध धर्म के संदर्भ में राहुल सांकृत्यायन की भूमिका को जानना ज़रूरी है। बिहार रिसर्च सोसायटी के संस्थापक संपादक रहे काशी प्रसाद जायसवाल की सक्रियता के कारण यह मुमकिन हो सका। उन दिनों उन्होंने ही संस्था की ओर राहुल सांकृत्यायन को वित्तीय सहायता उपलब्ध करायी, जिसके जरिए राहुल तिब्बत जाकर वहां से बौद्ध धर्म से संबंधित पांडुलिपियां ला सके। अधिकांश पांडुलिपियां अभी भी ताम्रपत्र व तालपत्र पर हैं, जिन्हें विशेष तरीके से संरक्षित किए जाने की आवश्यकता है। कुछ ताम्रपत्रों पर सोने-चांदी के अक्षरों से लिखी पांडुलिपियां हैं।

शिव कुमार मिश्र के मुताबिक, नालंदा विश्वविद्यालय को खंडहर बनाए जाने के बाद भी वहां बड़ी संख्या में पांडुलिपियां मौजूद थीं। उन्हें तिब्बत से आए बौद्ध शिक्षक व शोधार्थी अपने साथ ले गए। वहां ले जाकर उन्होंने पांडुलिपियों का अनुवाद तिब्बती में कर दिया। वहीं कुछ पांडुलिपियां अपने मूल रूप में रहीं, जिन्हें लाने की इजाजत राहुल सांकृत्यायन को नहीं मिली। ऐसे में उन्होंने फिल्म के रूप में पांडुलिपियों को संरक्षित कर लिया। वर्ष 1990 के दशक में नारीतासन इंस्टीट्यूट ऑफ बुद्धिस्ट स्टडीज और बिहार रिसर्च सोसायटी ने संयुक्त पहल कर लाई गयी फिल्मों को किताब के रूप में प्रकाशित किया है। यह अभी भी मूल रूप से पाली भाषा में ही है।

राहुल सांकृत्यायन व काशी प्रसाद जायसवाल की तस्वीर

सांकृत्यायन के उल्लेखनीय कार्यों के बारे में विस्तार से शिव कुमार मिश्र बताते हैं। वे कहते हैं कि हिंदी पट्टी में जो बौद्ध दिखाई देते हैं, वे या तो बाहर के हैं या फिर हाल के वर्षों में बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले लोग। जैसे सारनाथ में जो बौद्ध हैं वे तिब्बत मूल के हैं। साहित्य के क्षेत्र में बड़ा योगदान देने वाले सांकृत्यायन ने बौद्ध धर्म में रुचि के कारण पाली, प्राकृत, अपभ्रंश सहित कई भाषाओं को सीखा और बौद्ध धर्म से जुड़े दस्तावेजों को संरक्षित किया।

बौद्ध धर्म के दुर्लभ ग्रंथों को बचाने के लिए उन्हें अनेकानेक तकलीफों का सामना करना पड़ा। बौद्ध ग्रंथों की खोज में मीलों भटकते रहे। दुर्गम पहाड़ियों और नदी-नालों को पार करने के बाद वे भारत में ग्रंथों को सुरक्षित पहुंचा पाए। बेहद कष्टप्रद यात्रा करने के बाद वे तिब्बत और चीन तक गए और वे सारे जरूरी ग्रंथों को बचा लिया, जो आज भारत की धरोहर हैं। ये ग्रंथ पटना संग्रहालय में सुरक्षित हैं, लेकिन दुख की बात यह है कि सरकार इसकी सुध नहीं ले रही है।

पटना संग्रहालय में बिहार रिसर्च सोसायटी का मुख्य द्वार

मिश्र कहते हैं कि अब तक लोग केवल यह जानते हैं कि बख्तियार ने नालंदा को जला दिया, लेकिन उससे पहले ही जो महत्वपूर्ण बौद्ध ग्रंथ तिब्बत ले जाए गए उन्हें सुरक्षित रूप में लाने का बड़ा काम सांकृत्यायन ने किया। यह बहुत सालों से हो रहा था कि तिब्बत के बौद्ध विद्वान अपने साथ बहुमूल्य ग्रंथों को ले जाते थे। वहां तिब्बत की भाषा में ग्रंथों का अनुवाद किया जाता था। तो ऐसे में भारत से ले जाए गए बहुमूल्य ग्रंथ वहां के मठों और विद्वानों के घरों में रखे थे। इन सबके बारे में पता लगाने का काम सांकृत्यायन ने किया और उन ग्रंथों को भारत में लाये। मिश्र ने कहा कि इन ग्रंथों को लाने के लिए सांकृत्यायन ने चार बार दुर्गम यात्राएं की। बिहार रिसर्च सोसायटी की ओर से उनको फंडिंग की जाती थी। इस सोसायटी में उनके मित्र थे काशी प्रसाद जायसवाल। वे यहां के संपादक थे।

शिव मिश्र बताते हैं कि यह बातें बौद्ध विशेषज्ञों, पाठकों और विश्व के बुद्धिस्ट स्टडी करने वाले लोगों को अच्छी तरह पता है। बिहार रिसर्च सोसायटी में जो विश्व के बौद्ध विद्वान आते हैं, वे इन ग्रंथों को एकबार जरूर देखना चाहते हैं। विदेश से आने वाले विद्वानों को सांकृत्यायन के लाए गए ग्रंथ की पांडुलिपियों के बारे में पूरी जानकारी होती है। जर्मनी, जापान, अमेरिका या फ्रांस से जो विद्वान आते हैं, वे यह कहते हैं कि फलां पांडुलिपि का बंडल दिखाइए।

मिश्र अफसोस जताते हुए बताते हैं कि किसी भी राजनीतिक पार्टी के एक भी नेता ने बौद्ध धर्म के धरोहरों का संरक्षण करने वाली बिहार रिसर्च सोसाइटी को लेकर कोई रुचि नहीं दिखाई। हम चाहते थे कि केंद्र सरकार इसे संरक्षित करे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हमें कई मुकदमे लड़ने पड़े, तब जाकर बिहार सरकार ने मजबूरन अपने अधीन लिया। लेकिन अब भी सब कागजी ही है। धरातल पर कुछ नहीं।

(संपादन : नवल/अमरीश)


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