कोरोना के कहर के बीच जातिवादी शोर और अरविंद कुमार को अंतिम विदायी

बीते सप्ताह सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर कोरोना से जुड़ी सूचनाओं की भरमार रही। वहीं अगरतल्ला के डीएम शैलेश कुमार यादव से जुड़ी खबर सहित कुछ अन्य खबरें भी चर्चा में रहीं। दुखद खबर यह कि हिंदी को समृद्ध करने वाले भाषाविद् अरविंद कुमार का निधन हो गया

दलित-बहुजन इस सप्ताह

भारत में कोरोना के कारण स्थिति दिन-ब-दिन चिंताजनक होती जा रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आधिकारिक वेबसाइट पर जारी आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। हालात यह हैं कि हर दिन कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या नया रिकार्ड बना रही है। बीते 29 अप्रैल को रात साढ़े ग्यारह बजे जो आंकड़े जारी किए गए, उनके मुताबिक एक दिन में रिकार्ड 3 लाख 86 हजार 645 संक्रमितों की पहचान 24 घंटे के अंदर हुई। वहीं इस दौरान 3457 लोगों की मौत हुई। सबसे अधिक संक्रमितों की पहचान महाराष्ट्र में हुई जहां 66 हजार 159 लोग संक्रमित पाए गए। मृतकों की संख्या के मामले में भी 771 लोगों की मौत के साथ महाराष्ट्र पहले नंबर पर रहा। देश में कोरोना की चपेट में आने वालों की संख्या 1 करोड़ 83 लाख 76 हजार 524 हो गई है। वहीं सोशल मीडिया पर बीते सप्ताह कोरोना से होने वाली मौतों, ऑक्सीजन की कमी और दवाइयों के संकट से संबंधित खबरें प्रमुख रहीं। लेकिन सुर्खियों में रही 28 अप्रैल, 2021 को त्रिपुरा की राजधानी अगरतल्ला के जिलाधिकारी डॉ. शैलेश कुमार यादव द्वारा एक शादी समारोह में की गई छापेमारी। 

अगरतल्ला में ब्राह्मण पुरोहित को नियम सिखाना डीएम को पड़ा महंगा

दरअसल, सोशल मीडिया पर जो वीडियो वायरल हुआ, उसमें डीएम डॉ. शैलेश कुमार यादव दलबल के साथ एक मैरिज हॉल में लोगों को भगाते दिख रहे हैं। इस वीडियो में वह बता रहे हैं कि अगरतल्ला में रात के दस बजे के बाद से रात्रि कर्फ्यू है। लेकिन मैरिज हॉल में नियमों का उल्लंघन किया जा रहा था। इसलिए उन्होंने कार्रवाई की। इस वीडियो में जिस बात को लेकर जिलाधिकारी की आलोचना हो रही है, उसके मूल में एक ब्राह्मण पुरोहित की पिटाई है। इसे लेकर जहां एक तरफ सवर्ण जिलाधिकारी की आलोचना करते नजर आए तो दलित-बहुजनों ने उनकी तारीफ की। हालांकि बढ़ते विरोध के कारण डॉ. शैलेश यादव ने माफी भी मांग ली है।

अगरतल्ला के जिलाधिकारी डॉ. शैलेश कुमार यादव

इस संबंध में जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य की प्रोफेसर हेमलता महिश्वर ने भी अपना पोस्ट शेयर किया। उन्होंने लिखा कि “ब्राह्मणवाद के खोखलेपन को ज़ाहिर करते हुए जैसे ही कोई सैद्धांतिक तर्क रखिए, अधिकतर ब्राह्मणवादी ब्राह्मण व्यक्तिगत आक्रमण करने लगते हैं। सत्तर सालों के लोकतंत्र में रहकर भी नहीं सुधरे।”

वहीं जाने माने पत्रकार दिलीप मंडल ने इस संबंध में लिखा कि “अगर अगरतला डीएम शैलेश यादव के ख़िलाफ़ ब्राह्मण समाज अपना जातिवादी अभियान बंद नहीं करता तो यादव समाज को शादी, जन्म, मरण आदि में ब्राह्मणों को बुलाना बंद कर देना चाहिए। मेहनतकश और गौरवशाली यादव जाति बाक़ी ओबीसी को रास्ता दिखाए। आप किसी का दिया नहीं खाते। #IStandWithShaileshYadav”

आईआईटी खड़गपुर की महिला प्रोफेसर ने लांघी मर्यादाएं, एनसीबीसी ने लिया संज्ञान

कोरोना के आर्तनाद के बीच जातिवादी प्रलाप करने वालों में आईआईटी, खड़गपुर की अंग्रेजी साहित्य की प्रोफेसर सीमा सिंह का नाम भी बीते सप्ताह सुर्खियों में रहा। उनका एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें वह एक ऑनलाइन क्लास में एससी व एसटी छात्रों के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करती दिख रही हैं। इस कारण उनसे संबंधित पोस्ट सुर्खियों में रहे। इस संबंध में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने अपने एक पत्र में प्रो. सीमा सिंह के खिलाफ जांच कराने की बात कही है तथा केंद्र सरकार व राज्य सरकार से 15 दिनों के अंदर जवाब मांगा है। इसके अलावा 800 से अधिक छात्रों ने खुला पत्र लिखकर प्रो. सीमा सिंह के इस्तीफे की मांग की है। यह विडंबना ही है कि सीमा सिंह द्वारा सह-लिखित एक अन्य शोधप्रबंध, “लर्निंग टू लर्न फ्रॉम द अदर: सबाल्टर्न लाइफ नैरेटिव, एव्रीडे क्लासरूम एंड क्रिटिकल पीडेगोगी”, का सारांश कहता है कि “जब वर्ग, नस्ल, जाति, लिंग, त्वचा के रंग और समाज को अमानवीय बनाने वाली अन्य ऐसी समस्याएं हों तब शिक्षा इससे बेखबर नहीं रह सकती कि समाज में क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है और किसके हित में हो रहा है।”

हिंदी साहित्य जगत को थिसॉरस का तोहफा देने वाले अरविंद कुमार का निधन

बीते 26 अप्रैल, 2021 को हिंदी का वृहद शब्दकोश तैयार करने वाले अरविंद कुमार का निधन कोरोना की वजह से हो गया। वे दिल्ली के एक निजी अस्पताल में इलाजरत थे। उनके निधन की सूचना पर देश भर के बुद्धिजीवियों ने शोक संदश विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर शेयर किया। अपनी टिप्पणी में जाने-मान बहुजन पत्रकार उर्मिलेश ने लिखा कि “बहुत बड़ी क्षति-सचमुच अपूरणीय. हिंदी का पहला समांतर कोश (थिसॉरस) तैयार करने वाले भाषाविद्, माधुरी के पूर्व संपादक और कई महत्वपूर्ण पुस्तकों के लेखक अरविंद कुमार नहीं रहे। अंतिम समय तक वह अपने भावी प्रकल्पो को पूरा करने में लगे रहे. अरविंद जी 91 वर्ष के थे। बेहद अध्ययनशील, अनुशासन-प्रिय और मेहनती होने के चलते ही उन्होने अपने जीवन में इतने महत्वपूर्ण काम किये। इसमें उनकी विदुषी जीवन-संगिनी कुसुम जी की भी उल्लेखनीय भूमिका रही। उनसे मेरा संपर्क बहुत बाद का है, वह भी सोशल मीडिया के माध्यम से। लेकिन कम समय के औपचारिक परिचय के बाद भी मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनका बौद्धिक-संरक्षण और स्नेह मिला। अरविंद जी ने जो काम किये हैं, वह उन्हें हिंदी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता के इतिहास में हमेशा जिंदा रखेंगे…”

हिंदी समानांतर कोश के जनक अरविंद कुमार

अरविंद कुमार बहुजन समाज की वैचारिकी को मजबूती प्रदान करने वाले साहित्यकार रहे। फारवर्ड प्रेस पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख में उन्होंने लिखा है कि “पचास आदि दशक में मैं कांग्रेस छोड़ कर कम्यूनिस्ट पार्टी का उत्साही सदस्य बना था। कांग्रेस में हम नौजवान गांधी जी के उद्धार आंदोलन के अंतर्गत ‘हरिजन’ बस्तियों में शिक्षा का प्रसार करने, बच्चों और बुज़ुर्गों को पढ़ाने जाया करते थे, कम्यूनिस्ट पार्टी की करौल बाग़ ब्रांच में मुझे चित्रकार रामकुमार, उनके छोटे भाई चिन्तक व लेखक निर्मल वर्मा और भविष्य के सुप्रसिद्ध चित्रकार स्वामीनाथन से निकट संपर्क का सौभाग्य मिला और मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा भी। जिला स्तर की एक मीटिंग में मैं अपने अज्ञानवश निर्मल से पूछ बैठा– ‘कामरेड, हमारी हरिजन नीति क्या है?’ मुझे एक बिल्कुल अस्वीकार्य समाधान दिया गया, ‘साम्यवाद में पूंजीवादी, सर्वहारा आदि वर्ग होते हैं हरिजन इनमें से कुछ भी नहीं है इसलिए इस संबंध में हमारी कोई अलग नीति हो ही नहीं सकती, मैं उत्तर से संतुष्ट तो नहीं था, पर सोचा कि कोई गंभीर बात है जो बाद में समझ में आएगी। साठ आदि दशक आते आते न निर्मल साम्यवादी रहे थे, न मैं। अफ़सोस की बात यह रही कि निर्मल हिंदूवाद के पैरोकार बन गए, और मै उस का कट्टर विरोधी था, और अब तक हूं।”

कोरोना काल में भी नहीं थम रहा जातिवादी उत्पीड़न

बिहार में कोरोना काल में भी जातिवादी उत्पीड़न व अत्याचार का दौर जारी है। इस संबंध में एक वीडियो सोशल मीडिया बीते 27 अप्रैल को वायरल हुआ। यह वीडियो बिहार के नवादा जिले के रोह प्रखंड के कुंज पंचायत के दिरमोबारा गांव का है। वीडियो में एक दलित युवक के हाथ-पांव बांधकर मरणासन्न अवस्था तक पिटाई करते हुए दिखाया गया है। 28 अप्रैल, 2021 को दैनिक भास्कर द्वारा प्रकाशित खबर के मुताबिक सामंती मानसिकता वाले ऊंची जातियों के लोगों ने दलित युवक को न केवल पीटा बल्कि उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। 

 सिद्दीकी कप्पन को लेकर शीर्ष अदालत में जिरह

सुप्रीम कोर्ट के नवनियुक्त मुख्य न्यायाधीश एनबी रमण, न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायाधीश ए एस बोपन्ना की खंडपीठ ने बीते 28 अप्रैल को केरल के पत्रकार सिद्दीकी कप्पन का इलाज दिल्ली के किसी अस्पताल में कराने का निर्देश उत्तर प्रदेश की सरकार को दिया। 

बताते चलें कि कप्पन को पिछले साल तब गिरफ्तार कर लिया गया था जब वे हाथरस में मनीषा वाल्मीकि बलात्कार व सांस्थानिक हत्या की रिपोर्ट कवर करने जा रहे थे। उनके उपर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया से संबंध रखने का आरोप उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लगाया गया है तथा उनके खिलाफ यूएपीए एक्ट के तहत मामला दर्ज है।

खंडपीठ के सामने यूपी सरकार की पैरवी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने की। उन्होंने खंडपीठ पर आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा कि किसी कोरोना मरीज के बजाय कप्पन को बेड कैसे दिया जा सकता है। ऐसे आरोपी को विशेष सुविधाएं क्यों दी जानी चाहिए जो किसी प्रतिबंधित संगठन का सदस्य रहा हो। 

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस प्रकरण को इंसानियत के नजरिए से देखे जाने की आवश्यकता है।

प्रेमकुमार मणि की पत्नी और बेटों ने जीती कोरोना से जंग

बिहार के चर्चित साहित्यकार व बहुजन विचारक प्रेमकुमार मणि की पत्नी ममता मणि व उनके दोनों बेटे कोरोना से जंग जीत चुके हैं। इस संबंध में उनके पुत्र आलोक मणि ने अपने पोस्ट में लिखा कि “कोविड से हम तीन मैं, माँ और भाई बीते 8 अप्रैल को संक्रमित हुए। कहीं न कहीं हमने सावधानी नहीं बरती। जंग जारी थी। उसी बीच मां की तबियत 19 अप्रैल को ज्यादा बिगड़ गई। स्थिति नाजुक थी। मां की बात थी। मैंने हिम्मत जुटाई। परिवार से बहन-भाई ने हिम्मत दी। मां को लेकर अस्पताल पहुंचा। 5 घंटे तक एक अस्पताल का चक्कर काटने के बाद भी बेड न मिला। मेरे साथ मेरी मां और छोटे मामा थे। मामा ने 4-5 घंटे तक ऑक्सीजन की व्यवस्था की। हालत नाजुक होती जा रही थी। सबने एम्स, पटना से संपर्क किया। काफी मुश्किल के बाद एक बेड मिला। हमने करीब आधी रात को मां को एडमिट करवाया। अगले दिन एम्स से आदेश हुआ कि प्लाज्मा लाइए। कई लोगों ने मदद की कोशिश की, पर कुछ भी हो न सका। जैसे-तैसे एम्स ने ही प्लाज्मा की व्यवस्था की। फिर दो दिनों के बाद मां को आईसीयू में ले जाना पड़ा। मां ने हिम्मत नहीं हारी। वो जूझती रहीं। धीरे-धीरे स्थिति में सुधार हुआ। मां ने अपनी लड़ाई खुद लड़ी। चिकित्सकों ने काफी साथ दिया। उन तमाम हेल्थ वर्कर्स का भी शुक्रिया जो दिन-रात एम्स में मेहनत कर रहे है। छोटे मामा, बहन, भाई परिवार के सभी लोगों का शुक्रिया। पापा जी ने अपना मन मजबूत रखा। वे झुके नहीं और दिन-रात मां के लिए चिंतित रहे। और आज माँ घर आ गई।”

(संपादन : अनिल)


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